Dec ३१, २०१६ १२:३६ Asia/Kolkata

आज़ादी, इंसानी मूल्यों में से एक महत्वपूर्ण मूल्य है, जिसे हर कोई पसंद करता है।

आज़ादी के कारण ही विचार प्रगति करते हैं और प्रतिभाएं फलती फूलती हैं। यही कारण है कि अनेक विद्वानों और मतों ने इस बारे में अपने विचार रखे हैं। आज पश्चिमी सरकारें आज़ादी की रक्षा का दावा करती हैं। पश्चिमी शासकों और विचारकों का मानना है कि व्यक्तिगत एवं सामाजिक आज़ादी का विषय सबसे पहले यूरोप में पेश किया गया। पश्चिमी दार्शनिकों ने पहली बार 18वीं शताब्दी में आज़ादी के बारे में अपने विचार रखे और इस संबंध में किताबें लिखीं। वही विचार और नियम विश्व मानवाधिकार घोषणा पत्र का आधार बने, जो आज इस संदर्भ में सबसे अहम दस्तावेज़ माना जाता है।

हालांकि यह कहा जा सकता है कि इस विषय के बारे में पश्चिमी दार्शनिकों एवं विद्वानों के विचार रखने से सदियों पहले ईश्वरीय धर्मों ने इस पर विशेष ध्यान दिया था। यहां ध्यान योग्य बिंदु यह है कि 18वीं शताब्दी के अंत में फ़्रांस और उसके बाद पश्चिमी जगत में पेश किया जाने वाला आज़ादी का विषय, ईश्वरीय धर्मों में पेश किए गए विषय से काफ़ी सीमित था एवं कम महत्व रखता था।

ईश्वरीय धर्मों ने लोगों के लिए आज़ादी को काफ़ी महत्व दिया है और ईश्वरीय दूतों ने सबसे पहले इंसान की आज़ादी के लिए आवाज़ उठाई है। वास्तव में समस्त ईश्वरीय दूतों का सबसे पहला संदेश यह था कि ईश्वर के आदेशों का पालन करो और अत्याचारियों का पालन मत करो जो लोगों को अपना दास बनाते हैं।

उदाहरण स्वरूप, क़ुरान के सूरए नहल की 36वीं आयत में उल्लेख है, हमने हर समुदाय में एक दूत भेजा जो कहता है, एक ईश्वर की इबादत करो और अत्याचारी से दूरी बनाकर रखो। इस संदर्भ में हज़रत मूसा ने अपने आंदोलन के शुरू में एकेश्वरवाद के आहवान के बाद आज़ादी का संदेश दिया। यह आहवान मिस्र और उसके आर्थिक स्रोतों की आज़ादी के लिए नहीं था, बल्कि उसका उद्देश्य मिस्री जनता को तानाशाह के चंगुल से आज़ाद कराना था। इसलिए कि जब लोग आज़ाद हो जाते हैं तो उनका देश और उसके स्रोत भी आज़ाद हो जाते हैं। क़ुरान हज़रत मूसा की आज़ादी के आहवान की ओर संकेत करता है, हे तानाशाहों, ईश्वर के बंदों को मुझे सौंप दो, इसलिए कि मैं तुम्हारे लिए शांति का दूत हूं। फ़िरऔन और उसके साथियों का जवाब था कि हम उन लोगों के सामने नहीं झुकेंगे, जो ख़ुद हमारे बंदे हैं।

स्पष्ट है कि फ़िरऔन के कहने का मतलब यह नहीं था कि उसने इन लोगों को पैदा किया है। फ़िरऔन दावा करता था कि मैं तुम्हारा सर्वश्रेष्ठ पालनहार हूं। उसके इस दावे का मतलब यह था कि लोगों का जीवन उसके हाथ में है और उनके जीवन के नियम वह तय करेगा। फ़िरऔन और उसके अनुयाई मूर्ति पूजा करते थे और मूर्तियों को अपना ईश्वर मानते थे। इसीलिए फ़िरऔन के अनुयाई उससे कहते थे, क्या मूसा और उनके साथियों को इस बात की अनुमति दोगे कि वे तुम्हें और तुम्हारे भगवानों की उपेक्षा करें। यही कारण है कि हज़रत मूसा फ़िरऔन के इस दावे के सामने डट गए और लोगों को इस ग़ुलामी से मुक्ति दिलाने का आग्रह किया। वास्तव में हज़रत मूसा (अ) का कहना यह था कि एक ईश्वर के अलावा किसी अन्य की इबादत और आदेश का पालन सही नहीं है और समस्त इंसानों को ग़ुलामी की इस ज़ंजीर से आज़ाद होना चाहिए और उन्हें इंसान और उसके बनाए गए नियमों में नहीं बंधना चाहिए।

