अमीर अली शीरनवाई
तैमूरी शासन श्रृंखला का काल ईरान में शासन करने वाली शासन श्रृंखलाओं का स्वर्णिम काल माना जाता है।
इस काल में तैमूरी शासकों की तनाव कम करने की नीति के परिणाम स्वरूप सीमाओं पर और राजधानी में अपेक्षाकृत शांति स्थापित थी जिसके चलते सांस्कृतिक क्षेत्र ने काफ़ी प्रगति की। तैमूरी शासकों की ओर से कला व संस्कृति के भरपूर समर्थन के कारण ईरान की संस्कृति व सभ्यता के इतिहास में एक स्वर्णिम चरण अस्तित्व में आया। तैमूरी श्रृंखला के प्रमुख अमीर तैमूर गोरकानी के मरने के बाद उसके वंश के शासकों ने तलवारों को न्याम में रख दिया और उसके विजयों से प्राप्त होने वाले अपार धन के एक बड़े भाग को अपने दरबारों में कला व संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए ख़र्च किया। उनकी इस नीति के चलते अनेक प्रतिष्ठित कलाकार और विद्वान सामने आए और तैमूरी शासकों ने स्वयं भी कला के क्षेत्र में क़दम रखा।
इस काल की एक अहम विशेषता कला व संस्कृति के क्षेत्र की उन बेजोड़ हस्तियों का अस्तित्व है जिन्होंने शासकों के दरबार में उपस्थित हो कर संस्कृति के उत्थान के मार्ग पर क़दम बढ़ाया। इस तरह उन्होंने तैमूरी शासकों के दरबारों को भी रौनक़ प्रदान की और अपने गतिविधियों और अवशेषों से बाद के चरणों को भी प्रभावित किया। इन्हीं में से एक सुलतान हुसैन बाइक़ुरा के विद्वान व कलाप्रेमी मंत्री अमीर अली शीरनवाई थे जिन्होंने विभिन्न शैलियों से अपने काल की कला व संस्कृति पर प्रभाव डाला और अपने युक्तिपूर्ण संचालन से इस प्रक्रिया को चरम पर पहुंचा दिया। उन्होंने इसी तरह तैमूरियों के शासन के अंतिम काल के सामाजिक व सांस्कृतिक मैदानों को भी अपने सशक्ति व्यक्तित्व से प्रभावित किया।
अमीर निज़ामुद्दीन अली शीरनवाई ने 17 रमज़ान वर्ष 844 हिजरी क़मरी को शाहरुख़ मिर्ज़ा के शासनकाल में हेरात में इस संसार में आंखें खोलीं। कुछ लोगों ने कहा है कि उनका जन्म माज़न्दरान में हुआ। नवाई परिवार, अपने समय में लोगों के बीच सम्मानित व पढ़े-लिखे परिवारों में से एक थ। दौलतशाह समरक़ंदी ने अपनी किताब में अमीर अली शीरनवाई के पिता को उस समय के अत्यंत विख्यात लोगों में से एक बताया है। अमीर अली शीरनवाई के पिता के घर में विद्वानों व प्रतिष्ठित लोगों की बैठकें हुआ करती थीं और अमीर अली शीरनवाई बचपन से ही विद्वानों और धर्मगुरुओं से परिचित हो गए थे। यह माहौल उनकी प्रगति और विकास में काफ़ी प्रभावी रहा। अमीर अली शीर बचपन से शैख़ गोरकान के दरबार के बच्चों के साथ खेला करते थे और उन्हीं के साथ मदरसे जाते थे। उन्हीं में से एक हुसैन बाइक़ुरा थे। ख़ुन्दमीर ने मकारिमुल अख़लाक़ नामक अपनी किताब में इस बात की ओर संकेत करते हुए लिखा है कि जब अमीर अली शीरनवाई की आयु चार साल की हुई तो उन्होंने मदरसे जाना शुरू कर दिया और इस प्रकार उनकी पढ़ाई आरंभ हो गई। थोड़े ही समय में उन्होंने अपने साथ के सभी बच्चों को पीछे छोड़ दिया। अमीर अली शीरनवाई बचपन से ही असाधारण योग्यता के स्वामी थे और उन्होंने क़ुरआन याद करने और आरंभिक शिक्षा के सभी चरणों को तेज़ी से पूरा कर लिया। वे छः ही साल के थे कि वर्ष 850 हिजरी क़मरी में तैमूरी शासक शाहरुख़ मिर्ज़ा के निधन के बाद ख़ुरासान के क्षेत्र में अराजकता फैल गई और उनके परिवार ने हेरात छोड़ दिया। हेरात से निकलने की यात्रा के दौरान ही अमीर अली शीर की मुलाक़ात ज़फ़रनामा नामक किताब के लेखक और प्रख्यात इतिहासकार शरफ़ुद्दीन अली यज़्दी से हुई।
