गुरुवार- 9 जनवरी
1718, फ्रांस ने स्पेन के ख़िलाफ़ लड़ाई की घोषणा की।
1792, तुर्की और रूस ने शांति समझौते पर हस्ताक्षर किये।
1873, 19वीं शताब्दी के सबसे साहसी यूरोपीय शासकों में शुमार नेपोलियन बोनापार्ट तृतीय का निधन।
1915, महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीक़ा से लौटने के बाद मुंबई पहुंचे।
1922, भारतीय जैव रसायनशास्त्री एवं चिकित्सा के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित हरगोविन्द खुराना का जन्म हुआ।
1970, सिंगापुर में संविधान अपनाया गया।
2011, ईरान के पश्चिमोत्तर क्षेत्र में स्थित आज़रबाइजान प्रांत के उरूमिया क़स्बे के पास ईरान एयर बोइंग 727 के दुर्घटनाग्रस्त हो जाने से 77 लोगों की मृत्यु हो गई और 33 लोग घायल हो गए।
2011, अफ्रीक़ा के सबसे बड़े देश सूडान को दो हिस्सों में बांटकर दक्षिणी सूडान को अलग देश बनाने के लिए जनमत संग्रह कराया गया।
2012, लियोनेल मेसी ने लगातार दूसरे वर्ष फ़ीफ़ा का 'बैलोन डी' (सर्वश्रेष्ठ फ़ुटबॉलर) पुरस्कार जीता।
9 जनवरी सन 1768 ईसवी को फ़्रांस के क्रान्तिकारी नेता लैज़ेर होश का जन्म हुआ। उन्होंने फ़्रांस की क्रान्ति के दौरान सक्रिय भूमिका निभाई उन्हें फ़्रांस की क्रान्ति के उन विरोधियों को, जो पलायनकर्ताओं के नाम से प्रसिद्ध थे कुचलने के कारण ख्याति मिली। पलायनकर्ता वे लोग थे जो पहले ब्रिटेन भाग गये थे और फिर इस देश की व्यापक सहायता के साथ जून सन 1795 में फ़्रांस के पश्चिमी तट पर उतरे ताकि इस देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था का अंत कर दें। किंतु लैज़र होश के नेतृत्व में क्रान्ति के संरक्षकों ने उन्हें पराजित कर दिया। 1797 ईसवी को 29 वर्ष की आयु में होश का निधन हुआ।।
9 जनवरी सन 1792 ईसवी को रूस और उसमानी शासन के बीच शांति समझौता हुआ। जिसके बाद 18वीं शताब्दी की योरोप की लड़ाई समाप्त हो गयी। यह युद्ध वर्ष 1787 में उसमानी शासन द्वारा रूस और ऑस्ट्रिया के विरुद्ध आक्रमण के बाद आरंभ हुआ था क्योंकि यह दोनों देश उसमानी शासन के विभाजन का प्रयास कर रहे थे। इस युद्ध के समापन पर रुस ने उसमानी शासन के विशाल क्षेत्र को अपने अधिकार में कर लिया।

9 जनवरी वर्ष 1960 को मिस्र में नील नदी पर आसवान नामक बांध का निर्माण आरंभ हुआ। इस बांध का निर्माण मिस्र की महत्त्वपूर्ण आर्थिक योजना थी जिसकी घोषणा तत्कालीन राष्ट्रपति जमाल अब्दुन्नासिर ने की थी। पश्चिमी देशों ने भी इस बांध के निर्माण में सहायता करने की घोषणा की किन्तु वर्ष 1956 में जमाल अब्दुन्नासिर द्वारा स्वेज़ नहर के राष्ट्रीयकरण की घोषणा और फ़्रांसीसी, ब्रिटिश और ज़ायोनी सेना के संयुक्त आक्रमण के बाद पश्चिमी सरकारों ने जमाल अब्दुन्नासिर पर दबाव डालने के लिए बांध के निर्माण की सहायता रोक दी। इसी बीच सोवियत संघ ने अवसर से लाभ उठाते हुए मिस्र की वित्तीय व तकनीकी सहायता की और उसके बाद से जमाल अब्दुन्नासिर सोवियत संघ की ओर झुकाव रखने लगे। आसवान बांध मिस्र के दक्षिण में स्थित है जिसकी ऊंचाई114 मीटर, लंबाई 3600 मीटर तथा वह 2100 मेगावाट बिजली का उत्पादन करता है। इस बांध से इसी प्रकार बहुत से क्षेत्रों की सिंचाई भी होती है।

