मीर सैय्यद अली हमदानी
हमने उल्लेख किया था कि मीर सैय्यद अली हमदानी का ईरान के शहर हमदान में 714 हिजरी क़मरी को जन्म हुआ।
उन्होंने प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद, महान गुरूओं से हदीस, दर्शन शास्त्र, अध्यात्म और रहस्यवाद की शिक्षा ग्रहण की। शिक्षा ग्रहण करने के बाद, उन्होंने अपने उस्तादों की सिफ़ारिश पर ईरान के बाहर धर्म और इस्लामी रहस्यवाद का प्रचार प्रसार किया। वे अपने जीवन के अंत तक लोगों की शिक्षा दीक्षा में लगे रहे।
ईरान, मध्य एशिया और भारत में लोग उनका बहुत सम्मान करते थे। अध्यात्म के अलावा दर्शन शास्त्र में भी उन्हें उच्च स्थान प्राप्त था, इस संबंध में उनकी अनेक रचनाएं हैं। उनकी किताबों की संख्या 110 से अधिक है। यह रचनाएं अर्थ, विषय और शैली की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। यह किताबें विभिन्न कालों में क़ुरान की व्याख्या, हदीस, दर्शन शास्त्र, नैतिकता, रहस्यवाद और साहित्य के विषयों में लिखी गईं। उनकी समस्त किताबों में पेश किए गए विषय शिक्षाप्रद, आध्यात्मिक और रहस्यवादी हैं। मीर सैय्यद अली हमदानी की मौत के बाद उनकी संतान ने हमदान, श्रीनगर, बलख़ाब और अन्य क्षेत्रों में अपने पिता के मिशन को आगे बढ़ाया और लोगों का मार्गदर्शन किया।
इस्लाम धर्म के विस्तार में शिया विद्वानों ने काफ़ी कठिनाईयां सहन की हैं और उन्होंने इस मार्ग में अत्यंत प्रयास किए हैं। कश्मीर में शिया इस्लाम के प्रचार के लिए मीर सैय्यद अली हमदानी ने कई लम्बी यात्राएं कीं। ख़ुद वे कहते हैं, तीन बार पूरब से पश्चिम तक का सफ़र किया और समुद्र एवं धरती पर अजीबो ग़रीब चीज़ें देखीं, हर बार जब किसी शहर या इलाक़े में पहुंचा तो वहां के लोगों की आदतों का अलग तरह से अध्ययन किया। पहली बार में एक शहर से दूसरे शहर, दूसरी बार में एक गांव से दूसरे गांव और तीसरे सफ़र में एक घर से दूसरे घर का भ्रमण किया।
मीर सैय्यद अली हमदानी की यात्राओं का मुख्य उद्देश्य, धर्म का प्रचार और लोगों का मार्गदर्शन करना था। इन यात्राओं के बाक़ी रहने वाले महत्वपूर्ण प्रभावों में से एक कश्मीर में धार्मिक प्रचार है। लोग उन्हें कश्मीर का ईश्वरीय प्रचारक कहते थे।
उन्होंने अपने मज़बूत साहस और अपने शिष्यों एवं अनुयाईयों के प्रयासों से कश्मीर को इस्लाम का एक मज़बूत क़िला बना दिया। उन्होंने अपने वतन हमदान से कला, ज्ञान और उद्योग को कश्मीर पहुंचाया। इससे पता चलता है कि मीर सैय्यद अली हमदानी के सूफ़ीवाद ने उन्हें दुनिया से अलग थलग नहीं किया। वे एक कोने में बैठने वाले रहस्यवादी या एक कुटिया में बैठकर इबादत करने वाले सूफ़ी नहीं थे, पालनहार की इबादत ने उन्हें उसके बंदों की सेवा से नहीं रोका, वे लोगों की सेवा करने वाले और लोगों की हमदर्दी करने वाले एक सूफ़ी थे। उन्होंने अपनी यात्राओं और प्रचार प्रसार से वर्षों कश्मीर की सेवा की।
शोधकर्ताओं के अनुसार, मीर सैय्यद अली हमदानी कश्मीर की यात्रा पर जाने से पहले काफ़ी मशहूर थे। कहा जाता है कि वे 60 वर्ष की आयु में काफ़ी सफ़र करने के बाद कश्मीर पहुंचे थे और इससे पहले कई इलाक़ों में प्रचार का काम कर चुके थे और लोग उन्हें अच्छी तरह पहचानते थे। इस्लामी देशों में उनके बड़ी संख्या में शिष्य और अनुयाई थे। वे शरीयत के प्रचार और सूफ़ीवाद के प्रसार के लिए कश्मीर पहुंचे। इस समय वे कुबरविया सूफ़ी मत के कुतुब के स्थान पर आसीन थे।
इसके अलावा, इससे कुछ ही समय पहले कश्मीर में मुसलमानों का शासन हुआ था, जिन्हें अपने शासन की स्थापना के लिए मुस्लिम विद्वानों की ज़रूरत थी। मीर सैय्यद अली हमदानी की लोकप्रियता एवं विकास का एक अन्य कारण, छठी हिजरी शताब्दी में सूफ़ीवाद का बढ़ता प्रभाव था। इस समय तक सूफ़ीवाद ने दार्शनिक एवं तार्किक रूप धारण कर लिया था और धार्मिक मदरसों में भी एक विषय के रूप में इसे पढ़ाया जाने लगा था। सामान्य रूप से ऐसी स्थिति में, एक वरिष्ठ सूफ़ी के रूप में मीर सैय्यद अली हमदानी लोगों के ध्यान का केन्द्र बनें।
