मीर सैय्यद अली हमदानी
मीर सैय्यद अली हमदानी आठवीं हिजरी क़मरी के एक महान रहस्यवादी हैं।
उन्होंने अपना पूरा जीवन इस्लाम की शिक्षाओं के प्रचार और कश्मीर एवं ताजिकिस्तान के लोगों को सत्य की शिक्षा देने और उनका शुद्धिकरण करने में बिता दिया। उन्हें कुबरविया सूफ़ी सिलसिले के बड़े विद्वानों में गिना जाता है। विद्वान उन्हें सुल्तानुल आरेफ़ीन, कश्मीर के लोग अली सानी और उनके मुरीद एवं उनसे श्रद्धा रखने वाले शाहे हमदान कहते हैं। उन्हें अमीर कबीर भी कहा जाता है, ताजिकिस्तान में वे हज़रत अमीर जान के नाम से प्रसिद्ध हैं।
इस्लाम के प्रचार प्रसार की वजह से मीर सैय्यद अली हमदानी भारतीय उपमहाद्वीप विशेष रूप से कश्मीर में काफ़ी मशहूर हैं। वे कुबरविया मत के विशिष्ट विद्वानों में से थे, उनकी मौत के बाद उनके अनुयाईयों को हमदानिया कहा जाने लगा। शोधकर्ताओं के अनुसार, आठवी हिजरी क़मरी में अपने कुछ शिष्यों के साथ मीर सैय्यद अली हमदानी की कश्मीर यात्रा के कारण इस इलाक़े में शिया इस्लाम का विस्तार हुआ। फ़ार्सी में लिखी गई उनकी किताबों द्वारा ईरानी संस्कृति और भाषा भारतीय उपमहाद्वीप स्थानांतरित हुई। कश्मीर में बड़ी संख्या में लोग उनका अनुसरण करते हैं। श्रीनगर में स्थित उनकी ख़ानक़ाह या मठ आज भी लोगों के लिए तीर्थ स्थल है। उनका मज़ार ताजिकिस्तान में है, इस देश में भी वे काफ़ी प्रसिद्ध हैं।
मीर सैय्यद अली हमदानी का पश्चिमी ईरान के हमदान शहर में सोमवार 12 रजब सन् 714 हिजरी को जन्म हुआ। उनके पिता का नाम अमीर शहाबुद्दीन हसन बिन सैय्यद मोहम्मद हमदानी था, वे एक धार्मिक व्यक्ति थे। वे हमदान के शासक थे और हुसैनी सैय्यद परिवार से थे।
सैय्यद अली हमदानी ने प्राथमिक शिक्षा अपने मामू सैय्यद अलाउद्दीन से प्राप्त की। अलाउद्दीन एक सूफ़ी थे। 12 वर्ष की आयु में उनके मामू ने उन्हें शेख़ अबुल बरकात तक़ीयुद्दीन अली दोस्ती के संरक्षण में दे दिया। सैय्यद अली हमदानी ने विशिष्ट शिक्षकों और गुरुओं से शिक्षा ग्रहण की और उनसे हदीस, दर्शनशास्त्र और रहस्यवाद का ज्ञान प्राप्त किया और आत्मा के शुद्धिकरण में उनसे प्रभावित हुए।
सैय्यद अली हमदानी अलाउद्दीन सेमनानी जैसे गुरुओं के निकट रहस्यवाद के चरणों को तय करने के बाद, अपने समकालीन 30 विशिष्ट गुरुओं की सिफ़ारिश के अनुसार, इस्लाम धर्म के प्रचार के लिए ईरान की सीमाओं से बाहर गए। उन्होंने यात्रा की कठिनाईयों को ख़ुशी से सहन किया और तुर्किस्तान, कश्मीर, भारत, श्रीलंका, ताजिकिस्तान, सीरिया, रूम और दुनिया के विभिन्न देशों की यात्रा की। वे कई बार मक्का और मदीना भी गए। उन्होंने 21 वर्ष तक यात्रा की और कहीं एक स्थान पर निवास नहीं किया। इन लम्बी यात्राओं में उन्होंने 1400 से रहस्यवादी और विद्वानों से आध्यात्मिक लाभ उठाया। 753 हिजरी में वे हमदान लौटे और विवाह किया। 773 हिजरी में फिर से स्वदेश को अलविदा कहा और यात्रा पर निकल पड़े।
