बगदाद में “इस्लामी जागरुकता की अंतरराष्ट्रीय सभा” की नवीं बैठक
“इस्लामी जागरुकता की अंतरराष्ट्रीय सभा” की नवीं बैठक बगदाद में हुई और दो दिन के बाद सोमवार 24 अक्तूबर को एक विज्ञप्ति जारी करके समाप्त हो गयी।
वर्ष 2011 में “इस्लामी जागरुकता की अंतरराष्ट्रीय सभा” गठित होने के बाद ईरान से बाहर यह इस सभा की पहली बैठक थी। उत्तरी अफ्रीक़ा और पश्चिम एशिया में इस्लामी जागरुकता आरंभ होने के बाद “इस्लामी जागरुकता की अंतरराष्ट्रीय सभा” का गठन ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनई के सुझाव पर किया गया। बगदाद में “इस्लामी जागरुकता की अंतरराष्ट्रीय सभा” की समाप्ति पर जारी होने वाली विज्ञप्ति में आया है” इस्लामी जगत को इस समय चुनौतियों का सामना है जिनकी समीक्षा इस्लामी सिद्धांतों के अनुसार की गयी। इसी प्रकार इस विज्ञप्ति में बल देकर कहा गया है कि कुरआन करीम के आधार पर इस्लामी पहचान की सुरक्षा के साथ इस बात की संभावना उपलब्ध होती है कि इस्लामी राष्ट्र प्रगति करे। वहाबी विचार धारा इस्लामी विचार धारा की विरोधी है और यह दिग्भ्रमित सोच दुश्मनों ने उत्पन्न की है। यह ऐसी स्थिति में है जब इस्लाम की बुनियाद एकता और अन्याय से दूरी पर रखी गयी है। इस्लाम का ध्यान रखना संभव कार्य है और इसे नई सांस्कृतिक शैलियों का प्रयोग करके, राजनेताओं, विचारकों और मेधावी व प्रतीभाशाली लोगों की भूमिका से लाभ उठाकर संभव बनाया जा सकता है। सभ्य राष्ट्र आतंकवाद के विरोधी हैं।
वर्ष 2011 में ट्यूनीशिया के तानाशाह ज़ैनुल आबेदीन बिन अली की तानाशाही सरकार उखाड़ फेंकने के बाद इस्लामी जागरुकता आरंभ हुई और उसके बाद वह उत्तरी अफ्रीक़ा और पश्चिम एशिया के देशों में फैल गयी। ट्यूनीशिया के बाद मिस्र के तानाशाह हुस्नी मुबारक दूसरे तानाशाह थे जिनकी सरकार का अंत हो गया। मिस्री युवाओं ने काहेरा के अत्तहरीर स्क्वायर पर 18 दिनों तक धर्ना दिया जिसके बाद उनकी तानाशाही सरकार का भी अंत हो गया। इन दोनों तानाशाहों के पतन के बाद अमेरिका और उसके यूरोपीय घटकों ने जब क्षेत्र में अपने अवैध हितों को ख़तरे में पड़ता देखा तो उन्होंने इस्लामी जागरुकता को दिग्भ्रमित करने का यथासंभव प्रयास आरंभ कर दिया। इस्लामी जागरुकता आंदोलन की एक कमज़ोरी संगठित व एकजुट नेतृत्व का न होना था जो तानाशाही सरकारों के पतन के बाद उसका दिशा- निर्देशन करती। मिस्र के मुस्लिम ब्रदरहु जैसे संगठनों व पार्टियों ने पश्चिम पर विश्वास कर लिया और इस्लामी जागरुकता को गुमराह करने हेतु उनके जाल में फंस गया और उसके नतीजे में मिस्री जनता के चुने हुए पहले राष्ट्रपति मोहम्मद मुर्सी की सत्ता का अंत हो गया।
तानाशाही सरकारों के विरुद्ध जनता के मार्गदर्शन के लिए इस्लामी जागरुककता के पास कोई संगठित कार्यक्रम नहीं था और अमेरिका और उसके यूरोपीय घटकों ने इस चीज़ से अधिक से अधिक लाभ उठाया।
