चेलहलुम के अवसर पर नाइजीरियाई शियों पर अत्याचार
क़रीब 1400 से साल पहले कर्बला में इमाम हुसैन (अ) और उनके वफ़ादार साथियों की शहादत के बाद से उनके चेहलुम का दिन दुनिया भर के शिया मुसलमानों के लिए एक अहम दिन रहा है।
अहले बैत (अ) ने चेहलुम के दिन इमाम हुसैन (अ) के पवित्र मज़ार की ज़ियारत पर काफ़ी बल दिया है और इसे ईमान वालों की एक पहचान बताया है। अकसर अल्पसंख्यक शिया मुसलमानों का सरकारों ने दमन किया है और उनके ऊपर अत्याचार किए हैं। शिया मुसलमानों ने इन समस्त दबावों को सहन किया और अपनी जान की बाज़ी लगाकर भी इमाम हुसैन (अ) की ज़ियारत के लिए जाते रहे। विशेष रूप से चेहलुम के दिन किसी भी तरह से लोग कर्बला में स्थित इमाम हुसैन के पवित्र मज़ार पर पहुंचते रहे हैं। हालांकि अब इमाम हुसैन का चेहलुम एक अंतरराष्ट्रीय आयोजन में बदल गया है। इस अवसर पर इमाम हुसैन (अ) के चाहने वाले 2 करोड़ लोगों के मिलियन मार्च ने दुनिया भर के लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। यह ऐसी स्थिति में है कि पश्चिमी जगत के बड़े बड़े संचार माध्यमों ने इराक़ जैसे युद्ध ग्रस्त और दुनिया के सबसे ख़ूंख़ार आतंकवादी गुट का सामना कर रहे देश में होने वाले दुनिया के सबसे बड़े आयोजन की ओर से अपनी आंखें मूंद रखी हैं, इसके बावजूद हुसैनी कशिश दुनिया भर के लोगों को अपनी ओर खींच रही हैं।
कर्बला में चेहलुम के मिलियन मार्च में करोड़ों लोगों के भाग लेने के बावजूद, दुनिया भर के बहुत से लोग वहां हर साल नहीं पहुंच सकते। इसीलिए वे अपने शहरों और गांवों में शोक सभाओं, जुलूसों और पैदल मार्च का आयोजन करते हैं। नाइजीरिया में भी इमाम हुसैन (अ) से श्रद्धा रखने वाले ऐसी ही एक मार्च का आयोजन करते हैं।
नाइजीरिया उत्तरी अफ़्रीक़ा में स्थित है। इस अफ़्रीक़ी देश की जनसंख्या 15 करोड़ है, जिसमें 50 प्रतिशत मुसलमान और 50 प्रतिशत ईसाई हैं। यह सुनकर आपको आश्चर्य होगा कि 40 साल पहले तक इस देश में शिया मुसलमानों का कोई वजूद नहीं था। ईरान में इस्लामी क्रांति की सफलता से पहले जब इमाम ख़ुमैनी पैरिस के उपनगरीय इलाक़े नोफ़ेल लोशातो में निर्वासन का जीवन व्यतीत कर रहे थे, पेरिस में नाइजीरिया के एक छात्र इब्राहीम ज़कज़की ने उनसे मुलाक़ात की। उस समय ज़कज़की सुन्नी मुसलमान थे, लेकिन इमाम ख़ुमैनी से धार्मिक विषयों में बातचीत के बाद उन्होंने शिया इस्लाम स्वीकार कर लिया। उन्होंने नाइजीरिया वापस लौटने के बाद शिया इस्लाम का प्रचार शुरू किया और लोगों को इससे परिचित करवाया। वे ख़ुद कहते हैं कि जब नाइजीरिया में शिया इस्लाम स्वीकार करने वालों की संख्या 27 तक पहुंच गई तो हम बहुत ख़ुश हुए और हमें आशा की किरन दिखाई दी। शेख़ ज़कज़की के अभियान को अभी चार दशक पूरे नहीं हुए हैं, लेकिन वहां शिया मुसलमानों की संख्या 2 करोड़ तक पहुंच गई है। उनमें से अधिकांश लोग ऐसे हैं, जिनका जन्म शिया घराने में नहीं हुआ है और ख़ुद उन्होंने अध्ययन के बाद अहले बैत के मत का चयन किया है।
