Dec १३, २०१६ ०८:२२ Asia/Kolkata

ईश्वरीय धर्म होने के नाते इस्लाम हर एक इंसान को विशेष महत्व देता है।

व्यापक दृष्टिकोण के तहत सामाजिक जीवन पर अधिक ध्यान दिया गया है। सामाजिक जीवन का एक स्तंभ समाज के सदस्यों की सुरक्षा है। इसलाम ने इंसानों के आंतरिक सुधार के लिए बहुत सी शिक्षाओं को निर्धारित किया है। यदि कोई इंसान इस्लाम की धार्मिक व नैतिक शिक्षाओं को अपने जीवन में लागू करे तो कभी भी किसी को सताने के बारे में सोच भी नहीं सकता, किसी की हत्या करना तो बहुत दूर की बात है। शिक्षाओं को जीवन में लागू करना आंतरिक नियंत्रण का रास्ता है। इसके साथ ही बाहरी नियंत्रण के लिए भी इस्लाम ने सज़ा के कुछ नियम बनाए हैं। चूंकि जीवन गुज़ारना हर इंसान का अधिकार है इस लिए इस लिए यदि कोई किसी का जीवन समाप्त करता है तो उसके लिए कठोर सज़ा होना ज़रूरी है। इस्लामी समाज में लोगों के जान-माल और प्रतिष्ठा व सम्मान का ध्यान रखना अनिवार्य है। किसी का यह अधिकार कदापि नहीं छीना जाना चाहिए। यदि कोई किसी के अधिकार का हनन करता है तो उसे लोक परलोक दोनों जगहों पर सज़ा भुगतनी होगी।

फांसी की सज़ा भी इस्लाम में है तथा इतिहास में अन्य सभ्यताओं और धर्मों के काल में भी फांसी की सज़ा रही है। इस्लाम ने अंधाधुंध बदले की कार्यवाही के स्थान पर फांसी की सज़ा रखी है। अज्ञानता के काल में अरब क़बीलों का यह नियम था कि यदि किसी क़बीले का कोई व्यक्ति मार दिया जाता था तो उस क़बीले के लोग बदला लेने का संकल्प करते थे हत्या करने वाले व्यक्ति के क़बीले का एक व्यक्ति ज़रूर मार दिया जाए।  यह प्रथा एसा भयानक रूप धारण कर गई थी कि एक क़बीला दूसरे क़बीले को पूरी तरह समाप्त तक कर दिया करता था।

इस्लाम ने फांसी की सज़ा का प्रावधान पेश करके एक तो अंधाधुध बदले की कार्यावाही पर अंकुश लगाया तथा क़ातिल के बारे में फ़ैसले का अधिकार अदालत को दिया। दूसरी बात यह है कि बदला लेना पीड़ित परिवार का अधिकार है। अतः उनके निवेदन पर न्यायाधीश मामले की जांच करता है और सज़ा सुनाता है। दूसरी बात यह है कि हत्या के बदले में फांसी अनिवार्य नहीं है बल्कि पीड़ित परिवार क़ातिल को क्षमा कर सकता है या उससे हर्जाना वसूह कर सकता है। ईश्वर ने क़ुरआन में पीड़ित परिवार को माफ़ कर देने के लिए प्रोत्साहित किया है।

क़ुरआन में फांसी की सज़ा का उद्देश्य समाज के जीवन की रक्षा करना बताया गया है। क़ुरआन मजीद के सूरए बक़रह की आयत संख्या 179 में क़ेसास अर्थात बदले की सज़ा के बारे में कहा गया है कि तुम्हारे लिए क़ेसास में जीवन है  हे विवेक रखने वालो! शायद इस प्रकार तुम तक़वा के मार्ग पर चलो। अर्थात क़ेसास का लक्ष्य जीवन समाप्त करना नहीं जीवन बचाना है। लक्ष्य समाज के मामलों का सुधार और उसे सामान्य डगर पर लाना है। इसी लिए आयत में दिमाग़ और विवेक रखने वालों को संबोधित किया गया है, भावनाओं को केन्द्र में नहीं रखा गया है।

मौत की सज़ा से संबंधित क़ुरआन की आयत की गहन समीक्षा से यह लगता है कि फांसी की सज़ा हत्यारों के लिए है लेकिन इस सज़ा को व्यवहारिक करना ज़रूरी नहीं है। क्योंकि ईश्वर ने पीड़ित परिवार को एक अन्य मार्ग क्षमा और माफ़ी का सुझाया है। पाप और अपराध के संबंध में इस्लाम धर्म में दो सिद्धांतों न्याय और दया को दृष्टिगत रखा गया है तथा दया व क्षमा को प्रतिशोध से बेहतर बताया गया है।

न्याय पर ध्यान देना इस्लाम में सज़ा का मूल तर्क है। इस लिए अत्याचार की रोकथाम और न्याय की स्थापना के लिए सज़ा के क़ानून रखे गए हैं और अपराधियों की मुक़ाबला किया गया है ताकि समाज को स्वभाविक रूप में बाक़ी रखा जाए। इस्लाम धर्म बुद्धि और विवेकपूर्ण भावुकता का पक्षधर है, बुद्धिहीन भावुकता का समर्थन नहीं करता। क़ेसास भी एक सिद्धांत है क्योंकि इस पर अमल समाज को ज़िंदगी देता है।

