Jan १५, २०१७ १३:१६ Asia/Kolkata

पश्चिमी विचारकों ने आज़ादी की कुछ सीमाएं निर्धारित की हैं। जैसे यह कि आज़ादी की सीमा क़ानून है।

यदि कोई आज़ाद रहना चाहता है तो उसे चाहिए कि क़ानून के दायरे में रहते हुए आज़ाद रहे। या यह कि आज़ादी की सीमा वहां तक है जहां तक किसी अन्य की आज़ादी को आघात नहीं पहुंचता। इस तरह देखा जाए तो कोई भी समाज निरंकुश आज़ादी की बात नहीं करता बल्कि इंसानों के सुचारू जीवनयापन के लिए क़ानून होना ज़रूरी है। हर क़ानून अपने आप में आज़ादी को एक हद तक सीमित करने वाला होता है। पश्चिम में क़ानून केवल सामाजिक मामलों को दृष्टिगत रखकर बनाए जाते हैं और उनका लक्ष्य समाज का संचालन होता है।

हालांकि पश्चिम में कहा जाता है कि क़ानून से आज़ादी सीमित होती है लेकिन ख़ुद क़ानून भी बहुत से लोगों के रुजहानों और आकांक्षाओं का परिणाम होता है। इस लिए कि पश्चिमी सभ्यता और लोकतंत्र में क़ानून जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि बनाते हैं। वह जिस क़ानून को अपने व्यक्तिगत और दलगत हितों के लिए उचित और अच्छा समझते हैं उसे पास करते हैं। यह ज़रूरी नहीं है कि वह क़ानून मानवीय मूल्यों से समन्वित हो। समाज के अधिकांश लोगों की इच्छा और आकांक्षा क़ानून बनवाती है और यह क़ानून अपने दायरे के अनुसार आम लोगों की आज़ादी को सीमित करता है।

अलबत्ता यह भी बता देना ज़रूरी है कि यह केवल ज़ाहरी रूप है। यदि कोई आज पश्चिमी देशों के विषयों की समीक्षा करे और उनकी समस्याओं का अध्ययन करे तो बहुत आसानी से समझ सकता है कि पश्चिमी देशों की आज़ादी का सार है समाज के महत्वपूर्ण व प्रभावशाली वर्ग की इच्छा और मर्ज़ी। अतः जो जनता की मांग और इच्छा के नाम पर पेश किया जाता है वह दौलतमंद तबक़े की मर्ज़ी होती है।

हमने पिछले कार्यक्रम में भी बताया कि इस्लाम में आज़ादी का अर्थ है ईश्वर के अलावा हरेक की ग़ुलामी और बंदगी से मुक्ति। सवाल यह है कि इस आज़ादी की सीमा क्या है? इस्लाम ने कुछ क्षेत्रों में आज़ादी को अधिक सीमित रखा है और जबकि कुछ क्षेत्रों में आज़ादी का दायरा अधिक विस्तृत रखा है। इस्लाम का कहना है कि जिस प्रकार बाहरी कारक जैसे विस्तारवादी शक्तियां, अत्याचारी तत्व और कमज़ोर लोगों की आज़ादी पर हमला करने वाले लोग इंसान की आज़ादी को सीमित कर देते हैं उसी तरह कुछ भीतरी कारक भी जो इंसान के भीतर मौजूद होते हैं यह कारक भी इंसान की आज़ादी पर किसी सीमा तक अंकुश लगाते हैं। पश्चिम में आज़ादी के समर्थक उन कारकों का मुक़ाबला करते हैं जो बाहर से इंसान की आज़ादी को सीमित करते हैं। जबकि इस्लाम का दृष्टिकोण इस बारे में अधिक विस्तृत और गहरा है। इस दृष्टिकोण में कुछ दूसरे कारक भी शामिल हैं जैसे वह आदतें जो इंसान को दूसरों का मातहत बने रहने और अपमानित जीवन बिताने की ओर खींचती हैं। बुरा आचरण, अहं, बेजा प्रेम और घृणा आदि इंसान को इस प्रकार का जीवन गुज़ारने पर तैयार कर देते हैं। इस्लाम कहता है कि इस प्रकार के आंतरिक कारक भी इंसान की आज़ादी छीन सकते हैं। आज़ाद रहने का केवल यह अर्थ नहीं है कि इंसान किसी अन्य व्यक्ति या शासक के अधीन न रहे। आज़ाद रहने के लिए ज़रूरी है कि अपनी इच्छाओं का भी ग़ुलाम न हो। इस्लाम कहता है कि जो व्यक्ति डर, कमज़ोरी, लालच और अपनी इच्छाओं से मजबूर होकर अपने ऊपर कुछ चीज़ें लाद लेता है वह वास्तव में आज़ाद नहीं है।

