Jan ०३, २०१७ ११:१५ Asia/Kolkata

1761, पानीपत की तीसरी लड़ाई में अफ़ग़ान शासक अहमद शाह अब्दाली ने मराठों को पराजित किया।

1789, अमरीकी जनता ने जॉर्ज वाशिंगटन को देश का पहला राष्ट्रपति चुनने के लिए मतदान किया।

1859, अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ सशस्त्र आंदोलन में शामिल होने के आरोप में मुग़ल सम्राट बहादुरशाह ज़फ़र (द्वितीय) के खिलाफ़ मुक़दमा शुरू किया गया।

1927, अटलांटिक पार दूरभाष संपर्क शुरू। लंदन और न्यूयार्क इस सेवा से जुड़े।

1953, अमरीकी राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन ने हाइड्रोजन बम बनाने की घोषणा की।

1959, अमरीका ने क्यूबा में फिदेल कास्त्रो की नई सरकार को मान्यता प्रदान की।

1980, भारी बहुमत के साथ भारत की पूर्व प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी हुई।

1990, इटली में पीसा की झुकी मीनार को आम जनता के लिए ख़तरनाक मानकर बंद किया गया। लगभग 800 वर्षों के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ।

1999, अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के विरुद्ध महाभियोग की कार्रवाही शुरू।

2008, भारत और मलेशिया वायुसेना के पायलटों और युद्धपोतों के कर्मियों के प्रशिक्षण समेत रक्षा क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर सहमत हुए।

2015, पेरिस में व्यंग्य पत्रिका ‘चार्ली आब्दो’के कार्यालय में दो बंदूकधारियों की गोलीबारी में 12 लोगों की मौत हो गई।

2015, यमन की राजधानी सना में एक कैडिट कॉलेज के बाहर हुए कार बम धमाके में 38 लोगों की मौत हो गई और 63 से अधिक घायल हो गए।

 

7 जनवरी सन 1979 ईसवी को वियतनाम की सेना द्वारा कम्बोडिया पर आक्रमण के बाद इस देश के तानाशाह पोलपोट भाग निकले और हंग सामरीन के नेतृत्व में नयी सरकार सत्ता में आयी। पोल पोट कम्बोडिया में ऐसे गुट के नेता थे जो माओवादी और चीन के समर्थक थे। पोलपोट की सरकार हिंसात्मक कार्रवाइयों के सहारे लोगों को नगरों से गांवों की ओर पलायन करने पर विवश करती। इस सरकार ने बहुत से सांस्कृतिक चिन्हों को मिटा दिया और जनता पर बड़े अत्याचार किये।

कम्बोडिया पर पोलपोट के तीन वर्ष से भी कम अवधि के शासन के दौरान इस देश में 15 से 20 लाख लोग मारे गये जिनमें वियतनामी मूल के लोग मुख्य रुप से शामिल थे। वियतनामी सेना ने इसी बात को बहाना बनाकर पोलपोट का तख़्ता उलट दिया किंतु इसके बावजूद पोलपोट के समर्थक गुट ने देश के कुछ भागों में केंद्रीय सरकार के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा। अंतत: वर्ष 1983 में वियतनाम की सेना सामरीन की सरकार की स्थिति की ओर से आश्वस्त होने तथा अंतर्राष्ट्रीय दबावों के कारण कम्बोडिया से निकली। इस सेना को पूर्व सोवियत संघ का समर्थन प्राप्त था।

 

7 जनवरी सन 1986 ईसवी को मिस्र के सीना मरुस्थल की जेल में इस देश के सीमा सुरक्षा बल के जवान सुलैमान ख़ातिर की हत्या कर दी गयी। उन्होंने वर्ष 1985 ईसवी में मिस्र और ज़ायोनी शासन के बीच होने वाले कैम्पडेविड समझौते पर, जो वस्तुत: जायोनी शासन का एक षडयंत्र था, आपत्ति जताते हुए सीना मरुस्थल में कई ज़ायोनियों को हताहत कर दिया था। मिस्र की सरकार ने उन्हें गिरफ़तार करने के बाद उन पर दिखवाटी मुक़द्दमा चलाया और आजीवन कारावास का दंड दे दिया किंतु कुछ समय बाद सुलैमान ख़ातिर का शव जेल में फांसी पर लटका हुआ पाया गया। मिस्र की सरकार ने दावा किया कि उन्होने आत्महत्या की है। इस सूचना के फैलते ही राजधानी क़ाहेरा और मिस्र के दूसरे नगरों में छात्रों ने विशाल रैली निकाली और मिस्र की सरकार की कार्वाई के प्रति अपने विरोंध की घोषणा की।