इस्लामी संस्कृति में आज़ादी का आधार, एकेश्वरवाद पर है। इसीलिए क़ुरान में विभिन्न स्थानों पर उल्लेख है कि ईश्वरीय दूतों ने एक ईश्वर की इबादत का आहवान किया है। एकेश्वरवाद की वास्तविकता यह है कि ईश्वर के अलावा किसी और की बंदगी न की जाए, अर्थात हर धर्म और हर ईश्वरीय दूत द्वारा एकेश्वरवाद के आहवान का अर्थ है कि इंसान को ईश्वर के अलावा किसी और के सामने सिर नहीं झुकाना चाहिए, अब वह कोई व्यक्ति हो, जैसे कि फ़िरऔन और नमरूद, या कोई शासन हो, या कोई चीज़, रीति रिवाज या इंसान की इच्छाएं।

क़ुरान सूरए आले इमरान की 64वीं आयत में ईश्वरीय धर्मों के अनुयाईयों को संबोधित करते हुए कहता है कि कह दो किताब के मानने वालों से कि आओ उस बात की ओर कि जो हमारे और तुम्हारे बीच समान है, कि एक ईश्वर के अलावा किसी और की इबादत न करें और किसी को भी उसके समान न बताएं, और हममें से कुछ लोगों को कुछ अन्य लोगों को अपना ईश्वर स्वीकार नहीं करना चाहिए।

यह ऐसी वास्तविकता है कि जो यहूदी, ईसाई और अन्य ईश्वरीय धर्मों में मौजूद रही है। इस्लाम एकेश्वरवाद का ध्वजवाहक होने के रूप में बल देता है कि आज़ाद इंसान को अपने ईश्वर के अलावा किसी और का बंदा या ग़ुलाम नहीं होना चाहिए। दूसरे शब्दों में इच्छा, कामुकता, अंहकार, अज्ञानता के काल के रीति रिवाज, धन, स्थान और किसी भी अन्य चीज़ को इबादत में ईश्वर का साझीदार नहीं बनाना चाहिए। अर्थात किसी भी इंसान का ईश्वर के अलावा कोई और स्वामी नहीं होना चाहिए। यह इस्लाम का वैश्विक नारा है।

इस्लाम, इंसान को काफ़ी अधिक महत्व देता है और उसे ईश्वर के अलावा किसी और का बंदा नहीं मानता है। इस्लाम में आज़ादी का अर्थ भी यही है कि इंसान ईश्वर के अलावा हर चीज़ की बंदगी से आज़ाद हो। इस्लाम में आज़ादी एक ऐसा सुअवसर है, जिसके द्वारा इंसान कल्याण के मार्ग का चयन करता है। इस्लाम आज़ादी का संदेश देता है, इसलिए कि उसने समस्त रुवाकटों को हटाकर, इंसान को मुक्ति और कल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए आज़ाद छोड़ दिया है। इसीलिए इस्लाम में आज़ादी का मतलब, हर प्रकार की क़ैद से आज़ाद होना है। इसलिए कि ऐसा संभव नहीं है कि इंसान या कोई और किसी सीमितता को स्वीकार करते हुए उत्कृष्टता के मार्ग पर अग्रसर हो जाए। आज़ादी का अर्थ है, इन रुकावटों से आज़ाद होना जो इंसान की प्रतिभाओं के फलने फूलने और विकास में रुकावट बनें। इंसान में वैचारिक, शारीरिक और आध्यात्मकि दृष्टि से ऐसी प्राकृतिक प्रतिभाएं हैं, जिनका फलना फूलना ज़रूरी है। दूसरे लोगों को इन प्रतिभाओं के विकास में रुकावट नहीं बनना चाहिए। इसलिए आज़ादी का मतलब है, रुकावटों और अड़चनों से आज़ादी।

