Jan ०५, २०१६ ०८:३० Asia/Kolkata

मौलाना जलालुद्दीन मोहम्मद मौलवी ने पूरी दुनिया जानती है और वे फ़ारसी शायरी के अजूबे में गिने जाते हैं।

मौलाना जलालुद्दीन मोहम्मद मौलवी ने पूरी दुनिया जानती है और वे फ़ारसी शायरी के अजूबे में गिने जाते हैं। वह हस्ती मौलाना रोम की है जिन्हें फ़ारसी में मोलवी कहा जाता है। उनका पूरा नाम जलालुद्दीन मोहम्मद मोलवी है। उनके उच्च विचार का दुनिया की अनेक भाषाओं में अनुवाद हो चुका है और बहुत से साहित्यकार और बुद्धिजीवि, मौलवी के विचारों से प्रभावित हुए हैं। मौलाना जलालुद्दीन मोहम्मद मौलवी सातवीं शताब्दी हिजरी क़मरी के प्रसिद्ध शायर व ज्ञानी हैं। वह ईरान के सांस्कृतिक प्रभाव वाले क्षेत्र में रहते थे। फ़ारसी शायरी के इस बेमिसाल व अतुल्य शायर के उतार चढ़ाव भरे जीवन के बारे में आपको बताने जा रहे हैं। आपको यह भी बताएंगे कि मौलाना रोम ज़िन्दगी से संबंधित कुछ बातें, वास्तविकता से परे हैं।

 

 

फ़्रांस के प्रसिद्ध ईरानविद् प्रोफ़ेसर हेनरी मासे ने सोर्बन युनिवर्सिटी में अपनी फ़ेयरवेल पार्टी में कहा था, “मैंने अपनी ज़िन्दगी फ़ारसी साहित्य के लिए समर्पित की और आप जैसे बुद्धिजीवियों और उस्तादों को इस अजीब साहित्य से परिचित कराने के लिए मेरे पास तुलनात्मक अध्ययन के अलावा कोई और रास्ता नहीं था कि आपको यह बता सकूं कि फ़ारसी साहित्य चार खंबों पर टिका हुआ हैः फ़िरदोसी, सअदी, हाफ़िज़ और मौलाना रोम। फ़िरदोसी यूनान के शायर होमर के समतुल्य बल्कि उससे बेहतर हैं। सअदी अनतोले फ़्रांस की याद दिलाते हैं। हाफ़िज़ की जर्मनी के गोएटे से तुलना की जा सकती है कि जो ख़ुद को हाफ़िज़ का शिष्य कहते हैं और ख़ुद के जीवन को उस समीर का ऋणी मानता है जो हाफ़िज़ के जगत से उन तक पहुंची है किन्तु मौलाना की, दुनिया में कोई ऐसी हस्ती नहीं मिली, जिससे तुलना करूं। वह बेमिसाल और अतुल्य रहेंगे। वह सिर्फ़ शायर नहीं हैं बल्कि एक समाजशास्त्री और संपूर्ण मनोवैज्ञानिक हैं जो ईश्वर और इंसान को बहुत अच्छी तरह पहचानते हैं। उनकी क़द्र कीजिए और उनके ज़रिए ख़ुद को और ईश्वर को पहचानिए।”

 

 

