Dec ३१, २०१६ १२:२४ Asia/Kolkata

आज़ादी, फ़ैसला करने और चयन करने का अधिकार, इंसान के सम्मान की बुनियाद है।

इस पर धार्मिक शिक्षाओं में भी बल दिया गया है। पैग़म्बरे इस्लाम फ़रमाते हैं, ईश्वर के निकट इंसान से अधिक कोई चीज़ सम्मानीय नहीं है। पैग़म्बरे इस्लाम से पूछा गया, यहां तक कि फ़रिश्ते भी, उन्होंने जवाब दिया हां, इसलिए कि सूर्य और चंद्रमा की भांति मजबूर हैं, लेकिन इंसान को अधिकार देकर पैदा किया गया है।

चयन और निर्णय के अधिकार के अलावा, इंसान चिंतन मनन की क्षमता रखता है, स्वाधीन रूप से वह अच्छे और बुरे, सही और ग़लत में अंतर करने की योग्यता रखता है। इंसान अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करके अपनी जीवन शैली का निर्धारण कर सकता है। यहां तक कि इंसान दूसरों के लिए नियम बना सकता है, ताकि सब एक दूसरे का सम्मान करें।

सूरए इसरा की 70वीं आयत कहती है, हमने इंसान को सम्मान प्रदान किया है, इसकी व्याख्या में विद्वानों का कहना है कि इससे तात्पर्य यह है कि ईश्वर ने इंसान को बुद्धि प्रदान की है ताकि वह सोच समझ सके, बोलने की क्षमता प्रदान की है और अच्छे और बुरे में अतंर करने की योग्यता दी है।

हालांकि इंसान के इस सम्मान का अर्थ यह नहीं है कि उसे आज़ादी, फ़ैसला लेने और चयन का अधिकार है और वह सोचने समझने की शक्ति रखता है, बल्कि उसका कारण यह है कि उसकी रचना करते समय ख़ुद ईश्वर ने अपनी रूह उसमें फूंकी है। यही कारण है कि ईश्वर ने उसकी रचना के बाद ख़ुद को सबसे अच्छा रचनाकार बताया था। वास्तव में इंसान ईश्वरीय नामों और विशेषताओं का प्रतिबिंब है। इंसान आध्यात्मिक प्रवृत्ति द्वारा ब्रह्माण्ड से जुड़ा हुआ है। इस प्रकार वह ईश्वरीय विशेषताओं का सर्वश्रेष्ठ जलवा है।

ईसाईयत और यहूदीयत समेत अन्य ईश्वरीय धर्मों की शिक्षाओं में भी इंसान को ईश्वर का प्रतिबिंब क़रार दिया गया है। इस सम्मान का कारण यह है कि इंसान, ईश्वर का उत्तराधिकारी है। ईश्वर ने इंसान को सच्चाई और सृष्टि के रहस्यों को समझने के लिए उसकी व्यक्तिगत योग्यताओं के दृष्टिगत, अपना उत्तराधिकारी बनाया है।

इसलिए सोचने और समझने तथा आज़ादी, चयन और निर्णय के अधिकार के दृष्टिगत, समस्त इंसान इस प्रतिष्ठा में भागीदार हैं और यह सबके लिए समान है। यह प्रतिष्ठा प्राकृतिक है, जिसे इंसानियत से जुदा नहीं किया जा सकता। अर्थात इंसानियत की कल्पना उसके बिना संभव नहीं है। जबतक वह एक इंसान है, वह इस प्रतिष्ठा का मालिक है।

