शहाबुद्दीन सोहरवर्दी-7
हमने उल्लेख किया था कि परम्परागत इस्लामी दर्शनशास्त्र में हिकमते इशराक़ या इशराक़ दर्शन शास्त्र के संस्थापक शेख़ शहाबुद्दीन सोहरवर्दी 549 हिजरी क़मरी में ईरान के सोहरवर्द में पैदा हुए।
38 वर्ष की आयु में 587 हिजरी में सलाहुद्दीन अय्यूबी के आदेश से उन्हें मृत्यु दंड दिया गया। उन्होंने अपनी 38 वर्ष की अल्प आयु में कई महत्वपूर्ण रचनाएं छोड़ी हैं। सोहरवर्दी की रचनाओं में विविधता और ताज़गी पायी जाती है और शुद्ध दार्शनिक अर्थ से वे गहरे रहस्यवादी अर्थ प्राप्त करते हैं।
सोहरवर्दी के कार्यों को सैय्यद हुसैन नस्र, हैनरी कोरबिन, इस्माईल पूर और दीनानी जैसे शोधकर्ताओं ने परिचित करवाया है, विशेष रूप से उनकी रचना अक़्ले सुर्ख़ के बारे में हमने कोरबिन, दीनानी और इस्माईल पूर के दृष्टिकोणों को बयान किया था। इसी प्रकार फ़िरदौसी के शाहनामे और प्राचीन ईरानी लोक कथाओं के उनकी रचनाओं पर प्रभाव के बारे में बात की थी।
अक़्ले सुर्ख़ नामक पुस्तिका में सोहरवर्दी ने रहस्यवादी विषयों को दास्तान के रूप में परिंदों की ज़बानी में पेश किया है। इस किताब का महत्व उसके सारांश और निष्कर्ष में है। शोधकर्ताओं के अनुसार, इस किताब में इस्लामी रहस्यवाद और दर्शन को शायराना अंदाज़ में पेश किया गया है। सोहरवर्दी ने इस किताब में मुक्ति की प्राप्त के मार्ग को रहस्यमय ढंग से बयान किया है।
इस किताब में जो दास्तान बयान की गई है, उसके दो मुख्य पात्र हैं। एक बाज़ और लाल चेहरे और लाल बालों वाला एक बूढ़ा व्यक्ति। पुराने समय में राजा शिकारी बाज़ों को बहुत पसंद करते थे। कहते हैं कि राजा बाज़ की आँखें बंद कर दिया करते थे और उन्हें प्रशिक्षण देने के लिए उनके सिर पर टोपी रखा करते थे। कुछ इसका कारण यह बताते हैं कि जानवर इंसानों की आँखों से डरते हैं, इसलिए शिकारी परिंदे की आँखें बंद कर देनी चाहिएं ताकि उसकी नज़र शिकारी की नज़र से न मिले। इस दास्तान में बाज़, इंसान का प्रतीक है। ऐसा इंसान जो अपने वतन से दूर हो गया है और ज़मीन पर गिर गया है और आत्मा की भांति भौतिक जेल में क़ैदी बन गया है।
सोहरवर्दी की इस दास्तान में उनकी धुंधली होती हुई आपबीती का उल्लेख है। वह अपने अतीत को याद करते हुए कहते हैं कि शुरू में उनके कांधों पर, पर लगे हुए थे और उनके दिल में उड़ने की इच्छा थी, लेकिन धीरे धीरे परों के बंधने और आँखों के बंद होने से उड़ने का ख़याल दिल से निकल गया। मानो वह भूल ही गए हैं कि एक परिंदा हैं और उसका संबंध सर्वश्रेष्ठ एवं ऊंचे स्थान से है। उसकी आँखें बंद कर दी गई हैं और अब उसे आशियाने के बारे में भी कुछ याद नहीं है। बंधी हुई ज़ंजीर के साथ ही अंधेरे जंगल में अकेले सफ़र तय करना है, ताकि लाल चेहरे और लाल बालों वाले बूढ़े तक पहुंच सके, जो बाज़ का दार्शनिक रूप में मार्गदर्शन करेगा।
सोहरवर्दी की दास्तान का दूसरा पात्र यही बूढ़ा आदमी है, जो बुद्धि का प्रतीक है। लाल चेहरे और लाल बालों वाला बूढ़ा व्यक्ति न पूर्ण रूप से प्रकाश है और न ही अंधेरा, वह लाल है। कहा जाता है कि लाल रंग काले और सफ़ैद रंगों का मिश्रण है।
सोहरवर्दी अक़्ले सुर्ख़ अर्थात लाल बुद्धि की बात करते हैं, यानी ऐसी बुद्धि जो इंसान के अस्तित्व में है। मूल रूप से इंसान की बुद्धि सफ़ैद और प्रकाशमय है, लेकिन उसका शरीर घुप अंधेरा है। जब सफ़ैद एवं पारदर्शी बुद्धि इस अंधेरे में पहुंचती है, तो वह लाल हो जाती है। इसलिए अक़्ले सुर्ख़ का मतलब है इंसान की अक़्ल।