ईश्वर सूरए आराफ़ की 157वीं आयत में पैग़म्बरे इस्लाम की ज़िम्मेदारी और इस्लाम के परिणाम की ओर संकेत करते हुए कहता है कि पैग़म्बरे इस्लाम ने लोगों को इस्लाम की ओर बुलाकर, इंसान के पैरों से वह ज़ंजीरें खोल दी हैं, जो उसके विकास और उत्कृष्टता तक पहुंचने के मार्ग में रुकावट थीं।

यही कारण है कि इस्लाम की दृष्टि में रंग, जाति, लिंग और इसी प्रकार की अन्य विशिष्टताएं एक इंसान के दूसरे पर वरीयता प्राप्त करने का कारण नहीं हैं। इसलिए कि इस्लाम समस्त इंसानों को आज़ाद मानता है। फ्रांसीसी क्रांति के दस्तावेज़ों में बहुत ही महत्वपूर्ण वाक्य का उल्लेख है कि हर इंसान आज़ाद रूप से दुनिया में जन्म लेता है, आज यह दुनिया में हर किसी की ज़बान पर है, यह वही वाक्य है जिसका उल्लेख क़रीब 1400 साल पहले हज़रत अली (अ) ने किया था, हज़रत ने अपने बड़े बेटे इमाम हसन (अ) से कहा था, ईश्वर के अलावा किसी और की ग़ुलामी मत करना, इसलिए कि ईश्वर ने तुम्हें आज़ाद पैदा किया है।

जैसा कि आप देखते हैं, इस आज़ादी के संदेश में ईश्वर के अलावा हर चीज़ से रिहाई पर बल दिया गया है। यही कारण है कि हज़रत अली (अ) अपने सम्मान और गौरव का कारण, इसी आज़ादी को क़रार देते हैं और फ़रमाते हैं, हे ईश्वर मेरे लिए यही सम्मान काफ़ी है कि मैं तेरा बंदा हूं और मुझे यह गौरव प्राप्त है कि तू मेरा पालनहार है।

अब हमने यह बात जान ली है कि आज़ादी ईश्वरीय धर्मों के निकट एक मूल अधिकार है, इसलिए ईश्वरीय धर्मों विशेषकर इस्लाम के निकट आज़ादी के मूल नियम और पश्चिमी आज़ादी के बीच के अंतर को भी जान लें। इस्लामी आज़ादी और पश्चिमी आज़ादी के सिद्धांतों एवं उसके परिणामों में अंतर है। पश्चिमी आज़ादी का स्रोत मानवीय इच्छाएं और कामुकता है। वास्तव में पश्चिम में आज़ादी का दर्शन, ह्यूमैनिज़्म है। इंसान की इच्छाएं और रूझान आज़ादी का निर्धारण करते हैं। इस दृष्टिकोण के अनुसार, इंसान को आज़ाद रहना चाहिए जो उसका दिल चाहे वह उसे अंजाम दे सके। हालांकि इस प्रकार की आज़ादी, समाज में कभी व्यवहारिक नहीं हुई है। इसीलिए कोई भी असीमित आज़ादी का समर्थन नहीं करता है और इस प्रकार की आज़ादी संभव भी नहीं है।

अगर मान लें कि मानव समाज में एक इंसान इस प्रकार से आज़ाद हो कि जो उसका दिल चाहे वह करे और उसके मार्ग में कोई रुकावट न हो, तो यह आज़ादी कई दूसरे लोगों की आज़ादी को सीमित कर देगी और उन लोगों की शांति को भंग कर देगी और उनका सुख चैन छीन लेगी। यहां तक कि 19वीं और 20वीं शताब्दी में यूरोप में हर प्रकार के सामाजिक बंधनों से आज़ादी का नारा देने वाले अराजकतावादी कुछ सीमितताओं को मानते थे और उनका पालन करते थे।