सोमवार- 20 जनवरी
20 जनवरी सन 1841 ईसवी को ब्रिटेन ने हांग कांग पर क़ब्ज़ा कर लिया।
20 जनवरी सन 1944 ईसवी को दूसरे विश्व युद्ध में रायल एयरफ़ोर्स ने बरलिन पर 2300 टन वज़्नी बम गिराए।
20 जनवरी सन 2005 ईसवी को क्यूबा ने सार्वजनिक स्थलों पर सिगरेट पीने पर रोक लगा दी। क्यूबा का सबसे बड़ा निर्यात पदार्थ सिगरेट ही है।
20 जनवरी सन 1893 ईसवी को फ़्रांस ने अपने एशियायी उपनिवेशों में विस्तार करते हुए लाओस क्षेत्र को भी अपने उपनिवेश में शामिल कर लिया। लाओस, जो दक्षिणपूर्व में स्थित है, सन 1945 अर्थात 52 वर्षों तक फ़्रांस के अधिकार में रहा। द्वितीय विश्व युद्ध के अंत में लाओस कुछ समय के लिए जापान के अधिकार में चला गया किंतु थोड़े ही समय बाद फ़्रास की सेना ने जापानियों को इस क्षेत्र से बाहर निकाल दिया। सन 1949 में लाओस स्वाधीनदेश के रुप में फ़्रासीसी संघ में शामिल हो गया, किंतु बाद में लाओस की जनता के विद्रोह और भारत तथा, चीन के साथ युद्ध में फ़्रांस की पराजय के कारण पेरिस सरकार लाओस को सन 1954 में स्वतंत्रता देने पर विवश हो गयी।
20 जनवरी सन 1894 ईसवी को जर्मनी के आविष्कारक और संगीत विशेषज्ञ ओंडल्फ़ सैक्स का 75 वर्ष की आयु में निधन हुआ। उनका जन्म 1819 ईसवी में हुआ था। वे संगीत से संबंधित उपकरण और यंत्र बनाते थे। साथ ही संगीत का गहन अध्ययन भी करते थे। इसी कारण वे एक विख्यात संगीतकार बनकर उभरे।
20 जनवरी सन 1996 ईसवी को फ़िलिस्तीनियों ने मतदान करके पी एल ओ के नेता यासिर अरफ़ात को अपना नेता बनाया और ग़ज़्ज़ा पट्टी एवं पश्चिमी तट के क्षेत्रों में यासिर अरफ़ात की सरकार की स्थिति ठीक हो गयी। उन्हें 88 दशमलव 6 प्रतिशत वोट मिले और फ़िलिस्तीन की प्रजातांत्रिक प्रक्रिया में चुने गये वे पहले फ़िलिस्तीनी नेता बन गये।
20 जनवरी सन 2001 ईसवी को अमरीकी राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश ने राष्ट्रपति पद के चुनाव में इल गोर के साथ कड़ी टक्कर के बाद राष्ट्रपति पद प्राप्त करने में सफलता प्राप्त की। अमरीका के इतिहास में यह सबसे ज़ोरदार चुनावी टक्कर थी।
20 जनवरी सन 2001 ईसवी को फ़िलिपीन में ग्लोरिया मैकापागल आरोयो को देश की राष्ट्रपति के रुप में शपथ दिलायी गयी। यह क़दम उच्चतम न्यायालय के उस निर्णय के बाद उठाया गया जिसमें न्यायालय ने यह घोषणापत्र की थी राष्ट्रपति का पद ख़ाली हो गया है। जिसके बाद ग्लोरिया आरोफे को मुख्य न्यायधीष ने राष्ट्रपति के रुप में शपथ दिलायी।
ज्ञात रहे आरोयो, अपने पूर्ववर्ती राष्ट्रपति जोज़ेफ़ स्ट्राडा के काल में उपराष्ट्रपति थीं कि न्तु जैसे ही स्ट्राडा पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा उन्होंने अपने पद से त्यागपत्र दिया और विपक्ष में शामिल हो गयीं।
