Dec ११, २०१६ ११:२३ Asia/Kolkata

इस्राईल वर्षों से फ़िलिस्तीनी लोगों का जनसंहार और उन पर अत्याचार कर रहा है।

आज कल इस्राईलियों में मस्जिदुल अक़सा समेत बैतुल मुक़द्दस की मस्जिदों से गूंजने वाली अज़ान की अवाज़ सुनने का भी धैर्य नहीं है। हाल ही में ज़ायोनी कैबिनेट की समिति ने दो जातिवादी क़ानूनों को पारित किया है। पहले क़ानून के आधार पर बैतुल मुक़द्दस की मस्जिदों में लाऊडस्पीकर पर अज़ान देने पर प्रतिबंध लगाया गया है और दूसरा पश्चिमी किनारे में फ़िलिस्तीनियों की ज़मीनों को ज़ब्त करने से संबंधीत हैं।

इस क़ानून के आधार पर बैतुल मुक़द्दस की मस्जिदों से लाऊडस्पीकर पर अज़ान देने की अनुमति नहीं होगी, इसके लिए यह दलील पेश की गई है कि अज़ान की आवाज़ से अवैध बस्तियों में बसाए गए ज़ायोनियों को कष्ट होता है। इस क़ानून के आधार पर इस्राईली पुलिस अज़ान देने वालों को गिरफ़्तार करके पूछताछ कर सकती है और उन पर जुर्माना लगा सकती है। इस्राईली प्रधान मंत्री बिनयामिन नेतनयाहू ने भी इस क़ानून पर अपनी सहमति जता दी है।

धार्मिक आज़ादी इंसान का मूल अधिकार है। विश्व मानवाधिकार घोषणा पत्र के 18वें अनुच्छेद में उल्लेख है कि, प्रत्येक व्यक्ति को विचार, विवेक और धर्म से लाभ उठाने का अधिकार है। नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों के अनुबंध के पहले अनुच्छेद में कहा गया है कि हर किसी को विचार, विवेक और धर्म का अधिकार है। इस अधिकार में आज़ादी और धर्म के चयन का अधिकार शामिल है।

इस प्रकार इन मानवाधिकार दस्तावेज़ों में धार्मिक आज़ादी पर बल दिया गया है। लेकिन केवल धार्मिक आज़ादी भी काफ़ी नहीं है, बल्कि धार्मिक अनुयाइयों को भी उनके धार्मिक विश्वासों के कारण यातनाएं नहीं दी जानी चाहिएं। नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों के अनुबंध के 18वें अनुच्छेद में उल्लेख है कि किसी व्यक्ति को मजबूर नहीं किया जाना चाहिए कि वह अपने धर्म या विश्वासों के चयन में आज़ाद न रहे।

इस्लाम के प्रतीकों में से एक अज़ान है। मस्जिदों से जब अज़ान की आवाज़ गूंजती है तो मुसलमान नमाज़ के लिए मस्जिदों का रुख़ करते हैं। नमाज़ मुसलमानों के लिए एक अनिवार्य इबादत है। इसलिए ज़ायोनी शासन हो या कोई और किसी को इस बात का अधिकार नहीं है कि वह मुसलमानों को उनकी इबादत से रोके। ऐसा करना मानवाधिकार के विश्व घोषणा पत्र के विरुद्ध है।

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारों के दस्तावेज़ों के अनुसार, धार्मिक आज़ादी में अभिव्यक्ति की आज़ादी और धार्मिक संस्कारों की आज़ादी भी शामिल है। मानवाधिकारों के विश्व घोषणा पत्र के 18वें अनुच्छेद में अभिव्यक्ति और धार्मिक आज़ादी के बाद, इस बात पर बल दिया गया है कि इंसान को अपने धार्मिक विश्वासों को स्पष्ट करने और व्यक्तिगत या सामूहिक रूप से धार्मिक शिक्षाओं को लागू करने का अधिकार है।                        

नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों के अनुबंध के 18वें अनुच्छेद में धार्मिक आस्थाओं को व्यक्तिगत रूप में या सामूहिक रूप में स्पष्ट करने को औपचारिकता प्रदान की गई है। ईश्वरीय धर्मों में इबादतों द्वारा धार्मिक संस्कारों को स्पष्ट करने का प्रचलन है, अज़ान और नमाज़ भी इन्हीं संस्कारों में से एक है, इसलिए मुसलमानों को अपने धार्मिक संस्कारों को स्पष्ट करने से रोकना धार्मिक आज़ादी का खुला उल्लंघन है।

हालांकि इस्राईल की इस प्रकार की कार्यवाहियां, फ़िलिस्तीनी जनता के प्रति उसके जातिवादी व्यवहार का भाग हैं। ज़ायोनियों में जातिवाद इस हद तक है कि वे अज़ान की आवाज़ सुनने को भी असहनीय समझते हैं और फ़िलिस्तीनियों को इस बात की अनुमति नहीं देते कि वे अपने ही देश में और अपनी ही धरती पर इबादत कर सकें। यह क़दम भी अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों का उल्लंघन है।

मानवाधिकार विश्व घोषणा पत्र राष्ट्र संघ का पहला मानवाधिकार दस्तावेज़ है। सबसे पहले इस दस्तावेज़ के अनुच्छेद 2 में उल्लेख किया गया है कि प्रत्येक व्यक्ति किसी भी जाति, रंग, लिंग, भाषा, धर्म, राजनीतिक विचारधारा या राष्ट्रीयता, सामाजिक स्थिति, धन, जन्म या किसी भी अन्य स्थिति में अंतर के बिना इस घोषणा पत्र में घोषित अधिकारों से लाभ उठा सकता है।

मानवाधिकारों की दृष्टि से धार्मिक भेदभाव एक ओर मूल अधिकारों से लाभ उठाने में पक्षपात के न होने के नियम का उल्लंघन है, दूसरी ओर विशेष रूप से धार्मिक आज़ादी का उल्लंघन है।

मानवाधिकारों के अधिकांश दस्तावेज़ों के अनुसार, धर्म को अन्य मामलों जैसे कि जाति, रंग, राष्ट्रीयता इत्यादि की तरह मूल मानवाधिकारों से लाभ उठाने में भेदभाव का आधार नहीं बनाया जा सकता। 

उल्लेखनीय है कि भेदभाव विभिन्न प्रकार से किया जा सकता है। उदाहरण स्वरूप, सीधे रूप से हिंसा और विशेष धर्म के अनुयाइयों को दंडित करके भी ऐसा किया जा सकता है और परोक्ष रूप से भेदभाव किया जा सकता है, जैसे कि भरतियों में या संस्कृति में भेदभाव करना।

25 नवम्बर 1981 को राष्ट्र संघ महासभा ने एक घोषणा पत्र पारित किया था, जिसके चौथे अनुच्छेद के अनुसार, सरकारों की ज़िम्मेदारी है कि वे धार्मिक भेदभाव को समाप्त करने के लिए प्रभावी क़दम उठाएं या भेदभाव से मुक़ाबले के लिए क़ानून बनाने में तत्परता दिखाएं। इस घोषणा पत्र के तीसरे अनुच्छेद में भी धार्मिक भेदभाव को मानवाधिकारों और मूल आज़ादी का उल्लंघन बताया गया है।

बैतुल मुक़द्दस की मस्जिदों से अज़ान के प्रसारण पर पाबंदी के क़ानून की दुनिया भर में निंदा की गई है। 1948 से अवैध अधिकृत फ़िलिस्तीनी इलाक़े में स्थित इस्लामी आंदोलन का कहना है कि किसी भी स्थिति में इस जातिवादी और भेदभावपूर्ण क़ानून के क्रियान्वयन की अनुमति नहीं दी जाएगी। इस आंदोलन ने एक विज्ञप्ति में अज़ान को इस्लाम धर्म का एक प्रतीक बताया है।

फ़तह आंदोलन के एक नेता ने बैतुल मुक़द्दस की मस्जिदों से अज़ान के प्रसारण को एक धार्मिक युद्ध क़रार दिया है और लड़ाई को नया मोड़ देने के प्रति इस्राईल को चेतावनी दी है। फ़तह आंदोलन के पूर्व प्रवक्ता राफ़त अलियान ने कहा है कि बैतुल मुक़द्दस की मस्जिदों से अज़ान के प्रसारण पर प्रतिबंध, एक धार्मिक युद्ध है।

