Jan १५, २०१७ १३:५१ Asia/Kolkata

हमने ईरान के नवीं शताब्दी के ईरान के प्रसिद्ध विचारक, शायर, साहित्यकार, लेखक और राजनेता अमीर अली शेरनवाई के बारे में बताया था ।

वह ऐसी प्रसिद्ध हस्ती थे जिन्होंने विभिन्न समय में मूल्यवान सेवाएं अंजाम दीं और अपनी अमर यादें दुनिया के सामने छोड़ी।

तैमूरी शासन का दौर, ईरान में राज करने वाले परिवारों में सबसे स्वर्णिम व अच्छा दौर रहा है।  उस काल में तैमूरी शासन श्रंखला के राजा व महाराजाओं  द्वारा सांस्कृतिक और कला पर ध्यान दिए जाने के कारण ईरान की संस्कृति व सभ्यता के इतिहास का यह सबसे महत्वपूर्ण दौर था। इस काल की विशेषताओं में से एक यही थी कि प्रसिद्ध व सांस्कृतिक मैदान में सक्रिय लोगों का अपना अलग की स्थान है।

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सुल्तान हुसैन बाइक़रा के बुद्धिमान व होशियार मंत्री अमीर अलीशेर नवाई उस काल की महत्वपूर्ण हस्तियों में से एक थे। अमीर निज़ामुद्दीन अलीशेर नवाई का जन्म 17 रमज़ान 844 को हेरात के एक धार्मिक व बुद्धिमानी परिवार में हुआ। उन्होंने आरंभिक शिक्षा हेरात में प्राप्त किया। अमीर अलीशेर नवाई का परिणाम, हेरात में शक्ति के लिए होने वाली झड़पों के कारण, पलायन करके पवित्र नगर मशहर चला गया और उसके बाद समरक़ंद के लिए रवाना हो गया। अमीर अलीशेर ने समरक़ंद में रहने के दौरान अपनी शिक्षा पूरी की।  सुल्तान हुसैन बाइक़ुरा के सत्ता में पहुंचने के बाद, अमीर अलीशेर नवाई हेरात लौट गये और उन्हें राजदरबार में एक वरिष्ठ अधिकारी के पद पर नियुक्त किया गया और उन्होंने जनता की बहुत मूल्यवान सेवाएं की। अमीर अलीशेर नवाई ने अपने कार्यकाल में अपनी अध्यात्मिक विशेषताओं और गुणों को सब पर सिद्ध कर दिया जिसके कारण राजा हुसैन बाइक़ुरा ने उन्हें एतेमादुल मुल्क और रुकनुस्सलतना की उपाधि दी। उस काल में हर शहर से कला प्रेमी सुलतान हुसैन बाइक़ुरा के दरबार में आते थे और राजा उनकी भरपूर मदद करते थे और उनकी भरपूर सहायता करते थे और इन लोगों ने ईरान के कला और साहित्य के महत्वपूर्ण ख़ज़ाने में वृद्धि की।

प्रतिस्पर्धियों, दुश्मनों और दरबारियों ने जब देखा कि उनकी उपस्थिति से राजा के सामने उनकी कुछ नहीं चलती थी इसलिए उन्होंने अमीर अलीशेर के विरुद्ध राजा के कान भरने आरंभ कर दिए और अंततः सुलतान ने अमीर अलीशेर से त्यागपत्र ले लिया किन्तु दरबारियों ने जो उनकी स्थिति और उनसे द्वेष करते थे, इसी को पर्याप्त नहीं समझा और उन्होंने सुलतान हुसैन बाइक़रा से मांग की कि वह अमीर अलीशेर को उस्तराबाद की महत्वपूर्ण सरकार दे दें ताकि इस प्रकार से वह हेरात के राजमहल से अलीशेर नवाई को दूर रख सकें। उस्तराबाद हरा भरा, चहल पहल और आबाद शहर था और उस समय भी ईरान के प्रसिद्ध शहरों में उसे गिना जाता था। अमीर अली शेर वर्ष 982 हिजरी क़मरी में उस्तराबाद गये और कुछ समय तक उन्होंने वहां के गवर्नर का पद संभाला और इस दौरान उन्होंने अपनी पूरी क्षमताओं और योग्यताओं का नमूना पेश किया और पूरे न्यायपूर्ण ढंग से लोगों से व्यवहार किया। इन दिनों सर्वोच्च वंशज, धर्मगुरूओं और प्रतिष्ठित लोगों का विशेष सम्मान होता था जबकि आम लोग, जनता और सभी वर्ग के लोगों पूरी शांति से न्यायपूर्ण ढंग से जीवन व्यतीत कर रहे थे। दो वर्ष बीतने के बाद, अमीर अलीशेर के आह्वान और हेरात के दरबार की ओर से उनके विषाक्त होने की अफ़वाह फैलाए जाने के बाद, सुलतान हुसैन बाइक़ुरा ने अमीर को राजधानी बुला लिया किन्तु अमीर को मनाने के लिए इस बुलावे में देर हो चुकी थी और अमीर अली शेर के जीवन का सूर्य अस्त हो रहा था।

अमीर अलीशेर वर्ष 906 हिजरी क़मरी में रोबात परियान क्षेत्र में अपने कुछ सिपाहियों के साथ जब वह सुल्तान बाइक़ुरा के जुलूस के आने की प्रतीक्षा कर रहे थे उसी समय उनको दिल का दौरा पड़ा और उनका निधन हो गया।

