Aug २८, २०१६ ०९:२४ Asia/Kolkata
  • शहाबुद्दीन सोहरवर्दी-4

हम आपको पहले भी बता चुके हैं कि सोहरवर्दी ने इशराक़ नामक विचारधारा की आधारशिला रखी थी। 

ईरान के विश्वविख्यात दार्शनिक शेख शहाबुद्दीन सोहरवर्दी का जन्म सन 549 हिजरी क़मरी में सोहरवर्द नामक गांव में हुआ था।  सोहरवर्द, पश्चिमोत्तरी ईरान के ज़ंजान नगर के निकट स्थित है।  वे अपने समय के बहुत बड़े विद्धान थे।  38 वर्ष की आयु में हलब के कुछ विद्धानों के षडयंत्र के कारण सलाहुद्दीन अय्यूबी के आदेश पर उनकी हत्या कर दी गई।  अपनी अल्पायु में सोहरवर्दी ने कई किताबें लिखीं।  पिछले 2 कार्यक्रमों में हमने उनकी दो महत्वपूर्ण पुस्तकों, “आवाज़े परे जिब्रील” और “लोग़ते मूरान” के बारे में विस्तार से चर्चा की थी। 

 

आलोचकों का यह कहना है कि “फ़ी हक़ीक़तिल इश्क़” नामक किताब, प्रेम के बारे में लिखी जाने वाली अबतक की सर्वोत्तम किताबों में से एक है।  इन आलोचकों के अनुसार सोहर्वर्दी की इस किताब की लेखन शैली बहुत ही सुन्दर है जिसमें कविता का समावेश है।  विदित रूप से तो यह पुस्तक यूसुफ़ ज़ुलैख़ा और याक़ूब जैसे व्यक्तित्वों से संबन्धित है जिसमें आध्यात्मिक आयाम पाए जाते हैं।  दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि यह एसी किताब है जो दर्शनशास्त्र और सूफ़ीवाद का मिश्रण है।  सोहरवर्दी की पुस्तक, “फ़ी हक़ीक़तिल इश्क़” किसी सीमा तक उनकी अन्य तमसीली या रूपकात्मक किताबों से बहुत अलग है।  उन्होंने अपनी कुछ पुस्तकों में मनुष्य के अकेलेपन और इस नश्वर संसार से मुक्ति के बारे में भी लिखा है किंतु अपनी इस पुस्तक में उन्होंने प्रेम के बारे में चर्चा की है।  सोहरवर्दी ने इस किताब में प्रेम की उत्पत्ति और सुन्दरता एवं दुख के बारे में विस्तार से चर्चा की है।  यह भी कहा जा सकता है कि “फ़ी हक़ीक़तिल इश्क़” नामक किताब एक प्रकार से सूरे यूसुफ़ की एसी व्याख्या है जिसको सोहरवर्दी ने अपनी रूचि के हिसाब से लिखा है।

 

इस पुस्तक के माध्यम से सोहरवर्दी ने सूफ़ीवाद के आधार पर प्रेम की विस्तृत व्याख्या की है।  सोहरवर्दी कहते हैं कि ईश्वर ने पहले बुद्धि को जन्म दिया उसके बाद उसे तीन विशेषताएं प्रदान कीं।  पहली विशेषता ईश्वर को पहचानने के लिए।  दूसरी मनुष्य को पहचानने के लिए और तीसरी दूसरों को पहचानने के लिए।  पहली विशेषता से सुन्दरता प्राप्त हुई, दूसरी से प्रेम और तीसरी से दुख।  सोहरवर्दी के कथनानुसार सुन्दरता की मुस्कान से हज़ारों फ़रिश्तों ने अस्तित्व लिया जिसके बाद प्रेम और सुन्दरता के मिलन से धरती और आकाश बने।

 

सोहरवर्दी का कहना है कि यह सारी घटनाएं आदम के बनाए जाने से पहले की हैं।  जब आदम के बनाए जाने का समय आया और ईश्वर ने धरती पर उन्हें अपना प्रतिनिधि नियुक्त करना चाहा तो “हुस्न” या सुन्दरता को इसकी जानकारी हो गई।  वह आदम को देखने जाता है।  आदम को देखकर हुस्न उनके प्रेम में डूब जाता है।  हुस्न या सुन्दरता को गए हुए जब बहुत समय बीत गया और वह वापस नहीं आया तो उसके भाई अर्थात प्रेम और दुख चिंतित हो जाते हैं।  वे दोनो उसको ढूंढने निकलते हैं।  वे हुस्न को एसी स्थिति में ढूंढ निकालते हैं जब वह आदम के अस्तित्व में डूब चुका होता है।  वे उसके निकट होना चाहते हैं किंतु हुस्न उनको निकट आने नहीं देता।

