Aug २७, २०१६ १२:२९ Asia/Kolkata

हम इस्लाम से पहले और उसके बाद रय के इतिहास से अवगत हुए थे और हमने इस क्षेत्र में मौजूद मूल्यवान एतिहासिक धरोहरों की ओर संकेत किया था परंतु इस क्षेत्र में शाह अब्दुल अज़ीम और उनके हरम के साथ ताहिर और हमज़ा नाम के दो इमामज़ादों की भी क़ब्रें हैं जिसने हर चीज़ से अधिक रय शहर के महत्व को बढ़ा दिया है।

इस प्रकार से कि इन पवित्र धार्मिक स्थलों के अस्तित्व के कारण पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों से प्रेम करने और श्रृद्धा रखने वाले हज़ारों लोग प्रतिवर्ष ईरान और विश्व के दूसरे देशों से दर्शन के लिए यहां आते हैं।

इस बात के दृष्टिगत कि शाह अब्दुल अज़ीम का हरम महत्वपूर्ण दर्शन स्थलों में से है हमने आज के कार्यक्रम को शाह अब्दुल अज़ीम और उनके हरम के अंदर स्थित दो इमामज़ादों के मज़ार के परिचय से विशेष किया है। आशा है सदा हमारा यह प्रयास भी आपको पसंद आयेगा।

 

रय शहर की सड़कों और मोहल्लों से गुज़रने के बाद विभिन्न छोटे- 2 बाज़ारों में पहुंचते हैं और अचानक हज़रत शाह अब्दुल अज़कि की भव्य रौज़ा दिखाई देने लगता है। बहुत से लोगों को जहां रौज़े के समक्ष श्रृद्धा व्यक्त करते हुए देखा जा सकता है वहीं बहुत से लोग रौज़े के भीतर जाने के प्रयास कर रहे होते हैं। शाह अब्दुल अज़ीम के रौज़े के भीतर जहां बहुत से लोग नमाज़, दुआ और नौहा पढ़ रहे होते हैं वहीं हरम के कुछ सेवक हरम के भीतर और ज़रीह पर गुलाब जल छिड़क रहे होते हैं जिससे बड़ा ही आध्यात्मिक वातावरण उत्पन्न हो गया है। चारों ओर से दुआ की मनमोहक व आकर्षक आवाज़ें सुनाई देती हैं और वहां के आध्यात्मिक वातावरण को देखकर इंसान की आत्मा परलोक की याद करने लगती है और वह स्वयं को इस सांसारिक बंधन से मुक्ति दिलाना चाहती है। यहां दर्शन करने वाले इसलिए आते हैं ताकि दिल पर जमी ज़ंग को छुड़ा सकें और हल्का होकर जायें।

 

हज़रत शाह अब्दुल अज़ीम पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों के वंशज में हैं। उनका जन्म 173 हिजरी क़मरी में पवित्र नगर मदीना में हुआ था। शाह अब्दुल अज़ीम का अपने समय में ज्ञान के क्षेत्र में बहुत अच्छा व विशेष स्थान था और उनकी गणना विद्वानों और पैग़म्बरे इस्लाम तथा उनके पवित्र परिजनों के कथनों को बयान करने वालों में होती है। इसी प्रकार शाह अब्दुल अज़ीम पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों के विश्वास पात्र थे।

 

हज़रत शाह अब्दुल अज़ीम ने जब देखा कि अत्याचारी शासक मुतव्वकिल इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम के हित व पक्ष में अन्याय कर रहा है तो उन्होंने अत्याचारी बनी अब्बास शासन की वास्तविकताओं को बयान और उसका विरोध करना आरंभ कर दिया। शाह अब्दुल अज़ीम के ज्ञान और योग्यता के कारण इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करके रय नगर भेज दिया।

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शाह अब्दुल अज़ीम ने 75 वर्ष की उम्र में रय की ओर पलायन किया और इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम के प्रतिनिधि के रूप में वहां पर लोगों की कठिनाइयों व प्रश्नों का समाधान करना आरंभ कर दिया। शाह अब्दुल अज़ीम के रय प्रवास के दौरान वहां के लोगों ने उनके ज्ञान से लाभ उठाया। शाह अब्दुल अज़ीम ने “ख़ुतबे अमीरूल मोमेनिन” और “यौम व लैल” नाम की दो मूल्यवान किताबें भी लिखी हैं। अंततः 15 शव्वाल 252 हिजरी क़मरी को रय शहर में शाह अब्दुल अज़ीम का स्वर्गवास हो गया। ईरान के रय नगर के लोगों के निकट शाह अब्दुल अज़ीम का स्थान इतना ऊंचा था कि लोगों ने उनकी पावन समाधि पर दर्शन के लिए एक भव्य रौज़े का निर्माण कर दिया।