अमीर अलीशेर का सांस्कृतिक कारनामा बहुत प्रकाशमयी है। वह शक्तिशाली लेखक, अच्छे शायर, और प्रसिद्ध कलाकार थे। तुर्की साहित्य में उनकी पुस्तकों के कारण यह भाषण एक साहित्यिक भाषा के रूप में विकसित हो गयी। इसी आधार पर उनको तुर्की जुग़ताई भाषा के संस्थापक कहा जाता है।  ईरान के इस लेखक, बुद्धिजीवी और शायर ने तीस वर्ष के दौरान जब सत्ता की बागडोर उनके हाथ में थी, महत्वपूर्ण सांस्कृतिक व साहित्य से संबंधित सेवाएं अंजाम दीं। अमीर अलीशेर ने हेरात के दरबार में कलाकारों और धर्मगुरूओं का एक गुट तैयार कर दिया था जिन्होंने इस शहर को एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक केन्द्र में परिवर्तित कर दिया। अमीर अलीशेर ने विभिन्न शैलियों से इन लोगों को प्रभावित किया। मदरसे, मस्जिदों और शिक्षण संस्थाओं का गठन किया गया, इसी प्रकार तुर्की और फ़ारसी भाषा में पुस्तक लिखना और धर्मगुरूओं की भौतिक व अध्यात्मिक सहायता शामिल है। उन्होंने हेरात के दरबार में कल्याण और शिक्षण संस्थाओं का आधार रखकर बड़े औद्योगिक केन्द्र में परिवर्तित कर दिया ताकि साहित्य और कला के क्षेत्र में सक्रिय धर्मगुरु अर्थव्यवस्था की ओर से निश्चिंत होकर अपने ज्ञान संबंधी काम को जारी रखें।

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अमीर अलीशेर नवाई ने मंत्रालय की ज़िम्मेदारी अदा करने के साथ साहित्यक और कल्याणकारी काम भी पूरी निष्ठा से अंजाम दिया। उन्होंने इसी के साथ सार्वजनिक सेवाएं भी अंजाम दीं। उन्होंने संसारिक मामलों पर ध्यान दिए बना, निर्माण कार्यों पर अधिक रुचि के कारण अपना जीवन धार्मिक केन्द्रों, मस्जिदों और स्कूलों के निर्माण से विशेष कर दिया। उन्होंने विभिन्न मस्जिदों, स्कूलों, कारवांसरायों, यहूदियों के धार्मिक केन्द्रों, पुलों और मज़ारों का निर्माण और उनकी मरम्मत कराई। उन्होंने इसी प्रकार 370 पुस्तकें भी लिखी हैं जो उनकी यादगार के रूप में अब भी बाक़ी हैं। उनके इस काम से इराक़, फ़ार्स और ख़ुरासान में बहुत से वक़्फ़ की धरोहरें अस्तित्व में आईं।

अमीर अलीशेर नवाई, पैग़म्बरे इस्लाम के पौत्र हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के रौज़े के प्राचीन प्रांगण के संस्थापकों में से थे। यह प्रांगण 872 हिजरी शम्सी में निर्मित हुआ और फिर उसे रौज़े की इमारत और गुंबद के साथ मिला दिया गया। इस इमारत का दूसरा आधा भाग वर्ष 1010 हिजरी क़मरी में शाह अब्बास सफ़वी के आदेश पर रखा गया।

हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के रौज़े के स्वर्णिम हाल में, जो रौज़े के पश्चिमोत्तर में स्थित है, मुक़रनस की कला से सुसज्जित पांच कमरे ऊपर और नीचे चार प्रवेशाद्वार हैं। इन सबको अमीर अलीशेर के आदेश पर 875 से 885 हिजरी क़मरी में बनाया गया था। इस पर लिखे शिलालेख मुग़ल राजाओं के काल से संबंधित है।

अमीर अलीशेर नवाई साहित्य, कला, राजनीति और शायरी में दो भाषी थे। अर्थात वह फ़ारसी और तुर्की दोनों ही भाषाओं में निपुण थे और शेर और किताब लिखते थे। उनके काल में हेरात शेर, लिपिकारों, कलाप्रेमियों, संगीतकारों, कहानियां सुनाने वालों और पहलवानों का केन्द्र था। अमीर अलीशेर के अपने समय के कलाकारों और साहित्य कारों से बहुत ही घनिष्ठ संबंध थे। समाज के कलाप्रेमियों से उनके संबंध कभी भी राजा और प्रजा की सीमा तक नहीं गये बल्कि वह स्वयं को उनका सेवक कहते थे और उनसे सीखते थे।

यदि उस समय के प्रसिद्ध शायरों व कवियों जैसे जामी, बेहज़ाद और वाएज़ काशेफ़ी के साथ उनके संबंधों पर एक नज़र डालेंगे तो उनकी समझ में आ जाएगा कि इन लोगों ने अमीर अलीशेर के समर्थन से ही इतनी प्रगति की और इस स्थान पर पहुंच गयें। एडवर्ड ब्राऊन ने अमीर अलीशेर नवाई को मालीनास सेलीनोफ़ रूमी के समान बताया क्योंकि धर्म गुरू और बुद्धिजीवी उनके इर्द गिर्द बैठे रहते थे।

अमीर अलीशेर नवाई के पास प्रसिद्ध और अदभुत पुस्तकों वाला एक पुस्ताकालय भी था और इसकी ज़िम्मेदारी प्रसिद्ध बुद्धिजीवी और लिपिकार मौलाना हाज मुहम्मद ज़ुलफ़ूनून पर थी। निज़ामिया मदरसे के पुस्तकालय को भी निज़ामुद्दीन अमीर अलीशेर ने बनवाया था।