Dec १०, २०१६ १२:३८ Asia/Kolkata

मानव समाज में बच्चे सबसे ज़्यादा अपने बड़ों की ज़िन्दगी से उत्पन्न मुश्किलों और विभिन्न प्रकार की समस्याओं की ज़द पर होते हैं और उन्हें सहन करते हैं।

यूरोप शरण लेने के लिए जाने वाले लगभग आधे बच्चे लापता हो चुके हैं और उनकी स्थिति के बारे में कोई सूचना नहीं है। इनमें से ज़्यादातर बच्चे मानव तस्करों और यौन व्यापार करने वाले गैंगों की भेंट चढ़ गए हैं। इन बच्चों का ग़ुलामों के तौर पर यौन शोषण हो रहा है। यहां तक कि उन बच्चों को भी बहुत ख़तरों का सामना है जो अपने मां-बाप के साथ यूरोप पहुंच रहे हैं। इन बच्चों को सबसे ज़्यादा यौन दुराचार व यौन शोषण का ख़तरा है। इस बात के मद्देनज़र कि यूरोप में ज़्यादातर शरणार्थी जीवन की न्यूनतम सुविधाओं से भी वंचित हैं, इनमें से ज़्यादातर बच्चे या उनके मां-बाप जीवित रहने के लिए हर प्रकार के अपमान को सहन करने के लिए तय्यार हो जाते हैं। यूनान में ऐसे नौजवानों की तस्वीरें प्रकाशित हुयी हैं जो योन शोषण कराने के लिए तय्यार हैं। यूरोप में शरणार्थी बच्चे ऐसी स्थिति में हैं कि उनके अधिकारों का हनन हो रहा है और इस संदर्भ में यूरोपीय सरकारें कुछ नहीं कर रही हैं जबकि ये सरकारें ख़ुद को मानवाधिकार की रक्षक कहती हैं। मानवाधिकार के अंतर्राष्ट्रीय घोषणापत्र में इंसानों के अधिकारों के बारे में मूल रूप से चर्चा हुयी है और इंसान को छोटे और बड़े में विभाजित नहीं किया गया है। लेकिन चूंकि बच्चे ख़तरों की ज़द पर ज़्यादा होते हैं, इसलिए उन पर अधिक ध्यान देने के लिए इस संदर्भ में एक अलग कन्वेंशन की ज़रूरत महसूस हुयी और यह कन्वेन्शन 1990 में संयुक्त राष्ट्र संघ में पारित हुआ। इस कन्वेन्शन के पारित होने से पहले बच्चों के समर्थन में यूनिसेफ़ नामक संस्था गठित हो चुकी थी। इस संस्था के गठन और बाल अधिकार कन्वेन्शन के पारित होने में यूरोपीय सरकारों का प्रभावी रोल था। लेकिन यूरोप में शरणार्थियों की लहर जैसी स्थिति में, कि जब यूरोपीय सरकारों को बाल अधिकार कन्वेन्शन सहित मानवीय कन्वेन्शनों पर प्रतिबद्धता का इम्तेहान देना पड़ता है, तब उनके लिए बच्चों सहित दरबदर भटकने वाले शरणार्थियों की स्थिति कोई अहमियत नहीं रखती। उन्हें सिर्फ़ इस बात की फ़िक्र है कि शरणार्थियों को शरण देने का ख़र्चा उठना पड़ेगा, उनकी देखभाल करनी पड़ेगी और शरणार्थियों की मौजूदगी का उनके देश पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। कुछ यूरोपीय सरकारें इस अवधारणा के साथ कि मुसलमान बच्चों सहित सभी मुसलमान आतंकवादी हैं, बच्चों को उनके मां-बाप के साथ अपने यहां शरण नहीं दे रही हैं।           

यूनिसेफ़ अपनी स्थापना के आरंभ से ख़ास तौर पर दूसरे विश्व युद्ध के पीड़ित जवानों को मदद करने पर केन्द्रित थी कि इन जवानों में मुख्य रूप से यूरोपीय बच्चों की देखभाल शामिल थी। लेकिन 1953 में इस संस्था ने अपनी गतिविधियों का दायरा बढ़ाते हुए इसमें विकासशील देशों को भी शामिल किया। यूनिसेफ़ ने बच्चों की खाद्य पदार्थ, पीने का पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में कई कार्यक्रम चलाए। 10 दिसंबर 1948 को विश्व बाल अधिकार घोषणापत्र ने इस विषय को मान्यता दी कि बच्चों और माओं को विशेष देखभाल व मदद मिलने का अधिकार हासिल है। 1959 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने बाल अधिकार कन्वेन्शन को पारित किया जो बाल अधिकार के 10 बिन्दु पर आधारित है। हालांकि इस कन्वेन्शन पर सभी देशों ने दस्तख़त नहीं किए और इसके सिद्धांत की हैसियत सिर्फ़ सूचित करने भर थी, लेकिन इस कन्वेन्शन के अवतरण ने विश्व बाल अधिकार कन्वेन्शन का रास्ता साफ़ किया।