भारतीय उपमहाद्वीप विशेषकर कश्मीर में इस्लाम धर्म के विस्तार के अलावा मीर सैय्यद अली हमदानी ने शिया इस्लाम की शिक्षाओं के आधार पर अपने राजनीतिक विचारों के प्रचार का प्रयास किया। राजनीति में लिखने और विचार रखने के लिए इस महान सूफ़ी को जिस चीज़ ने प्रेरित किया वह उनके धार्मिक विचार हैं। इसी प्रकार, उनके समय की ज़रूरतों की भी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। उदाहरण स्वरूप, लोगों के बीच हमदानी की लोकप्रियता के कारण शासकों का ध्यान भी उनकी ओर रहता था, मीर सैय्यद अली हमदानी भी इस अवसर का लाभ उठाते हुए धार्मिक, नैतिक एवं सामाजिक सुधारों के लिए प्रयास करते थे।
उनके राजनीतिक विचार, धार्मिक विश्वासों से प्रभावित थे और उनका अधिक झुकाव सुधारों की ओर था। वे अपने व्यक्तित्व के रहस्यवादी आयाम से काफ़ी प्रभावित थे, यही कारण है कि जो उन्होंने अपने राजनीतिक विचारों को बहुत स्पष्ट रूप में बयान नहीं किया है।
अगर हम उनके विचारों से उनके राजनीतिक रूझान को समझना चाहें तो हम यह कह सकते हैं कि उनके राजनीतिक विचार पूर्ण रूप से समाज की विशेषताओं से जुड़े हुए हैं। उनके दृष्टिगत राजनीतिक व्यवस्था को पिरामिड के रूप में पेश किया जा सकता है, कि जिसमें सर्वप्रथम शासक, उसके बीच में सरकारी अधिकारी और नीचे के भाग में समाज के लोग स्थित हैं।
मीर सैय्यद अली हमदानी की नज़र में शासक कि जो राजनीतिक व्यवस्था के सबसे ऊपर वाले भाग में स्थित होता है धार्मिक, रचनाकार और बुद्धिमान होना चाहिए। इस प्रकार का शासक, धर्म के आधार पर समाज को संगठित करता है और मज़बूती प्रदान करता है और उसकी नैतिकता एवं धर्म में आस्था के कारण न्याय को बल मिलता है और अत्याचार समाप्त होता है।
मीर सैय्यद अली हमदानी ने राजनीति एवं शासन के ढांचागत आयामों का उल्लेख करने के बजाए शासक और शासन से संबंधित नैतिक एवं धार्मिक विषयों के सुधारों पर बल दिया। इस संदर्भ में शासक के लिए मुख्य समस्याओं का उल्लेख करते हुए वे कहते हैं, यह वही समस्याए हैं जिनकी ओर शरीयत ने संकेत किया है। उदाहरण स्वरूप, अत्याचार, दिखावा, अंहकार, विद्वानों और सुशील लोगों से दूरी और जाहिलों के साथ उठना बैठना, अयोग्य कर्मचारियों की भर्ती, निर्धन एवं ज़रूरतमंदों के प्रति लापरवाही और देश की सीमाओं में शांति की स्थापना में असमर्थता।
मीर सैय्यद अली हमदानी शासन की समस्याओं को शासक, अधिकारियों और दरबारियों में खोजते हैं और इन समस्याओं के समाधान एवं सुधार के लिए समाधान पेश करते हैं। वे शरीयत एवं व्यवहारिक शासन के नियमों से लाभ उठाकर अपने दृष्टिगत राजनीतिक शासन को एक रचनाकार एवं सुशील शासक के रूप में पेश करते हैं। इसीलिए उनके समस्त राजनीतिक विचारों में नैतिकता एवं ईमानदारी की झलक देखी जा सकती है।
दुनिया के बारे में मीर सैय्यद अली हमदानी के रहस्यवादी दृष्टिकोण के कारण, उन्होंने ऐसी राजनीति को स्वीकार किया जिसके परिणाम स्वरूप, इंसान को परलोक में भी कल्याण प्राप्त हो और समाज के सबसे निचले वर्ग का कल्याण, ईमानदार शासक पर निर्भर करता है। शासक परिवर्तनों एवं समाज सुधारों का स्रोत है, इसीलिए वह समाज के पाप और पुण्य में भी भागीदार रहेगा।
मीर सैय्यद अली हमदानी के मुताबिक़, शासक को शासन के संचालन के लिए ऐसे कर्मचारियों की ज़रूरत होती है जो अपने कार्यों में विशेषज्ञ होने के साथ ही बुराई से दूर रहें। इसलिए कि भ्रष्ट कर्मचारी या अधिकारी शासक एवं समाज पर बुरा प्रभाव डालते हैं। अधिकारी समाज और शासक के बीच संपर्क का माध्यम हैं। शासक को चाहिए कि उनके चयन में विशेष ध्यान रखे और स्वस्थ एवं योग्य लोगों का चयन करे।
मीर सैय्यद अली हमदानी के दृष्टिगत राजनीतिक व्यवस्था में तीसरा वर्ग, समाज है। समाज के सदस्यों की ज़िम्मेदारी है कि वे एक दूसरे के एवं शासकों की गतिविधियों पर नज़र रखें और ज़रूरत पड़ने पर समाज में बुराई को फैलने से रोकें।