वर्ष 853 हिजरी क़मरी में हेरात के सिंहासन पर अबुलक़ासिम बाबर के बैठने के बाद अमीर अली शीरनवाई का परिवार हेरात वापस लौट आया लेकिन वह बहुत अधिक दिनों तक वहां रह नहीं पाया और अली शीर अभी 17 साल के थे कि बाबर का निधन हो गया और अबू सईद तथा हुसैन बाइक़ुरा के बीच सत्ता के लिए युद्ध आरंभ हो गया। इस युद्ध में अबू सईद को विजय प्राप्त हुई। हेरात पर अबू सईद का शासन आरंभ होने के साथ ही अमीर अली शीरनवाई के परिवार के दर-दर भटकने का काल शुरू हो गया क्योंकि अबू सईद तथा हुसैन बाइक़ुरा के बीच सत्ता के युद्ध में उनके परिवार ने हुसैन बाइक़ुरा से अपने पुराने संबंधों के चलते उसका साथ दिया था। अली शीरनवाई पहले मशहद गए और फिर वहां से समरक़ंद चले गए। इसके बाद उनकी शिक्षा का कठिन दौर और दरिद्रता व बीमारी का काल शुरू हुआ। उन्होंने महशहद में मुहम्मद ख़िज़्र शाह और शैख़ कमाल तुरबती जैसे कवियों व विद्वानों से मुलाक़ात की और उनसे शिक्षा ग्रहण की। मशहद में कुछ समय रहने के बाद अली शीरनवाई ने हेरात लौटने का फ़ैसला किया। हेरात में कुछ समय तक वे सुलतान अबू सईद के दरबार में रहे लेकिन थोड़े ही समय बाद हेरात की स्थिति देख कर निराश हो गए और समरक़ंद चले गए। समरक़ंद में उन्होंने ख़ाजा अबुल्लैसी की ख़ानक़ाह में अपने जीवन का बहुत कठिन समय बिताया। वहां पर उनके निवास के दौरान आस-पास के कवि, विद्वान और प्रतिष्ठित लोग आया करते थे और उनसे ज्ञान अर्जित किया करते थे।
अमीर अली शीरनवाई ने समरक़ंद में अपने निवास के दौरान अपनी शिक्षा पूरी की। उन्होंने ख़ाजा अबुल्लैसी से धर्मज्ञान सीखा, शायरी का ज्ञान दरवेश मंसूर सब्ज़वारी से प्राप्त किया और क़ुरआन की क़िराअत मौलाना हाफ़िज़ अली जामी से सीखी। अमीर अली शीरनवाई को आर्थिक कठिनाई के इन बरसों में समरक़ंद के एक प्रतिष्ठित व्यक्ति दरवेश मुहम्मद तरख़ान और समरक़ंद के शासक अहमद हाजी बेग का समर्थन प्राप्त रहा। संस्कृति के क्षेत्र में उनकी प्रगति के साथ ही उनका प्रकाशमयी राजनैतिक जीवन भी आरंभ हुआ और इसके साथ ही उनकी कठिनाइयों का दौर समाप्त हुआ। वर्ष 873 हिजरी क़मरी में ओज़ून हसन क़वीयोनलू के हाथों आज़रबाइजान में अबू सईद की हत्या के बाद सुलतान हुसैन मिर्ज़ा हेरात की गद्दी पर बैठे। सुलतान ने अमीर अली शीरनवाई से जो वादे किए थे उन्हें पूरा करते हुए उन्होंने अली शीर को समरक़ंद से हेरात बुलाया। जब ये दोनों मदरसे में पढ़ते थे तो दोनों ने एक दूसरे को वचन दिया था कि जिसे भी सत्ता प्राप्त होगी वह दूसरे की स्थिति से निश्चेत नहीं रहेगा। इसी लिए जब हुसैन मिर्ज़ा को सत्ता प्राप्त हुई तो उन्होंने वचन निभाते हुए अपने बचपन के मित्र अमीर अली शीरनवाई को अपने पास बुला लिया।
सुलतान हुसैन बाइक़ुरा के दरबार में अमीर अली शीरनवाई की स्थिति तेज़ी से मज़बूत होती चली गई और उनके युक्तिपूर्ण परामर्शों से सुलतान का शासन हेरात में सुदृढ़ हुआ और उनके न्यायपूर्ण शासन में हेरात के लोगों को अत्याचारों से मुक्ति मिल गई। सुलतान हुसैन ने आरंभ में अमीर अली शीरनवाई को मोहरदारी का पद दिया जो योग्य व विश्वस्त लोगों को ही दिया जाता था लेकिन उन्होंने यह पद स्वीकार नहीं किया जिसके चलते शैख़ अहमद सुहैली को यह पद दिया गया। फिर वर्ष 876 हिजरी में सुलतान हुसैन बाइक़ुरा ने दीवाने आला या मुख्य मंत्री के पद पर उन्हें मनोनीत किया। अमीर अली शीरनवाई ने आरंभ में यह पद भी स्वीकार करने से इन्कार किया लेकिन सुलतान के आग्रह पर अंततः उन्होंने पद स्वीकार कर लिया।
अमीर अली शीर एक योग्य व चतुर मंत्री के रूप में उभरे और सुलतान हुसैन की अनुपस्थिति में वे हेरात के मामलों का संचालन भली भांति करते थे। उन्होंने हेरात के लोगों की बहुत सेवा की और राजनैतिक व सामाजिक मामलों में काफ़ी सुधार किए। वे हमेशा अपने पद को लोगों को न्याय दिलाने के लिए प्रयोग करते थे और इस बात का बड़ा ध्यान रखते थे कि उनकी ओर से लोगों पर कोई अत्याचार न होने पाए। अपनी किताब मजालिसुन्नफ़ायेस में अमीर अली शीर से बात पर बल देते हैं कि मेरे पास सम्मानीय व दुष्ट, सिपाही व आम नागरिक और राजनितिज्ञ व दरिद्र अपने काम के लिए आया करते थे और मैं उनका काम करने की कोशिश करता था लेकिन मैंने कभी किसी से बदला नहीं चाहा और किसी का ऋणी नहीं रहा हालांकि इस मार्ग में मुझे काफ़ी कठिनाइयां सहन करनी पड़ीं।
अमीर अली शीरनवाई के प्रतिद्वंद्वि, शत्रु और दरबारी उन्हें अपनी सत्तालोलुपता के मार्ग में बाधा समझते थे और सुलतान से निरंतर उनकी शिकायतें करते रहते थे। यही कारण था कि तंग आकर उन्होंने मंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया।