मौलाना जलालुद्दीन मुहम्मद बलख़ी-8
मौलाना जलालुद्दीन मुहम्मद बलख़ी के नाम से पूरी दुनिया परिचित है।
मौलाना जलालुद्दीन मुहम्मद बलख़ी के नाम से पूरी दुनिया परिचित है। फ़ारसी शायरी के इस अद्भुत शायर को मौलवी और मौलाना रोम भी कहा जाता है। उनकी कविताओं के माध्यम से उनके विचार संसार की विभिन्न भाषाओं में अनुवादित हो कर अनेक साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों तक पहुंचे हैं और उन्हें प्रभावित कर चुके हैं। मौलवी या मौलाना रोम तेरहवीं शताब्दी ईसवी के सबसे प्रख्यात कवियों में से एक हैं जो संस्कृति प्रेमी ईरानी शासन में जीवन बिता रहे थे। तो आजके कार्यक्रम में भी फ़ारसी के इस महान कवि के उतार-चढ़ाव भरे जीवन पर एक दृष्टि डालेंगे। कृपया हमारे साथ रहें।
पिछले कार्यक्रम में हमने बताया कि मौलाना जलालुद्दीन मुहम्मद बलख़ी उर्फ़ मौलवी का जन्म बल्ख़ में हुआ, जो उस समय ख़ुरासान के महत्वपूर्ण शहरों में से एक था। मौलाना रोम का पालन पोषण एक ज्ञानप्रेमी परिवार में हुआ। वे अभी किशोर ही थे कि ईरान पर मंगोलों के हमले के कारण उन्हें अपने परिवार के साथ बल्ख़ की ओर पलायन करना पड़ा। कई साल तक बग़दाद, दमिश्क़ व हेजाज़ जैसे क्षेत्र के विभिन्न शहरों की यात्रा करने के बाद अंततः वे वर्तमान तुर्की के क़रामान नगर पहुंचे और वहीं ठहर गए। उस समय इस नगर को लारंदे कहा जाता था। इस नगर में शिक्षा-दीक्षा के लिए उचित वातावरण था। लारंदे के शासक ने, जो सुलतान अलाउद्दीन कैक़ुबाद सलजूक़ी के अधीन था, मौलवी के पिता बहाउद्दीन वलद, उनके परिवार और शिष्यों का भरपूर स्वागत किया और एक मदरसा उनके नाम कर दिया।
लारंदे एक सुंदर शहर था और उसके गली कूचों में बाईज़न्टाइन साम्राज्य या पूर्वी रोमन साम्राज्य बल्कि उससे पहले के प्राचीन यूनानी साम्राज्य के रोचक अवशेष मौजूद थे। इस नगर के लोगों की अपनाइयत और शहर के शांत वातावरण ने, बहाउद्दीन वलद के लिए, जो वृद्धावस्था में थे, शिक्षा-दीक्षा और उपदेश का उचित व सुरक्षित वातावरण उपलब्ध करा दिया था। इसी शहर में पिता के प्रोत्साहन और उनके शिष्यों के आग्रह पर मौलवी ने पहली बार उपदेश की बैठक आयोजित की। क़ुरआन, हदीस, साहित्य, शायरी, तफ़सीर और अन्य आवश्यक ज्ञानों पर अच्छी पकड़ रखने वाले मौलवी, अपनी बात को मुहावरों और अरबी व फ़ारसी के शेरों और कथाओं का प्रयोग करके अधिक रोचक बना देते थे। इस प्रकार बहुत सारे लोग उनके शिष्य बन गए।