आज दुनिया भर के मुस्लिम और ग़ैर मुस्लिम कर्बला में चेहलुम के अवसर पर होने वाले मिलियन मार्च से परिचित हैं, हालांकि इस्लाम के दुश्मनों ने दुनिया के सबसे विशाल आयोजन का बहिष्कार किया हुआ है और वे नहीं चाहते कि लोगों को इसके बारे में पता चले और इमाम हुसैन (अ) के प्रेम का प्रकाश दुनिया को प्रकाशमय बना दे। इस बीच, नाइजीरिया के अत्याचार ग्रस्त शियों का विशाल आंदोलन लोगों की नज़रों से ओझल रहा है। नाइजीरिया में जो लोग लम्बी दूरी और आर्थिक समस्याओं के कारण इराक़ में नज़फ़ से कर्बला तक मिलियन मार्च में भाग नहीं ले सकते, वे मातमी जुलूस के रूप में अपने अपने शहरों से ज़ारिया शहर तक मार्च करते हैं। वे 80 से 160 किलोमीटर तक पैदल चलकर ज़ारिया शहर में इमाम हुसैन के चेहलुम की शोक सभा में भाग लेने पहुंचते हैं। नाइजीरियाई शियों के वरिष्ठ धर्मगुरू आयतुल्लाह शेख़ ज़कज़की ने इस शहर में एक इमामबाड़े की स्थापना की थी, जो शियों की धार्मिक एवं सामाजिक गतिविधियों का केन्द्र है। इस मार्च में 80 लाख लोग भाग लेते हैं, जिनमें सुन्नी मुसलमानों और ईसाईयों की भी एक बड़ी संख्या होती है। इस मार्च में कादूना राज्य के ईसाई पादरियों का भाग लेना इस बात का सूचक है कि नाइजीरियाई शियों ने इमाम हुसैन के संदेश को सही रूप में लोगों तक पहुंचाया है।
फ़ादर युहन्ना बोरू इमाम हुसैन (अ) के चेहलुम के इस मार्च में भाग लेने की वजह बताते हुए कहते हैं, क्यों हम इमाम हुसैन (अ) की याद में आयोजित इस मार्च में भाग न लें, ऐसा आयोजन जो न्याय की याद दिलाता है और शांतिपूर्ण जीवन के लिए एक आदर्श है। हम चाहते हैं कि कर्बला के बाद इमाम हुसैन (अ) के परिवार के सदस्यों की कठियाईयों और दुखों का कुछ अनुभव करें।
काले कपड़े पहने लाखों शिया, जो इमाम हुसैन को न्याय और आज़ादी का प्रतीक मानते हैं, ऐसी स्थिति में नाइजीरिया के जंगलों से होकर ज़ारिया शहर की ओर जाते हैं, जब आतकंवादी गुट बोको हराम के हमलों की संभावना बनी रहती है। इसके अलावा, पिछले कुछ वर्षों से नाइजीराई सेना शिया मुसलमानों पर खुलकर हमले किए हैं। जबकि इराक़ में अमरीका और उसके घटक देशों द्वारा समर्थित आतंकवादी गुट दाइश इमाम हुसैन के चाहने वालों के विशाल समूह के निकट आने का साहस नहीं रखता। नाइजीरिया के शिया बिना किसी सुरक्षा कवच के ही इमाम हुसैन (अ) के मार्ग पर आगे बढ़ जाते हैं। कर्बला तक पहुंचने वाले राजमार्गों पर लोग इमाम हुसैन (अ) की मोहब्बत में अपना सब कुछ श्रद्धालुओं की सेवा में पेश कर देते हैं। वहां किसी को भोजन नहीं ख़रीदना पड़ता है, कोई भूखा या प्यासा नहीं सोता है। स्थानीय लोग श्रद्धालुओं के हाथ पैर तक धोते हैं और उन्हें अपने घरों और तम्बुओं में जगह देते हैं। लेकिन नाइजीरिया में लोग बहुत ही कम सुविधाओं के साथ इस मार्च में शामिल होते हैं और ज़ारिया पहुंचते हैं। वे अपनी जानों को क़ुर्बान कर देते हैं, लेकिन इमाम हुसैन से प्रेम करना नहीं छोड़ते। जैसा कि इस साल भी इमाम हुसैन के चेहलुम से ठीक पहले नाइजीरियाई सैनिकों ने फ़ायरिंग करके दर्जनों लोगों को शहीद कर दिया। इस साल नाइजीरिया में सबसे छोटे शहीद की आयु तीन वर्ष थी। ज़ैनब केवल तीन वर्ष की थी, नाइजीरियाई सैनिकों ने उसे गोलियों से भून डाला। सैनिकों ने शहीदों के शवों को अज्ञान स्थान पर स्थानांतरित कर दिया और उन्हें उनके परिजनों को नहीं सौंपा।