हज़रत शाह अब्दुल अज़ीम के रौज़े का एक लंबा इतिहास है जो इस समय एक बड़े काम्प्लेक्स की सूरत में है और हज़ारों लोग उसके दर्शन के लिए आते हैं। हज़रत शाह अब्दुल अज़ीम का जो रौज़ा है वह दूसरे बड़े दर्शनीय स्थलों की भांति आरंभ में एक हरम था यानी एक केन्द्रीय इमारत थी और उससे लगी दूसरी इमारतों का निर्माण धीरे -धीरे हुआ और इस समय वह एक बड़े काम्प्लेक्स का रूप धारण कर गया है जिसमें बड़े बड़े हाल, प्रांगण और बरामदे आदि हैं। हज़रत शाह अब्दुल अज़ीम के हरम में इमामज़ादा ताहिर और इमामज़ादा हमज़ा की जो इमारतें हैं वे भी हज़रत शाह अब्दुल अज़ीम की इमारत का भाग समझी जाती हैं। हज़रत शाह अब्दुल अज़ीम की पावन समाधि पर पहली इमारत कब बनी उसके बारे में सूक्ष्म जानकारी नहीं है। हरम की इमारत के निर्माण के संबंध में जो सबसे पुराना दस्तावेज़ मिला है वह इस बात का सूचक है कि हरम का मुख्य द्वार ईंटों का है और उसमें उसके निर्माणकर्ता का नाम  यानी बरकियारक सल्जूक़ी के काल के मंत्री मज्दुल मुल्क क़ुम्मी का नाम लिखा हुआ है परंतु हालिया वर्षों में इमारत के बायीं ओर की दीवार पर जो शिलालेख लगाये गये हैं उसमें यह लिखा गया है कि तीसरी हिजरी शताब्दी के अंतिम वर्षों में पहली इमारत की मरम्मत मोहम्मद बिन ज़ैद दायी अलवी द्वारा की गयी। हरम के चारों ओर ईंट की जो दीवारें हैं उन पर शोध के बाद विशेषज्ञों ने बताया है कि हरम के प्रवेश द्वार की दीवार में जो शिलालेख है उसका संबंध आले बूइये के काल से है। इस आधार पर अनुमान लगाया जा सकता है कि हरम के इस भाग का निर्माण आले बुइया के काल में हुआ था और उसके बाद सल्जूक़ियों के काल में मज्दुल मुल्क क़ुम्मी ने इसका पुनरनिर्माण कराया। हज़रत शाह अब्दुल अज़ीम के हरम में जो नई इमारतें बनी हैं या उनमें विस्तार हुआ है उसके बारे में सल्जूक़ी काल से सफवी काल तक कोई विशेष जानकारी नहीं है परंतु यह बात स्पष्ट है कि इस इमारत व हरम पर ईरानी विशेषकर शीया शासकों की दृष्टि रही है। जैसाकि माज़न्दरान में आले बुइये के शासक हेसामुद्दौला अर्दशीर ने हज़रत शाह अब्दुल अज़ीम के हरम के लिए प्रतिवर्ष 200 दीनार विशेष किया था। तैमूरियों के काल में भी हज़रत शाह अब्दुल अज़ीम की पावन समाधि पर बनी इमारत पर ध्यान दिया गया और उस काल की यादगारें भी हैं। शाहरुख़ तैमूरी स्वयं हज़रत शाह अब्दुल अज़ीम के हरम के दर्शन के लिए वहां गया। हज़रत शाह अब्दुल अज़ीम के हरम पर सफ़वी काल में बहुत ध्यान दिया गया और हरम के चारों ओर इमारतों का निर्माण किया गया और राजधानी के निकट होने के कारण हज़रत शाह अब्दुल अज़ीम के हरम के महत्व में सदैव वृद्धि होती रही और हज़रत शाह अब्दुल अज़ीम तथा इमाम ज़ादा हमज़ा से संबंधित अधिकांश इमारतों का निर्माण,  उनमें विस्तार और उन्हें सुसज्जित करने का कार्य क़ाजारी  काल में हुआ। यहां इस बात का उल्लेख आवश्यक है कि सफ़वी शासक अपना संबंध इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम के बेटे इमामज़ादा हज़रत हमज़ा से बताते हैं।

इस्लामी क्रांति की सफ़लता के बाद ईरान में प्रसिद्ध दूसरे धार्मिक व पवित्र स्थलों की भांति हज़रत शाह अब्दुल अज़ीम के हरम में भी विस्तार किया गया और हरम, प्रांगण, हाल और बरामदों में बहुत निर्माण कार्य किये गये।