ईरान और दक्षिण एवं मध्य एशिया में मीर सैय्यद अली हमदानी के अनेक शिष्य थे, लेकिन दुर्भाग्यवश इन विद्वानों के बारे में हम तक अधिक जानकारी नहीं पहुंची है। उनके सबसे प्रसिद्ध और विशिष्ट शिष्य का नाम नुरुद्दीन जाफ़र बदख़्शी है।
मीर सैय्यद अली हमदानी जब मध्य एशिया के इलाक़े ख़तलान में थे, तो उस समय बदख़्शी उनकी सेवा में हाज़िर हुए और उनके ज्ञान एवं अध्यात्म से लाभ उठाया। गुरु की सेवा में रहकर हासिल किए गए अपने आध्यात्मिक अनुभवों को उन्होंने ख़ुलासतुल मनाक़िब नामक किताब में दर्ज किया है।
उनके एक दूसरे शिष्य ख़्वाजा इसहाक़ ख़तलानी हैं। ख़तलानी मीर सैय्यद अली हमदानी के दामाद भी थे। विभिन्न यात्राओं में वे अपने उस्ताद के साथ रहे। ख़्वाजा इसहाक़ ने पचास वर्ष के दौरान बड़ी संख्या में लोगों को इस्लामी शिक्षाओं से परिचित करवाया और उनका प्रशिक्षण किया।
मीर सैय्यद हुसैन सेमनानी ने भी, जो एक रहस्यवादी और चमत्कारी विद्वान थे, मीर सैय्यद अली हमदानी से शिक्षा ग्रहण की और अपने उस्ताद के आदेशानुसार कई बार कश्मीर की यात्रा पर गए।
मीर सैय्यद अली हमदानी का उनके जीवन में ही काफ़ी सम्मान था और ईरान, तुर्किस्तान और भारत के अधिकांश शहरों के लोग उनका विशेष सम्मान किया करते थे। धार्मिक सच्ची निष्ठा एवं आध्यात्म के अलावा, दर्शनशास्त्र में भी उनका विशिष्ट स्थान था और वे अपने समय में प्रचलित विषयों की अच्छी जानकारी रखते थे। उन्होंने कई किताबें भी लिखी हैं।
लोगों के बीच उनकी लोकप्रियता और सम्मान इतना अधिक था कि बहुत से शासक और अधिकारी उनका अत्यंत सम्मान करने लगे और उनके उपदेशों पर ध्यान देने लगे। मीर सैय्यद अली हमदानी जब परलोक सिधार गए तो शासकों और अधिकारियों के बीच उनका मक़बरा बनवाने और उसे सजाने के लिए प्रतिस्पर्धा सी हो गई।
कश्मीर में जिस मकान को मीर सैय्यद अली हमदानी ने इबादत, प्रचार, प्रवचन और उपदेश के लिए चुना था, वहां के निवासियों ने उसका बहुत सम्मान किया और उसे मस्जिद में परिवर्तित कर दिया और वहां एक भव्य इमारत का निर्माण किया। नवीं हिजरी शताब्दी के आरम्भ से आज तक यह इस इलाक़े के लोगों में काफ़ी लोकप्रिय है और इसे पवित्र स्थान माना जाता है। आशूर के दिन जब इमाम हुसैन की याद में निकलने वाले जुलूस उधर से गुज़रते हैं तो इस पवित्र स्थल के सम्मान में वे अपने अलम झुका लेते हैं। इसलिए कि उनका मानना है कि मीर सैय्यद अली हमदानी की सेवाएं प्रंशसनीय एवं सम्मानीय हैं। जम्मू-कश्मीर, गिलगीत और बलतिस्तान में उनके नाम पर कई स्कूलों और मस्जिदों का नाम है।
