शहाबुद्दीन सोहरवर्दी-8
जैसा कि आप जानते हैं कि ईरान के महान दार्शनिक सोहरवर्दी ने इशराक़ नामक विचारधारा की आधारशिला रखी थी।
ईरान के इस विश्वविख्यात दार्शनिक, शेख शहाबुद्दीन सोहरवर्दी का जन्म सन 549 हिजरी क़मरी में ज़न्जान के सोहरवर्द नामक गांव में हुआ था। सोहरवर्द, पश्चिमोत्तरी ईरान के ज़ंजान नगर के निकट स्थित है। सोहरवर्दी अपने समय के बहुत बड़े विद्धान थे। 38 वर्ष की आयु में हलब के कुछ विद्धानों के षडयंत्र के कारण सलाहुद्दीन अय्यूबी के आदेश पर उनकी हत्या कर दी गई। अपनी अल्पायु में सोहरवर्दी ने कई किताबें लिखीं हैं।
मात्र 38 वर्ष की आयु में सोहरवर्दी ने लगभग 50 रचनाएं लिखीं। उनकी इन रचनाओं में से कुछ ऐसी कहानियां हैं जिनको उदाहरण के साथ पेश किया गया है जबकि कुछ रहस्यमई हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि इन रचनाओं के अध्ययन से सोहवर्दी के वास्तविक व्यक्तित्व का पता चलता है। पिछले कुछ कार्यक्रमों में हमने सोहरवर्दी की कुछ रचनाओं की गहन समीक्षा की थी।
सोहरवर्दी को दो महान ईरानी दार्शनिकों इब्ने सीना और इब्ने रुश्द के बीच की कड़ी माना जाता है। इन दो महान ईरानी दार्शनिकों के काल को ईरान में दर्शनशास्त्र के स्वर्णिम काल की संज्ञा दी जाती है जिसके बीच की कड़ी सोहरवर्दी हैं। इसके अतिरिक्त उनको इस्फ़हान विचारधारा के अस्तित्व में लाने का कारक भी कहा जाता है। मीर दामाद और मुल्ला सद्रा जैसे महान ईरानी दार्शनिक, सोहरवर्दी की विचारधारा से बहुत प्रभावित थे।
सोहरवर्दी जहां एक विचारक थे वहीं वे अन्य विचारकों के विचारों को मिश्रित करके उनसे नई सोच देने में भी बहुत आगे थे। उन्होंने न केवल इशराक़ी विचारधारा जैसी विचारधारा विश्व के सामने पेश की बल्कि बहुत से महान सूफ़ियों के लेखों को भी पेश किया जिनसे लोग इससे पहले अवगत नहीं थे। इन बातों के दृष्टिगत यह कहा जा सकता है कि यह उनके दर्शन का आकर्षण ही है जिसकी वजह से हालिया वर्षों में बहुत से दार्शनिक बहुत तेज़ी से उनकी रचनाओं की ओर उन्मुख हुए हैं।
हालांकि पूरे विश्वास के साथ तो यह कहना मुश्किल ही है कि यूरोप में सोहरवर्दी की रचनाओं को पहले किसने परिचित करवाया किंतु इतना अवश्य कहा जा सकता है कि पिछली शताब्दी के अंत में जर्मनी के शोधकर्ताओं ने सोहरवर्दी की रचनाओं पर शोध आरंभ किया था। दूसरे विश्व युद्ध के बाद फ़्रांसीसियों ने और बाद में ब्रिटेन वासियों ने इस बारे में अध्ययन आरंभ किया। इस समय कई इटैलियन और स्पैनिश शोधकर्ता भी सोहरवर्दी की रचनाओं पर काम कर रहे हैं। इसी बीच ईरान के शोधकर्ताओं में से एक, सैयद हुसैननस्र ने अपनी अंग्रेज़ी और फ़्रांसीसी भाषा की रचनाओं के माध्यम से सोहरवर्दी को पश्चिम में पहचनवाने के बारे में उल्लेखनीय प्रयास किये हैं। सोहरवर्दी के बारे में योरोप के अतिरिक्त भारतीय उप महाद्वीप में भी काफ़ी अध्ययन, किया गया।
