Jan १८, २०१७ १४:१४ Asia/Kolkata

जैसा कि हमने कहा कि इस्लाम ने एकेश्वरवाद और एकता व भाईचारे के नारे के ज़रिए अरबों के बीच अज्ञानता के काल में व्याप्त जातीय व क़बायली मतभेद व दुश्मनी को ख़त्म किया।

इसी बिखराव के कारण अरबों के बीच हमेशा रक्तपात होता था, यह बिखराव एकेश्वरवाद की आस्था के साये में ख़त्म हो गया। इसी प्रकार पिछले कार्यक्रम में इस बात का उल्लेख किया कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम के स्वर्गवास के बाद मुसलमानों ने मदीना के पास सक़ीफ़ा नामक स्थान पर एक परिषद का गठन किया। पैग़म्बरे इस्लाम की ओर से मुसलमानों के सम्मान व महानता को बचाने की अनुंशसा के बावजूद सफ़ीक़ा की घटना इस्लामी समुदाय के बीच एक प्रकार के मतभेद का कारण बनी, लेकिन यह घटना हज़रत अली अलैहिस्सलाम की दूरदर्शिता के नतीजे में किसी ख़तरनाक विवाद का रूप धारण करने से बच गयी और मुसलमानों की एकता राजनैतिक वर्चस्व जमाने की भेंट चढ़ने से बच गयी।

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ख़लीफ़ाओं के दौर में मुसलमानों का क्षेत्र बढ़ा और ख़लीफ़ाओं के बीच मतभेद भी पैदा हुए लेकिन इस्लामी समाज की एकता को कोई नुक़सान नहीं पहुंचा। ये मतभेद कि जिनकी जड़ जातीय व क़बायली भेदभाव के सिर उठाने में निहित थी, इस सीमा तक बढ़ा कि ख़लीफ़ा की हत्या कारण बना लेकिन फिर भी इस्लामी जगत में एकता बाक़ी रही। हज़रत अली अलैहिस्सलाम की इब्ने मुल्जिम मुरादी के हाथों शहादत के बाद, अज्ञानता के काल के द्वेष का संक्रमित घाव फूट गया, बिखराव की आग भड़क उठी, इस्लामी समाज में भोग विलास और जातीय भेदभाव की भावना भड़कने से इस्लामी एकता ख़तरे में पड़ गयी। इस बीच पहले ख़लीफ़ा के निर्धारण का मार्ग बदला और यह विरासत बन गयी। मोआविया ने किसी नैतिक, धार्मिक व राजनैतिक विशेषता के कारण नहीं बल्कि विरासत के तौर पर यज़ीद को अपना उत्तराधिकारी बनाया। उमवियों के शासन काल में भी जातीय भेदभाव की नीति ने जोर पकड़ा जिससे सामाजिक खाई पैदा हुयी।

मिसाल के तौर पर सासानी शासन काल में ईरानी जनता राजाओं के अत्याचार से पीड़ित थी इसलिए न्याय व आज़ादी के ध्वजवाहक धर्म इस्लाम की ओर उन्मुख हुयी। जब ईरानी जनता ने उमवियों के ग़ैर इस्लामी व जातिवादी क्रियाकलाप देखे तो तत्कालीन शासन के ख़िलाफ़ आंदोलन शुरु किया। उस समय जातीय व क़बायली रस्साकशी के कारण मुसलमानों के बीच फूट की पृष्ठिभूमि बनी लेकिन एक केन्द्रीय राजनैतिक तंत्र के मौजूद रहने से इस्लामी जगत में राजनैतिक एकता किसी सीमा तक सुरक्षित रहीं हालांकि वह केन्द्रीय रानजैतिक तंत्र अत्याचार करता था। हालांकि उस समय इस्लामी जगत बड़े भूभाग तक फैल चुका था और मुसलमानों की फ़त्ह का दायरा ईरान, रोम, सीरिया, इटली, उत्तरी अफ़्रीक़ा, एटलांटिक महासागर के तटवर्ती इलाक़ों, कॉकेशिया, जैहून और सिंध नदी यहां तक कि स्पेन तक पहुंच चुका था लेकिन एक केन्द्रीय सत्ता के बावजूद यह अंदर से हिल चुका था। संगीत

