Aug १७, २०१६ ११:३२ Asia/Kolkata

सोहरवर्दी  का पूरा नाम शेख शहाबुद्दीन अबुल फ़ुतूह यहया बिन हब्श सोहरवर्दी था किंतु वे सोहरवर्दी के नाम से विख्यात हुए।

सोहरवर्दी ने इस्लामी दर्शनशास्त्र के प्रचार एवं प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।  उनको “फल्सफ़ए इशराक़” या इशराक़ी विचारधारा का जनक माना जाता है।  वास्तव में सोहरवर्दी ने ही इशराक़ी विचारधारा की आधारशिला रखी थी।

हमने आपको पिछले कार्यक्रम में बताया था कि सोहरवर्दी के नाम से विश्वविख्यात दर्शनशास्त्री, शेख शहाबुद्दीन अबुल फ़ुतूह यहया बिन हब्श का जन्म सन 549 हिजरी क़मरी में ईरान के ज़ंज़ान क्षत्र के एक गांव, सोहरवर्द में हुआ था।  सन 587 हिजरी क़मरी में हलब के कुछ धर्मगुरूओं के एक षडयंत्र के अन्तर्गत, सलाहुद्दीन अय्यूबी के आदेश पर सोहरवर्दी जैसे महान दार्शनिक की हत्या कर दी गई।  सोहरवर्दी की कुल आयु 38 वर्ष थी किंतु इसी दौरान उन्होंने ज्ञान विशेषकर दर्शनशास्त्र के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किये।  महान दार्शनिक सोहरवर्दी की हत्या के बारे में प्रोफ़ेसर इब्राहीम का कहना है कि सोहरवर्दी पर ज़रतुश्ती या पारसी धर्म के अनुसरणकर्ता होने का आरोप लगाकर उनकी हत्या की गई जबकि मेरा मानना है कि वे मुसलमान और ईश्वर के बहुत बड़े उपासक थे।  वे कहते हैं कि यदि सोहरवर्दी जैसे महान दार्शनिक की हत्या न की जाती और वे कुछ और जीवित रह जाते तो संसार उनसे और अधिक लाभान्वित होता। सोहरवर्दी की महत्वपूर्ण रचनाओं के नाम इस प्रकार हैं, हिक्मतुल इशराक़, तल्वीहात, मुक़ावेमत, मशारे व मुतारेहात, परतोनामे, हैकलुन्नूर, अल्वाहे एमादी, रेसालतुत्तैर, आवाज़े पुर जिबरईल, अक़्ले सुर्ख़, रूज़ी बा जमाअते सूफ़ियान, रिसालतुन फ़ी हालत्तितुफ़ूलिया, रेसालतुन फ़ी हक़ीक़तुल इश्क़ व वारेदात और तक़दीसात आदि।  उनकी इन रचनाओं में से अधिकांश अरबी भाषा में हैं जबकि कुछ फ़ार्सी में हैं।

सोहरवर्दी की रचनाओं में एसी पुस्तकें भी हैं जिनमें सांकेतिक ढंग से या फिर उदाहरण के साथ कहानियों को पेश किया गया है।  इन रचनाओं की महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इनके अध्धयन से हमें सोहरवर्दी के विचारों और उनकी दार्शनिक सोच का पता चलता है जो एक प्रकार से सोहरवर्दी की विचारधारा का पता देती हैं।  सोहरवर्दी के बारे में पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने के लिए हमें उनकी उन कहानियों का अध्ययन करना होगा जिनकों उन्होंने उदाहरणों या मिसालों के साथ पेश किया है।  यह रचनाएं, सोहरवर्दी की वे रचनाए हैं जिनमें उनके आध्यात्मिक अनुभवों को रहस्यमई ढंग से पेश किया गया है।  उनकी प्रत्येक पुस्तक में आंतिरक अनुभवों को स्पष्ट करने के साथ ही कुछ रहस्यों से पर्दा उठाया गया है।  सोहरवर्दी ने अपनी इन रचनाओं में बहुत ही सुन्दर ढंग से सृष्टि के मनमोहक दृश्यों और आध्यात्मिक चरणों का उल्लेख किया है।  इससे उनका अभिप्राय यह है कि मनुष्य को उसके उच्च लक्ष्य से अवगत करवाया जाए जिसे वह भूल चुका है।

