Dec २५, २०१६ १०:५६ Asia/Kolkata

हमने मानवाधिकार के संबंध में यूरोपीयों के रवैए और बर्ताव की बात की।

इससे पहले के कार्यक्रम में हमने बताया था कि यूरोपीय देशों में कट्टर दक्षिण पंथी और शरणार्थी विरोधी धड़ों की शक्ति बढ़ती जा रही है जो यूरोप की ओर बढ़ने वाली शरणार्थियों की लहर का कड़ा विरोध करते हैं। ऐतिहासिक अनुभावों के अनुसार उन समाजों में कट्टर दक्षिणपंथी विचारधारा पनपी है जहां आर्थिक विषमता बहुत अधिक है तो वर्गों के बीच दूरियां बहुत ज़्यादा है।  लेकिन हालिया वर्षों में यूरोप में यह देखने में आ रहा है कि यूरोपीय संघ के धनी देशों में भी शरणार्थियों का विरोध करने वाले कट्टर दक्षिणपंथी धड़ों की ओर लोगों का रुजहान बढ़ा है। इसका कारण यूरोप में नस्ल परस्ती की विचारधारा है जो मानवाधिकार के सम्मान के बड़े दावे करता है।

यूरोप में नस्ल परस्ती का इतिहास बहुत पुराना है। साम्राज्यवादी काल की नस्ल परस्ती आज भी यूरोप की कुछ सरकारों में मौजूद है। इसको समझने के लिए यूरोप तथा अन्य भागों में आतंकी घटनाओं की कवरेज पर ध्यान देना काफ़ी है। जब यूरोप में आतंकवाद की कोई घटना होती है तो सारी दुनिया में उसकी चर्चा होती है तथा विश्व शांति के ख़तरे में पड़ जाने की बात कही जाती है। लेकिन यदि दुनिया में कहीं और आतंकवाद की कई गुना बड़ी घटना घटती है तो यूरोप में उसे कुछ पंक्तिये की ख़बर से अधिक महत्व नहीं मिल पाता। यूरोपीय सरकारें अपनी इसी नस्ल परस्ती के कारण अपनी जनता को बहुत से तथ्यों से अनभिज्ञ रखती हैं। वह शरणार्थियों की लहर पैदा होने के कारणों के बारे में कभी बात नहीं करतीं। क्या वजह है कि दसियों लाख की संख्या में सीरियाई नागरिक अपना घरबार छोड़कर और जान ख़तरे में डालकर यूरोप की ओर भाग रहे हैं। सीरिया संकट किस तरह शुरू हुआ। क्या इस संकट को भी अपनी तनाशाही सरकारों के विरुद्ध जनता के विद्रोह का नाम दिया जा सकता है जिसके दृश्य पश्चिमी एशिया के कुछ क्षेत्रों में देखने में आए? निश्चित रूप से सीरियाई सरकार पर यह आपत्ति है कि उसने अपने विरोधियों के संबंध में अच्छा बर्ताव नहीं अपनाया लेकिन यह आपत्ति और आलोचना इस सतह की नहीं है कि इसके आधार पर सीरिया की सरकार को गिराने के लिए आतंकी संगठनों की सहायता और संरक्षण का औचित्य पेश किया जा सके। तुर्की, सऊदी अरब, संयुक्त अरब इमारात तथा क़तर ने सीरिया की सरकार को गिराने की पश्चिम तथा अरब देशों की योजना को व्यवहारिक बनाने का बीड़ा उठाया। रोचक बात यह है कि सऊदी अरब ने भी सीरिया में लोकतंत्र की स्थापना का राग अलापना शुरू कर दिया जबकि सऊदी अरब पर आले सऊद क़बीला उसी प्राचीन क़बायली अंदाज़ में शासन कर रहा है तथा इस देश के नागरिकों को मूलभूत अधिकारों से भी वंचित रखा जाता है।