 

हुस्न, आदम के बाद हज़रत यूसुफ़ की तलाश में निकलता है और उनतक पहुंच जाता है।  हुस्न के भाई फिर परेशान हो जाते हैं किंतु वे उसे ढूंढ नहीं पाते।  इसी बीच हुस्न, हज़रत यूसुफ़ के बहुत निकट हो चुका होता है।  प्रेम और दुख, जो अपने भाई हुस्न या सुन्दरता से निराश हो चुके होते हैं, अलग-अलग रास्तों पर निकल जाते हैं।  दुख सीधे कनआन जाता है और हज़रत यूसुफ़ के पिता हज़रत याक़ूब से मिलकर उनके साथ हो जाता है।  इन दोनों की दोस्ती शुरू हो जाती है और अंततः याक़ूब अपनी आखों की रोशनी दुख को दे देते हैं।

 

दूसरी ओर दुख का दूसरा भाई इश्क़, चलते-चलते मिस्र पहुंचता है।  वह मिस्र के राजा के दरबार में जाता है।  मिस्र के राजा की पत्नी ज़ुलैख़ा उसके बारे में पूछती है।  वह कहती है कि तुम कौन हो और कहां से आए हो।  इसके उत्तर में इश्क़, ज़ुलैख़ा से कहता है कि मैं बैतुल मुक़द्दस से हूं और मेरा काम घूमना-फिरना है।  इसके बाद प्रेम, अपने और अपने भाइयों के बारे में ज़ुलैख़ा को बताता है।  वह बताता है कि उसका हुस्न नामक भाई किस प्रकार से यूसुफ़ का हो गया।  ज़ुलैख़ा बताती है कि यूसुफ मिस्र में है यह सुनकर हुस्न का भाई प्रेम खुश हो जाता है और ज़ुलैख़ा के गले पड़ जाता है कि मुझे मेरे भाई से मिलवा दो।  इश्क़ या प्रेम को गले में डाले जब ज़ुलैख़ा, यूसुफ़ के पास पहुंचती है तो वह भी यूसुफ़ के प्रेम में डूब जाती है।  हालांकि मिस्रवासी इस बात पर ज़ुलैख़ा की आलोचना करते हैं।

 

बाद में यह ख़बर कनआन पहुंचती है कि युसुफ़, मिस्र के शासक हो गए हैं।  यह ख़बर सुनकर याक़ूब, अपने बेटों के साथ मिस्र के शासक की सेवा में पहुंचते हैं।  वहां पहुंचकर वे देखते हैं कि यूसुफ़ और ज़ुलैख़ा सिंहासन पर बैठे हुए हैं जिनमे एक शुद्ध सुन्दरता है जबकि दूसरा शुद्ध प्रेम।  याक़ूब के साथ हुज़्न या दुख भी राजमहल पहुंचता है और वहां पर अपने बिछड़े भाइयों अर्थात हुस्न और इश्क़ को पाता है।  इस प्रकार हुज़्न, हुस्न और इश्क़ एकसाथ मिलते हैं।

 

यहां पर सोहरवर्दी कहानी को समाप्त करते हैं।  यहां से वे उन शब्दों और बातों को समझाने का प्रयास करते हैं जिनको उन्होंने कहानी में प्रयोग किया है।  पहले वे इश्क़ या प्रेम की समीक्षा करते हैं फिर प्रेमी और प्रेमिका के बारे में चर्चा करते हैं।  उनका मानना है कि मनुष्य को इस संसार में प्रेम को समझना चाहिए और फिर प्रेमी के लिए समर्पित हो जाना चाहिए।  सोहरवर्दी मानते हैं कि प्रेमी और प्रेमिका को मिलाने का पुल प्रेम है।  इसी आधार पर वे कहते हैं कि मनुष्य को जीवन में वास्तविक प्रेम की तलाश में रहना चाहिए क्योंकि उसे प्राप्त करके वह बहुत ही विचित्र बातों को समझने लगता है।

 

