Aug २८, २०१६ ०८:५५ Asia/Kolkata

हमने यह बताया कि शहाबुद्दीन सोहरावर्दी, ईरान के ज़न्जान शहर के निकट एक गांव में 549 हिजरी क़मरी में पैदा हुए और 38 साल की उम्र में 587 हिजरी क़मरी में हलब के धर्मगुरुओं के षड्यंत्र से सलाहुद्दीन अय्यूबी के आदेश पर क़त्ल हुए।

यूं तो उनकी ज़िन्दगी कम रही किन्तु कम ज़िन्गदी आयु के बावजूद उन्होंने बहुत ही मूल्यवान किताबें लिखीं। इस ईरानी दार्शनिक की कुछ रचनाएं रूपकात्मक कहानियों का संग्रह है।

 इन रचनाओं के बारे में कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि ये सोहरावर्दी के असल व्यक्तित्व को पेश करती हैं। ये रचनाएं सोहरावर्दी के आत्मिक अनुभव का संग्रह हैं जो बहुत ही आकर्षक भाषा में सांकेतिक रूप में लिखी गयी हैं। इसी प्रकार हमने सांकेतिक व रूपकात्मक भाषा की ओर सोहरावर्दी के झुकाव का कारण भी बयान किया और फ़ारसी साहित्य की मोलवी, अत्तार और हाफ़िज़ जैसी हस्तियों पर सोहरावर्दी के प्रभाव का उल्लेख किया।

 

लुग़ते मूरान शहाबुद्दीन सोहरावर्दी की फ़ार्सी में लिखी पुस्तिका है। यह पुस्तिका अब तक कई बार छप चुकी है। पहली बार ओतो इश्पीस और ख़तक ने लुग़ते मूरान में संशोधन किया और इसके अंग्रेज़ी भाषा में अनुवाद सहित दो अन्य पुस्तिकाएं सूफ़ीवाद के विषय पर प्रकाशित कीं।

इसी प्रकार इस पुस्तिका की फ़ारसी प्रति 1935 में हेनरी कॉर्बिन की कोशिश से प्रकाशित हुयी। डॉक्टर सय्यद हसन अरब ने भी इसे संशोधित किया और फिर प्राकशित किया।

 

लुग़ते मूरान पूरी तरह से सूफ़ीवाद पर आधारित पुस्तिका है। सोहरावर्दी ने यह पुस्तिका अपने एक दोस्त के कहने पर लिखी। इस पुस्तिका का नाम रूपकात्मक है। लुग़ते मूरान का अर्थ चींटी की भाषा या चींटी की बातचीत है। सोहरावर्दी की यह पुस्तिका ईश्वर के नाम और पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम पर दुरुद भेजने अर्थात उनके प्रति शुभकामना के साथ शुरु होती है, जिससे सोहरावर्दी की आस्था का पता चलता है। उस समय की सामाजिक स्थिति और धार्मिक कट्टरवाद का तक़ाज़ा था कि वह अपनी बात को सांकेतिक रूप में पेश करें।

 

लुग़ते मूरान में शहाबुद्दीन सोहरावर्दी ख़ुद को चींटी के रूप में ढालते हैं और उसी के साथ चलते हुए भक्ति के रहस्य को बयान करते हैं और चीटियों से बहुत कुछ सीखते हैं।

 

बिचारी चींटी अपनी रोज़ी के लिए मैदान व मरुस्थल का रुख़ करती है। रोज़ी हासिल करने के लिए बहुत मेहनत करती है। यही चींटी कभी ऐसा उच्च स्थान हासिल करती है कि ईश्वरीय प्रकाश का जलवा बिखेरती है और ईश्वरीय दूत सुलैमान का मार्गदर्शन करती है। लुग़ते मूरान पुस्तिका में सोहरावर्दी उल्लु, चमगादड़, हुदहुद और कछुए जैसे पशु पक्षी की ज़बान से दूसरी कहानियों का उल्लेख करते हैं। इसी प्रकार हुदहुद के हज़रत सुलैमान के दरबार से ग़ाएब होने पर उससे पूछताछ की घटना और दूसरे पक्षियों के उनके पास आने की कहानियों का उल्लेख है। इसी प्रकार कैयख़ुसरो राजा के जाम या प्याले की कहानी एक आत्मज्ञानी के पवित्र मन की ओर संकेत है या जिनों के राजा से एक इंसान की दोस्ती की कहानी भी आत्मज्ञान के विशेष आयाम की ओर इशारा है।

 

कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि लुग़ते मूरान का विषय आत्म उत्थान है। वह मार्ग जिस पर भक्त को चलना चाहिए ताकि भौतिक बंधनों से निकल कर ईश्वरीय सामिप्य हासिल करे। सोहरावर्दी ने इस बात को अलग अलग उपमाओं से कहानी के अंदाज़ में सरला भाषा में इस पुस्तिका में बयान किया है।

 

लुग़ते मूरान में 9 अध्याय हैं। पांचवें अध्याय में 4 कहानियां बयान की गयी हैं। इन अध्याय में इंसान की अस्लियत को आत्मिक कहा गया है। 

इन अध्यायों में इंसान की आत्मा के बारे में सुदंर उपमाओं, सत्य को समझने में नास्तिकों की अक्षमता, इंसान का अपनी असलियत अर्थात आत्मा को भुला देना, ईश्वर के निकट होने के मार्ग और कयख़ुसरो के जाम का उल्लेख है।