मीर सैय्यद अली हमदानी के कुछ मुरीदों और शिष्यों के मुताबिक़, वे एक चमत्कारी व्यक्ति थे। मध्य ऐशियाई देशों के लोग आज भी इन चमत्कारों को याद करते हैं। प्रतिवर्ष 6 ज़िलहिज्जा को जो उनके निधन की तारीख़ है, कश्मीर समेत पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में लोग उन्हें श्रद्धांजलि देते हैं और समारोहों का आयोजन करते हैं। इन समाराहों में सैय्यद के गुणों, चमत्कारों और शिक्षाओं का बखान किया जाता है।
अनेक विद्वानों और इतिहासकारों ने मीर सैय्यद अली हमदानी की प्रशंसा में लेख और कविताएं लिखी हैं। उनकी कुछ किताबों का उर्दू, तुर्की, पश्तू और फ़्रांसीसी में अनुवाद हुआ है और उनमें से कुछ की महत्वपूर्ण व्याख्याएं लिखी गई हैं।
मीर सैय्यद अली हमदानी ने 110 किताबे लिखी हैं, जिनमें काव्य संग्रह भी शामिल हैं। यह किताबें विषयवस्तु और शैली की दृष्टि से ध्यान योग्य हैं। यह किताबें क़ुरान की व्याख्या, हदीसों की व्याख्या, दर्शनशास्त्र, नैतिक शास्त्र, रहस्यवाद और साहित्य जैसे विषयों में लिखी गई हैं और उन सभी में शिक्षाप्रद उपदेश और आध्यात्मिक बातें हैं। ईरान के इस विशिष्ट रहस्यवादी ने अपने लेखों में महत्वपूर्ण बिंदु बयान किए हैं, जिसके कारण उनकी किताबें पाठक के लिए लाभदायक हैं।
ज़ीक़ादा 786 हिजरी क़मरी को मीर सैय्यद अली हमदानी हज के इरादे से कश्मीर से निकले। उनकी यात्रा को शुरू हुए अभी कुछ दिन भी नहीं बीते थे कि पाख़ली के शासक ने उन्हें कुछ दिन अपने प्रदेश में मेहमान बनने की दावत दी, ताकि वे वहां रहकर लोगों को उपदेश दें। उन्होंने स्वीकार यह दावत स्वीकार कर ली और क़रीब 10 दिन वहां प्रवचन दिया। उसके बाद उन्होंने अपनी यात्रा पुनः शुरू की, लेकिन रास्ते में ही वे बीमार पड़ गए और पांच दिन बाद बुधवार 6 ज़िलहिज्जा सन् 786 हिजरी क़मरी को उनका निधन हो गया।
कहा जाता है कि अपने जीवन की अंतिम रात में सुबह तक वे अल्लाह और या हबीब का स्मरण करते रहे और अल्लाह का नाम जपते रहे, बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम कहते हुए वे इस दुनिया से चले गए। उनका निधन कूनार से कुछ किलोमीटर की दूरी पर ईरान और अफ़ग़ानिस्तान की सीमा पर हुआ। ग़ुस्ल और कफ़न देने के बाद उनके शव को ख़तलान ले जाया गया। कूलाब के इलाक़े में जहां उन्होंने एक मस्जिद और मदरसे का निर्माण किया था, उन्हें दफ़्न कर दिया गया।
ताजिकिस्तान में मीर सैय्यद अली हमदानी के मक़बरे की पहली इमारत अभी भी बाक़ी है, इस इमारत में एक हाल और 9 कमरे हैं, उनके परिवार के 10 लोग भी यहीं दफ़्न हैं।
मीर सैय्यद अली हमदानी के निधन के बाद उनके बेटे सैयय्द मोहम्मद उनके उत्तराधिकारी बने और उन्होंने अपने पिता के कार्यों को आगे बढ़ाया। मीर मोहम्मद 800 हिजरी क़मरी में भारत से मक्का गए और हज किया और 809 हिजरी क़मरी में उनका स्वर्गवास हो गया। उन्हें उनके पिता की क़ब्र के निकट ही दफ़्न किया गया। सैय्यद मोहम्मद के वंशज हमदान, श्रीनगर, बल्ख़ाब और अन्य इलाक़ों में मौजूद हैं।