            

शरण के लिए यूरोप पहुंचने वाले बच्चों को दूसरे विश्व युद्ध से भी भयावह स्थिति का सामना है। विश्व बाल अधिकार कन्वेन्शन 54 अनुच्छेद पर आधारित है। इनमें से हर एक अनुच्छेद बच्चों के अधिकारों की व्याख्या करता है। अलबत्ता इस बात की व्याख्या भी ज़रूरी है कि इन अधिकारों को इस कन्वेन्शन में प्राथमिकता के आधार पर बयान नहीं किया गया है। कन्वेन्शन के पहले अनुच्छेद में बच्चों की परिभाषा दी गयी है कि इस परिभाषा के अनुसार, 18 साल से कम उम्र के हर व्यक्ति की बच्चे की श्रेणी में गणना होगी। इस कन्वेन्शन के दूसरे अनुच्छेद में आया है, सदस्य देश कन्वेन्शन में वर्णित अधिकार को बिना भेदभाव के हर उस बच्चे के लिए सुनश्चित बनाएंगे जो उनके न्यायिक क्षेत्र में आता है। इस संदर्भ में नस्ल, जाति, रंग, भाषा, धर्म, राजनैतिक विचारधारा सहित अन्य विचार, राष्ट्रीय, जातीय या सामाजिक, आर्थिक स्रोत और विक्लांगता को अहमियत नहीं देंगे और बच्चे के मां-बाप या क़ानूनी सरपरस्त का सम्मान करेंगे। अंतर्राष्ट्रीय कन्वेन्शन में बिना किसी अपवाद के बाल अधिकार को समग्र रूप में अहमियत दी गयी है। वास्तव में यूरोपीय सरकारों के पास शरणार्थियों में ख़ास तौर पर बाल शरणार्थियों को स्वीकार न करने का कोई बहाना नहीं है, वह भी इस स्थिति में कि वे मानवाधिकार की रक्षा का दावा करती हैं। वास्तव में इस स्थिति में उनकी ज़िम्मेदारी और बढ़ जाती है। सवाल यह है कि क्या यूरोपीय सरकारों का व्यवहार दसियों हज़ार शरणार्थियों के संबंध में ज़िम्मेदाराना है?          

यूरोप की सीमाओं के पीछे मौजूद शरणार्थियों की उनके बच्चों के साथ तस्वीरों और वीडियो क्लिप को देख कर ही उनकी दयनीय स्थिति का अंदाज़ा किया जा सकता है। हंग्री की सरकार ने सर्बिया से मिली अपनी सीमाओं पर बाड़ लगा दी है ताकि शरणार्थियों के यूरोप में प्रवेश को रोके। यूरोपीय सरकारों की सीमावर्ती पुलिस ख़ास तौर पर यूरोप के सीमावर्ती देशों की पुलिस, शरणार्थियों के साथ उनके बच्चों के सामने हिंसक व्यवाहार अपनाने में किसी प्रकार की शर्म महसूस नहीं करती। इस संदर्भ में एक तस्वीर में हंग्री का एक पत्रकार शरणार्थियों की पिटाई करते हुए दिखाई देता है। इन तस्वीरों को भूमध्यसागर के तट पर आयलन कुर्दी नामक सीरियाई शरणार्थी बच्चे के बेजान शरीर की तस्वीर के साथ रखिए कि जिसकी तस्वीर से मानवीय भावना की एक लहर उठी थी। ये दोनों तस्वीरें यूरोप की हैं। एक तस्वीर उस बेजान बच्चे की है जो सीरिया में संकट पैदा करने वाली सरकारों के ग़ैर ज़िम्मेदारा रवैया की भेंट चढ़ा जबकि दूसरी तस्वीर योरोप की सीमाओं के पीछे शरणार्थियों की भीड़ के ख़िलाफ़ प्रतिक्रिया की है, जिसमें शरणार्थी पिटते हुए दिखाई दे रहे हैं।