सोहरावर्दी ने उपमाओं व रूपकात्मक भाषा का सहारा इसलिए लिया ताकि अपनी बात को सुदंर तरीक़े से पेश करके भक्तों के मन में आत्मिक लगाव पैदा करें। सोहरावर्दी रूपकात्मक भाषा का इस्तेमाल करते वक़्त किसी प्रकार की मुश्किल महसूस नहीं करते बल्कि अपनी अपार कल्पना शक्ति के ज़रिए इसे बड़ी आसानी से पेश करते हैं। यही कारण है कि इस सांकेतिक शैली के बारे में शोध और उसके अर्थ को समझना बहुत कठिन काम है क्योंकि इन संकेतों को समझने के लिए कोई स्पष्ट मानदंड नहीं हैं। उपमाओं के हर समूह को समझने के लिए व्यापक स्तर पर शोध की ज़रूरत है दूसरी ओर वास्तविक अर्थ को समझने में ग़लती होने की स्थिति में उनके दार्शनिक व अध्यात्मिक उद्देश्य को नहीं समझा जा सकता।

 

लुग़ते मूरान पुस्तिका की एक विशेषता यह है कि सोहरावर्दी ने कहानियों के वर्णन के दौरान बीच बीच में फ़ारसी और अरबी शेरों का उल्लेख किया है हैं। फ़ारसी भाषा की उनकी दूसरी पुस्तिकाओं में इन सब शेरों का उल्लेख नहीं है। मिसाल के तौर पर उनकी किताब ‘आवाज़े परे जिबरईल’ में एक पद्य भी मौजूद नहीं है। इन शेरों के कुछ शायरों के नाम का उल्लेख है। लुग़ते मूरान पुस्तिका की एक और विशेषता यह है कि इसमें पवित्र क़ुरआन की आयतों का भी बहुत उल्लेख है। इस पुस्तिका में अरबी शब्दों के बहुत अधिक इस्तेमाल के कारण गद्य में प्रवाह कम हो गया है। सोहरावर्दी ने यह पुस्तिका उन लोगों के लिए लिखी जो उनकी तरह फ़ारसी भाषी हो और साथ ही अरबी भाषा भी अच्छी तरह जानते हों।    

            

लुग़ते मूरान की अहमियत इस बात में नहीं है कि वह गद्य में है बल्कि साहित्यिक शैली, उपमा, शेर और कहावतों के इस्तेमाल में निहित है कि जिसके ज़रिए उन्होंने आध्यात्मिक उद्देश्यों को बयान किया है।  इस पुस्तिका में दार्शनिक संकेतों का कम उल्लेख है। सोहरावर्दी ने जिन कहानियों का उल्लेख किया है उनमें से कुछ कहानियां फ़ारसी गद्य व पद्य में मौजूद कहानियों से मिलती जुलती हैं। जैसा कि डॉक्टर मुजतबाई ने अपनी किताब ‘सोहरावर्दी व फ़रहंगे ईरान बास्तान’ में लिखा है कि लुग़ते मूरान पुस्तिका की कुछ कहानियां बौद्ध धर्म की जात कथाओं से मिलती जुलती हैं।

 

लुग़ते मूरान पुस्तिका का आरंभ कुछ चीटियों की शबनम के क़तरे के बारे में बातचीत है। वे आपस में पूछती हैं कि यह क़तरा ज़मीन का है या आसमान से आया है। जब चीटियां देखती हैं कि शबनम का क़तरा वाष्पीकरण द्वारा हवा में घुल मिल जाता है तो यह नतीजा निकालती हैं कि यह हवा से आया है। सोहरावर्दी आगे इस कहानी से यह नतीजा पेश करते हैं कि हर चीज़ अपनी अस्लियत की ओर पलटती है और प्रकाश का स्वामी ईश्वर की ओर पलटता है।

सोहरावर्दी कछुओं की कहानी में कई कछुओं का उल्लेख करते हैं जो एक समुद्री पक्षी को देखते हैं तो पूछते हैं कि इस पक्षी का संबंध पानी से है या हवा से। अगर पक्षी को पानी की ज़रूरत नहीं है तो उसका संबंध पानी से नहीं है तो इस प्रकार वह बिना पानी के रह सकता है। कछुए शासक से पूछते हैं कि जो रत्न किसी स्थान को घेर लेता है, किस तरह वह स्थान व दिशा से आवश्यकतामुक्त हो सकता है। शासक उन्हें जवाब नहीं दे पाता तो कछुए शासक को छोड़ कर आगे बढ़ जाते हैं।

 

सोहरावर्दी ने इस उपमा में पैग़म्बरे इस्लाम की मेराज और असली सूफ़ी संतों के अनुभव को बयान किया है जिन्होंने वास्तव में स्थान व छह दिशाओं से बाहर निकलने का अनुभव किया। उनका मानना है कि जब तक पर्दे नहीं हटेंगे और स्थान व दिशा से बाहर नहीं निकलेंगे उस समय तक ईश्वर के क़रीब नहीं हो सकते। इस उपमा में कछुए सत्य की खोज में पीछे रह जाने वाले भक्त हैं जो शासक की बात को समझ न पाने के कारण उसे छोड़ देते हैं। शासक से अभिप्राय अध्यात्मिक गुरु है।

 प्राचीन ईरान के पौराणिक मिथक, दर्शन शास्त्र के संकेतों तथा सोहरावर्दी के आध्यात्मिक विचारों का ज्ञान ही उनकी इस प्रकार की कहानियों को समझने में मदद कर सकता है।