उन्होंने आगे कहा कि फ़िलिस्तीनी प्राधिकरण के समस्त अधिकारियों और गुटों को चाहिए कि ऐसे हर क़दम का मुक़ाबला करें, जिससे ज़ायोनी शासन की पहचान बदलने की कोशिश की जाए।

इसी प्रकार बैतुल मुक़द्दस और अवैध अधिकृत इलाक़ों के प्रमुख मुफ़्ती ने इस क़ानून पर प्रतिक्रिया जताई है। बैतुल मुक़द्दस और अवैध अधिकृत इलाक़ों के मुफ़्तीए आज़म शेख़ मोहम्मद हुसैन ने इस्राईली कैबिनेट द्वारा इस क़ानून को पारित करने की निंदा की है और कहा है कि इस क़ानून का पारित होना, एक प्रकार से मस्जिदों को जलाने, उन्हें ध्वस्त करने और बंद करने की नीति को आगे बढ़ाना है।

बैतुल मुक़द्दस की मस्जिदों विशेष रूप से मस्जीदुल अक़सा से अज़ान के प्रसारण पर प्रतिबंध के क़ानून को हमास ने भी इस शहर की इस्लामी पहचान को बदलने की एक साज़िश क़रार दिया है और इसे एक बहुत ही ख़तरनाक क़दम बताया है।

हमास के प्रवक्ता अब्दुल लतीफ़ क़ानू ने एक बयान जारी करके कहा है कि इस प्रकार के भेदभावपूर्ण क़ानून को पारित करके इस्राईल ने मुसलमानों के धार्मिक मामलों में ख़ुला हस्तक्षेप किया है, जिससे विश्व भर के मुसलमानों की भावनाएं आहत हुई हैं।

क़ानू का कहना था कि यह क़ानून उन समस्त अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों का खुला उल्लंघ है, जो फ़िलिस्तीनियों के धार्मिक स्थलों का समर्थन करते हैं और फ़िलिस्तीनी धरती पर स्थित धार्मिक स्थलों पर फ़िलिस्तीनी जनता के ऐतिहासिक अधिकारों को औपचारिकता प्रदान करते हैं। उसका अंतिम उदाहरण, मस्जिदुल अक़सा के बारे में यूनेस्को का वह प्रस्ताव है, जिसमें स्पष्ट किया गया है कि यह मस्जिद केवल मुसलमानों की है और इसका यहूदियों से कोई संबंध नहीं है।

बैतुल मुक़द्दस की मस्जिदों से अज़ान के प्रसारण पर प्रतिबंध के हर प्रकार के क़ानून के प्रति चेतावनी देते हुए क़ानू विश्व समुदाय और अंतरराष्ट्रीय संगठनों से मांग करते हैं कि वे बैतुल मक़द्दस में स्थित मस्जिदों और अन्य धार्मिक स्थलों पर ज़ायोनी शासन के हमलों को रोकें।

कुछ विश्लेषकों का मानना है कि इस्राईल का यह नया क़दम एक प्रकार से मुस्लिम समुदाय से टकराना है औऱ विश्व समुदाय के दोहरे रवैये से इस्राईल को अपनी भेदभावपूर्ण नीतियों को जारी रखने में सहयोग मिला है। इस्लामी प्रतीक के रूप में बैतुल मुक़द्दस की मस्जिदों से अज़ान के प्रसारण पर पाबंदी, ज़ायोनी शासन की ओर से इस्लामी जगत के ख़िलाफ़ युद्ध की घोषणा जैसा है। ऐसी परिस्थितियों में, बैतुल मुक़द्दस और मस्जिदुल अक़सा का समर्थन विश्व भर के मुसलमानों की ज़िम्मेदारी है।

बैतुल मुक़द्दस में इस्राईल की गतिविधियों के परिणाम स्वरूप, फ़िलिस्तीनी जनता का क़ुद्स इंतेफ़ाज़ा शुरू हुआ है।  इस इंतेफ़ाज़े का समर्थन और बैतुल मुक़द्दस का समर्थन इस्लामी जगत के सर्वप्रथम मुद्दे के रूप में समस्त मुसलमानों की ज़िम्मेदारी है।