शहाबुद्दीन सोहरवर्दी-2
हमने आपको बताया था कि सोहरवर्दी के नाम से विश्वविख्यात दर्शनशास्त्री, शेख शहाबुद्दीन अबुल फ़ुतूह यहया बिन हब्श का जन्म सन 549 हिजरी क़मरी को ईरान के ज़ंज़ान नगर के एक गांव, सोहरवर्द में हुआ था।
सन 587 हिजरी क़मरी में हलब के कुछ धर्मगुरूओं के एक षडयंत्र के अन्तर्गत, सलाहुद्दीन अय्यूबी के आदेश पर सोहरवर्दी जैसे महान दार्शनिक की हत्या कर दी गई। सोहरवर्दी की कुल आयु 38 वर्ष थी किंतु इसी दौरान उन्होंने ज्ञान विशेषकर दर्शनशास्त्र के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किये।
इस महान ईरानी दार्शनिक की रचनाओं में कुछ बातों को इस प्रकार से पेश किया गया है जैसे वे अस्पष्ट या रहस्यमई हों किंतु इनके अध्ययन से हमें सोहरवर्दी के अंतरमन या उनकी आंतरिक सोच का पता चलता है। यह कहानियां या यह विषय जो बहुत ही रोचक और अच्छे ढंग से पेश किये गए हैं सोहरवर्दी के आध्यात्मिक अनुभवों को दर्शाते हैं।
शेख शहाबुद्दीन सोहरवर्दी ने अपनी रचनाओं में जो रहस्यमयी बिंदुओं का उल्लेख किया है उनको तीन भागों में बांटा जा सकता है। पहली क़िस्म वह है जो इशराक़ी व्यवस्था में अंधकार और प्रकाश के अर्थ को बयान करती है। इस प्रकार के उदाहरण सोहरवर्दी की रचनाओं में बहुत ही कम देखने को मिलते हैं। दूसरी क़िस्म वह है जिसमें प्राचीन ईरान से संबन्धित बातों का उल्लेख किया गया है। तीसरी वह क़िस्म है जिसका उल्लेख सोहरवर्दी की रचनाओं में अधिक विस्तार से मिलता है जिसमें उदाहरण के साथ बातें पेश की गई हैं।
सोहरवर्दी की एक पुस्तक का नाम है, “आवाज़े परे जिब्राईल”। उनकी इस पुस्तक पर हैनरी कॉर्बिन और पावेल क्राउस ने फुटनोट्स लिखे हैं जिसका फ़्रांसीसी भाषा में अनुवाद किया गया है। इसको बाद में डा. मेहदी बयानी ने प्रकाशित करवाया। डाक्टर ज़बीहुल्लाह सफ़ा ने “तारीख़े ज़बान व अदबियाते ईरान” नामक अपनी पुस्तक में सोहरवर्दी की इस पुस्तक के बारे में इस प्रकार लिखा है। “आवाज़े परे जिब्राईल” में सोहरवर्दी ने बहुत ही साधारण और सरल शैली का प्रयोग किया है। उन्होंने इसमें कहानियों के साथ ही सवाल और जवाब को भी पेश किया है। सोहरवर्दी की इस किताब में छठी शताब्दी में प्रचलित फ़ारसी भाषा का प्रयोग किया गया है। किताब में कहीं-कहीं अरबी शब्दों के साथ सांकेतिक भाषा का प्रयोग देखने को मिलता है जिससे उसे समझने में थोड़ी परेशानी होती है। उनकी इस किताब को समझने के लिए तत्कालीन प्रचलित फार्सी भाषा का जानना ज़रूरी है।
स्वयं इस पुस्तक के नाम या उसके शीर्षक से ही पता चलता है कि यह पुस्तक कुछ रहस्यमई है। “आवाज़े परे जिब्राईल” का नाम सुनकर मनुष्य का मन थोड़ा आध्यात्म की ओर मुड़ता है। इस किताब में जिस प्रकार से सांकेतिक रूप में बातें कही गई हैं उनसे पुस्तक को समझने में परेशानी होती है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि सोहरवर्दी की यह पुस्तक थोड़ी जटिल है। अपनी पुस्तक का आरंभ उन्होंने ईश्वर के नाम से किया है जिससे पता चलता है कि वे एकेशेवरवाद पर आस्था रखते थे और उनपर इस्लाम विरोधी होने का आरोप पूर्ण रूप से निराधार है। अपने काल में मौजूद धर्मान्धता के कारण सोहरवर्दी ने बहुत सी बातों को रहस्यमई ढंग से पेश किया है।
सोहरवर्दी की यह पुस्तक, रूहानी मेराज की बात पेश करती है। उन्होंने पहले इस पुस्तक को लिखने के कारण की ओर संकेत किया है। सोहरवर्दी के अनुसार इस पुस्तक को लिखने का मुख्य कारण उनके काल के किसी चरमपंथी द्वारा पुराने सूफ़ियों का अनादर करना और उनकी बातों को अस्वीकार करना है। उस रूढ़ीवादी ने ख़ाजा अबूअली फारमदी को बुराभला कहा था। सोहरवर्दी, पुस्तक में मौजूद कहानी का आरंभ उस प्रश्न से करते हैं जिसे एक कट्टर और रूढ़ीवादी व्यक्ति ने ख़वाजा अबूअली फारमदी से पूछा था, उसने कहा था कि क्यों (कबूदपूशान) कुछ आवाज़ों को जिब्रईल का पर मानते हैं और एसा क्यों है कि वे इन्द्रियों से समझी जाने वाली चीज़ों को भी परे जिब्रील की संज्ञा देते हैं।