टयूनीशिया में ज़ैनुल आबेदीन बिन अली और मिस्र में हुस्नी मुबारक की सरकार के गिर जाने के बाद लीबिया की जनता ने भी जनरल क़ज़्ज़ाफी के विरुद्ध आंदोलन किया। पश्चिमी सरकारें लीबियाई जनता के आंदोलन की मूक दर्शक नहीं बनी रहीं बल्कि उन्होंने जनरल क़ज़्ज़ाफी के विरुद्ध जनता लीबियाई जनता के आंदोलन का समर्थन किया ताकि कज़्ज़ाई के बाद जो सरकार बने उसके गठन और तानेबाने में उनकी भूमिका रहे। पश्चिमी सरकारों की यह नीति लीबियाई जनता के कई दलों में बट जाने और लीबिया में अलकायदा तथा दाइश के प्रभाव का कारण बनी। बहरैन में अमेरिका और ब्रिटेन ने इससे भिन्न नीति अपनाई और उन्होंने बहरैन में सऊदी अरब के हस्तक्षेप का पूर्ण समर्थन किया। इसी प्रकार ये देश बहरैनी जनता के दमन में इस देश की तानाशाही सरकार का समर्थन कर रहे हैं। बहरैन का तानाशाह इस देश की जनता का दमन कर रहा है फिर भी ब्रिटेन ने लंदन में बहरैन नरेश के स्वागत के लिए रेड कार्पेट बिछाई। वास्तव में पश्चिमी सरकारों ने उत्तरी अफ्रीक़ा और पश्चिम एशिया में अपने हितों के दृष्टिगत भिन्न नीतियां अपनाई हैं। उन्होंने ज़ैनुल आबेदीन बिन अली और हुस्नी मुबारक के अंत को अपने हित में देखा। लीबिया में जनरल कज्जाफी की सरकार गिराने में उन्होंने इस देश की जनता का भागीदार बनने का प्रयास किया जबकि इन्हीं सरकारों ने बहरैन में इस देश के जनता के स्वतंत्रता और न्यायप्रेमी आंदोलन के दमन में बहरैन की आले खलीफा सरकार का समर्थन किया। सीरिया में संकट उत्पन्न करके और बश्शार असद की सरकार का तख्ता पलट देने का प्रयास करके पश्चिमी सरकारों ने जायोनी शासन के मुकाबले में प्रतिरोध का अंत कर देने की चेष्टा की। पश्चिमी देशों ने सीरिया में इस देश की जनता के समर्थन के बहाने आतंकवादी और तकफीरी गुटों का समर्थन किया और इस देश को आतंकवादियों और तकफीरियों के एकत्रित होने के स्थल में परिवर्तित कर दिया। तकफीरी और आतंकवादी गुटों ने सीरिया, इराक और क्षेत्र के कुछ दूसरे इस्लामी देशों में जनघन्य मानवीय अपराध अंजाम दिये। पश्चिमी सरकारें इस्लामी देशों में तकफीरी और आतंकवादी गुटों को मज़बूत करके इस्लामी संप्रदायों के अनुयाइयों के मध्य फूट डालने और इस्लामी जागरुकता की लहर को दिग्भ्रमित करने का प्रयास कर रही हैं। यद्यपि विदित में इन सरकारों ने आतंकवाद से मुकाबले का नारा लगाया और दाइश से मुकाबले के लिए गठबंधन भी बनाया परंतु कौन है जो नहीं जानता कि सऊदी अरब, तुर्की और अमेरिका अपने यूरोपीय घटकों के साथ मध्यपूर्व में आतंकवादी और तकफीरी गुटों के सबसे बड़े समर्थक हैं। क्या यह हो सकता है कि कुछ आतंकवादी और तकफीरी गुट और उनमें सर्वोपरि दाइश कुछ देशों के समर्थन के बिना सीरिया और इराक के बड़े भाग पर नियंत्रण कर लें। यह किस प्रकार संभव है कि पूरी दुनिया विशेषकर यूरोप के हज़ारों नागरिक किसी के समर्थन के बिना आतंकवादी गुटों से जुड़ने के लिए स्वयं को इराक और सीरिया पहुंचा रहे हैं? आतंकवादियों के सीरिया और इराक पहुंचने का मुख्य कॉरीडोर तुर्की है। सऊदी अरब, कतर और संयुक्त अरब इमारात दाइश और दूसरे