इसके बाद में सोहरवर्दी मुहब्बत शब्द को परिभाषित करते हैं।  यहां पर सोहरवर्दी, इश्क़ शब्द की समीक्षा करते हैं।  वे कहते हैं कि इश्क़ शब्द, अशक़ा से लिया गया है।  अशक़ा एक वनस्पति है।  वास्वत में यह एक प्रकार की बेल है।  यह बेल जब किसी पेड़ पर चढ़ती है तो वह उसका पानी चूसने लगती है।  पानी की कमी के कारण उसका रंग पीला पड़ने लगता है।  धीरे-धीरे उसके पत्ते गिरने लगते हैं और कुछ समय के बाद पूरा पेड़ सूख जाता है।  सोहरवर्दी का मानना है कि मनुष्य एक पेड़ के समान है।  बाद में इश्क़ उसे अपने घेरे में ले लेता है।  फिर मनुष्य रूपी वृक्ष, इश्क़ नामक बेल में बुरी तरह से उलझ जाता है।  इसका परिणाम यह निकलता है कि मनुष्य रूपी पेड़ मुरझाकर सूख जाता है।  अंत में उसका निर्जीव शरीर संसार में रह जाता है और आत्मा, सदा रहने वाले परलोक चली जाती है।

 

सोहरवर्दी के कहने का तातपर्य यह है कि मनुष्य को आशिक होना चाहिए।  उसे यह समझ लेना चाहिए कि यह संसार नश्वर है जो बाक़ी रहने वाला नहीं है जबकि परलोक सदा रहने वाला है।  परलोक को प्राप्त करने का मूल मंत्र यह है कि मनुष्य प्रेम करे और यह प्रेम सृष्टिकर्ता से होना चाहिए।  वास्तविक प्रेम यही है कि मनुष्य, ईश्वर से प्रेम करे। 

 

 

 

 

भारत के वरिष्ठ नेता और पूर्व विदेश मंत्री यशवंत सिन्हा ने अपनी ही पार्टी की नरेन्द्र मोदी नेतृत्व वाली सरकार की ओर से परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह की सदस्या के लिए किये जा रहे प्रयासों की आलोचना की है।

उनका कहना है कि भारत को समूह की सदस्यता की आवश्यकता नहीं है और यह कि इससे देश को लाभ नही हानि ही होगी।  उन्होंने कहा कि एनएसजी की सदस्यता पाने में भारत ने जो इतनी उत्सुकता दिखाई, उसकी कोई आवश्यकता नहीं थी।

रविवार को भाजपा के वरिष्ठ नेता सिन्हा ने यहां तक कहा कि मुझको यह नहीं पता कि सरकार में बैठे लोग इस विषय को समझते हैं या नहीं किंतु मुझको पता है कि एसे लोग सरकार मे बैठे हैं जो हर दिन गुमराह कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि भारत को आवेदक के तौर पर परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह में शामिल नहीं होना चाहिए बल्कि सदस्यता को स्वीकार नहीं करना चाहिए। क्योंकि भारत को जो आवश्यकता थी वह पहले ही पा चुका है।

ज्ञात रहे कि दो दिन पहले ही 48 सदस्यीय समूह के पूर्ण सत्र में सदस्य बनने के भारत के प्रयास विफल रहे हैं।  दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल में आयोजित पूर्ण सत्र से पहले भारत ने कई देशों के सामने अपना पक्ष रखा था।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वीटज़रलैण्ड और मैक्सिको से समर्थन का आश्वासन मिलने के बाद ताशकंद में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के सम्मेलन से अवसर पर चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग से सकारात्मक फैसला करने का आग्रह किया था।

चीन, भारत जैसे परमाणु अप्रसार संधि एनपीटी पर हस्ताक्षर न करने वाले देशों के समूह में शामिल न करने की अपनी नीति पर बाक़ी रहा।  ज्ञात रहे कि

+ गतवर्ष दिल्ली के बाद बिहार विधानसभा चुनावों में भाजपा को मिली अभूतपूर्व विफलता के बाद जिन 4 भाजपा वरिष्ठ नेताओं ने अपनी ही पार्टी के वर्तमान नेतृत्व की खुली आलोचना की थी उनमें यशवंत सिन्हा, मुरली मोहर जोशी, लालकृषण आडवानी और शांता कुमार शामिल थे।

आलोचको का मानना है कि केन्द्र की वर्तमान सरकार को केवल प्रधानमंत्री मोदी वित्तमंत्री अरूण जेटली और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ही चला रहे हैं।