इस्लाम और मानवाधिकार-21
हमने बताया था कि इस्लामी क़ानूनी व्यवस्था में हर व्यक्ति के लिए भौतिक व आध्यात्मिक दो तरह के जीवन को दृष्टिगत रखा गया है।
भौतिक जीवन मनुष्य के शरीर से जबकि आध्यात्मिक जीवन उसकी आत्मा से संबंधित होता है। ईश्वर ने ज़िंदा रहने का हक़, एक अमानत के रूप में मनुष्य को दिया है ताकि वह अपने जीवन से सही ढंग से लाभ उठाए और अपने तथा अन्य लोगों के मन मस्तिष्क को स्वस्थ रखने का प्रयास करे। इस ईश्वरीय अमानत की सुरक्षा हर इंसान का दायित्व है। आध्यात्मिक जीवन का महत्व, भौतिक जीवन से अधिक है और इस्लाम मनुष्य के इस जीवन पर विशेष ध्यान देता है। धर्म के इस पहलू पर ईश्वरीय धर्मों विशेष कर इस्लाम धर्म के अलावा किसी भी धर्म व मत ने ध्यान नहीं दिया है। मानवाधिकार के किसी भी दस्तावेज़ में मनुष्य के आध्यात्मिक जीवन की ओर कोई संकेत नहीं किया गया है क्योंकि मानवाधिकार के इन दस्तावेज़ों की बुनियाद ही पश्चित के कुछ विचारकों की भौतिक सोच पर आधारित और इस संसार के शारीरिक जीवन तक सीमित है।
आसमानी धर्मों के अनुसार मानव जीवन, इस संसार के शारीरिक जीवन तक सीमित नहीं है। मौत, इंसान के जीवन का अंत नहीं होती बल्कि केवल उसकी आत्मा, शरीर के पिंजरे से स्वतंत्र हो जाती है और अपने आध्यात्मिक जीवन की शुरुआत करती है। इस आधार पर मनुष्य के आध्यात्मिक जीवन का उसकी आत्मा से निकट संबंध है। हम सभी अपनी आत्मा के प्रति उत्तरदायी हैं क्योंकि हमारी आत्मा के सामने हमेशा कुछ ख़तरे रहते हैं। इसी लिए आध्यात्मिक जीवन के लिए ख़तरा बनने वाले, भौतिक जीवन के लिए ख़तरा बनने वालों से कहीं अधिक हैं। मनुष्य की आध्यात्मिक ज़िंदगी के अंत का एक अर्थ उसका पथभ्रष्ट होना है। आत्मिक दृष्टि से पहुंचने वाले सबसे गंभीर ख़तरों में से एक भ्रष्ट विचारों का प्रसार और नैतिक व सामाजिक बुराइयों का प्रचार है।
ईश्वरीय धर्मों में जीवन के अधिकार को बहुत अधिक पावन माना जाता है अतः स्वाभाविक है कि कोई भी अपने जीवन का, चाहे वह भौतिक हो या आध्यात्मिक, उस प्रकार से सौदा नहीं कर सकता जैसा उसका दिल चाहता है। जब जीवन पावन होता है तो मनुष्य अपने जीवन में ईश्वरीय मान्यताओं को व्यवहारिक बनाने की कोशिश करता है। इस स्थिति में मनुष्य न केवल अपने ज़िंदगी बल्कि दूसरों के जीवन के बारे में ज़िम्मेदारी का आभास करता है चाहे इसमें उसका अपना कोई लाभ न हो। अतः जो कुछ उससे संभव होता है वह मानवता के उत्थान और दूसरों की प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए अंजाम देता है क्योंकि मनुष्य की जान भी सम्मानीय है और उसकी आत्मा भी प्रतिष्ठित है।
अधिकारों के क्षेत्र में एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय मानवीय प्रतिष्ठा है क्योंकि यह अनेक अधिकारों, विशिष्टताओं व ज़िम्मेदारियों का आधार है। मानवाधिकार के दस्तावेज़ों में मानवीय प्रतिष्ठा को एक ऐसी विशेषता बताया गया है जो उसके अस्तित्व का अभिन्न अंग है और सभी मानवाधिकारों का स्रोत है। सभी इंसान, लिंग, जाति, शारीरिक व मानसिक स्थिति जैसे सभी बातों की अनदेखी करते हुए, मानवीय प्रतिष्ठा का पात्र हैं। मानवाधिकार संबंधी सभी दस्तावेज़ों में मानवीय प्रतिष्ठा का शब्द वर्णित है और संयुक्त राष्ट्र संघ के घोषणा पत्र, मानवाधिकार के अंतर्राष्ट्रीय घोषणापत्र, नागरिक व राजनैतिक अधिकारों के अंतर्राष्ट्रीय चार्टर, आर्थिक व सामाजिक अधिकारों के अंतर्राष्ट्रीय चार्टर और मानवाधिकार के लगभग सभी कन्वेंशनों में मानवीय प्रतिष्ठा की ओर संकेत किया गया है।
