Oct ०५, २०१६ १३:१८ Asia/Kolkata

इस्लाम की दृष्टि में सभी लोग एक समान हैं। 

इस आधार पर इस्लामी दृष्टिकोण के अनुसार मानवाधिकारों का वास्तविक अर्थ यह है कि मानव के अधिकारों के संबन्ध में उन अधिकारों और बातों को दृष्टिगत रखा जाए जो सृष्टि की दृष्टि में सारे लोगों में एक जैसी हैं।  इस्लाम ने समस्त परिवारों के लिए कार्यक्रम निर्धारित किया है।  वर्तमान काल में भी मुसलमान धर्मगुरू, पवित्र क़ुरआन की शिक्षाओं, पैग़म्बरे इस्लाम (स) एवं उनके पवित्र परिजनों के कथनों और बुद्धि एवं तर्क के आधार पर उन विषयों के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं जिनकी हमको आवश्यकता पड़ती है।  इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि पवित्र क़ुरआन के रूप में ईश्वर ने मानव जाति का ऐसा संविधान दिया है जिसमें उसकी आवश्यकताओं की बातों का उल्लेख किया गया है।

इस समय हमारे पास मानवाधिकारों का जो अन्तर्राष्ट्रीय घोषणापत्र मौजूद है वह पूरी तरह से पश्चिमी सभ्यता से प्रभावित है।  इस प्रकार कहा जा सकता है कि मानवाधिकारों का घोषणापत्र, समस्त लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति करने में सक्षम नहीं है।  इसका मुख्य कारण यह है कि मानव के अधिकारों को उचित ढंग से समझने के लिए स्वयं मनुष्य को समझना बहुत ज़रूरी है।  यही कारण है कि मानव जाति के लिए किसी भी प्रकार का क़ानून बनाने से पहले मनुष्य के वास्तविक अधिकारों को समझना आवश्यक है।  पश्चिमी विचारधारा और इस्लामी शिक्षाओं के बीच बहुत अंतर पाया जाता है जिसके कारण पश्चिमी विचारधारा पर आधारित किसी भी दस्तावेज़ को पूरी मानवजाति के लिए मानदंड के रूप में पेश नहीं किया जा सकता।

पश्चिमी विचारधारा में भौतिकवाद को ही महत्व दिया जाता है।  इसके अनुसार मनुष्य भी संसार में पाई जाने वाली अन्य भौतिक वस्तुओं की भांति ही एक वस्तु है।  पश्चिमी विचारधारा में मनुष्य की सांसारिक आवश्यकताओं को तो दृष्टिगत रखा गया है किंतु प्रलय के बाद के जीवन और मानव के आध्यात्मिक आयामों के बारे में कुछ भी नहीं कहा गया है।

पश्चिमी विचारधारा के आधार पर भौतिकता ही सबकुछ है और इसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं है।  उनके अनुसार भौतिकता से हटकर सारी बातें कल्पना मात्र हैं और आध्यात्म या इस जैसी बातें व्यर्थ हैं।  यही कारण है कि पश्चिमी मानवाधिकार, भौतिकता के इर्दगिर्द घूमते दिखाई देते हैं।

इस्लामी शिक्षाओं में बताया गया है कि मनुष्य केवल इस नश्वर संसार तक ही सीमित नहीं है।  इस आधार पर उसके लिए एसे अधिकारों का निर्धारण नहीं किया जा सकता जो केवल भौतिकता पर केन्द्रित हों।  इन अधिकारों को इस प्रकार का होना चाहिए कि वे मनुष्य की भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों प्रकार की आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाले हों।  वास्तव में मनुष्य, शरीर तथा आत्मा से बना प्राणी है जिसके तीन आयाम हैं।  मानवीय, पाश्विक और ईश्वरीय।  इस आधार पर मानवजाति के लिए निर्धारित किये जाने वाले क़ानूनों में इन तीनों आयामों को दृष्टिगत रखा जाना चाहिए।  धार्मिक शिक्षाओं के अनुसार ईश्वर ही इस सृष्टि का रचयिता है।  उसी ने मनुष्य को अस्तित्व प्रदान किया है।  ईश्वर, मनुष्य की शारीरिक और आध्यात्मिक हर प्रकार की आवश्यकताओं से भलिभांति अवगत है।  उसने धर्म के रूप में मानव जाति के लिए जो संविधान भेजा है उसमें मनुष्य की हर प्रकार की आवश्यकता को दृष्टिगत रखा गया है।  इसमें जहां मनुष्य की सांसारिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखा गया है वहीं उसकी आध्यात्मिक ज़रूरतों को अनदेखा नहीं किया गया है।

पश्चिमी विचारधारा में मनुष्य के अधिकार उसी से शुरू होते हैं और उसी पर समाप्त हो जाते हैं।  उसके हिसाब से हर समस्या का समाधान केवल बुद्धि से ही किया जाना चाहिए और उसके अतिरिक्त फैसला लेने के लिए कोई दूसरी चीज़ नहीं है।  इस विचार के अनुसार व्यक्ति के अधिकारों का ईश्वर से कोई लेना-देना नहीं है और यह केवल बुद्धि पर ही आधारित हैं।

हालांकि इस्लामी विचारधारा के अनुसार मनुष्य एक प्राणी है जिसको ईश्वर ने अस्तित्व दिया है।  वह उसका सृष्टिकर्ता है।  वह अक्षम है जबकि उसके बनाने वाला पूर्ण रूप से सक्षम है।  एसे में उसके बारे में उसी को अधिक जानकारी है जिसने मनुष्य को बनाया है।

