मीर सैयद अली हमदानी
हमने इससे पहले मीर सैयद अली हमदानी के बारे में बताया कि उनका जन्म ईरान के हमदान नगर में हुआ और उन्होंने आरंभिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद बड़ गुरुओं की सेवा में उपस्थित होकर हदीस और इरफ़ान तथा अन्य इस्लामी विषयों का व्यापक ज्ञान प्राप्त किया साथ ही उन्होंने आत्म मंथन और आत्म निर्माण के चरणों को तय किया।
जब कर्म व ज्ञान के उच्च स्थान पर वह पहुंच गए तो उनके गुरुओं ने उन्हें इस्लाम धर्म के प्रचार की ज़िम्मेदारी सौंपी। उन्होंने अपना पूरा जीवन इसी ध्येय को प्राप्त करने में लगा दिया तथा सारी ज़िंदगी इस्लाम के प्रचार और शिष्यों के प्रशिक्षण में बिताई। मीर सैयद अली हमदानी को दर्शन शास्त्र का भी पूर्ण ज्ञान था जबकि इतिहास का भी उन्हें व्यापक ज्ञान था। मीर सैयद अली हमदानी ने इन विषयों में अनेक किताबें लिखी हैं। उनकी पुस्तकों, पुस्तिकाओं और लेखों की संख्या 110 से अधिक है। उनकी पुस्तकों की विषयवस्तु तथा उनकी लेखन शैली बहुत रूचिकर थी। पैग़म्बरे इस्लाम के कथनों और जीवन शैली, कुरआन की व्याख्या, तर्क शास्त्र तथा दर्शन शास्त्र के बारे में उनकी पुस्तकें बड़ी मूल्यवान एवं पाठदायक बातों से भरी हुई हैं। उन्होंने अपनी गद्य प पद्य रचनाओं में जिस प्रकार के बिंदुओं को उठाया है और रेखांकित किया है वह हर पाठक का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं।
मीर सैयद अली हमदानी की पुस्तकें और पुस्तिकाएं हस्तलिखित रूप में और शोधकर्ताओं की पहुंच से दूर हैं। उनकी कुछ ही किताबें हैं जो प्रकाशित हुईं। हालांकि दर्शन शास्त्र के क्षेत्र में हेनरी कोरबन का कहना है कि मीर सैयद अली हमदानी एक नए स्कूल के जनक हैं और उनके विचारों से किसी भी दर्शनशस्त्री को बहुत कुछ मिल सकता है लेकिन इसके लिए शर्त है कि उनकी पुस्तकें प्रकाशित हों।
मीर सैयद अली हमदानी एक धर्मगुरू के साथ ही सूफ़ी के रूप में भी बड़ी ख्याति रखते हैं। उनका पहला व्यक्तित्व ज़ख़ीरतुल मुलूक तथा दूसरा व्यक्तित्व उनकी अन्य पुस्तकों में निखर कर सामने आया है। मीर सैयद अली हमदानी आम लोगों के बीच शिक्षा और ज्ञान के प्रचलन पर ध्यान केन्द्रित रखने के साथ ही शासकों को भी नसीहत करते रहते थे कि वह आम इंसानों की समस्याओं के निदान के लिए प्रयास करें। उनका कहना था कि आम इंसानों की सेवा करना उपासना से बड़ा काम है। मीर सैयद अली हमदानी ने शासकों और राजाओं को सीख देने के लिए और उन्हें उनके दायित्वों से अवगत कराने के लिए ज़ख़ीरतुल मुलूक नाम की पुस्तक लिखी जिसमें उन्होंने बताया कि किस तरह राजनीति की जानी चाहिए और किस प्रकार देश का संचालन होना चाहिए। मीर सैयद अली हमदानी ने कहा कि अच्छी सरकार वही है जो समाज के कल्याण में प्रभावी स्तंभ का काम करे।