रोम के सुलतान अलाउद्दीन कैक़ुबाद सलजूक़ी ने जब ख़ुरासान के ज्ञानी बहाउद्दीन वलद के ज्ञान व प्रतिष्ठा के चर्चे सुने तो बहुत आग्रह करके उन्हें क़ूनिया में अपने दरबार में बुलाया। क़ूनिया भी उस समय बल्ख़, हेरात, मर्व और नीशापुर की भंति ज्ञान व संस्कृति के बड़े केंद्रों में से एक समझा जाता था। रोम के सलजूक़ी दरबार ने बहाउद्दीन वलद और उनके परिवार का ज़बरदस्त स्वागत किया। स्वयं सुलतान अलाउद्दीन कैक़ुबाद उनकी अगवानी के लिए गया। इसी प्रकार क़ूनिया के अनेक विद्वान, प्रतिष्ठ लोग और जनता के सभी वर्गों से संबंध रखने वाले शहर से काफ़ी पहले ही बाहर निकल कर उनके स्वागत लिए पहुंचे। वे इस बात से बहुत प्रसन्न थे कि ख़ुरासान के प्रख्यात विद्वान और नामचीन उपदेशक उनके नगर में पधार रहे थे। बहाउद्दीन वलद, सुलतान तथा नगर के प्रतिष्ठित लोगों के अत्यधिक आग्रह के बावजूद नगर में प्रविष्ट होने के तुरंत बाद एक मदरसे में जा कर रुक गए और इस बात ने हर छोटे-बड़े व्यक्ति की दृष्टि में उनकी प्रतिष्ठा और बढ़ा दी।
सलजूक़ी दरबार, फ़ारसी भाषा के शायरों, लेखकों और विद्वानों का ठिकाना समझा जाता था और उसमें फ़ारसी भाषा में ही सारे सरकारी काम किए जाते थे। वहां के विद्वान, कवि, सूफ़ी और इतिहासकार भी फ़ारसी में ही बात करते थे और उनमें से अधिकांश लिखते भी फ़ारसी में ही थे। बहाउद्दीन वलद और जलालुद्दीन मुहम्मद मौलवी के पाठ और उपदेश की बैठकें, उनके क़ूनिया पहुंचते ही आरंभ हो गईं। युवा मौलवी के बैठकों की रोचकता, हर दिन इस नगर के विभिन्न वर्गों में से नए नए श्रोता बढ़ा रही थी। मौलवी की आयु चौबीस साल की रही होगी कि उनके पिता की मौत ने घर वालों की देख-भाल भी और उनके शिष्यों के प्रशिक्षण और उपदेश की ज़िम्मेदारी उन पर डाल दी।
उन्हीं दिनों जलालुद्दीन मुहम्मद मौलवी के शिक्षक और बहाउद्दीन वलद के श्रद्धालु सैयद बुरहानुद्दीन मुहक़्क़िक़ तिरमिज़ी क़ूनिया पहुंचे। उन्होंने मौलाना रोम को अधिक निरंतरता के साथ अध्ययन करने और अपने लिखी बातों विशेष कर पिता की बातों पर विचार व चिंतन करने के लिए प्रोत्साहित किया। इसके बाद मौलवी उच्च शिक्षा के लिए शाम या वर्तमान सीरिया की ओर रवाना हो गए। सात साल शिक्षा, सात साल तपस्या और सात साल चिंतन ने, जिसका कुछ भाग हलब और दमिश्क़ के मदरसों और कुछ भाग क़ैसरिया व क़ूनिया में सैयद बुरहानुद्दीन मुहक़्क़िक़ तिरमिज़ी की देख-रेख में बीता, युवा जलालुद्दीन मुहम्मद को एक ज्ञानी मुफ़्ती, विद्वान और ईश्वर की गहन पहचान रखने वाले एकेश्वरवादी में बदल दिया।
जब जलालुद्दीन मुहम्मद बलख़ी लगभग 33 साल की आयु में शाम से क़ूनिया लौटे तो एक बड़े मौलाना व मुफ़्ती बन चुके थे। उस समय के प्रचलित ज्ञानों में वे इतने दक्ष हो चुके थे कि सिराजुद्दीन उरमवी और सदरुद्दीन क़ूनवी जैसे क़ूनिया के बड़े विद्वान उन्हें सम्मान की दृष्टि से देखते थे। मौलवी के तफ़सीर या फ़िक़्ह के पाठ में तो केवल धार्मिक ज्ञान से तृप्ति की इच्छा रखने वाले भाग लेते थे किंतु उनकी उपदेश की बैठकों में जनता के विभिन्न वर्गों के बहुत सारे लोग यहां तक कि फ़ारसी भाषी तुर्क और नगर के प्रतिष्ठित लोग भी शामिल हुआ करते थे।