जलालुद्दीन मोहम्मद बलख़ी उर्फ़ मोलवी, सातवीं हिजरी क़मरी के प्रसिद्ध ईरानी शायर व आत्मज्ञानी हैं। ज़्यादातर शोधकर्ताओं का मानना है कि मोलवी 6 रबीउल अव्वल सन 604 हिजरी क़मरी को बल्ख़ में पैदा हुए। जलालुद्दीन मोहम्मद, बल्ख़ के एक मशहूर वक्ता के घर पैदा हुए। उनके पिता बहाउद्दीन वलद, वक्ता होने के अलावा, शिक्षक, उपदेशक, धर्मगुरु और आत्मज्ञानी थी। उनके पिता सुलतानुल उलमा के नाम से मशहूर थे। मौलानना ने अपने पिता की छत्रछाया में ऐसी हालत में घर में परवरिश पायी कि घर का माहौल ईश्वर के गुणगान से सुगन्धित रहता था। ऐसे माहौल में आंख खोलने वाले मौलाना रोम, बचपन से ही आत्मज्ञान की ओर उन्मुख हुए। मौलाना इस माहौल में बड़े हुए और ख़ुद को ईश्वर की याद में लीन पाया! वह अपना दिन रात आत्मिक जगत की वादियों की सैर में बिताते थे। उन दिनों मौलाना के शिक्षक सय्यद बुर्हानुद्दीन तिरमज़ी थे जो ख़ुद अपने समय के मशहूर आत्मज्ञानी व उपदेशक थे। ख़ुद मौलाना के पिता, सय्यद बुर्हानुद्दीन तिरमज़ी के शिष्य रह चुके थे। शोध के अनुसार, सय्यद बुर्हानुद्दीन तिरमज़ी ने मोलवी की, जब वे नाबालग़ थे और उस वक़्त भी जब वह क़ूनिये के मशहूर वक्ता थे, ज्ञान, धर्मशास्त्र और अध्यात्म के चरणों को तय करने में बहुत मदद की।

 

 

जिन दिनों मौलाना बचपन का दौर गुज़ार रहे थे, ख़ुरासान और बल्ख़ से समरक़न्द तथा ख़ारज़्म से नीशापूर तक सम्राट मोहम्मद ख़ारिज़्मशाह की हुकूमत थी।

उन दिनों बल्ख़ ख़ुरासान के चार बड़े अहम शहरों में गिना जाता था। मर्व, हरात और नीशापूर के साथ साथ बल्ख़, इस्लामी जगत का ज्ञान का महत्वपूर्ण केन्द्र समझा जाता था। बल्ख़ में बड़ी संख्या में मस्जिदें और मदरसे थे। उन दिनों प्रवचन और पैग़म्बरे इस्लाम के कथनों की व्याख्या की सभाएं बहुत आयोजित होती थीं और बल्ख़ शहर मदरसों, विद्वानों और धर्मगुरुओं की बहुतायत के कारण क़ुब्बतुल इस्लाम अर्थात इस्लाम के गुंबद के नाम से मशहूर था। किन्तु कुछ समय बाद यह शहर आस-पास के क्षेत्रों में मंगोलों के हमलों के बारे में सरगोशियों के कारण संकटग्रस्त हो गया। उस वक़्त मौलाना 13 साल के किशोर थे जब मध्य एशिया पर मंगोलों के हमले का ख़तरा बढ़ गया था और ख़ारज़्मशाह द्वारा कुछ मंगोल व्यापारियों की हत्या कराने से यह प्रक्रिया और तेज़ हो गयी थी। उन दिनों मंगोलों के हमले से पहले मौलाना रोम के पिता बहाउद्दीन वलद ने बल्ख़ छोड़ने का फ़ैसला किया। उन्होंने अपने परिजनों के साथ हज करने के इरादे से बग़दाद और हेजाज़ का रुख़ किया। इस सफ़र में इतिहासकारों के अनुसार, मौलाना के पिता के साथ उनके कुछ समर्थक भी थे।

 

 

इस सफ़र के दौरान मौलाना का परिवार थोड़े समय के लिए नीशापूर में रुका। नीशापूर में मौलाना अपने पिता के साथ तत्कालीन प्रसिद्ध शायर व आत्मज्ञानी फ़रीदुद्दीन अत्तार से मिलने गए। अत्तार ने मौलाना रोम की प्रतिभा को देख कर उन्हें अपनी किताब ‘असरार नामे’ की एक प्रति भेंट की।

पलायन के इस दौर में जो बल्ख़ से शुरु हुया और नीशापूर, बग़दाद, शाम और हेजाज़ तक जारी रहा, मौलाना को मदरसों में शिक्षा हासिल करने का कम मौक़ा मिला। इस दौरान वे अपने पिता और उनके प्रतिभाशाली शिष्यों से शिक्षा लेते रहे और साथ ही फ़ारसी व अरबी साहित्य के पद् व गद्य का अध्ययन करते रहे। जब हलब और बग़दाद जैसे शहरों में ठहरते थे तो मदरसे में जाकर ज्ञान की प्यास बुझाते थे।