इस्लामी मानवाधिकार घोषणापत्र में इंसान की प्रतिष्ठा, सम्मान और हस्ती पर बल दिया गया है। इस घोषणापत्र की प्रस्तावना में उल्लेख किया गया है कि इंसान का सम्मान और प्रतिष्ठा ईश्वरीय वरदान है, ईश्वर ने इंसान को सर्वश्रेष्ठ बनाया है, उसे सम्मान प्रदान किया है, उसे धरती पर अपना उत्तराधिकारी बनाया है, उसे अपनी अमानत सौंपी है और जो कुछ ज़मीन और आसमान में है, वह सब उसके निंयत्रण में है। घोषणा पत्र के पहले अनुच्छेद में समस्त इंसानों को प्रतिष्ठा में समान माना गया है और उसके चौथे अनुच्छेद में प्रत्येक व्यक्ति के सम्मान पर बल दिया गया है और उल्लेख किया गया है कि पुरुष और महिलाएं इंसानी प्रतिष्ठा में एक समान हैं। 11वें अनुच्छेद में इंसान की आज़ादी पर ध्यान दिया गया है और कहा गया है कि किसी को भी ग़ुलाम बनाने, अपमान करने, प्रताड़ित करने और शोषण करने का अधिकार नहीं है।

जन्मजात प्रतिष्ठा, ऐसा सम्मान है कि जो इंसान को इंसान होने की हैसियत से प्राप्त है। इस प्रतिष्ठा, का विश्वास, जाति, धर्म और प्रकार की चीज़ों से कोई संबंध नहीं है। यहां तक कि अपराध करने और अत्याचार करने वाले इंसान से भी इसे नहीं छीना जा सकता। इसलिए कि इंसान का कर्म उसकी वास्तविकता से अलग है। वास्तव में जिस चीज़ की निंदा होनी चाहिए वह कर्म है, जिसे इंसान अंजाम देता है। इसलिए क़ुराने मजीद की जिन आयतों में काफ़िरों या कुछ लोगों को बुद्धि का सही प्रयोग न करने और चिंतन मनन न करने के कारण जानवरों से उपमा दी गई है, इसका अर्थ मानवीय प्रतिष्ठा का नष्ट होना नहीं है। यह मिसाल केवल इसलिए दी गई है, क्योंकि इंसान ने अपनी मानवीय प्रतिष्ठा को जानवरों वाली विशेषताओं के निंयत्रण में दे दिया है और केवल सोने, खाने-पीने और आंतरिक उच्छाओं में व्यस्त हो गया है और मानवीय जीवन से उसका कोई लेना देना नहीं रहा। वास्तव में इन आयतों से पता चलता है कि इस प्रकार के इंसान जीवन के विकास में वनस्पतियों और जानवरों के विकास से आगे नहीं बढ़े हैं।

हालांकि जानवरों का जीवन भी मूल्यवान है। लेकिन जानवरों का जीवन इंसान के जीवन के स्तर तक नहीं पहुंचता, बल्कि उसका स्तर इंसानी जीवन से कम है। इंसान अपनी प्रतिभाओं का इस्तेमाल करके अपनी आत्मा की शुद्धि कर सकता है और मानवीय स्तर पर पहुंच सकता है। इसलिए कि संसार की रचना का उद्देश्य, इंसानी विकास है। अब अगर इंसान केवल जानवरों वाले जीवन पर ही ख़ुश हो जाएगा, तो निश्चित रूप से उसकी निंदा की जाएगी। यही कारण है कि इस्लाम, इंसान के लिए एक अन्य प्रकार के सम्मान को विशेष करता है और वह सम्मान कोशिश द्वारा प्राप्त करने वाला नहीं है। यह वही प्रतिष्ठा या सम्मान है, जो पश्चिमी विद्वानों और विचारकों की नज़र से ओझल रहा है।

इस्लाम, जन्मजात प्रतिष्ठा के अलावा, इंसान के लिए एक अन्य प्रकार की प्रतिष्ठा का उल्लेख करता है। वह ऐसा सम्मान है, जिसे प्रयास करके प्राप्त किया जा सकता है। यही प्रतिष्ठा इंसान का अंतिम उद्देश्य है।