मौलाना रोम की शायरी की क्षमता, कथा सुनाने की दक्षता, आवाज़ का ठहराव व प्रभाव और उनकी सभा की रोचकता व अपनाइयत ऐसी बातें थीं जो उनकी बैठकों को ख़ास रंग प्रदान करती थीं और धीरे-धीरे दूसरों की सभाओं के रंग को फीका कर देती थीं। उनका विनम्र और अपनाइयत भरा स्वर, सुनने वालों और शिष्यों पर चमत्कारिक प्रभाव डालता था और उन्हें रोने, गिड़गिड़ाने और प्रायश्चित करने पर बाध्य और भलाई व सद्कर्म के लिए प्रोत्साहित करता था।
मौलाना रोम की पाठ की बैठकों में भी विशेष रोचकता थी। वे अपने मदरसे के अलावा क़ूनिया के कई अन्य मदरसों में भी पढ़ाते थे। जब वे एक मदरसे से दूसरे मदरसे की ओर जा रहे होते थे तो बहुत से लोग उनके साथ-साथ चलते थे। गली-कूचों में मौलाना के साथ चलने वाली भीड़ अन्य लोगों के लिए रास्ता चलना मुश्किल बना देती थी। जब वे बाज़ारों या गली-कूचों के अंदर चल रहे होते थे तो जिसे भी कोई धार्मिक प्रश्न पूछना होता था या धार्मिक संस्कारों में कठिनाई आ रही होती थी यहां तक कि उसे कोई अत्यचारी या शासक सता रहा होता था तो वह स्वयं को मौलाना रोम के पास पहुंचाता और उनसे सहायता या मार्गदर्शन का अनुरोध करता था।
मौलाना रोम के उपदेश की सभा में समाज के सभी वर्गों के लोग उपस्थित होते थे। हुसामुद्दीन चलबी जैसे युवा के साथ ही, जो मौलाना के ख़ास शिष्य थे, सलाहुद्दीन ज़रकूब क़ूनवी जैसे अनपढ़ किंतु उत्साहित वृद्ध मौजूद होते थे कि जो सैयद बुरहानुद्दीन के श्रद्धालु थे और मौलाना उन्हें बहुत चाहते थे। सलाहुद्दीन ज़रकूब क़ूनवी एक साधारण से देहाती वृद्ध थे किंतु उनके भीतर ईश्वर की खोज की उत्सुकता थी। वे मौलाना रोम की उपदेश की सभाओं में भाग लेते थे और ईश्वर के समक्ष अपनी गिड़गिड़ाहट से इन सभाओं को विशेष कौतूहल और रंग प्रदान कर देते थे। मौलाना रोम के तेज़ी से गुज़रते इन दिनों में ही उनकी पत्नी गौहर ख़ातून का निधन हो गया और वे उन्हें अकेला छोड़ गईं। इस अकेलेपन से बचने के लिए उन्होंने दिन-प्रतिदिन स्वयं को अधिक से अधिक अध्ययन, शिक्षा-दीक्षा और उपदेश की सभाओं में लीन कर लिया। उनके बच्चे सीरिया से पढ़ाई करके क़ूनिया वापस आ चुके थे और उन्हें अधिक देख-भाल की ज़रूरत थी। विवश होकर मौलान को दूसरा विवाह करना पड़ा। उन्होंने कर्रा ख़ातून क़ूनवी से, जो ईरानी मूल की तुर्क थीं और फ़ारसी भाषा में दक्षता रखती थीं, विवाह कर लिया। कर्रा ख़ातून ने, जिनके पहली शादी से एक लड़की और एक लड़का था, जल्द ही मौलाना जलालुद्दीन रोमी के सुनसान से घर को प्रेम व स्नेह की रौशनी से उज्जवल और आबाद कर दिया।