इसी विषय को विस्तृत दायरे में देखा जाए तो वह राष्ट्र भी जो लालच, लोभ, भ्रष्टाचार और बुरी आदतों का बंदी न हो वह बाहरी कारकों अर्थात अत्याचारी व विस्तारवादी शक्तियों का बंदी भी नहीं होगा। यह एसा पैमाना है जो किसी भी राष्ट्र के बारे में अपनाया जा सकता है। अर्थात आंतरिक आज़ादी, आध्यात्मिक आज़ादी, उन ज़ंजीरों से आज़ादी जो इंसान की गतिविधियों और इरादों को बेड़ी लगा देती हैं। यह ज़ंजीरे इंसान के अस्तित्व से बाहर नहीं हैं बल्कि उसके अस्तित्व के भीतर हैं। यह आज़ादी के बारे में इस्लाम तथा पश्चिमी मतों के बीच बुनियादी अंतर है।

पश्चिम की स्वतंत्रता के मुक़ाबले में इस्लाम की आज़ादी एक ईश्वरीय उपहार है जिसका आधार एकेश्वरवाद और ईश्वर की बंदगी है। इस आज़ादी में कर्तव्य परायणता की भावना साथ साथ रहती है और यह आज़ादी आंतरिक व बाहरी कारकों को नियंत्रित करती है। यह आज़ादी इंसान को बहकने से रोकती है, उसके लिए उत्थान का रास्ता खोलती है और उसकी सभी क्षमताओं को सक्रिय करती है। इस्लाम के अनुसार इंसान की इस दुनिया की ज़िंदगी और परलोक की ज़िंदगी में सीधा संबंध है तथा उसके कर्मों का उसकी परलोक की ज़िंदगी पर गहरा असर होता है।

तक़वा, ईश्वरीय भय, आत्म निर्माण जिन पर इस्लाम में बहुत अधिक बल दिया गया है वास्तव में इन्हीं आंतरिक कारकों पर नियंत्रण पाने के तरीक़े हैं। तक़वा का मतलब यह है कि इंसान बड़ी होशियारी से अपने कर्मों पर नज़र रखे तथा अपने बर्ताव पर अज्ञानता और इच्छाओं का वर्चस्व न होने दे और ख़ुद को सीधे मार्ग से किसी भी हालत में बहकने न दे। आत्म निर्माण का अर्थ यह है कि इंसान ख़ुद को दिल और आत्मा के प्रदूषणों से पवित्र बनाए। यदि किसी व्यक्ति में ईश्वरीय भय  और आत्म निर्माण की भावना है तो वह सही अर्थों में आज़ाद है और बड़ी से बड़ी शक्ति का मुक़ाबला करके विजयी हो सकता है। यदि किसी राष्ट्र के अंदर ईश्वर का भय और आत्म निर्माण की चाहत है तो यह भावना जिस स्तर की भी होगी वह उसी स्तर तक अपनी आज़ादी को सीमित करने वाले कारकों का मुक़ाबला कर सकता है।