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30 दैय सन 1357 हिजरी शम्सी को ईरान में इस सूचना के मिलते ही कि इस्लामी क्रान्ति के संस्थापक इमाम ख़ुमैनी पेरिस से स्वदेश लौटने वाले हैं, सारी जनता प्रसन्नता से झूम उठी। हर ओर केवल यही बातें सुनाई देतीं थीं कि इमाम ख़ुमैनी का किस प्रकार स्वागत किया जाए। दूसरी ओर शाह के पिटठुओं को इस सूचना से गहरा आघात लगा और वे अत्यंत चिंतित हो गये। उनका प्रयास था कि किसी तरह अपनी छवि को ठीक कर लें। बहुतों ने तो अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। अत्याचारी शाह के कुछ समर्थक सैनिकों ने तो अंतिम प्रयास करते हुए निहत्थी जनता पर आक्रमण किया किंतु इससे जनता के दृढ़ संकल्प पर कोई प्रभाव नही पड़ा।

30 दैय 1363 हिजरी शमसी को ईरान के एक महान धर्मगुरू आयतुल्लाह सैयद अहमद ख़ान्सारी का निधन हुआ। बचपने में ही उनके पिता का निधन हो गया और इसके बाद वह बड़े भाई की देखरेख में बड़े हुए। आरंभिक शिक्षा अपनी जन्म स्थली में प्राप्त करने के बाद वह इराक़ के पवित्र नगर नफ़ज चले गये और वहां उन्होंने अपने समय के प्रसिद्ध धर्मगुरूओं से लाभ उठाया। उसके बाद आयतुल्लाह ख़ान्सारी पढ़ाने लगे। आयतुल्लाह ख़ान्सारी उन धर्मगुरूओं में से हैं जो शाह की अत्याचारी सरकार के विरुद्ध स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी के आंदोलन में उनका समर्थन करते थे और क्रांति व आंदोलन के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने की दिशा में किसी प्रकार के संकोच से काम नहीं लेते थे। आयतुल्लाह ख़ान्सारी के राजधानी तेहरान में रहने से जहां क्रांतिकारियों को मनोबल मिलता था वहीं उनका रहना इस बात का कारण बना कि शाह की अत्याचारी सरकार लोगों से सतर्कता से पेश आये। आयतुल्लाह ख़ान्सारी जो दर्स पढ़ाते थे उसमें आयतुल्लाह शहीद मुर्तज़ा मुतह्री, इमाम मूसा सद्र, सैयद रज़ा सद्र और जलाल ताहिर शम्स जैसे महान धर्मगुरूओं ने भाग लिया। आयतुल्लाह ख़ान्सारी ने कई महत्वपूर्ण किताबें भी लिखी हैं जिनमें शरहे मुख्तसर नाफेअ, हाशिया बर उरवतुल वुस्क़ा और अलअक़ाएदे इक़्क़ा का नाम लिया जा सकता है।

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24 जमादिउल अव्वल सन 1326 हिजरी क़मरी को प्रसिद्ध लेखक, संघर्षकर्ता और विचारक नसरुल्लाह मलिकुल मुतकल्लेमीन मुहम्मद अली शाह क़ाजार के पिट्ठुओं के हाथ गिरफ़्तार हुए और मार दिए गये। उनका जन्म सन 1277 हिजरी क़मरी में इस्फ़हान नगर में हुआ था। मलिकुल मुतकल्लेमीन ने वर्ष 1299 हिजरी क़मरी में भारत का दौरा किया। वे भारतीय समाज की दयनीय स्थिति और इस देश में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के वर्चस्व से बहुत प्रभावित हुए और अपनी सबसे बड़ी पुस्तक मिनल ख़ल्क़ एल हक़ प्रकाशित की। इस पुस्तक का बुद्धिजीवियों और जनता ने भव्य स्वागत किया किन्तु ब्रिटिश साम्राज्यवाद और उसके पिट्ठु क्रोधित हो उठे। उसके बाद उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया और ईरान की ओर देश निकाला दे दिया गया। देश निकाला दिए जाने के समय वे सैयद जमालुद्दीन असदाबादी से परिचित हुए और उनकी स्वतंत्रता प्रेमी भावनाओं और उनकी जीवन शैली से बहुत प्रभावित हुए। जब वे अपने जन्म स्थल इस्फ़हान पहुंचे तो वहां उपदेश में व्यस्त हो गये। इस दौरान वे क़ाजारी शासन की नज़र में आ गये और वर्ष 1326 हिजरी क़मरी में मुहम्मद अली शाह क़ाजार के आदेश पर उनकी हत्या कर दी गयी।