ख़ाजा अबूअली फारमदी ने उस व्यक्ति को उत्तर देते हुए कहा कि आवाज़े परे जिब्रील में से एक तुम स्वयं भी हो। इस उत्तर में उस व्यक्ति ने कहा कि इस वाक्य का क्या अर्थ हो सकता है? क्योंकि यह निर्रथक बात है। सोहरवर्दी ने इन्ही बातों के कारण उस ज़िद्दी व्यक्ति को अज्ञानी संबोधित करते हुए कहा कि मैं परे जिब्रीईल के बारे में “परे जिब्रीईल” शीर्षक के अन्तर्गत एक लेख लिख रहा हूं। अब यदि तुम इस बात को समझना चाहते हो तो इसका अध्धयन करो। फिर एक संक्षिप्त भूमिका के बाद वे इस लेख को कहानी के रूप में आरंभ करते हैं। इस प्रकार सोहर्वरदी ने दार्शनिक दृष्टि से एक बहुत ही महत्वपूर्ण किंतु गूढ़ रचना को अस्तित्व दिया।
पुस्तक में लिखी कहानी दो भागों में है। कहानी का पहला भाग उस व्यक्ति से संबन्धित है जो वास्तविकता की तलाश में है और वह स्वयं सोहरवर्दी हैं। वे एक ख़ानक़ाह जाते हैं जिसके दो दरवाज़े हैं। एक दरवाज़ा नगर की ओर खुलता है जबकि दूसरा जंगल की ओर। वास्तविकता का खोजी, जंगल की ओर निकल जाता है। रास्ते में वह दस एसे लोगों को देखता है जिनके व्यक्तित्व से वह प्रभावित होता है। कहानी का नायक अपने अन्तरमन से यह पूछता है कि उसका गंतव्य क्या है? इसी प्रकार से वह सृष्टि के रहस्यों और उनसे संबन्धित बातों के बारे में भी सवाल करता है। इसी प्रकार सवाल से सवाल निकलते रहते हैं और बात बढ़ती जाती है। इन्ही प्रश्नों के माध्यम से सोहरवर्दी, सूफ़ीवाद के उन नियमों को समझाते हैं जिनका समझना इस मार्ग में आगे बढ़ने के लिए बहुत ज़रूरी है।
कहानी के दूसरे भाग में इस कहानी का नायक अपने गुरू से “इस्मे आज़म” के बारे में जानकारी प्राप्त करना चाहता है। इस्मे आज़म वह ज्ञान है जिसे केवल ईश्वर ही जानता है या फिर वह जानता है जिसे ईश्वर चाहे। गुरू, नायक की बात मान लेता है और उसको पहले कुछ विचित्र अक्षर सिखाता है। इन अक्षरों के बारे में डाक्टर सैयद हुसैन नस्र कहते हैं कि यह विचित्र अक्षर, रहस्यमई ज्ञान “इल्मे जफ़र” से संबन्धित हैं। उसके बाद कहते हैं कि ईश्वर ने फ़रिश्तों की भांति कुछ शब्दों को बनाया है और “आला” नामक शब्द, फरिश्तों से भी अधिक महत्वपूर्ण है। यह ठीक उसी प्रकार से है जैसे सूर्य का प्रकाश, तारों के प्रकाश पर वरीयता रखता है। वे कहते हैं कि मनुष्य भी ईश्वर के शब्दों में से एक है और वह जिब्रईल की आवाज़ है। जिब्रईल के पर, आसमान से ज़मीन तक फैले हुए हैं। यह विश्व वास्तव में उनकी छाया या साया है। पश्चिम, वास्तव में जिब्रईल के उल्टे पर की छाया है, ठीक उसी प्रकार से जैसे पूरब भी जिब्रईल के पर की ही छाया का प्रतिबिंब है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि संसार में पाई जाने वाली सभी चीज़ें जिब्रईल के पर की आवाज़ से अस्तित्व में आई हैं। कल्मा और ईश्वर के निकटतम इस फ़रिश्तें के पर की आवाज़ से मनुष्य पैदा हुआ है और कलमा अर्थात ईश्वर के नाम से मनुष्य परिपूर्णता तक पहुंचता है।
इस पुस्तक में सोहरवर्दी ने ईश्वरीय तत्वदर्शिता की छाया में अपनी पहचान के दृष्टिकोणों का उल्लेख किया है। उन्होंने सूफीसंतों के साहित्य का प्रयोग करते हुए केवल बुद्धि को सबकुछ मानने वालों और तत्वदर्शिता के समर्थकों के बीच पाए जाने वाले मतभेदों का भी उल्लेख किया है।