तो इस्लाम में आज़ादी केवल बाहरी बंधनों से मुक्ति पाना नहीं है। बल्कि आंतरिक बंधनों से आज़ाद होना भी शर्त है। अतः यदि कोई बाहरी बंधनों से आज़ाद हो लेकिन आंतरिक बंधनों में जकड़ा हुआ हो तो वह आज़ाद नहीं है। इस्लाम तथा अन्य ईश्वरीय धर्मों ने दूसरों के अधिकारों और आज़ादी का ख्याल रखने पर बहुत अधिक ज़ोर दिया है और कहा है कि कोई भी इंसान आज़ाद होने के नाम पर दूसरों के अधिकारों पर हमला नहीं कर सकता। इन धर्मों का कहना है कि कोई भी इंसान आज़ाद होने के बहाने ख़ुद अपने हितों को भी ख़तरे में नहीं डाल सकता। ख़ुद उसे भी अपनी इस आज़ादी से कोई नुक़सान नहीं पहुंचना चाहिए। उसे ख़ुद भी आज़ाद होने के नाम पर नुक़सान नहीं उठाना चाहिए। यही वजह है कि इस्लाम में आत्म हत्या को हराम घोषित किया गया है।

इस तरह कोई भी इंसान यह नहीं कह सकता कि मैं आज़ाद हूं और अपनी इच्छा के अनुसार अपनी आज़ादी को ख़त्म करना चाहता हूं। या ख़ुद को दूसरों के हवाले कर रहा हूं या दूसरों की ज़बरदस्ती की मांग स्वीकार कर रहा हूं। अलबत्ता एक महत्वपूर्ण और ध्यान योग्य बिंदु यह है कि यह इंसान का व्यक्तिगत कर्तव्य है कि ख़ुद को नुक़सान न पहुंचाए।  अर्थात किसी भी सरकार को यह हक़ नहीं है कि व्यक्ति ने अपने हित की रक्षा नहीं की अतः उसे गिरफ़तार करके उस पर मुकद्दमा चलाए। लेकिन इस्लाम यह कहता है कि इंसान का अपनी व्यक्तिगत आज़ादी को भी नुक़सान न पहुंचाना ज़रूरी है और इस आज़ादी की रक्षा करना एक धार्मिक कर्तव्य है। अर्थात यदि उसने इस कर्तव्य का उल्लंघन किया तो ईश्वर उसे सज़ा देगा। इस लिए कि अपने व्यक्तिगत हितों की रक्षा करना वाजिब है।

पश्चिम में आज़ादी की सीमा भौतिक लाभ तय करते हैं। दूसरे शब्दों में सारी कोशिश इस बात की होती है कि लोगों के हितों और स्वार्थों की रक्षा हो चाहे वह स्वार्थ अनैतिक और ग़लत ही क्यों न हो। यदि इन हितों से दूसरों के भौतिक हित प्रभावित होते हों तो फिर उनके लिए सीमाएं निर्धारित होती हैं। शिक्षा और प्रशिक्षा भी एसा विषय है जिसमें आज़ादी इंसान का सुनिश्चित अधिकार है। इंसानों को यह अधिकार है कि वह शिक्षा ग्रहण करें लेकिन पश्चिम के बड़े विश्वविद्यालयों में यही अधिकार सीमित कर दिया जाता है। ज्ञान और हाई टेक का स्थानान्तरण वर्जित है। विकासशील देशों को हाईटेक का स्थानान्तरण प्रतिबंधित है। इस  लिए कि यदि तकनीक का स्थानान्तरण हो गया तो बड़ी शक्तियों का उस क्षेत्र में एकाधिकार समाप्त हो जाएगा तथा उनका भौतिक वर्चस्व ख़त्म हो जाएगा।

इस प्रकार देखा जाए तो पश्चिम में आज़ादी की सीमाएं कभी कभी बड़ी अतार्किक हैं। जैसे कि इन देशों में ज़ायोनी शासन पर कोई भी टिप्पणी करना दंडनीय अपराध है। जबकि नैतिक मूल्यों को कुचलने में कोई बुराई नहीं है जैसे कि अमरीका और यूरोप में समलैंगिकता को धीरे धीरे क़ानूनी मान्यता मिलती जा रही है। बल्कि जो इस घृणित कर्म का विरोध करे उस पर हमला कर दिया जाता है। अर्थात इन देशों में नैतिक मूल्यों का कदापि कोई महत्व नहीं है।