ज़ख़ीरतुल मुलूक वह पुस्तक है जिसमें एक प्रस्तावना और दस खंड हैं तथा अंत में एक समाप्ति लेख है। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि मीर सैयद अली हमदानी ने यह पुस्तक कुछ राजाओं के आग्रह पर लिखी और यह उनकी बहुत विस्तृत रचना है। इसकी प्रस्तावना में लेखक तथा पुस्तक का नाम आया है। मीर सैयद अली हमदानी ने इस पुस्तक का नाम ज़ख़ीरतुल मुलूक इस लिए रखा कि राजाओं के आग्रह पर यह पुस्तक उन्होंने लिखी थी।
बहुत से विशेषज्ञ यह कहते है कि मीर सैयद अली हमदानी की पुस्तक ज़ख़ीरतुल मुलूक वास्तव में अबू हामिद मोहम्मद ग़ज़ाली की पुस्तक एहयाए उलूमे दीन का संक्षिप्त रूप है और उसमें बयान की गई बातों का अनुवाद है जबकि लेखक ने अपनी ओर से भी इसमें बहुत सी चीज़ें की वृद्धि की है लेकिन पुस्तक में कहीं भी इस बात का उल्लेख नहीं है। पुस्तक में एक ही जगह पर ग़ज़ाली की किताब का नाम लिया गया है लेकिन वहां भी यह नहीं कहा गया है कि इस पुस्तक के किसी भाग के अनुवाद को इस पुस्तक में शामिल किया गया है।
मीर सैयद अली हमदानी ने ज़ख़ीरतुल मुलूक पुस्तक के हर खंड की शुरुआत क़ुरआन की किसी आयत या हदीस से की है और इसके बाद आयतों और हदीसों के आधार पर इसी तरह महापुरुषओं के कथनों के प्रकाश में अपनी बातें पेश की हैं। इस पुस्तक की एक और विशेषता यह है कि इसे सुन्नी धर्म के आधार पर लिखा गया है और इसमें जो नसीहतें और उपदेश हैं वह सुन्नी धर्म के लोगों के लिए हैं। इसी लिए पढ़ने वाले को लगता है कि यह पुस्तक किसी सुन्नी धर्मगुरू ने लिखी है।
इस पुस्तक का बड़े पैमाने पर स्वागत किया गया। इस पुस्तक के शुरू में भी रेफ़रेंस लिख दिए गए हैं जो बहुत बाद तक प्रयोग किया जात रहे। मीर सैयद अली हमदानी की पुस्तक ज़ख़ीरतुल मुलूक को 16वीं शताब्दी ईसवी में तुर्की के एक लेखक व शायर मुसलेहुद्दीन मुसतफ़ा बिन शाबान ने नए सिरे से लिखा और इसका तुर्की भाषा मे अनुवाद किया गया। आज भी इस पुस्तक की हस्तलिखित प्रतियां ईरान, फ़्रांस, ब्रिटेन, रूस और अफ़ग़ानिस्तान के पुस्तकालयों में मौजूद हैं। यह पुस्तक लाहौर और मुंबई में प्रकाशित हो चुकी है।
सैरुत्तालेबान भी मीर सैयद अली हमदानी की और पुस्तक है जिसमें सूफ़ियाना बातें हैं और ईश्वर से संबंधित तत्वज्ञान के बड़े मूल्यवान बिंदु बयान किए गए हैं। यह पुस्तक भी ज़ख़ीरतुल मुलूक की शैली में लिखी गई है और लेखक ने जगह जगह हे मेरे प्यारे कहकर पाठक को संबोधित किया है और अपनी बात पेश की है। अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए लेखक ने आयतों, हदीसों तथा अरबी व फ़ारसी भाषा के शेरों की सहायता ली है। पुस्तक के विभिन्न भागों में तत्वज्ञान और पवित्र जीवन शैली के बारे में महत्वपूर्ण बातें बयान की गई हैं। यह पुस्तक पढ़ने वाला यही समझेगा कि इसका लेखक बहुत बड़ा सूफ़ी होगा जिसने संकीर्ण सोच वाले धर्मगुरुओं की मान्यताओं से बहुत ऊपर जाकर अपनी बातें पेश की हैं।
