Feb २६, २०१६ १२:२९ Asia/Kolkata

26 फ़रवरी वर्ष 1958 को पाकिस्तान के कोट दी जी सिंध प्राप्त के स्थान पर एक प्राचीन सभ्यता के अवशेष बरामद हुए जो मोहनजोदड़ो की सभ्यता से भी लगभग तीन सौ वर्ष पुराने हैं।

26 फ़रवरी वर्ष 1958 को पाकिस्तान के कोट दी जी सिंध प्राप्त के स्थान पर एक प्राचीन सभ्यता के अवशेष बरामद हुए जो मोहनजोदड़ो की सभ्यता से भी लगभग तीन सौ वर्ष पुराने हैं। यह अवशेष 600 फ़िट लंबे और 400 फ़िट चौड़े क्षेत्रफल में फैले हुए हैं। यह क्षेत्र दो भागों में विभाजित है। एक भाग आवासीय क्षेत्र तथा दूसरा दुर्ग था जो चालीस फ़िट ऊंचा, 500 फ़िट लंबा और 300 फ़िट चौड़ा है। जहां अमीर वर्ग के लोग रहा करते थे जबकि दूसरा भाग आम लोगों के घरों और मकानों के लिए विशेष था। यह घर मिट्टी की ईंटों से बनाए गए थे जिनकी नींव पत्थरों पर रखी गयी थी। कहा जाता है कि मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की सभ्यताएं, जो कोट दीजी की सभ्यता के बाद अस्तित्व में आईं, अपने विभिन्न रीति रिवाजों और विज्ञान व तकनीक में कोट दीजी पर निर्भर थीं। इसका प्रमाण यह भी है कि मोहनजोदड़ो से बरामद होने वाले बर्तनों पर वही डिज़ाइनें और बेहतर ढंग से बनी हुई हैं जो कोट दीजी के खंडहरों से बरामद होने वाले बर्तनों पर बनी थी। कोट दी जी के अवशेषों की खोज, पुरातन जगत की एक महत्त्वपूर्ण खोज समझी जाती है।

 

26 फरवरी वर्ष 1921 फरवरी को ईरान और पूर्व सोवियत संघ के मध्य मित्रता के समझौते पर हस्ताक्षर हुए। सोवियत संघ में क्रांति के चार वर्ष बाद होने वाले इस समझौते में मास्को ने कहा था कि वह ईरान के बारे में पूर्व ज़ार शासकों की नीतियों को नहीं अपनाएगा और इसी लिए सोवियत संघ ने उन सभी समझौतों को निरस्त कर दिया जो ईरान और रूस के मध्य अतीत में हुए थे और जिनका ईरान को नुकसान हो रहा था। इसी प्रकार तेहरान के साथ मित्रता के समझौते में उन समझौतों को भी निरस्त कर दिया गया जो ज़ार शासकों ने ईरान के विरुद्ध किसी अन्य देश से किये थे किंतु सोवियत संघ ने ईरान के पूर्वोत्तर व पश्चिमोत्तर में स्थित क़फ़काज़, और तुर्किस्तान के क्षेत्रों को ईरान को वापस नहीं किया। इस समझौते में सब से महत्वपूर्ण वचन, जो ईरान ने दिया वह यह था कि वह अपनी भूमि को सोवियत संघ के लिए प्रयोग करने की अनुमति नहीं देगा क्योंकि उस समय सोवियत संघ को पश्चिमी देशों से बहुत ख़तरा था।

 

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7 इसफ़ंद सन 1334 हिजरी शम्सी को ईरान के विख्यात शायर और साहित्यकार अली अकबर देहख़ोदा का निधन हुआ। उनका जन्म सन 1258 हिजरी शम्सी को तेहरान में हुआ था। आरंभिक शिक्षा प्राप्ति के बाद व योरोप चले गये और वहॉ पॉच वर्ष अध्ययन और शोधकार्य में बिताए। वे जब ईरान लौटे तो इस देश में संविधान क्रान्ति का आरंभ हो रहा था वे भी स्वतंत्रता प्रेमी विचारधारा रखने वालों के साथ जुड़ गये। उन्होंने अपने कलम द्वारा तत्कालीन अत्याचारी शासक के विरुद्ध प्रभावी संघर्ष किया।

 

 

7 इसफ़ंद सन 1371 हिजरी शम्सी को ईरान के वरिष्ठ धर्मगुरु आयतुल्ला मिर्ज़ा हाशिम आमुली का निधन हुआ। वे ईरान के उत्तरी नगर आमुल के निवासी थे। उन्होंने आरंभिक शिक्षा के बाद उच्चस्तरीय शिक्षा के लिए पवित्र नगर कुम और फिर नजफ़ की यात्रा की। वे बहुत ही सादा जीवन व्यतीत करते थे। उन्होंने बड़े योग्य शिष्यों को प्रशिक्षित करके समाज और धर्म की सेवा की। 

 

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2 रजब वर्ष 440 हिजरी क़मरी को ईरान के एक महान विद्वान अबू रैहान बैरूनी का वर्मतान अफ़ग़ानिस्तान के ग़ज़ना नगर में देहान्त हुआ। भूगोल, खगोल शास्त्र और गणित जैसे ज्ञानों में दक्ष इस महान विद्वान ने बचपन से पवित्र क़ुरआन से अपनी शिक्षाओं को आरंभ किया। उन्होंने युवाकाल में विभिन्न यात्राएं की और अपने ज्ञान में वृद्धि की। अबू रैहान बैरूनी को शिक्षा प्राप्त करने के दौर से ही गणित और भौतिकशास्त्र से इतनी अधिक रूचि थी कि थोड़े से ही समय में वह इन ज्ञानों में उस्ताद गिने जाने लगे। उसके बाद उन्होंने इतिहास और भूगोल की ओर ध्यान लगाया फिर चिकित्सा, दवा निर्माण, खनिज और खगोलशास्त्र जैसे ज्ञान प्राप्त किए। इस मुसलमान दर्शनशास्त्री, हकीम और विद्वान को अरबी, यूनानी और संस्कृत सहित उस काल की बहुत सी भाषाओं में दक्षता प्राप्त थी। उनकी महत्त्वपूर्ण पुस्तकों में आसारूल बाक़िया, तहक़ीक़ मालिल हिन्द और अल जवाहर का नाम उल्लेखनीय है।