लाल चेहरे वाला व्यक्ति बुढ़ापे का दावा करता है और कहता है कि वह वर्षों से एक अंधेरे कुंए में पड़ा हुआ था, यह अंधेरा कुंआ यह संसाह है। वह बाज़ से कहता है कि कुंए में पड़े रहने की वजह से उसका चेहरा लाल हो गया है। बूढ़े के पास बाज़ के हर सवाल का जवाब है। बूढ़ा, बाज़ से कहता है कि उसे अपने सवालों का जवाब जानने के लिए एक चेतावनी भरा सफ़र करना होगा। उसे उस सफ़र के समस्त मार्गों का ज्ञान है।
बाज़ ने बूढ़े से पूछा कि वह कहां से आया है। बूढ़े ने कहा, कोहे क़ाफ़ से, मेरा डेरा वहीं है, तेरा ठिकाना भी वहीं था, लेकिन तू भूल चुका है। बाज़ ने उससे पूछा कि तू यहां किस की खोज में है। उसने कहा कि मैं एक सैलानी हूं और हमेशा इस दुनिया में घूमता रहता हूं और अजीबो ग़रीब चीज़ें देखता रहता हूं। बाज़ ने उससे पूछा कि दुनिया की अजीबो ग़रीब चीज़ों में से तुमने क्या देखा। उसने जवाब में कहा कि दुनिया में सात चीज़ें अजीब हैं। सबसे पहले कोहे क़ाफ़ जो हमारा वतन है। दूसरे गौहरे शब अफ़रोज़, तीसरे दरख़्ते तूबा, चौथे दवाज़दह कारगाह, पांचवें ज़िरह दाऊदी, छठे तीग़े ब्लारक और सातवें चश्मए ज़िंदगानी।
बाज़ उनमें से हर एक के बारे में पूछता है लेकिन हम सही से नहीं समझ पाते हैं कि तूबा, क़ाफ़, 11 और 12 नम्बर किस चीज़ का प्रतीक हैं या गौहरे शब अफ़रोज़ से सोहरवर्दी का क्या तात्पर्य है। बूढ़े की बात से केवल इतना समझते हैं कि तूबा दरख़्त कोहे क़ाफ़ के दरख़्तों में से एक दरख़्त है, जो दुनिया के आख़िरी सिरे पर है, जिसमें 11 पहाड़ शामिल हैं। ऐसा प्रतीत होत है कि इस दास्तान का बूढ़ा पहेलियों का जवाब पहेली से देना चाहता है।
बूढ़े के अनुसार, गौहरे शब अफ़रोज़ कोहे क़ाफ़ पर्वतीय श्रंखला के तीसरे पहाड़ में स्थित है और उसके वजूद से अंधेरी रात रोशन हो जाती है। वह कहता है कि गौहर शब अफ़रोज़ को यह रोशनी दरख़्ते तूबा से मिलती है। बूढ़ा, बाज़ को 12 प्रशिक्षण स्थलों और उसके 7 गुरुओं एवं शिष्यों के बारे में बताता है, जो दीबा कपड़ा बुनते हैं। उनका कपड़ा वास्तव में दाऊदी ज़िरह है।
दाऊदी ज़िरह एक ऐसा कवच है जिसमें असंख्यक कड़े हैं और वह बहुत मज़बूत है। बूढ़ा, बाज़ को बताता है कि उसका मूल उद्देश्य इस कवच के कड़ों को खोलना है। ऐसा कवच जो बहुत ही अधिक एवं बारीक रस्सियों की भांति उसके गले में पड़ा हुआ है, जो टूटती नहीं हैं, केवल उन्हें तीग़े ब्लारक या धारदार ख़ंजर से काटा जा सकता है। यह ख़ंजर जल्लाद या क़ैद ख़ाने के प्रमुख अधिकारी के पास है। जल्लाद हर कवच का इतिहास जानता है, वह केवल सही समय पर ही गांठों को काटेगा। लेकिन समस्या यह है कि अगर जल्लाद कवच को काटना चाहेगा तो वह ख़ुद को ही नुक़सान पहुंचा बैठेगा।
जब दास्तान यहां तक पहुंचती है तो बाज़, बूढ़े से कहता है कि वह उसे ऐसा मार्ग दिखाए जिससे इन गांठों को खोलने में नुक़सान न पहुंचे। बूढ़ा इस समस्या का समाधान भी जानता है। वह कहता है कि एकमात्र मार्ग चश्मए ज़िंदगानी है। अगर वह चश्मए ज़िंदगानी तक पहुंच जाए और वहां स्नान करे, तो बिना किसी नुक़सान के इससे आज़ाद हो जाएगा और आसानी से सूर्य की ओर परवाज़ कर सकेगा और मुक्ति प्राप्त कर लेगा।