उमवी परिवार के शासन काल के अंतिम दौर में जनता के बढ़ते असंतोष के कारण जनविद्रोह का दायरा बढ़ा। मौजूदा स्थिति के विरोधियों का मानना था कि सभी मुसलमानों को बराबर का अधिकार मिले और ग़ैर मुसलमान ईश्वरीय धर्म के अनुयाइयों के साथ न्यायपूर्ण व्यवाहर हो। यह असंतोष विभिन्न विद्रोहों के रूप में प्रकट हुआ किन्तु इन विद्रोहों में सिर्फ़ वह आंदोलन बनी उमय्या की सत्ता को हिला सका जो अलवी और अब्बासी लाए थे। अलवियों और अब्बासियों ने एक दूसरे के साथ सहयोग से बनी उमय्या की हुकूमत गिरायी लेकिन बनी उमय्या की जगह पर अब्बासियों ने सत्ता संभाली न अलवियों ने। अब्बासियों ने 132 हिजरी क़मरी में इस्लामी जगत पर अपना शासन थोपा। उनका दावा था कि वह इस्लामी समाज में न्याय, ईश्वर से भय और कल्याण का नया दौर शुरु करेंगे।

अब्बासियों के शासन काल में उनके वादे के ख़िलाफ़ न तो न्याय, ईश्वर से डर और कल्याण का दौर शुरु हुआ बल्कि इस्लामी जगत के बिखराव का पहले से ज़्यादा मार्ग समतल हुआ। अब्बासियों के शासन काल के पहले 100 साल में कि जिसका चरम हारून रशीद का शासन काल था, इस्लामी जगत में एक प्रकार से राजनैतिक केन्द्रीयता मौजूद थी। हारून रशीद की अचानक मौत और उसके दोनों बेटों अमीन और मामून के बीच प्रतिस्पर्धा ने गृह युद्ध को जन्म दिया और धीरे-धीरे इस्लामी जगत में बिखराव अब्बासी शासन काल में पूरी तरह स्पष्ट हो गया। उंदलुस या दक्षिणी स्पेन में अब्दुर्रहमान अमवी ने उमवी शासन से अलग अपनी हुकूमत बनायी। ईरान के ख़ुरासान, मावराउन्नहर या ट्रान्सोज़ियाना और सीस्तान में शासन तंत्र से अलगाववादी आंदोलन निकले और केन्द्रीय शासन के लिए सिर दर्द बन गए। मिस्र में भी स्वाधीनता का अभियान छिड़ गया। मिस्र में तूलूनिया शासन के संस्थापक इब्ने तूलून ने दरबार से भेजे गए कर जमा करने वाले अधिकारी को मानने से इंकार कर दिया और ख़ुद ख़र्चों की निगरानी करने लगा। मोरक्को और अलजीरिया में भी इदरीसियों ने सत्ता अपने हाथ में ले ली और कुछ समय बाद मिस्र में फ़ातमियों की हुकूमत बनी। इस तरह केन्द्र को छल करके वजूद में आने वाले ये आंदोलन मुसलमानों के बीच एक तरह से फूट का कारण बने।

बढ़ते राजनैतिक मतभेद के साथ साथ यूनानी व दार्शनिक विचारों के आने से इस्लामी समाज में विचारों व आस्थाओं की भरमार हो गयी। एक दूसरे से विरोधाभास रखने वाले वैचारिक मतों के वजूद से राजनैतिक मतभेद और बढ़ा। अब्बासी शासक ने इस वैचारिक व राजनैतिक बिखराव को नियंत्रित करने के लिए सुन्नी संप्रदाय के चार मतों को मान्यता दी और शिया सहित दूसरे मतों का दमन किया। इन मतों को मान्यता दिए जाने से कुछ समय के लिए इस्लामी समाज में सीमित स्तर तक एकता पैदा हुयी लेकिन यह एकता अस्थायी नहीं थी और इस तरह अब्बासी शासकों का प्रभाव ख़त्म हो गया। यहां तक कि आले बुवैह के शासन काल में सांस्कृतिक विकास के बावजूद यह एकता मज़बूत न हो सकी।             

