सोमवार- 26 अक्तूबर
26 अक्तूबर 1947 को राजा हरि सिंह जम्मू-कश्मीर को भारत में विलय करने पर सहमत हुए।
ब्रिटेन से भारत की स्वतंत्रता तथा पाकिस्तान के भारत से अलग हो जाने के पश्चात 26 अक्तूबर सन 1947 ईसवी को जम्मू व कश्मीर का महत्वपूर्ण क्षेत्र भारत से जुड़ गया। मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र होने के नाते यह क्षेत्र पाकिस्तान का भाग बनने वाला था किंतु इस क्षेत्र के शासक ने भारत के साथ रहना पसंद किया। जब इस बात की घोषणा की गई तो पाकिस्तान ने इस क्षेत्र पर आक्रमण करके इसके कुछ भाग पर अधिकार कर लिया। उस समय से लेकर अब तक इस क्षेत्र के स्वामित्व को लेकर भारत और पाकिस्तान के मध्य विवाद है और दोनों देश दो युद्ध लड़ चुके हैं। दोनों देशों के बीच विवाद अब भी जारी है जिसके समाधान के प्रयास किए जा रहे हैं।
26 अक्तूबर सन 1955 ईसवी को पश्चिमी सरकारों के षड़यंत्रों के परिणराम स्वरुप वीयतनाम का विभजन हो गया जो फ़्रांसीसी साम्राज्य से संघर्ष कर रहा था। पश्चिमी देशों ने एक नए देश के रुप में दक्षिणी वियतनाम की स्थापना की। दक्षिणी वियतनाम की स्थापना का उद्देश्य, जिसके पीछे मुख्य रुप से अमरीका का हाथ था, वियतनाम की सोशियालिस्ट सरकार को कमज़ोर करना और उसका तख़्ता उलटना था। 1965 में जब अमरीकी सेना वियतनामी सेना के विरुद्ध मैदान में उतरी तो दक्षिणी वियतनाम अमरीकी सेना की छावनी बन गया। किंतु इस युद्ध में वियतनाम की सेना ने अमरीकी सेना को पराजित कर दिया सन 1975 में उत्तरी वियतनाम ने दक्षिणी वियतनाम पर आक्रमण करके वहॉ की सरकार का अंत कर दिया। इस प्रकार यह भाग पुन: वियतनाम से जुड़ गया।
26 अक्तूबर 1994 को ज़ायोनी शासन और जॉर्डन के बीच 46 साल से जारी युद्ध को समाप्त करते हुए शांति संधि हुई। 26 अक्तूबर सन 1994 ईसवी को जॉर्डन के पूर्व नरेश मलिक हुसैन अब्दुल्ला और ज़ायोनी शासन के तत्कालीन प्रधान मंत्री इसहाक़ रॉबिन ने तथाकथित शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए। यह संधि अमरीका द्वारा अरब देशों पर इस्राईल को थोपने की योजना का परिणाम थी।
यह योजना 1991 में मैड्रिड सम्मेलन से आरंभ हुई थी। जॉर्डन और इस्राईल के मध्य संधि के अनुसार इस्राईल ने यह वचन दिया था कि वह जॉर्डन के कुछ भाग से पीछे हट जाएगा तथा जॉर्डन से आर्थिक प्रतिबंध हटा लेगा। अमरीका ने भी कहा कि इस संधि पर हस्ताक्षर के बाद वह जॉर्डन का ऋण माफ़ कर देगा तथा उसकी आर्थिक सहायता करेगा। किंतु अमरीका ने यह वचन पूरा नहीं किया और जॉर्डन नरेश अपने लक्ष्य तक न पहुंच सके। इस प्रकार इस्राईल के मुक़ाबले में अरब देशों का मोर्चा इस संधि से कमज़ोर हो गया।
26 अक्तूबर सन् 1995 को इस्राइल की गुप्तचर एजेंसी मोसाद के एजेंटों ने फ़िलिस्तीन के इस्लामी प्रतिरोध संगठन जेहादे इस्लामी के महासचिव डा. फ़तही शक़ाक़ी को माल्टा की राजधानी वलेत्ता में शहीद कर दिया। शहीद डा. फ़तही शक़ाक़ी का वर्ष 1951 में ग़ज़्ज़ा के शरणार्थी कैम्प में जन्म हुआ था। उन्होंने मेडिकल की पढ़ाई पूरी करके बैतुल मुक़द्दस के एक अस्पताल में चिकित्सक के रूप में काम करना शुरू किया। उन्होंने युवा अवस्था से ही ज़ायोनियों के विरुद्ध अपनी राजनीतिक गतिविधियां आरंभ कर दी थीं। सन 1968 में उन्हेंने जेहादे इस्सामी की सदस्यता ग्रहण कर ली। वर्ष 1979 में इमाम ख़ुमैनी के बारे में किताब लिखने के कारण मिस्र में उन्हें जेल में डाल दिया गया। डा. शक़ाक़ी ने प्रतिरोध की सफलता के लिए अथक प्रयास किए और वे जेहादे इस्लामी के महासचिव बन गए। इस फ़िलिस्तीनी शहीद का कहना था कि इन्तफ़ादा ज़ायोनियों द्वारा फ़िलिस्तीन के अतिक्रमण का नतीजा है और जब तक अतिक्रमण बाक़ी है इन्तफ़ादा भी पूरी शक्ति से जारी रहेगा। इसी प्रकार इमाम ख़ुमैनी द्वारा विश्व क़ुद्स दिवस घोषित किये जाने को वे फ़िलिस्तीन में इस्लाम का पुनर्जीवन क़रार देते थे।

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9 रबीउल औव्वल सन 260 हिजरी क़मरी को इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम की शहादत के बाद इमाम मेहदी अलैहिस्सलाम की इमामत का काम आरंभ हुआ। इमाम मेहदी अलैहिस्सलाम हज़रत इमाम हसन असकरी अलैहिस्सलाम के पुत्र और पैग़म्बरे इस्लाम के पौत्र हैं। वे ईश्वर के आदेश पर लोगो की निगाहों से ओझल हैं और वर्ष 328 हिजरी क़मरी तक वे अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से जनता से संपर्क में थे। इस कालखंड को ग़ैबते सुग़रा कहा जाता है किंतु वर्ष 328 हिजरी क़मरी के बाद से ग़ैबते कुबरा अर्थात ऐसा काल आरंभ हुआ कि इमाम मेहदी अलैहिस्सलाम ने अपने प्रतिनिधियों द्वारा भी जनता से संपर्क को समाप्त कर दिया। और घोषणा की कि इस काल में धर्मगुरुओं को उनका प्रतिनिधि समझा जाए।
हदीसों में आया है कि वे संसार में एक न्याय पूर्ण शासन की स्थापना करके संसार को न्याय से भर देंगे। जबकि वो अन्याय से भर चुका होगा।