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हज़रत शाह अब्दुल अज़ीम के हरम की जो मुख्य इमारत है वह बहुत बड़ी और चार कोनों वाली है और इसमें सल्जूक़ियों के काल की अधिकांश इमारतों की भांति चारों कोनों के उपर ताक़ बनाये गये हैं जो हाथी के कान की तरह हैं जिन्हें फ़ार्सी में फील गूश कहा जाता है और गुंबद उसके ऊपर है। हरम में जो हाल और बरामदे हैं वे एक दूसरे से मिले हुए हैं और हर बरामदे से दूसरे में बड़ी सरलता से जाया जा सकता है। हरम के मुख्य भाग के उत्तर में और उत्तरी व बड़े हाल की ओर हरम का मुख्य दरवाज़ा है। हरम के दो भागों पर सोने के पानी का काम किया गया है और पैग़म्बरे इस्लाम, इमाम रज़ा और इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम के सर्वण कथन लिखे गये हैं। दरवाज़े और दीवार पर जो कुछ सुन्दर लिपी में लिखा हुआ है और उन पर कला कृतियां बनाई गयी हैं उनकी सुरक्षा के लिए ज़मीन से दो मीटर की ऊंचाई तक के भाग पर शीशा लगा दिया गया है। हरम का दक्षिणी दरवाज़ा लकड़ी का है और उस पर बहुत सुन्दर मुनब्बकारी की गयी है यानी लकड़ी को उकेर कर कला कृतियां बनाई गयी हैं उस पर लकड़ी को उकेर कर शेर लिखे गये हैं। हरम का जो दक्षिणी हाल है वह पूरब में इमाम ज़ादा हमज़ा की ओर खुलता है। हरम के अंदर की जो दीवार है नीचे से लेकर ऊपर तक उसे मरमर के काले और सफेद पत्थरों से एक मीटर 65 सेंन्टीमीटर तक की ऊंचाई तक को ढ़क दिया गया है। इसी प्रकार उपर से छत तक के भाग पर वर्ष 1857 में बहुत ही सुन्दर आइनाकारी की गयी है। हरम में जो ताक़ हैं उनके उपर शेलालेख हैं और उन्हें हदीसों व कथनों से सुसज्जित किया गया है।

हज़रत शाह अब्दुल अज़ीम के हरम में एक मूल्यवान और इतिहासिक चीज़ उनकी पावन समाधि पर लकड़ी का संदूक है और उसके चारों ओर ज़ियारतनामा और पवित्र कुरआन की आयतें सुन्दर लिपी में उकेर कर लिखी गयी हैं और उस पर अंकित 725 हिजरी कमरी बराबर 1325 की तारीख़ को पढ़ा जा सकता है। लकड़ी का यह संदूक समय गुजरने के साथ -साथ पुराना हो गया था और वर्ष 1950 में अपने समय के प्रसिद्ध ईरानी कलाकर हाज मोहम्मद सनीअ ख़ातम द्वारा बहुत ही सुन्दर ढंग से इसकी मरम्मत की गयी और इस समय वह दो मीटर 58 सेंटीमीर लंबा और एक मीटर 20 सेंटीमीटर ऊंचा व चौड़ा है। हज़रत शाह अब्दुल अज़ीम के हरम में जो सुनहरा गुंबद है वह भी हरम की प्राचीन व इतिहासिक धरोहर है। पहली बार इस गुबंद का निर्माण मज्दुल मुल्क बरअविस्तानी द्वारा उस समय किया गया था जब हरम की इमारत का पुनरनिर्माण किया था। दूसरे गुंबदों की भांति इस गुबंद में भी दो दीवारें हैं। गुंबद के भीतरी भाग में गोल ताक़ था जबकि गुंबद का बाहरी भाग शंकुवाकार था जो शाह तहमास्ब के काल में परिवर्तित हो गया। 1854 में नासिरुद्दीन शाह के आदेश से उस पर सोने का काम करके उसे सुनहरा बनाया गया। छत से गुंबद की सीधी ऊंचाई लगभग 12 मीटर है जबकि एक सिरे से दूसरे सिरे तक गुंबद की लंबाई लगभग 18 मीटर है। गुंबद पर दो पंक्तियों में शिलालेख लगे हुए हैं। उपर वाली पंक्ति को शेरों से जबकि नीचे वाली पंक्ति को पवित्र कुरआन की आयत “इन्ना फतहना लका फत्हन मुबीना” से सुज्जित किया गया है और नीचे वाला शिलालेख उपर वाले से थोड़ा चौड़ा है। गुंबद के विपरीत मीनारें 19 शताब्दी की हैं।

 

जैसाकि हमने कार्यक्रम के आरंभ में संकेत किया कि हज़रत शाह अब्दुल अज़ीम के हरम में इमाम ज़ादा ताहिर और इमाम ज़ादा हमज़ा की भी पावन समाधियां हैं और इमामज़ादा हमज़ा की जो इमारत है वह लगभग शाह अब्दुल अज़ीम के हरम के बराबर है और उसमें भी आइनाकारी की गयी है और उसमें चांदी की ज़रीह है। इसी प्रकार हज़रत शाह अब्दुल अज़ीम के हरम के अंदर इमामज़ादा ताहिर की भी पावन समाधि है और उस पर जो इमारत बनी है वह हज़रत शाह अब्दुल अज़ीम के हरम के पूर्वोत्तर में है और इस इमारत को 1320 हिजरी क़मरी में टाइलों से सुशोभित किया गया। शाह अब्दुल अज़ीम, इमामज़ादा हमज़ा और इमाम ज़ादा ताहिर की जो इमारतें और बरामदें हैं वे सबसे एक दूसरे से मिले हुए हैं और उन सबको पत्थर के कामों, टाइलों के कार्यों और आइनाकारी से सुसज्जित किया गया है और इसके निर्माण के लिए ईरान के पारंपरिक व दक्ष वास्तुकारों से लाभ उठाया गया है जिन्होंने इस्लामी कला का बेजोड़ नमूना पेश कर दिया है।