इशराक़ी विचारधारा के जनक सोहरवर्दी पर यह भी आरोप लगाया गया कि उनमें इस्लाम विरोधी झुकाव पाया जाता है।  उनके विरोधियों का कहना था कि वे इस्लाम के मुक़ाबले में ज़रतुश्ती धर्म को पुनर्जीवित करना चाहते हैं।  हालांकि यह बात पूरी तरह से निराधार है।  सोहरवर्दी एक विद्वान थे और उनको ज़रतुश्ती धर्म के बारे में पूरी जानकारी थी।  वे प्राचीन ईरान के इतिहास से भलिभांति अवगत थे किंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि उनकी विचारधारा इस्लाम विरोधी थी।  वे तर्कों से साथ अपनी बात कहा करते थे और इस्लाम को सिद्ध करने के लिए तर्कपूर्ण दलीलें देते थे।

अरबी भाषा का एक शब्द है, “रम्ज़”।  इसका अर्थ होता है राज़ या रहस्य।  छिपी हुई बात को इशारों में कहने को भी रम्ज़ कहा जाता है।  सोहरवर्दी ने अपनी रचनाओं में बहुत सी बातें इशारों में कही हैं।  इस बारे में वर्तमान काल के एक शोधकर्ता डाक्टर तक़ीपूर नामदारयान लिखते हैं कि रहस्यमई बातें वे होती हैं जिन्हें इशारों में कहा जाता है और उसका सुनने या पढ़ने वाला पहली बार में केवल उसके विदित रूप को समझता है जबकि जानकार लोग उसकी गहराई को समझ जाते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि सोहरवर्दी ने अपने बहुत से विचारों को रहस्यमई ढंग से जो बयान किया है उसके कुछ मुख्य कारण हैं।  पहला कारण तो यह है कि रचना या वार्ता को रहस्यमई ढंग से पेश करने में उसकी सुन्दरता बढ़ती है।  दूसरा कारण यह है कि इससे बात या लेख महत्वपूर्ण बन जाता है।  सोहरवर्दी को शब्दों के निहित अर्थों की गहरी समझ थी।  अपनी बात को कहने के लिए उन्होंने पुरानी परंपराओं और प्राचीन आस्थाओं को भी माध्यम बनाया है।  कभी कभी इशारों में बात करने से अपनी बात कह दी जाती है और उसे हरएक आसानी से समझ भी नहीं पाता।  इशारों में या रहस्यमय ढंग से बात करने में वास्तव में कुछ छिपी हुई बातों को दूसरों से छिपाना होता है।  यह विषय, प्राचीन साहित्य में स्पष्ट रूप में दिखाई देता है।

सोहरवर्दी की बहुत सी बातें पढ़ने के बाद पहली बार में समझ में नहीं आतीं और उनकी काव्य शैली से आम लोग परिचित नहीं हैं।  यही कारण है कि उनके साहित्य को पढ़कर पहली बार में हो सकता है कि कोई उससे प्रभावित ही न हो किंतु एसे बहुत से विद्धान और दर्शनशास्त्री गुज़रे हैं जिन्होंने सोहरवर्दी के साहित्य और उनके लेखों से लाभ उठाया और वे उनसे बहुत प्रभावित हुए।  सोहरवर्दी और उनकी रचनाओं से लोग दो तरह से प्रभावित हुए।  कुछ लोगों ने इशराक़ी विचारधारा को पूर्ण रूप से स्वीकार कर लिया।  इस प्रकार के लोगों ने सोहरवर्दी की विचारधारा से पूरा लाभ उठाया और उन्होंने सूफ़ीज़्म या अंतरज्ञान से परिचित होने के लिए सोहरवर्दी की शैली को अपनाया।  अत्तार ने अपनी पुस्तक “मंतिक़ुत्तैर और मौलवी ने मस्नवी में सोहरवर्दी की रहस्यमई लेखन शैली को अपनाया है।  हालांकि एसा नहीं है कि सोहरवर्दी ही इस शैली के जनक हैं बल्कि उनसे पहले वालों ने भी इस शैली का प्रयोग किया है किंतु कहते हैं कि सोहरवर्दी ने इस शैली को बहुत ही अच्छे ढंग से अपनी रचनाओं में प्रयोग किया है।

बहुत से साहित्यकारों और सूफ़ियों ने सोहरवर्दी के आध्यात्मिक विचारों से भरपूर लाभ उठाया है।  इस प्रकार से कहा जा सकता है कि बाद वाले दार्शनिकों पर सोहरवर्दी जैसे महान दर्शनशास्त्री का प्रभाव है।  कहते हैं कि सूफ़ी कवियों में हाफ़िज़ वे कवि हैं जिनपर आध्यात्मिक विचारों का अधिक एहसान है।  हालांकि मौलवी ने अपनी रचनाओं में सोहरवर्दी की काव्य शैली को अपनाया है किंतु यह बात पूरे विश्वास के साथ कही जा सकती है कि दोनों में बहुत अंतर है और सोहरवर्दी की शैली अधिक प्रभावी है।