Sep ०५, २०१६ ०६:३३ Asia/Kolkata
  • मंगलवार - 8 सितम्बर

8 सितम्बर सन 1763 ईसवी को वर्षों के संघर्ष के बाद अंतत: कैनेडा, पेरिस समझौते के आधार पर फ़्रांस के अधिकार से स्वतंत्र हुआ।

इस प्रकार औपचारिक रुप से इसे ब्रिटेन का समर्थन प्राप्त हुआ किंतु फ़्रान्सीसी मूल के केनेडाइयों और कैनेडा में रह रहे ब्रिटेन वासियों के बीच लम्बे समय तक विवाद जारी रहा। वर्ष 1867 ईसवी को कैनेडा की स्वाधीनता के बावजूद यह देश राजनैतिक व्यवस्था की दृष्टि से ब्रिटेन का अनुयायी है।

 

8 सितम्बर सन 1941 ईसवी को नाजी जर्मनी के सैनिकों ने सोवियत संघ पर आक्रमण के तीन महीने बाद लेनिन्ग्राड का परिवेष्टन कर लिया किंतु हिटलर और उसके सेनाकमांडरों के अनुमान के विपरीत इस नगर पर नाज़ी सेना का अधिकार न हो सका बल्कि जनवरी सन 1944 तक इस नगर की जनता ने संघर्ष किया और यह परिवेष्टन तोड़ दिया। परिवेष्टन के काल में इस नगर के लोगों को अजीविका बहुत कठिनाई से प्राप्त होती थी। इसी कारण लगभग 10 लाख लोग मारे गये किंतु सोवियत संघ की सेना के निरंतर आक्रमण और हिटलर पर कुछ अन्य मोर्चों से भी प्रहार होने तथा सोवियत संघ की कड़ाके की सर्दी के कारण जर्मनी की सेना पीछे हटने पर विवश हो गयी।

8 सितम्बर सन 1948 ईसवी को जर्मनी के संगीतकार रिचर्ड एश्ट्रोविस का निधन हुआ। उनका जन्म सन 1864 में हुआ। उन्हें 19वीं और 20वीं शताब्दी में आधुनिक संगीत की एक विशेष शैली का जनक समझा जाता है।

 

8 सितम्बर सन 1954 ईसवी को फ़िलीपीन की राजधानी मनीला में दक्षिण पूर्वी एशिया के संयुक्त सुरक्षा समझौते सीटो पर हस्ताक्षर हुए। यह समझौता अमरीका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, फ़्रांस, पाकिस्तान, थाइलैंड, न्यूज़ीलैंड और फ़िलीपीन के बीच हुआ। समझौते के सदस्य देश वचनबद्ध हुए कि यदि इनमें से किसी देश पर भी बाहरी आक्रमण हो या आंतरिक विद्रोह उभरे तो दूसरे सदस्य देश शत्रु पर आर्थिक प्रतिबंध लगाने या उसके विरुद्ध सैनिक कार्रवाई जैसी प्रतिक्रिया दिखाएंगे।

वियतनाम युद्ध में अमरीका की पराजय के बाद सन 1975 में यह समझौता निरस्त हो गया।

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18 शहरीवर सन 1348 हिजरी शम्सी को ईरान के प्रसिद्ध लेखक जलाल आले अहमद का निधन हुआ। वे सन 1302 हिजरी शम्सी को तेहरान मे जन्मे। वर्ष 1325 हिजरी शम्सी को उन्होंने विश्व विद्यालय में साहित्य के विषय की शिक्षा पूरी की। द्वितीय विश्व युद्ध की ज्वलंत परिस्थितियों के दौरान वे राजनीति में उतरे। और समाचार पत्रों तथा प्रत्रिकाओं में उनके लेख छपने लगे। और वर्ष 1332 से वे गमभीरता के साथ शिक्षा देने अध्ययन और लिखने में व्यस्त हो गये। वे छोटी कहानियां लिखने में व्यस्त हो गये। लिखने की उनकी एक विशेष शैली थी। वे कहानियों के रुप में सामाजिक तथा राजनैतिक समस्याओं की उल्लेख करते। ईरानी समाज में पश्चिमी संस्कृति के प्रचलन को देखकर आले अहमद को बहुत दुखा हुआ। इसी विषय में उन्होंने वर्ष 1341 में पश्चिम के मारे हुए लोग नामक एक पुस्तक लिखी। जिसमें उन्होने पश्चिमी संस्कृति की बुराइयों का उल्लेख करते हुए इससे बचने के मार्ग बताए थे। उन्होंने इसके अतिरिक्त भी कई पुस्तकें लिखी हैं।

 

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19 मोहर्रम सन 366 हिजरी क़मरी को ईरान में आले बूये शासन श्रृंखला के शासक रुक्नुद्दौला दैलमी का निधन हुआ। उनका असली नाम हसन बिन बूये था। ईरान के पश्चिमी और दक्षिणी क्षेत्रों पर उनका राज था। उल्लेखनीय है कि आले बूये ईरान के प्रसिद्ध मुसलमान वंशों में एक था जिसने सन 320 हिजरी क़मरी से ईरान और इराक़ के बड़े भाग पर राज किया। इस शासन श्रृंखला के कुछ शासकों ने इस्लामी संस्कृति और ज्ञान के क्षेत्र में सराहनीय प्रयास किये हैं।

आले बूये वंश के शासक, साहित्यकारों और विद्वानों का बड़ा आदर व सम्मान करते और विद्वानों में से ही अपने मंत्रियों का चयन करते थे। इन शासकों द्वारा ज्ञान और सॉंस्कृतिक मामलों पर विशेष ध्यान दिए जाने के कारण लोगों में भी ज्ञान और संस्कृति में रुचि बढ़ गयी थी। इस वंश ने बहुत सी धरोहरें और उपहार छोड़े हैं। इनमें बग़दाद के अज़ोदी अस्पताल साहित दसियों अस्पतालों, स्कूलों आदि का नाम लिया जा सकता है।

 

19 मुहर्रम सन 61 हिजरी क़मरी को इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके साथ शहीद होने वालों के परिजनों को बंदियों के रूप में इराक़ के कूफ़ा नगर से, उमवी शासन की राजधानी दमिश्क़ नगर ले जाया गया। इन बंदियों ने विशेषकर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के बीमार बेटे इमाम ज़ैनुलआबेदीन और उनकी बहन हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा ने कूफ़ा में अत्याधिक कड़ी परिस्थितियों के बावजूद असाधारण साहस का प्रदर्शन साहस का प्रदर्शन करते हुए, उमवी शासक यज़ीद के अत्याचारों और अपराधों से लोगों को अवगत कराया। उमवी शासक यज़ीद ने इन बंदियों का अपमान करने के लिए उन्हें नगर- नगर घुमाने का फैसला किया था किंतु बंदी होने के बावजूद इन लोगों ने एक सप्ताह के भीतर कूफ़ा वासियों की आंखें खोल दीं और उन्हें अपने किये पर पछतावा होने लगा। यहां तक कि कूफ़े के शासक उबैदुल्लाह इब्ने ज़्याद के विरुद्ध विद्रोह की आशंका पैदा हो गयी थी इसी लिए उसने इन बंदियों को कूफ़ा से हटा कर, उमवी राजा, यज़ीद के पास दमिश्क़ भेजने का निर्णय लिया जिसके आदेश से इमाम हुसैन को शहीद किया गया था।

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