प्राप्त की जाने वाली प्रतिष्ठा, ऐसी प्रतिष्ठा है जिसे इंसान अपनी क्षमताओं का प्रयोग करके हासिल करता है। दूसरे शब्दों में यद्यपि सभी गौरव और सम्मान में समान हैं, लेकिन इंसान अपनी योग्यताओं का प्रयोग करके इंसानी उत्कृष्टता को प्राप्त कर सकता है और सर्वश्रेष्ठ स्तर पर पहुंच सकता है। इस प्रकार, इंसान नैतिकता एवं उत्कृष्टता तक पहुंचने के लिए जितना प्रयास करेगा, वह दूसरों की तुलना में अधिक उत्कृष्टता प्राप्त करेगा। यह किस प्रकार से संभव है कि भले और बुरे इंसान एक समान हों। क्या अपराधी और अत्याचारी उन लोगों के समान हैं, जो शांति के लिए प्रयास करते हैं और मानवता की सेवा करते हैं।

धार्मिक शिक्षाओं के मुताबिक़, इस प्रकार की प्रतिष्ठा का सबसे महत्वपूर्ण मापदंड ईमान और तक़वा है। इस संदर्भ में क़ुरान के सूरए होजरात की 13वीं आयत में उल्लेख है कि हे लोगो, हमने तुम्हें एक महिला और पुरुष से पैदा किया और तुम्हें क़बीलों और समुदायों में बांट दिया, ताकि एक दूसरे को पहचान सको। ईश्वर के निकट तुम में से सबसे अधिक सम्माननीय वह है जो सबसे अधिक ईमान वाला है। ईश्वर बुद्धिमान और जानकार है।

इस आयत में चिंतन मनन करने से कुछ बिंदु प्राप्त होते हैं, पहले यह कि जाति, भाषा और लिंग का इंसानी प्रतिष्ठा से कोई लेना देना नहीं हैं। इसलिए कि समस्त इंसान, इंसान होने की हैसियत से सम्माननीय हैं और इसकी सामाजिक अधिकारों में कोई भूमिका नहीं है। सामाजिक अधिकारों में समस्त इंसानों को इस प्रकार के अधिकार प्राप्त हैं। दूसरे यह कि जो प्रतिष्ठा प्राप्त की जाती है, वह प्रलय के दिन ईश्वर के निकट दूसरों पर वरीयता प्राप्त करने का मापदंड बन सकती है। हालांकि इस दुनिया में भी अच्छे और भले लोगों की प्रशंसा की जाती है। लेकिन उनका मूल स्थान एवं सम्मान प्रलय के दिन ईश्वर के निकट होगा।

इस्लामी और पश्चिमी मानवाधिकारों के बीच एक बुनियादी अंतर जन्मजात सम्मान को प्राप्त होने वाले सम्मान से अलग करना है। पश्चिमी दृष्टिकोण में मानव प्रतिष्ठा एवं सम्मान को समस्त मानवाधिकारों से संबंधित माना जाता है, लेकिन दुर्भाग्यवश इसमें दोनों प्रतिष्ठाओं के बीच कोई अंतर नहीं रखा गया है। इंसान की इस प्रतिष्ठता की उपेक्षा के कारण, वहां लोग नैतिकता एवं अध्यात्म से दूर हो रहे हैं।

जन्मजात सम्मान से इंसान को विशेष अधिकार एवं ज़िम्मेदारियां प्राप्त होती है, लेकिन केवल इसके आधार पर इंसान उत्कृष्टता हासिल नहीं कर सकता। इसलिए कि प्राप्त की जाने वाले प्रतिष्ठा वह इंसानी गौरव है, जो अपने और दूसरों के अधिकारों का सम्मान करने और ज़िम्मेदारियां पूरी करने से प्राप्त होते हैं।

हालांकि इसका उद्देश्य भौतिक एवं व्यक्तिगत उद्देश्यों को प्राप्त करना नहीं है, बल्कि इंसानी विवेक की गहराईयों तक पहुंचना है। ईश्वर ने इसी इंसानी विवेक को इंसानों को अमानत स्वरूप प्रदान किया है, ताकि वे आध्यात्मिक विकास कर सकें। इंसान को चाहिए कि इस प्रतिष्ठा को प्राप्त करने के लिए वह हमेशा व्यक्तिगत एवं सामाजिक ज़िम्मेदारियां पूरी करता रहे और लगातार सुधार के मार्ग पर अग्रसर रहे।