मीर सैयद अली हमदानी की एक और पुस्तक है रिसालए दह क़ायदे। यह पुस्तिका है जो पाठकों को यह बताती है कि सत्य के मार्ग पर चलकर ईश्वर की सेवा में अपना स्थान कैसे ऊंचा किया जा सकता है। इस पुस्तका में सत्य व ईश्वर के प्रेमियों को तीन वर्गों में बांटा गया है और हर एक को सत्य तक पहुंचने का अलग रास्ता बताया गया है। एक वर्ग उपासकों और तपस्वी लोगों का है, दूसरा वर्ग सूफ़ियों और तत्वज्ञानियों का है और तीसरा वर्ग सत्य के मार्ग में खुद को समर्पित कर देने वालों का है। पुस्तिकों में इसी तीसरे वर्ग को सबसे महत्वपूर्ण धुव्र मानकर उसके लिए दस नियम बयान किए गए हैं और इन्ही नियमों के आधार पर इस पुस्तिका का नाम रखा गया है। पुस्तिका का मूल उद्देश्य इन दस नियमों की व्याख्या करना है। यह दस नियम हैं तौबा, त्याग, ईश्वर के आसरे रहना, संतुष्टि, लोगों से दूरी, स्मरण, ईश्वर की ओर ध्यान, संयम, आत्ममंथन तथा राज़ी रहना। कुछ लोग यह मानते हैं कि यह पुस्तिका वास्तव में नजमुद्दीन कुबरा की पुस्तक उसूलुल अशरह का अनुवाद है। लेकिन पुस्तिका में कहीं भी यह नहीं कहा गया कि यह किसी अन्य पुस्तक का अनुवाद है। शायद यह हुआ हो कि लेखक ने कुछ बातें तो उस पुस्तक से ली हों और फिर उनमें कुछ चीज़ों की वृद्धि कर दी हो।
मीर सैयद अली हमदानी की एक और पुस्तक है दरवीशिया। यह पुस्तिका है लेकिन बड़ी महत्वपूर्ण जानकारियों से सुसज्जित है। इस पुस्तिका में यह बताया गया है कि सूफ़ी बनने के लिए किस तरह अपने उस्ताद की सेवा करनी चाहिए और किस तरह उसकी अनुशंसाओं का पालन करना चाहिए साथ ही यह बताया गया है कि उसताद बन जाने बाद अपने शिष्यों को किस तरह सूफ़ीवादी की शिक्षा देनी चाहिए। मीर सैयद अली हमदानी का मानना है कि हर हदीस और क़ुरआन की हर आयत तथा ईश्वर के हर स्मरण और उपासना में कुछ विशेष रहस्य निहित हैं। इन रहस्यों से ईश्वरीय दूत और पैग़म्बर भी अवगत होते हैं। यदि इनके बारे में ग़लती हो जाए और इनका स्थान बदल दिया जाए तो कुछ समस्याएं भी हो सकती हैं। उनका कहना था कि जिस तरह शरीर को अनेक प्रकार के रोग लग जाते हैं और हर बीमारी का इलाज और उसकी दवा अलग होती है उसी तरह आत्मा की बीमारियां भी होती हैं। हर बीमारी का अलग इलाज होता है और उसके लिए हर जाप और स्मरण व उपासना की ज़रूरत होती है और इसका सही ज्ञान ईश्वर के पैग़म्बरों और दूतों को ही होता है। मीर सैयद अली हमदानी जहां एक ओर सूफ़ीवाद से जुड़े हुए हैं वहीं इस बात पर भी बल देते हैं कि इस्लाम धर्म के हर नियम और आदेश का पालन किया जाना चाहिए क्योंकि यही मुक्ति का सही मार्ग है। मीर सैयद अली हमदानी की यह पुस्तक प्रकाशित हो चुकी है और पुस्तकालयों में मौजूद है।