इस्लाम में फांसी की सज़ा रक्तपात और हत्या का दुस्साहस रोकने के लिए है तथा इस पर अमल होने की स्थिति में अपराध से समाज को लगने वाला घाव भर जाता है। इसलाम हर मामले में सभी आयामों का यथार्थवादी रूप से जायज़ा लेता है। इसी प्रकार निर्दोष का ख़ून बहाए जाने की स्थिति में अतिवाद से परहेज़ किया गया है। इस्लाम ने फांसी को एकमात्र रास्ता नहीं निर्धारित किया है और न ही ख़ूनबहा और क्षमा को एकमात्र रास्ता माना है। क्योंकि पहला रास्ता हिंसा का है और दूसरा रास्ता दुस्साहस बढ़ने का कारण बन सकता है। इस्लाम ने तीसरा रास्ता चुना है। फांसी को क़त्ल की असली सजा माना है ताकि कोई भी हत्या का दुस्साहस न कर सके। दूसरा रास्ता क्षमा और ख़ूनबहा का रखा है जो पीड़ित परिवार के हाथ में है। साथ ही प्रभावित परिवार को क़ातिल को क्षमा कर देने के लिए प्रोत्साहित किया है।

फांसी का विरोध करने वालों का एक तर्क यह रहता है कि फांसी की सज़ा मानवता, वर्तमान सभ्यता और जीवन के अधिकार के विपरीत है। वह तर्क देते हैं कि किसी की भी जान लेना बुरा है अतः फांसी की सज़ा भी बुरी है। जवाब में यह कहना चाहिए कि क्या हर प्रकार की हिंसा और हत्या बुरी है? क्या उस इंसान का भी किसी की हत्या कर देना बुरा है जो केवल अपनी रक्षा की कार्यवाही कर रहा है? क्या युद्ध के समय भी कहा जा सकता है कि जो जवाबी हमला कर रहा है वह बुरा काम करता है? क्या पुलिस जब अपराधियों के गैंग के विरुद्ध कार्यवाही करती है तो वह भी बुरा है?

यह बात पूरे निश्चय से कही जा सकता है कि हर प्रकार की हत्या बुरी नहीं है। जान लेने के कुछ मामले न्याय के अनुरूप होते हैं।

सन थामस थियालोजी के शिक्षा हैं उनका कहना है कि समाज के लिए यदि ज़रूरत हो तो बुरे लोगों से पहुंचने वाले नुक़सान की रोक थाम के लिए सभी आवश्यक क़दम उठाए। मौत की सज़ा के विरोधियों का तर्क सही नहीं है। जिंदगी गुज़ारने और आज़ाद रहने का अधिकार हर इंसान के लिए है लेकिन इस अधिकार की  एक सीमा यह है कि इससे दूसरों के अधिकार और दूसरों की आज़ादी को आंच न आ। यदि एसा हो तो सीमा को लांघने वाले व्यक्ति को सज़ा देना ज़रूरी है।

फांसी के विरोधियों का कहना है कि एक व्यक्ति की यदि हत्या हुई है और अब जवाब में दूसरे व्यक्ति को फांसी दी जा रही है तो एक और जान भी चली जाती है जबकि मानवता और दया कहती है कि हत्यारे को फांसी न दी जाए। जवाब में हम कह सकते हैं कि दया हर जगह अच्छी नहीं होती और हर दया को सही नही माना जा सकता। क्योंकि किसी संगदिल हत्यारे के साथ दया से पेश आना जो इंसानों का बड़ी आसानी से क़त्ल कर देता है, दूसरों की हमले करने वाले व्यक्ति के साथ नर्मी बरतना वास्तव में भले लोगों के साथ अन्याय है। अतः यदि हम आंख बंद करके केवल दया करते चले जाएंगे तो एक स्थिति एसी आ जाएगी जिसमें सभी इंसानों की जानें ख़तरे में पड़ जाएंगी और पूरा समाज मुसीबत में फंस जाएगा।

कोई भी इस तथ्य का इंकार नहीं कर सकता कि फांसी सहित जितनी भी सज़ाएं हैं सबमें हिंसा तो ज़रूर होती है और इंसान को पसंद भी नहीं आती लेकिन बड़े लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए इस तार्किक रास्ते को अपनाना ज़रूरी है। यदि किसी अपराधी को भय और कठोरता के मार्ग से और कड़ी सज़ा देकर रोका जा सकता है तो फांसी की सज़ा इसमें सबसे प्रभावी है तथा इससे अपराधों की दर में कमी लायी जा सकती है। अलबत्ता यह ज़रूरी नहीं है कि फांसी की सज़ा दे ही दी जाए फांसी का क़ानून मौजूद होना भी अपने आप में एक निरोधक स्थिति है।

फांसी की सज़ा अपराधियों के हाथों होने वाली इंसानों की हत्या की रोकथाम करती है तथा हत्या के बदले हत्या के कभी न रुकने वाले सिलसिले को रोकती है। इस प्रकार देखा जाए तो फांसी की सज़ा हत्यारे के भी हित में है। क्योंकि यदि उसे हत्या से पहले पूरा विश्वास हो कि हत्या कर देने के बाद उसे फांसी ज़रूर हो जाएगी तो वह आसानी से किसी की हत्या नहीं करेगा। जिसकी हत्या होती है उसको भी फांसी के क़ानून से लाभ पहुंचता है कि वह मज़लूमियत में मरने से बच जाता है। इसी प्रकार घर वालों और समाज को भी इस क़ानून से लाभ पहुंचता है समाज में अपराध की दर गिरती है।