9 जनवरी वर्ष 1964 ईसवी को पनामा नहर पर अमरीकी ध्वज फहराए जाने के बाद पनामा में अमरीका के विरुद्ध विद्रोह में तीव्रता आ गयी जिसके दौरान अमरीकी सैनिकों ने बहुत से लोगों को हताहत और घायल कर दिया। उल्लेखनीय है कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अमरीका ने पनामा के 134 क्षेत्रों में अपनी सैन्य छावनियां बनाई और इस देश का अतिग्रहण कर लिया। वर्ष 1947 में पनामा की जनता के विरोध और कड़े संघर्ष के बाद इस देश की सरकार अमरीकी सैन्य छावनियों को समाप्त करने पर विवश हो गयी। अंततः वर्ष 1999 में अमरीका ने पनामा नहर को छोड़ दियाजो एटलांटिक महासागर और प्रशांत महासागर को जोड़ने वाली है।

***
19 देय सन 1365 हिजरी शम्सी को ईरानी सेना के जवानों ने इराक़ के अतिक्रमणकारी सैनिकों के विरुद्ध करबला पांच नामक सैनिक कार्रवाई आरंभ की। यह कार्रवाई इराक़ के बसरा नगर के पूर्व में हुई। उक्त क्षेत्र के महत्व को देखते हुए इराक़ ने वहां बहुत सी बाधाएं खड़ी कर दी थीं जिन्हें पार करना बहुत कठिन था किंतु ईरानी जियालों ने ईश्वर पर भरोसा करके उन सभी रुकावटों को पार किया और शत्रु पर कड़ा प्रहार किया जिसमें 80 लड़ाकू विमान और 700 टैंक इराक़ी सेना के हाथ से निकल गये। इसी प्रकार हजारों इराक़ी सैनिक हताहत और घायल हुए।
ईरानी सेना की इस कार्रवाई से यह स्पष्ट हो गया कि इराक़ पश्चिमी और अरब देशों के समर्थन के बावजूद ईरानी जियालों की जवाबी कार्रवाई से सुरक्षित नहीं था।

***
13 जमादिउल अव्वल सन 11 हिजरी क़मरी को एक कथन के अनुसार पैग़म्बरे इस्लाम सलल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम की पुत्री और हज़रत अली अलैहिस्सलाम की पत्नी हज़रत फ़ातेमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा की अल्पायु में शहादत हो गयी। उनका पूरा जीवन अध्यात्म और नैतिकता से ओतप्रोत था। इस्लाम के आरंभिक काल में हज़रत फ़ातेमा ज़हरा का जीवन बहुत उतार चढ़ाव से भरा हुआ था। उन्होंने इस्लाम धर्म के अंतिम दूत और अपने पिता हज़रत मुहम्मद और अपने पति हज़रत अली के कांधे से कांधा मिलाकर इस्लाम धर्म की अद्वितीय सेवा की। उन्होंने हज़रत इमाम हसन और हज़रत इमाम हुसैन जैसे दो पुत्रों का प्रशिक्षण किया जिनके बारे में पैग़म्बरे इस्लाम का कथन है कि यह दोनों स्वर्ग के युवाओं के सरदार हैं। वे महिलाओं के लिए पूर्ण और व्यापक आदर्श थीं। उनका ईमान, पवित्रता, सच्चाई, चेतना और ज्ञान महिलाओं के लिए आदर्श बन गया। इसीलिए पैग़म्बरे इस्लाम सलल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम ने उनके बारे में कहा कि वे लोक परलोक की महिलाओं की सरदार हैं। पैग़म्बरे इस्लाम उनका बहुत सम्मान करते थे और जब भी वे आतीं उनका खड़े होकर सम्मान करते और उन्हें अपनी जगह पर बिठाते थे। पैग़म्बरे इस्लाम की पुत्री हज़रत फ़ातेमा की शहादत पर हम आपकी सेवा में संवेदना प्रस्तुत करते हैं और आपकी सेवा में उनका एक कथन पेश करते हैं। वे कहती हैं मुझे तुम्हारे संसार में तीन चीज़ें पसंद हैं, पवित्र क़ुरआने मजीद की तिलावत, पैग़म्बर के चेहरे को देखना और ईश्वर के मार्ग में दान देना करना।