पश्चिम में सोहरवर्दी से संबन्धित अति प्राचीन स्रोत, दर्शनशास्त्र से संबन्धित विश्वकोष है। इसमें उन्हें दर्शनशास्त्र के एक अनुभवी आलोचक के रूप में बताया गया है। अरबी और फार्सी भाषा के दर्शनशास्त्र से संबन्धित शब्दकोषों में सुहैल अफ़नान ने सोहरवर्दी के इशराक़ी दर्शन के कुछ शब्दों या उसकी शब्दावलियों की व्याख्या की है। धर्मों का अध्ययन करने वाले इटली के एक प्रसिद्ध इतिहासकार Mircea Eliade ने धर्म के बारे में लिखे अपने विश्वकोष के 35वें अध्याय में सोहरवर्दी के धर्म से संबन्धित विचारों की ओर संकेत किया है। उनका मानना है कि सोहरवर्दी इब्नेसीना, फ़ाराबी और ग़ज़ाली जैसे महान मुसलमान दार्शनिकों की श्रेणी में आते हैं।
जर्मनी में ईरान के महान दार्शनिक सोहरवर्दी के बारे में गहन अध्ययन किया गया है। उनके इशराक़ दर्शनशास्त्र के बारे में जर्मनी के शोधकर्ता माक्स होरतेन ने शोध किया है। उन्होंने इशराक़ फलसफे की मुख्य बातों को जर्मन भाषा में पेश किया है। माक्स होरतेन द्वारा लिखी गई पुस्तक जर्मनी के बाद वाले शोधकर्ताओं के लिए सोहरवर्दी के संबन्ध में रेफरेंस बुक के रूप में जानी जाती है।
जर्मनी के ही एक अन्य शोधकर्ता स्पाइज़ का ध्यान वर्तमान शताब्दी के आंरभ में सोहरवर्दी की ओर गया। उन्होंने शहाबुद्दीन सोहरवर्दी के दर्शनशास्त्र के बारे में तीन पुस्तकें लिखीं। उनकी किताबों को भी जर्मनी भाषा में सोहरवर्दी के बारे में रेफरेंस बुक के रूप में ही देखा जाता है। उनके अतरिक्त एक जर्मनी लेखक Hellmut Ritter ने भी अपने दो विस्तृत लेखों में इस बात का प्रयास किया है कि सोहरवर्दी के दर्शनशास्त्र की मूल बातों का उल्लेख किया जाए। उनके अलावा साइनमन वानडेन नामक एक अन्य शोधकर्ता ने सोहरवर्दी की एक पुस्तक “हैकलुन्नूर” का अनुवाद करते हुए उसपर फुटनोट लिखे हैं।
फ़्रांसीसी भाषा में सोहरवर्दी के संबन्ध में सबसे पुरानी रचना बैरेन कारादोवो ने सन 1902 में की थी। इसका शीर्षक था, “फलसफए इशराक़”। इस रचना में सोहरवर्दी के दर्शनशास्त्र की व्याख्या की गई है। बैरेन कारादोवो के बाद फ़्रांसीसी शोधकर्ताओं में हैनरी कार्बेन का नाम लिया जा सकता है। यह कहा जा सकता है कि सोहरवर्दी के बारे में पश्चिमी लेखकों और विद्धवानों में सबसे अधिक काम उन्होंने ही किया है। उनके लेख न केवल पश्चिम बल्कि ईरान में भी महत्व रखते हैं। उन्होंने सोहरवर्दी के बारे में बहुत कुछ लिखा है। उन्होंने सोहरवर्दी के बारे में लिखने के साथ ही उनकी कुछ रचनाओं का अनुवाद भी किया है। कारादोवो ने अधिकतर सोहरवर्दी की रचनाओं का अनुवाद किया है। उनका महत्वपूर्ण कार्य यह है कि उन्होंने सोहरवर्दी की रचनाओं पर शोध करके उसे एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया है।
यह पुस्तक दो भागों में है। उन्होंने अपनी यह किताब उस समय प्रकाशित की थी जब सोहरवर्दी के व्यक्तित्व को उतनी अच्छी तरह से नहीं पहचाना जाता था जितना आज पहचाना जाता है। यह वह समय था जब सोहरवर्दी को ईरान में भी कम जाना जाता था। कारवन ने सोहरवर्दी की दो पुस्तकों, हिकमतुल इशराक़ और परे जिब्रील का भी अनुवाद किया है। सोहरवर्दी के जीवन के बारे में कुछ अन्य किताबों में भी मिलती है जो इस्लामी दर्शनशास्त्र के इतिहास के बारे में लिखी गई हैं। यह पुस्तकें जर्मनी, अंग्रेज़ी और इतालवी भाषाओं में हैं। कारवन ने, “ईरानी तसव्वुफ़ में एक ईरानी” शीर्षक के अन्तर्गत अपनी एक पुस्तक में सोहरवर्दी की विचारधारा के साथ ही साथ इब्ने अरबी और सेमनानी की विचारधाराओं के बारे में भी चर्चा की है। इसी प्रकार उन्होंने आत्मा की आध्यात्मिक यात्रा के बारे में बयान किया है। इसके अतिरिक्त कारवन ने सोहरवर्दी के बारे में अपने एक लेख में सोहरवर्दी की दार्शनिक विचारधारा की तुल्नात्मक समीक्षा की है। उन्होंने इसी प्रकार “इशराक़ विचारधारा के संस्थापक” शीर्षक के अन्तर्गत एक किताब में न केवल सोहरवर्दी के विचारों की बल्कि उनके पूरे जीवन की समीक्षा की है।
कारवन ने अन्य शोधकर्ताओं और अनुभवी गुरूओं की भांति एसे बहुत से शिष्यों का प्रशिक्षण किया जिन्होंने सोहरवर्दी के विचारों से लाभ उठाया। इनमें से जेंबेट मसीसी का नाम लिया जा सकता है। उन्होंने सोहरवर्दी के दर्शन पर विस्तार से लिखा है। कारवन के एक अन्य शिष्य का नाम है अमीर नफकी। उन्होंने सोहरवर्दी की शैली और उनके दर्शनशास्त्र के बारे में विशेष रूप से लिखा है।
सोहरवर्दी के बारे में फ़्रांसीसी भाषा में लिखी जाने वाली एक अन्य रचना का नाम है, “इब्नेसीना और मेटाफ़िज़िक” जिसे जार्ज अनावाटी ने लिखा है। इसमें सोहरवर्दी के विचारधारा पर इब्ने सीना के प्रभाव को दिखाने का प्रयास किया गया है। इसमें सोहरवर्दी को इब्ने सीना का अनुयाई बताया गया है। उन्होंने इसके अतिरिक्त अपनी एक अन्य पुस्तक में भी सोहरवर्दी के निकट अस्तित्व के बारे में चर्चा की है। अब्दुर्रहमान बदवी ने भी सोहरवर्दी की दृष्टि से सृष्टि की पहचान के बारे में अध्ययन किया है।
पश्चिम में सोहरवर्दी को परिचित कराने में लुइस गार्ट की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इस फ़्रांसीसी लेखक ने पश्चिम में सोहरवर्दी को परिचित कराने के लिए कई लेख भी लिखे हैं। उनके एक अन्य लेख में सोहरवर्दी के विचार और उनकी तत्वदर्शिता की मूल प्रवृत्ति की समीक्षा की गई है। लुइस गार्ट ने अपने एक अन्य लेख में फ़ाराबी और सोहरवर्दी के दर्शनशास्त्र की तुल्नात्मक समीक्षा की है।
एक अन्य लेखक, गोम्स नोगाल्स ने इस्लामी दर्शनशास्त्र के इतिहास शीर्षक के अन्तर्गत सोहरवर्दी के महत्व और फलसफे के क्षेत्र में उनके योगदान का उल्लेख किया है।