 

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17 दैय सन 1314 हिजरी शम्सी को ईरान के अत्याचारी शासक रज़ाख़ान पहलवी ने ईरानी महिलाओं को इस्लामी हिजाब पहनने से रोक दिया। इस आदेश का उद्देश्य इस्लामी मूल्यों का दमन और पश्चिम का अंधा अनुसरण था। तुर्की की यात्रा के बाद रज़ाख़ान ने इस देश के पश्चिमवादी राष्ट्रपति अतातुर्क की देखा-देखी ईरान में भी यह निंदनीय आदेश जारी किया जिसके बाद से पूरे देश में शाह के सुरक्षाकर्मी पर्दे वाली महिलाओं का अनादर करने लगे। शाह के इस क़दम पर ईरान की जनता विशेषकर धर्मगुरुओं ने गहरी आपत्ति जताई।

 

17 दैय सन 1346 हिजरी शम्सी को ईरान के कुश्ती चैम्पियन गुलाम रज़ा तख़्ती को शाह के कारिंदों ने एक षडयंत्र में मार डाला। वे तेहरान में पैदा हुए थे। तख़्ती बहुत ही साहसी तथा सदाचारी व्यक्ति थे। वे चैम्पियन होने के बावजूद बड़े ही विनम्र स्वभाव के स्वामी थे। उन्होंने ओलम्पिक खेलों की प्रतियोगिता में सोने और चॉदी के नौ पदक जीते। उनकी बढ़ती लोकप्रियता और शाह के अत्याचारों के प्रति उनका विरोध उनकी हत्या का कारण बना।

 

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11 जमादिउल अव्वल सन 382 हिजरी क़मरी को अरबी व्याकरण व साहित्य के विशेषज्ञ अली बिन ईसा रमानी का देहान्त हुआ। वे अपने दौर के साहित्यिक ज्ञान में दक्षता प्राप्त करने के साथ साथ, धर्मशास्त्र, वादशास्त्र और क़ुरआन के ज्ञानों में भी निपुण थे। रूमानी ने इब्ने सर्राज जैसे अपने समय के साहित्य के विख्यात गुरूओं से ज्ञान प्राप्त किया फिर वे इस विषय में दक्ष हो गए और बहुत से शिष्य उनसे ज्ञान प्राप्त करने लगे। उन्होंने जो महत्त्वपूर्ण पुस्तकें लिखी हैं उन में एजाज़ुल क़ुरआन का नाम लिया जा सकता है।

 

11 जमादिल अव्वल सन 597 हिजरी क़मरी को इस्लामी जगत के प्रसिद्ध दर्शनशास्त्री, गणित्ज्ञ, खगोलशास्त्री और विद्वान ख़्वाजा नसीरूद्दीन तूसी, ईरान के उत्तरपूर्वी नगर तूस में जन्मे। उन्होंने हलाकू ख़ान के काल में सबसे बड़े इस्लामी और वैज्ञानिक केन्द्र व पहली ऑबज़रवेटरी अर्थात मराग़े की वेधशाला की स्थापना की। ख़्वाजा नसीरूद्दीन तूसी के प्रयास से मराग़े की वेधशाला बेहतरीन और आधुनिक यंत्रों से लैस हो गई जिसका तीन सौ वर्ष बाद भी पश्चिम में कोई उदाहरण नहीं मिलता। उन्होंने खगोल शास्त्र से संबंधित बातों के लिए शम्सी घड़ी से  लाभ उठाने हेतु नये मार्ग की खोज की। ख़्वाजा नसीरूद्दीन तूसी ने एक महापुस्तकालय की भी स्थापना की जिसमें चार हज़ार से भी अधिक पुस्तकें मौजूद थीं। उन्होंने अपनी वेधशाला में सोलह वर्ष तक तारों के बारे में शोध किया। नसीरूद्दीन तूसी ने जो पुस्तकें लिखी हैं उनकी संख्या 80 है जो अरबी और फ़ारसी भाषाओं में हैं। उन्होंने जो पुस्तकें लिखी हैं उनमें असासुल इक़्तेबास, अख़लाक़े नासिरी, अवसाफ़ुल अशराफ़ और शरहे इरशाद जैसी प्रसिद्ध पुस्तकों की ओर संकेत किया जा सकता है।