सैयद अली हमदानी
सैयद अली हमदानी अपनी मूल्यवान आयु इस्लाम धर्म के प्रचार व प्रसार, आत्मा की पवित्रता तथा कश्मीर व ताजेकिस्तान में सत्य प्रेमियों को शिक्षा देने में व्यतीत की और वह कुब्रविया सूफ़ी पंत के महान धर्म गुरुओं में गिने जाते हैं।
धर्म गुरुओं और विद्वानों ने उन्हें सुलतानुल आरेफ़ीन का नाम दिया जबकि कश्मीरी जनता ने उन्हें इस्लाम का संस्थापक अली द्वितीय कहा तथा शिष्यों व अनुयाइयों ने उन्हें शाहे हमदान की उपाधि दी। उनको अमीर कबीर भी कहा जाता है। वह ताजेकिस्तान में हज़रत अमीर जान के नाम से भी प्रसिद्ध थे।
हमने आपको बताया कि ईरानी ज्ञानी मीर सैयद अली हमदानी वर्ष 714 हिजरी क़मरी में ईरान के शहर हमदान में जन्मे और उन्होंने आरंभिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद प्रसिद्ध धर्मगुरुओं से शिक्षा प्राप्त की और उसके बाद इन प्रसिद्ध धर्मगुरुओं से परिज्ञान, दर्शनशास्त्र, हदीस इत्यादि की शिक्षा ग्रहण की और उनकी आत्मा की पवित्रता और अध्यात्म से प्रभावित हुए। उन्होंने अपने समय के प्रसिद्ध परिज्ञानियों के निकट ईश्वर से निकटता प्राप्त करने का मार्ग सीखने के बाद, अपने गुरुओं द्वारा इस्लाम धर्म के प्रचार और सत्यता की खोज करने वालों का मार्ग दर्शन करने के लिए ईरान से बाहर भेजे गये। वह यह ज़िम्मेदारी अपनी आयु के अंतिम दिनों तक निभाते रहे और उन्होंने अपना पूरा जीवन इस्लाम धर्म के प्रचार और सत्य के खोजियों के मार्गदर्शन में व्यतीत किया।
सैयद अली हमदानी अपने समय में बहुत ही सम्मानीय व्यक्ति थे और ईरान के अधिकतर शहरों, मध्य एशिया और भारत में हर वर्ग के लोग उनका विशेष सम्मान करते थे। उन्होंने पवित्रता और ईश्वरीय भय के अतिरिक्त ज्ञान और दर्शनशास्त्र में भी उच्च स्थान प्राप्त किया और अपने समय में प्रचलित समस्त ज्ञानों में निपुण थे और उन्होंने इन विषयों पर बहुत सी पुस्तकें भी लिखी हैं। सैयद अली हमदानी ने 110 से अधिक पुस्तकें लिखी हैं जिनमें छोटी पुस्तकें और कविताओं का संकलन भी शामिल हैं। उनकी पुस्तकें और शेर विषय वस्तु और शैलियों की दृष्टि से अनमोल है। यह पुस्तकें पवित्र क़ुरआन की व्याख्या, हदीसों, दर्शनशास्त्र, शिष्टाचार, परिज्ञान और साहित्य के विषयों पर लिखी गयी हैं। इन किताबों की विषय वस्तु पाठदायक और रोचक होती हैं। इस महान ईरानी परिज्ञानी के बारे में होने वाले शोध से पता चलता है कि उनके पद्य और गद्य ने उनकी पुस्तकों को पाठकों के लिए रोचक बना दिया है। सैयद अली हमदानी के स्वर्गवास के बाद उनके पुत्रों और पौत्रों ने हमदान, कश्मीर और बलख़ाब सहित विभिन्न क्षेत्रों में अपने पिता की गतिविधियों को जारी रखा और उनके मार्गदर्शन के लिए प्रयासरत रहे।
सैयद अली हमदानी ईरान की बहुत महत्वपूर्ण हस्तियों में से एक है जिन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप, पाकिस्तान, सीरिया और विभिन्न अरब देशों की यात्रा करके विभिन्न धार्मिक व सांस्कृतिक गतिविधियां अंजाम दीं। शोधकर्ता इस बात पर सहमत हैं कि कश्मीर में इस्लाम धर्म का प्रचार व प्रसार तथा वहां के लोगों के मध्य फ़ारसी भाषा और साहित्य का प्रचार व प्रसार उन्हीं की देन है। प्रोफ़ेसर शहीद मुर्तज़ा मुतह्हरी “ ख़िदमाते मुताक़ाबिले इस्लाम व ईरान” नामक अपनी पुस्तक में मीर सैयद अली हमदानी के बारे में लिखते हैं कि सैयद अली हमदानी उन लोगों में से एक हैं जिन्होंने कश्मीर में इस्लाम धर्म की सेवा की। यह महान हस्ती, इस्लामी गौरव है, उन्होंने कश्मीर में हज़ारों शिष्यों का प्रशिक्षण किया जिनमें से हर एक स्वयं में उस्ताद था, कश्मीर में बने सैयद अली के मक़बरे को अब भी लोग सम्मान की दृष्टि से देखते हैं और स्थानीय लोग वहां दर्शन करने जाते हैं।
हेनरी कोरबन का कहना है कि कश्मीर में बहुत सी कलाओं और ज्ञानों को प्रचलित करने वाले मीर सैयद अली हमदानी थे। उनका मानना था कि श्री हमदानी उस नवीन मार्ग को आरंभ करने वाले हैं और उनकी पुस्तकें प्रकाशित होने की स्थिति में दर्शनशास्त्री,श्री हमदानी की पुस्तकों से बहुत कुछ प्राप्त कर सकते हैं। इसी प्रकार इससे हटकर बहुत से शोधकर्ताओं और इतिहासकारों का यह मानना है कि कश्मीर में बहुत सी शिक्षाओं और ज्ञानों का विस्तार और प्रचार व प्रसार, भारतीय उपमहाद्वीप और कश्मीर में सैयद अली हमदानी और उनके साथियों की देन है।
कुछ शोधकर्ता मीर सैयद अली हमदानी की पुस्तकों और उनके जीवन के बारे में यह मानते हैं कि सैयद अली की अधिकतर यात्राएं, एक ओर महापुरुषों के आदेशों का पालन थीं जबकि दूसरी ओर सूफ़िवाद की मूल शिक्षाओं का पालन वह सूफ़िवाद की शिक्षा के लिए अबू हामिद ग़ज़ाली, शैख़ फ़रीदुद्दीन अत्तार, सादी, मौलवी, शैख़ महमूद शबिस्तरी और इब्ने अरबी जैसे प्रसिद्ध साहित्यकारों, सूफ़ियों और परिज्ञानियों की पुस्तकों से लाभ उठाते थे।
मीर सैयद अली हमदानी ने अपने जीवन में तीन बार कश्मीर की यात्रा की थी उनकी एक यात्रा में उनके साथ उनके 700 साथी, अनुयायी और शिष्य थे जिनमें से अधिकतर सैयद, प्रसिद्ध परिज्ञानी, कलाकार और विख्यात हस्तियां थीं। उन्होंने कश्मीर की यात्राएं की और वहां के स्थानीय लोगों को अपनी शिक्षाओं से बहुत प्रभावित किया। कहा जाता है कि सैयद अली हमदानी के साथ इस यात्रा में प्रसिद्ध बुनकर, मिट्टी का बर्तन बनाने वाले और सुलेखक इत्यादि शामिल थे। यही कारण है कि हेनरी कोरबन जैसे शोधकर्ता उन्हें कश्मीर में बहुत सी कलाओं को फैलाने का कारण मानते हैं।
सैयद अली हमदानी ने कश्मीर में धर्मगुरुओ, यात्रियों, पुजारियों और बौद्ध धर्म तथा हिंदु धर्म के धर्मगुरुओं से निरंतर शास्त्रार्थ किए हैं और अधिकतर में उनकी की विजय हुई है।
कश्मीर में रहने के दौरान जो लगभग 5 साल था, उन्होंने 37000 लोगों को मुसलमान किया। सैयद अली हमदानी ने इस क्षेत्र के लोगों में इस्लाम की एसी आत्मा फूंक दी कि वह अपने उपासना स्थलों को तोड़ देते और उसके स्थान पर मस्जिदों का निर्माण करते और सैयद हमदानी का साथ देने की खुलकर घोषणा करते और उनको अपने यहां बुलाते ताकि वह नई बनी मस्जिद में आकर आज़ान दें और इस मस्जिद का शुभारंभ करें।
स्थानीय सरदार और पंच उनके आदेशों को तुरंत लागू करते थे और ईश्वरीय कृपा दृष्टि की छत्रछाया में उनकी शिक्षाएं और प्रचार का क्रम जारी रहा। भारत के प्रसिद्ध जादूगर, संन्यासी और धर्मगुरु उनकी तर्क संगत बातों के साथ असहाय हो जाते थे और हार मान लेते थे और उनसे विभिन्न प्रकार के चमत्कार इत्यादि भी देखते थे और इस प्रकार वह बिना किसी रोक टोक के इस्लाम धर्म स्वीकार कर लेते थे। यह विशेषता लोगों को भीतर से परिवर्तित करने में बहुत प्रभावी रही और बहुत अधिक सफल भी रही जिसके कारण कश्मीर में इस्लाम धर्म विशेषकर सूफ़ि पंथ प्रचलित हुआ।
सैयद अली हमदानी निरंतर लोगों को धार्मिक आस्थाओं के बारे में बताते थे और उनको उपदेश दिया करते थे और नैतिक विषयों को बहुत ही सुन्दर वाणी में और लोगों के शैक्षिक स्तर को देकर बयान करते थे। इस धार्मिक कार्य के साथ ही वह कश्मीर में फ़ारसी भाषा प्रचलित करने में भी सफल रहे। वास्तव में यह कहा जा सकता है कि कश्मीर में मीर सैयद अली हमदानी की धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक समस्त गतिविधियां, विकसित हुईं और उनसे बहुत लाभ प्राप्त हुआ, समस्त गतिविधियां विषय वस्तु और लाभ की दृष्टि से इस्लामी थीं और फ़ारसी भाषा में ढली हुई थीं।
इस चरण में आत्मा और शरीर का मिलन उस स्तर पर पहुंच गया कि उनको हवारीये कश्मीर की उपाधिक मिली और कश्मीर को मिनी ईरान कहा जाने लगा। इसके बावजूद कहा जा सकता है कि भारतीय उप महाद्वीप के अन्य क्षेत्रों की तुलना में कश्मीर की जनता फ़ारसी भाषा से देर से अवगत हुई और इन क्षेत्रों से फ़ारसी भाषा के प्रसिद्ध लेखक और शायर निकले।
सैयद अली हमदानी ने कश्मीर में एक पूर्व निर्धारित व सुनोयोजित प्रचारिक संस्था का गठन किया जो उनकी सूक्ष्म निगरानी में उपदेशकों और प्रचारकों को लोगों के मार्ग दर्शन के लिए तैयार और उन्हें विभिन्न क्षेत्रों में भेजती थी ताकि लोग पवित्र क़ुरआन और पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों की शिक्षाओं से अवगत हों। उन्होंने कश्मीर क्षेत्र में मूल्यवान और टिकाऊ सेवाएं अंजाम दीं और इस शक्तिशाली प्रचारक के हाथ कश्मीर में पहले धार्मिक शिक्षा केन्द्र की स्थापना हुई। इसी प्रकार मीर अली हमदानी के आदेश पर सुलतान शहाबुद्दीन ने इस क्षेत्र में पवित्र क़ुरआन के एक मदरसे की स्थापना की जो बहुत ही महत्वपूर्ण और विस्तृत मदरसा था और कश्मीर के विभिन्न क्षेत्रों से छात्र शिक्षा प्राप्त करने इस मदरसे में आते थे और सैयद मीर अली हमदानी के प्रसिद्ध शिष्य भी इसी मदरसे से निकले हैं। सुलतान क़ुतुबुद्दीन ने उनके आदेश पर कश्मीर में एक बड़ा मदरसा बनाया और उसके विभिन्न प्रकार की शिक्षाएं दी जाती थीं।
सैयद अली हमदानी ने इसी प्रकार कश्मीर में एक पुस्तकालय का गठन किया जिसमें अरबी और फ़ारसी भाषा में इस्लामी स्रोत मौजूद हैं। यह पुस्तकालय बहुत ही महत्वपूर्ण है और क्षेत्र की महत्वपूर्ण हस्तियां इसे देखने और लाभ उठाने के लिए आती हैं।
आज भी भारतीय उपमहाद्वीप में सैयद अली हमदानी की अध्यात्मिक और सांस्कृतिक उपस्थिति समस्त बाधाओं के बावजूद महसूस की जा सकती है। कश्मीर में विभिन्न मस्जिदों के मेहराबों और मदरसों पर लिखे फ़ारसी भाषा के विभिन्न शेर, स्थानीय लोगों और यात्रियों के ध्यान अपनी ओर आकर्षित करते हैं और विभिन्न विषयों पर उनकी लिखी पुस्तकों के इस धरती पर बहुत से पाठक हैं जो हमारे दावे पर बहुत अच्छा तर्क है।सैयद अली हमदानी ने 110 से अधिक पुस्तकें लिखी हैं जिनमें छोटी पुस्तकें और शेर के दीवान भी शामिल हैं। उनकी पुस्तकें और शेर विषय वस्तु और शैलियों की दृष्टि से अनमोल हैं। यह पुस्तकें पवित्र क़ुरआन की व्याख्या, हदीसों, दर्शनशास्त्र, शिष्टाचार, परिज्ञान और साहित्य के विषयों पर लिखी गयी हैं। इन किताबों की विषय वस्तु पाठदायक और रोचक होती हैं। इस महान ईरानी परिज्ञानी के बारे में होने वाले शोध से पता चलता है कि उनके पद्य और गद्य ने उनकी पुस्तकों को पाठकों के लिए रोचक बना दिया है।