संयुक्त राष्ट्र संघ के घोषणा पत्र में कहा गया हैः संयुक्त राष्ट्र संघ की सदस्य सरकारें, इंसान के बुनियादी अधिकारों, मानवीय प्रतिष्ठा और मनुष्य के व्यक्तिगत मूल्य पर अपनी आस्था की घोषणा करती हैं और मानवाधिकार और बिना किसी भेदभाव के सभी के लिए बुनियादी स्वतंत्रता के सम्मान के प्रोत्साहन को संयुक्त राष्ट्र संघ का एक लक्ष्य मानती हैं। मानवाधिकार के अंतर्राष्ट्रीय घोषणापत्र की भूमिका व उसकी पहली ही धारा में सभी इंसानों के लिए मानवीय प्रतिष्ठा और लोगों के समान अधिकारों को स्वीकार किया गया है। इस घोषणा पत्र में मानवीय प्रतिष्ठा पर विशेष रूप से ध्यान दिया गया है प्रतिष्ठा के लिए जन्मसिद्ध या जन्मजात जैसे विशेषण का प्रयोग किया है। इस घोषणापत्र में इसी तरह मनुष्य की जन्मसिद्ध मानवीय प्रतिष्ठा को वैश्विक न्याय, स्वतंत्रता और शांति का आधार बताया गया है।
बहुत से बुद्धिजीवियों का कहना है कि मनुष्य का अस्तित्व ही मूल्यवान और सम्मानीय है और इसी लिए कथित मानवाधिकार क़ानूनों को मानवीय प्रतिष्ठा को दृष्टिगत रख कर तैयार किया गया है। आसमानी धर्मों की शिक्षाओं पर एक सरसरी नज़र डालने से पता चलता है कि ये सभी धर्म मनुष्य के सम्मान पर बल देते हैं। इस्लाम में मानवीय प्रतिष्ठा एक ईश्वरीय उपहार के रूप में दिखाई पड़ती है। क़ुरआने मजीद की विभिन्न आयतों में इस ओर संकेत किया गया है। उदाहरण स्वरूप सूरए इसरा की आयत नंबर 70 में कहा गया हैः निश्चय ही हमने आदम की संतान को प्रतिष्ठा प्रदान की और उन्हें जल व थल में (सवारियों) पर बिठाया, हर स्वादिष्ठ और पवित्र आहार में से उन्हें रोज़ी प्रदान की और अपनी बहुत सी रचनाओं पर उन्हें पूर्ण श्रेष्ठता दी।
इस प्रतिष्ठा का तार्किक आधार है और इसकी जड़ें मुनष्य के नैतिक व आध्यात्मिक पहलुओं से मिली हुई हैं क्योंकि यह प्रतिष्ठा उसे ईश्वर ने प्रदान की है। इस्लाम की दृष्टि में इस विशिष्टता व प्रतिष्ठा का स्रोत मनुष्य की विशेष रचना में है जो उसमें ईश्वर की आत्मा फूंके जाने से हुई है। क़ुरआने मजीद सूरए साद की 72वीं आयत में मनुष्य की रचना की ओर संकेत करते हुए कहता है। तो जब मैं उसको ठीक-ठाक कर दूँ और उसमें अपनी आत्मा फूँक दूँ तो तुम उसके आगे सजदे में गिर जाना। ईश्वर की ओर से इस प्रकार की प्रतिष्ठा अन्य रचनाओं को प्रदान नहीं की गई है और इसी लिए मनुष्य, फ़रिश्तों के सजदे का पात्र बना है। क़ुरआने मजीद के प्रख्यात व्याख्याकार आयतुल्लाह जवादी आमुली इस आयत के बारे में कहते हैं कि इंसान, इंसान होने की दृष्टि से प्रतिष्ठित है, इंसान में एक ऐसी आत्मा है जो उसके मूल अस्तित्व का भाग है और वह आत्मा प्रतिष्ठित है।