तकफीरी व आतंकवादी गुटों की वित्तीय और ग़ैर वित्तीय आवश्यकताओं के मूल आपूर्तिकर्ता हैं। कुछ दिन पूर्व टोएटा कंपनी ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिसके अनुसार उसे 60 हज़ार वानेट और लैंड क्रूज़र गाड़ियां खरीदने का आर्डर दिया गया। इन गाड़ियों को ख़रीदने का आर्डर इराक और सीरिया में लड़ने वाले तकफीरी और आतंकवादी गुटों को देने के लिए सऊदी अरब, कतर और संयुक्त अरब इमारात की ओर से दिया गया था।
इस्लामी जागरुकता की अंतरराष्ट्रीय सभा के गठन का एक मूल कारण इस्लामी संप्रदायों के अनुयाइयों के मध्य फूट डालने और तकफीरी और आतंकवादी गुटों को मजबूत करके उनसे लाभ उठाने के पश्चिम के षडयंत्रों से मुकाबला था। इस्लामी जागरुकता की सभा की बैठकों में अधिकांश इस्लामी संप्रदायों के अनुयाइयों को आमंत्रित किया गया और उन्होंने इस सभा की बैठकों में भाग लिया। बगदाद में इस सभा की होने वाली बैठक में विश्व के 22 इस्लामी देशों के धर्मगुरूओं ने भाग लिया जिनमें से अधिकांश सुन्नी थे। इस सभा की बैठक में जिन विषयों के बारे में चर्चा की गयी उनमें से एक तकफीरी गुटों और उनमें सर्वोपरि वहाबियत से मुकाबला था। इराक के पूर्व प्रधानमंत्री नूरी अलमालेकी ने इस सभा में अपने भाषण में तकफीरी आतंकवादी गुटों विशेषकर दाइश के विचारों और मुसलमानों के मध्य फूट डालने हेतु उसके प्रयासों की ओर संकेत हुए कहा तकफीरी विचारधारा सांप्रदायिकता की आग को जलाये रखना चाहती है।
इराक के प्रधानमंत्री हैदर अलएबादी ने भी इस्लामी जागरुकता की अंतरराष्ट्रीय सभा की नवीं बैठक के उद्घाटन भाषण में बल देकर कहा कि अंधे आंतकवाद के लिए शीया और सुन्नी में कोई अंतर नहीं है। उन्होंने कहा कि दाइश ने अधिकतर अहले सुन्नत को बेघर किया है। इस्लामी जागरुकता की अंतरराष्ट्रीय सभा के सचिव डाक्टर अली अकबर विलायती ने इस सभा के अपने भाषणा में कहा कि आज क्षेत्र में बहुत अवसर उत्पन्न हो गये हैं और मुसलमानों का दायित्व है कि वे इस्लामी जागरुकता के साथ तकफीरी विचारधारा का मुकाबला जारी रखें। इस्लामी देशों में समस्त कठिनाइयों और संकटों के बावजूद इस्लामी जागरुकता का आंदोलन जनता के समर्थन से जारी है यद्यपि उसे इन देशों में चुनौतियों व रुकावटों का सामना है। लेबनान के एक वरिष्ठ धर्मगुरू खिज़्र मोहम्मद अलकबेश ने बगदाद में इस्लामी जागरुकता की अंतरराष्ट्रीय सभा की होने वाली बैठक के अवसर पर कहा कि बगदाद में इस्लामी जागरुकता की बैठक में विभिन्न धर्मों के धर्मगुरूओं की भागीदारी दाइशी आतंकवाद के मुकाबले में सबसे बड़ी प्रतिक्रिया है। इराक और सीरिया की सरकार इस समय आतंकवादी और तकफीरी गुटों से मुकाबले की पहली पंक्ति में हैं। इस्लामी जागरुकता की अंतरराष्ट्रीय सभा की दो दिवसीय बगदाद बैठक में भाग लेने वालों ने आतंकवादी और तकफीरी गुटों से मुकाबले में सीरिया और इराक सरकार के समर्थन की घोषणा की। बगदाद बैठक में भाग लेने वालों के भाषण का एक महत्वपूर्ण भाग इसी विषय से विशेष था।