ह्यूमनिज़्म या मानवतावाद विचारधारा का आधार मनुष्य की इच्छाएं हैं।  इस हिसाब से यदि कोई धर्म है तो उसको मनुष्य की इच्छाओं के अनुरूप होना चाहिए।  इस हिसाब से मनुष्य की इच्छाओं को आधार बनाकर ही नियम बनाने चाहिए क्योंकि वे ही समस्त मूल्यों का केन्द्र हैं।  एसे में मनुष्य, मानव के लिए वे क़ानून निर्धारित करता है जो उसकी इच्छाओं के अनुरूप हों।  इस स्थिति में मानवतावा का झुकाव उदारवाद की ओर दिखाई देता है।  उदारवाद या लिबरलिज़्म में क़ानून का आधार स्वतंत्रत पर निर्भर है  किंतु यहां पर समस्या यह है कि यदि हर इंसान यह चाहे कि वह जो चाहता है उसे ही अंजाम दे तो फिर आपसी टकराव की स्थिति पैदा होगी।  एसे में सामाजिक व्यवस्था चरमरा जाएगी और मनुष्य के लिए जीवन व्यतीत करना कठिन हो जाएगा।  जब यह स्थिति उत्पन्न होगो तो फिर दूसरों को ध्यान में रखकर निजी आज़ादी को सीमित किया जाएगा जिससे सामाजिक व्यवस्था सुचारू रूप से चलती रहे।  एसे में हर व्यक्ति की निजी स्वतंत्रता उस समय तक सुरक्षित है जबतक वह दूसरों के लिए समस्या न बने।

पश्चिमी दृष्टिकोण के अनुसार उसका मुख्य लक्ष्य, सरकारों के मुक़ाबले में केवल व्यक्ति एवं उसके अधिकारों की रक्षा करना है।  इस सोच के अनुसार अधिकार केवल व्यक्ति के लिए हैं जो सामाजिक हितों से भी उपर हैं।  इसके विपरीत इस्लामी विचारधारा के अन्तर्गत अधिकारों का लक्ष्य यह है कि व्यक्ति और समाज के अधिकारों को साथ-साथ पूरा किया जाए।  साथ ही न्याय की स्थापना करके अधिकारों को न्यापूर्ण ढंग से विभाजित किया जा सके।  इन सब बातों का मुख्य उद्देश्य यह है कि मनुष्य, आध्यात्मिक विशेषताओं को प्राप्त कर सके।

पश्चिमी विचारधारा की मुख्य समस्या यह है कि उसमें मनुष्य को एक पूर्ण स्वतंत्र प्राणी के रूप में देखा जाता है जिसकी स्वतंत्रता की कोई सीमा नहीं है।  जैसाकि हम पहले भी बता चुके हैं कि मनुष्य को यदि पूर्ण रूप से स्वतंत्र छोड़ दिया जाए तो उसकी इस स्वतंत्रता से पूरे समाज की स्वतंत्रता ख़तरे में पड़ सकती है।  दूसरी बात यह है कि मानवाधिकारों का निर्धारण करते समय जाति, कुल, रंग या भौगोलिक क्षेत्र आदि में से किसी को भी वरीयता नहीं दी जानी चाहिए बल्कि हर प्रकार की विशेषताओं से दूर रहकर उसके लिए केवल एक मनुष्य होने के नाते अधिकार निर्धारित किये जाएं।

पश्चिमी दृष्टिकोण के हिसाब से मनुष्य का जीवन केवल सांसारिक जीवन तक ही सीमित है।  उसके हिसाब से प्रलय या परलोक जैसी कोई चीज़ नहीं है बल्कि यह मात्र का कल्पना है।  यही कारण है कि इस विचारधारा में केवल सांसारिक जीवन को महत्व दिया जाता है और उसी के आधार पर क़ानून बनाए जाते हैं।  वहां पर मानवीय मूल्यों का कोई भी महत्व नहीं है।  इसके वितरीत एकेश्वरवादी विचारधारा में मनुष्य का जीवन केवल संसार तक सीमित नहीं है बल्कि इस जीवन के बाद भी एक अन्य जीवन है।  यही कारण है कि इस्लामी मानवाधिकार केवल संसार तक सीमित न होकर बाद वाले जीवन से भी संबन्धित हैं।

पश्चिमी मानवाधिकारों के अस्तित्व में आने का मूल कारण वहां पर आने वाली क्रांतियां और होने वाले जनान्दोलन थे जो तत्कालीन तानाशाहों के विरुद्ध होते थे।  इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि प्रथम एवं द्वितीय विश्वयुद्धों के बाद यूरोप में उत्पन्न होने वाली समस्याओं का सामना करने और तत्कालीन परिस्थितियों से निबटने के उद्देश्य से मानवाधिकारों का निर्धारण किया गया।  यही कारण है कि पश्चिमी मानवाधिकार व्यापक नहीं हैं और उनमें बहुत कमियां पाई जाती हैं।  अतः यह कहना ग़लत नहीं होगा कि पश्चिमी मानवाधिकार विश्वव्यापी नहीं हैं और हो भी नहीं सकते क्योंकि यह एक विशेष भौगोलिक क्षेत्र की आवश्यकताओं के अनुरूप हैं।  यही वह कारण है जिसकी वजह से इनको नाना प्रकार की चुनौतियों का सामना है।  विश्व के बहुत से विचारक और समाज, पश्चिमी मानवाधकारों को स्वीकार नहीं करते।  इसीलिए इस्लामी देशों ने इस्लामी मानवाधकार घोषणात्र तैयार किया है जिसे मिस्र की राजधानी क़ाहिरा में पारित किया गया।  इसमें इस्लामी शिक्षाओं के आधार पर मानवाधिकारों की व्याख्या की गई है।