प्रतिष्ठा एक ऐसा उपहार है जो क़ुरआने मजीद के अनुसार ईश्वर की विदित रचनाओं में सिर्फ़ इंसान को प्रदान किया गया है और किसी भी ज़मीनी रचना को इस विशेषता से याद नहीं किया गया है। ईश्वर सूरए मोमेनून की 12वीं, 13वीं और 14वीं आयत में कहता है। हमने मनुष्य को मिट्टी के सत से बनाया, फिर हमने उसे एक सुरक्षित ठहरने की जगह (माता की कोख में) टपकी हुई बूँद बनाकर रखा फिर हमने उस बूँद को लोथड़े का रूप दिया, फिर हमने उस लोथड़े को चबाए हुए मांस जैसा रूप दिया, फिर उस चबाए हुए मांस जैसी वस्तु को हमने हड्डियों का रूप दिया, फिर हमने उन हड्डियों पर मांस चढ़ाया, फिर हमने उसे एक नई सृष्टि प्रदान की। तो बहुत ही बरकत वाला है ईश्वर जो सबसे उत्तम रचयिता है। व्याख्याकारों के अनुसार फिर हमने उसे एक नई सृष्टि प्रदान की, मनुष्य के शरीर में आत्मा फूंके जाने की ओर संकेत है। इस आधार पर मनुष्य व आदम की संतान की प्रतिष्ठा का कारण, ईश्वरीय आत्मा है और चूंकि ईश्वर ने यह आत्मा मनुष्य को दी है इस लिए वह अन्य जीवों की तुलना में प्रतिष्ठित हो गया है। ईश्वर ने भी मनुष्य की रचना के बाद स्वयं को सर्वोत्तम रचयिता कहा है और उसने यह बात अपने लिए किसी भी अन्य जीव, यहां तक कि फ़रिश्तों की रचना के बाद भी नहीं कही है।
इस्लाम की दृष्टि में सभी इंसान मानवीय प्रतिष्ठा के पात्र हैं, चाहे व मुस्लिम हों या ग़ैर मुस्लिम, पापी हों या पवित्र। इंसान के संबंध में इस्लाम का यह दृष्टिकोण, उसके सम्मान व प्रतिष्ठा के स्तर का परिचायक है। पैग़म्बरे इस्लाम व उनके परिजनों के अनेक कथनों में सभी इंसानों के सम्मान व प्रतिष्ठा की रक्षा पर बल दिया गया है। इन कथनों में सभी नागरिकों यहां तक कि इस्लामी सरकार के विरोधियों की जान, सम्मान, संपत्ति और व्यवसाय की रक्षा पर ज़ोर दिया गया है। इस्लाम धर्म में सामाजिक व नागरिक अधिकारों की दृष्टि से मुसलमानों व ग़ैर मुस्लिमों में कोई अंतर नहीं है और सभी के समान अधिकार हैं।
इस संबंध में एक अत्यंत महत्वपूर्ण कथन हज़रत अली अलैहिस्सलाम का है। उन्होंने अपने साथी मालिके अश्तर को मिस्र का शासक बना कर भेजते समय अपने आदेश में उनसे कहा थाः अपने हृदय में प्रजा के लिए दया, प्रेम व कृपा भाव पैदा करो। और उनके प्रति चीर-फाड़ करने वाले दरिन्दे बन कर उन्हें खाने को अच्छा अवसर न समझो कि लोग दो प्रकार के होते हैं, या तो वे धर्म में तुम्हारे भाई होते हैं या फिर रचना में तुम्हारे जैसे मनुष्य होते हैं जिनसे ग़लतियां होती हैं। हज़रत अली के इस कथन से यह समझ में आता है कि इंसान होने के नाते हर मनुष्य सम्मान व प्रतिष्ठा का पात्र है। इसी लिए वे कहते हैं कि दिल की गहराइयों से सबसे प्यार करो।
इसी तरह कहा गया है कि एक दिन पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम व उनके साथी एक जगह बैठे हुए थे कि एक यहूदी व्यक्ति का जनाज़ा (शव) वहां से ले जाया गया गया। पैग़म्बर, जनाज़े के सम्मान में अपने स्थान से खड़े हो गए और कुछ क़दम उसके साथ गए और अपने स्थान पर लौट आए। उनके एक साथी ने कहा कि हे ईश्वर के पैग़म्बर! वह तो एक यहूदी व्यक्ति का शव था। उन्होंने फ़रमायाः क्या वह इंसान नहीं था? क्या इंसानियत में दूसरों के समान नहीं था? इतना ही उसके सम्मान के लिए काफ़ी है। इसके बाद उन्होंने कहाः इस्लामी सरकार में रहने वाले ग़ैर मुस्लिम भी तुम मुसलमानों के समान हैं और उन्हें भी वही अधिकार और सुविधाएं प्राप्त हैं जो तुम्हें प्राप्त हैं।