 

 

इस लंबे सफ़र के बाद अंततः मौलाना रोम का परिवार 617 हिजरी के बाद केन्द्रीय अनातोलिया गया और कुछ समय तक मौजूदा क़रामान में रहने के बाद, क़ूनिये में बस गया। इस इलाक़े के लोग फ़ारसी भाषी थे। वे मोलाना की क्लास और प्रवचन में बड़ी संख्या में भाग लेते थे। इस दौरान मौलाना रोम या मोलवी धर्मशास्त्र, क़ुरआन, क़ुरआन की व्याख्या, ईश्वरीय दूतों के इतिहास, अरबी और फ़ारसी साहित्य के ज्ञान को बढ़ाते गए और अपने पिता व अनुयाइयों के आग्रह पर प्रवचन और क्लास देने लगे। 628 हिजरी में पिता के देहान्त के बाद, मौलाना को उनका उत्तराधिकारी नियुक्त किया गया। उसी समय से मोलवी के बहुत से शिष्य हुए और समाज के सभी वर्ग से प्रशंसक उनके पास आने लगे।

उन दिनों मौलाना की उम्र 24 साल थी। वे प्रवचन देने के साथ साथ शोध व अध्ययन भी करते रहे। उन्हीं दिनों मौलाना ने अपने बचपन के उस्ताद सय्यद बुर्हानुद्दीन तिरमज़ी से अध्यात्म के उच्च चरणों को हासिल करने में मदद ली। उसके बाद वे ज्ञान की प्राप्ति के लिए हलब, दमिश्क़ और बग़दाद के सफ़र पर निकले और वहां साहित्य, भाषा, क़ुरआन की व्याख्या, पैग़म्बरे इस्लाम के कथन और धर्मशास्त्र की शिक्षा हासिल की।

उन दिनों मौलाना ने अपनी ज़िन्दगी के सात साल ज्ञान की प्राप्ति में गुज़ारे और इन सात वर्षों की तपस्या से वे महान आत्मज्ञानी, प्रवचनकर्ता, और मुफ़्ती बन कर उभरे। मौलाना की क्लास, भाषण और प्रवचन की सभाएं उनके काल के दूसरे प्रवचनकर्ताओं व शिक्षकों से भिन्न होती थीं। चूंकि मौलाना रोम को क़िस्सा सुनाने और पढ़ने का बहुत शौक था इसलिए उनकी प्रवचन की सभा का माहौल बहुत मज़ेदार रहता था।

 

         

समकालीन शोधकर्ता डाक्टर ज़र्रीनकूब अपनी किताब में कि जिसका हिन्दी अनुवाद , ‘एक एक सीढ़ी ईश्वर से मुलाक़ात तक’ है, जलालुद्दीन मोहम्मद मौलाना की ज़िन्दगी के विभिन्न पहलुओं का उल्लेख किया है और मोलवी के प्रवचनों की विशेषता यूं बयान की है, “ज्ञान की विभिन्न शाखाओं में मौलाना की दक्षता और पवित्र क़ुरआन की आयतों और पैग़म्बरे इस्लाम के कथनों का गहरा ज्ञान और ख़ास तौर पर जिस शौक़ से वे कहानियों, मिसाले और शेर सुनाते थे, सुनने वाला उनकी बातों से सम्मोहित हो जाता था। सवालों के जवाब में बहुत ही अहम व सूक्ष्म बिन्दु निहित होते थे। इस तरह की सभाओं के नमूने ‘मजालिसे सबआ’ नामक किताब में मौजूद हैं।” शहर में उनके ख़ुद के मदरसे और दूसरे मदरसों में उनकी क्लास, बहुत ही रोमांचक होती थी। जब वह मदरसों के लिए रवाना होते थे तो उनके साथ छात्रों की भीड़ चलती थी। उनकी प्रवचन की क्लासों में सभी वर्ग के लोग हिस्सा लेते थे। हेसामुद्दीन चलबी जैसे उभरते हुए जवान तो सलाहुद्दीन ज़रकूब जैसे अनपढ़ किन्तु जोश ज़ज़्बे से भरे बूढ़े भी मौजूद रहते थे।