सऊदी अरब तमाम लोकतांत्रिक मूल्यों से दूर देश है लेकिन वह अमरीका और यूरोप का क़रीबी घटक माना जाता है उसे सीरिया में लोकतंत्र लागू करने का ठेका दिया गया। यह सीरिया में लोकतंत्र की स्थापना के संबंध में पश्चिम का बहुत बड़ा विरोधाभासी रवैया है। इसी विषय से समझा जा सकता है कि मध्यपूर्व के क्षेत्र में लोकतंत्र की स्थापना के मुद्दे को पश्चिमी सरकारें अपने स्वार्थों के लिए हथकंडे के रूप में प्रयोग कर रही हैं। अलबत्ता हम अपनी इस चर्चा में सीरिया में लोकतंत्र की स्थापना के संबंध में यूरोपीय देशों के विरोधाभासी रवैए की समीक्षा नहीं करेंगे। सीरिया में पश्चिमी और अरब गठबंधन ने जो भयानक संकट पैदा किया उसका असर पश्चिमी एशिया ही नहीं सारी दुनिया पर पड़ा है। सीरिया की 2 करोड़ 30 लाख जनता अनेक राजनैतिक और आर्थिक समस्याओं के बावजूद शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत कर रही थी। यह देश इस्राईल के विरुद्ध अस्तित्व में आने वाले प्रतिरोधक मोर्चे का महत्वपूर्ण स्तंभ माना जाता है और संकट शुरू होने से पहले अनेक फ़िलिस्तीनी संगठन जो इस्राईली क़ब्ज़े के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं सीरिया में मौजूद थे। ज़ायोनी शासन के अतिग्रहण और अतिक्रमण के मुक़ाबले में सीरिया से अधिक किसी भी अरब देश ने प्रतिरोध नहीं किया है। पश्चिमी सरकारों तथा क्षेत्र के अरब देशों ने सीरिया के विरुद्ध जो साज़िश रची उसका उद्देश्य ही यह था कि दमिश्क़ सरकार का तख्ता उलट कर इस देश को इस्राईल विरोधी प्रतिरोधक मोर्चे से बाहर निकाल दें। इस भयानक साज़िश का नतीजा यह निकला कि देश के आर्थिक व नागरिक प्रतिष्ठान ध्वस्त होकर रह गए और एक करोड़ दस लाख से अधिक लोग विस्थापित हुए जबकि 5 लाख से अधिक लोगों की जानें चली गईं।

तुर्की, लेबनान और जार्डन वह देश हैं जहां सीरिया में लोकतंत्र की स्थापना के नाम पर शुरू की गई साज़िश के नतीजे में विस्थापित होने वाले सीरियाई नागरिकों की बड़ी संख्या विस्थापित होकर पहुंची है। लेकिन सीरिया के इन पड़ोसी देशों में शरणार्थी का जीवन व्यतीत करने वाले सीरियाई नागरिकों को अनेक समस्याओं का सामना है। इनमें कुछ विस्थापित लोग यह समझते हैं कि बेहतर जीवन पाने के लिए उनके पास यही एक विकल्प है कि जान जोखिम में डालकर ख़ुद को किसी तरह यूरोप पहुंचा दें। वह अपनी लुटी हुई ज़िंदगी की बची खुची पूंजी निर्दयी मानव तस्करों के हाथ में देकर यूरोप जाने का प्रयास करते हैं। इन सीरियाई नागरिकों में एक भी ऐसा नहीं था जो अपनी पसंद से अपना घरबार छोड़कर यूरोप में एसे जीवन की तलाश में जाता जिसका भविष्य अंधकार में है। यदि किसी को यूरोप जाने की चाहत होती तो वह क़ानूनी रास्ता अपनाता। पश्चिमी देशों की साज़िश और सऊदी अरब, तुर्की, संयुक्त अरब इमारात और क़तर की ओर से इस साज़िश के व्यवहारीकरण के नतीजे में सीरिया में तकफ़ीरी आतंकी संगठनों का बहुत बड़ा ठिकाना बन गया। किस तर्क के आधार पर इसे सही माना जा सकता है कि सऊदी अरब यूरोपीय सरकारों और अमरीका के प्रत्यक्ष समर्थन से आतंकी संगठनों की मदद लेकर सीरिया में लोकतंत्र और आज़ादी की स्थापना करे।