नाइजीरियाई सेना ने इससे पहले भी शेख़ ज़कज़की के इस्लामी आंदोलन को निशाना बनाया है। दिसम्बर 2015 में नाइजीरियाई सेना ने केवल इस आरोप में कि कुछ शिया मुसलमानों ने एक सैन्य वाहन को रोक दिया था, 1000 से भी अधिक शियों का जनसंहार कर दिया था। सैनिकों ने ज़ारिया स्थित इमामबाड़े को ध्वस्त कर दिया और शेख़ ज़कज़की के घर को आग लगा दी। उन्होंने घर में मौजूद लोगों को शहीद कर दिया या बुरी तरह से घायल कर दिया। शेख़ ज़कज़की और उनकी पत्नी का बुरी तरह घायल अवस्था में अपहरण कर लिया और काफ़ी अरसे बाद अदालत में हाज़िर किया। उन्हें आज तक जेल में बंद कर रखा है। नाइजीरियाई सेना ने अधिकांश शहीदों के शव उनके परिजनों को नहीं दिए और उन्हें एक सामूहिक क़ब्र में दफ़्न कर दिया।
इस घटना से कुछ महीने पहले, नाइजीरियाई सैनिकों ने प्रदर्शनकारियों पर हमला करके, शेख़ ज़कज़की के 3 बेटों समेत 33 निर्दोष लोगों की हत्या कर दी थी। नाइजीरियाई सेना के इन अमानवीय अत्याचारों पर पश्चिम समेत दुनिया भर का मीडिया चुप्पी साधे रहा। लेकिन नाइजीरियाई शियों के ख़िलाफ़ सरकार और सेना के योजनाबद्ध हमलों के बावजूद, दूसरे मतों और धर्मों के अनुयाईयों के बीच वे शिष्टाचार और विनम्रता के लिए जाने जाते हैं। शिया मुसलमानों की इसी लोकप्रियता से भयभीत होकर तकफ़ीरी और साम्राज्यवादी शक्तियां उन्हें निशाना बना रही हैं।
नाइजीरियाई शिया आशूर और चेहलुम के दिन, ज़रूरतमंद रोगियों को ख़ून दान करते हैं। वहां के अस्पतालों में ख़ून देने वालों की बड़ी संख्या को देखकर आपात स्थिति पैदा हो जाती हैं। शिया मुसलमान बिना किसी धर्म और मत की सीमा के समस्त रोगियों को ख़ून दान करके नया जीवन प्रदान करते हैं।
नाइजीरिया के शिया मुसलमानों ने अपने शिष्टाचार और नैतिकता से लोगों का आत्मविश्वास हासिल किया है। इस देश में शिया धर्म के प्रसार का यह एक मुख्य कारण है। शेख़ ज़कज़की लोगों को सरकार के भ्रष्टाचार, उसके ज़ायोनी शासन और तकफ़ीरी शक्तियों के साथ संबंधों को उजागर करते रहते थे। लेकिन उन्होंने कभी भी अपने अनुयाईयों को हिंसा का सहारा लेने की अनुमति नहीं दी। यहां तक कि उन्होंने अपने तीन बेटों की हत्या के बाद भी लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की। नाइजीरिया के शियों ने इस साल चेहलुम के मार्च का आयोजन ऐसी स्थिति में किया है कि जब उनके धार्मिक नेता शेख़ ज़कज़की पिछले क़रीब एक वर्ष से घायल अवस्था में जेल में बंद हैं। उन्हें न ही चिकित्सा की सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है और न ही ज़मानत पर रिहा किया जा रहा है। इसके बावजूद, जिस आंदोलन की उन्होंने शुरूआत की थी, दिन प्रतिदिन लोग उससे जुड़ते जा रहे हैं।