यूरोप की ओर बढ़ने वाले शरणार्थियों की लहर का सीधा संबंध मध्यपूर्व और विशेष रूप से सीरिया के बारे में पश्चिमी सरकारों की नीतियों से है। जबकि पश्चिमी सरकारें सीरियाई जनता के विस्थापित होने और शरणार्थी बनने के बारे में बिल्कुल अलग और उल्टी तसवीर पेश करती हैं और इस पूरे मामले में यह सरकारें अपनी ज़िम्मेदारी स्वीकार करने के लिए कदापि तैयार नहीं है। यही कारण है कि सीरिया के बारे में उनकी नीतियों में कोई बदलाव भी नहीं आ रहा है। यह सरकारें सीरियाई शरणार्थियों को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरे के रूप में देखती हैं और उनके लगता है कि इस समस्या से निपटने का यही रास्ता है कि शरणार्थियों के लिए सीमाएं बंद कर दी जाएं और जो शरणार्थी देश में आ गए हैं उन्हे बाहर निकाला जाए।

यूरोप में कुछ आतंकी घटनाएं हुईं और नस्ल परस्ती पर आधारित कुछ हमले हुए जिसे आधार बनाकर यूरोपीय सरकारों ने शरणार्थियों के संबंध में कठोर रवैया अपनाना शुरू कर दिया। यूरोप में सीरियाई शरणार्थियों को बुरी तरह भेंट चढ़ाया गया है। वह यूरोपीय सरकारों के झूठे वादों की भेंट चढ़े हैं जिन्होंने सीरिया में लोकतंत्र और मानवाधिकार के नाम पर संकट पैदा किया। शरणार्थियों की इस लहर से यूरोपीय सरकारों के इन दावों की हक़ीक़त भी सबके सामने आ गई कि वह अपनी सीमाओं के भीतर मानवाधिकारों का बड़ा ख्याल रखती हैं। वैसे वह अपनी सीमाओं के भीतर तो मानवाधिकार के नाम पर कुछ क़दम उठाती भी हैं लेकिन सीमाओं से बाहर उनकी नज़र में महत्व केवल उनके स्वार्थों और हितों को ही होता है। वह अपने यह स्वार्थ पूरे करने के लिए कोई भी रास्ता अपनाने में नहीं हिचकिचातीं। सऊदी अरब जो सीरिया इराक़ तथा अन्य कई देशों में जहां संकट फैला हुआ है तकफ़ीरी आतंकी संगठनों का खुला हुआ समर्थक है लेकिन इसी सऊदी अरब से यूरोपीय सरकारों के क़रीबी संबंध हैं। यह लोकतंत्र और मानवाधिकार के संबंध में यूरोपीय सरकारों के दोहरे रवैए का खुला उदहारण हैं।

यूरोपीय सरकारें सीरियाई शरणार्थियों के बारे में अपनी कोई भी ज़िम्मेदारी स्वीकार नहीं करना चाहतीं। यह सरकारें शरणार्थियों को अपने देश से बाहर निकालने तथा उन्हें प्रवेश से रोकने के लिए कठोर कार्यवाही करने हेतु बहाने की तलाश में हैं। वह इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए हर रास्ता आज़मा रही हैं चाहे उन्हें मानवीय निमयों और मानवाधिकार के घोषणापत्र का उल्लंघन ही क्यों न करना पड़े। शरणार्थियों पर होने वाले नस्ल भेदी हमलों और उनके साथ भेदभावपूर्ण बर्ताव की घटनाओं के बारे में यूरोपीय सरकारों की ढिलाई इसी तरह शरणार्थी बच्चों और महिलाओं के यौन शोषण की घटनाओं पर यूरोपीय सरकारों की तटस्थता यह बताती है कि यह सरकारें शरणार्थियों के लिए माहौल को असुरक्षित बना देना चाहती हैं ताकि शरणार्थी यूरोपीय देशों की ओर जाने के बारे में सोचना छोड़ दें।