आले बुवैह शासन काल पर सलजूक़ी तुर्कों की जीत और बग़दाद में उनके प्रवेश के बाद, मुसलमानों का शासक सलजूक़ियों के प्रभाव में आ गया हालांकि उस वक़्त तक उसका आले बुवैह परिवार से अच्छा संबंध था। सलजूक़ियों ने शियों के संबंध में कठोर रवैया अपनाया। सलजूक़ियों का सुन्नी मत की ओर रुझान था और उन्होंने बग़दाद में अब्बासी शासन का समर्थन करके एक केन्द्रित राजनैतिक तंत्र की दिशा में क़दम उठाया। उन्होंने इस्लामी समाज को अपने नियंत्रण में अपनी राजनैतिक शक्ति के तहत दिशा निर्देशित किया। इस बीच ख़्वाजा निज़ामुल मुल्क तूसी ने एकता के लिए विशेष योगदान दिया। उन्होंने बग़दाद में निज़ामिया मदरसे की स्थापना की और मुसलमानों के बीच वैचारिक व धार्मिक बिखराव को ख़त्म करने में बहुत बड़ा योगदान दिया। शियों के साथ उनका व्यवहार मैत्रीपूर्ण था। न्यायिक क्षेत्र में ख़्वाजा निज़ामुल मुल्क की उपस्थिति से मलिकशाह सलजूक़ी को मध्यपूर्व में अपनी सरकार को सांस्कृतिक व सैन्य दृष्टि से शक्तिशाली सरकार बनाने में मदद मिली लेकिन सलजूक़ी शासन काल में यह शक्ति व अपेक्षाकृत राजनैतिक एकता भी स्थायी नहीं थी। ख़्वाजा निज़ामुल और बाद में मलिक शाह सलजूक़ी की हत्या से इस साम्राज्य के भीतर भी बहुत फूट पड़ गयी थी।

सलजूक़ी शासन काल में ख़ास तौर पर सीरिया और फ़िलिस्तीन में फैली हुयी फूट और व्याप्त आंतरिक उथल-पुथल से, यूरोप के राजाओं और धार्मिक अधिकारियों को बैतुल मुक़द्दस पर चढ़ाई के लिए बेहतरीन अवसर मुहैया हुआ। गिरजाघर के अधिकारी ईसाइयों को भड़काने के साथ साथ मुसलमानों के बीच आंतरिक मतभेद को भी ख़ूब हवा देते थे। इस तरह मुसलमानों और इसाइयों के बी सलीबी जंगें छिड़ने की पृष्ठिभूमि बनी। ये जंगे लगभग 200 साल तक चलीं और दोनों धर्मों के अनुयाइयों को भारी नुक़सान पहुंचा। सलजूक़ी शासन के कमजोर होने और इस्लामी जगत में बढ़ते मतभेद का एक दुष्परिणाम यह निकला कि ईरान पर मंगोलों ने हमला कर दिया।

मलिकशाह सलजूक़ी के बाद, इब्बे हुबैरा और ख़लीफ़ा नासिर जैसी हस्तियों ने मुसलमानों के बीच एकता के लिए बहुत कोशिश की। इस दिशा में उन्होंने ख़िलाफ़त को मज़बूत बनाने और सूफ़ी गुटों को ख़िलाफ़त संस्था से जोड़ने की कोशिश की लेकिन इसके बावजूद मुसलमानों के बीच राजनैतिक बिखराव जार रहा ख़ास तौर पर बग़दादी शासकों और ख़्वारज़्मशाही शासकों के बीच दुश्मनी के कारण मुसलमानों की शक्ति क्षीण होती जा रही थी। बग़दाद के शासक और ख़्वारज़्मशाही शासक इस्लामी जगत के बड़े भाग पर शासन कर रहे थे। इन दोनों के बीच दुश्मनी ऐसी थी कि तत्कालीन बग़दाद के शासक नासिर ने मुसलमानों के बीच एकता के अपने दावे के बावजूद नस्तूरी पादरी के सहयोग से चंगेज़ ख़ान को ख़्वारज़्मशाही शासन के अधीन क्षेत्रों पर हमला करने के लिए उकसाया। चंगेज़ ख़ान ने जो इस्लामी जगत के बीच आपस में मतभेद व फूट को अपना आधिपत्य बढ़ाने के लिए उचित अवसर समझता था, ईरान सहित इस्लामी जगत पर चढ़ाई कर दी जिसके नतीजे में 656 हिजरी में उस शासन का पतन हो गया जिसे आम तौर पर ख़िलाफ़त कहा जाता है।

आठवी हिजरी क़मरी के शुरु में उस्मानी सिपाहियों ने सत्ता अपने हाथ में ली और यह इस्लामी जगत में बहुत बड़ी घटना थी क्योंकि वे बाद में सलीबियों के खिलाफ़ मुसमलानों की बहुत बड़ी शक्ति बने। उस्मानी शासक सुलतान मोहम्मद द्वितीय ने जिनकी उपाधि मोहम्मद फ़ातेह थी, इस्तांबोल की फ़तह के बाद उस्मानी शासन की शक्ति को बढ़ाने तथा ख़िलाफ़त की स्थापना की कोशिश की। मुसलमान सुलतान मोहम्मद को मुक्तिदाता, सलीबियों के हमलों की क्षतिपूर्ति करने वाला और मंगोलों के हमलों से हुयी ख़राबी की भरपायी करने वाला समझते थे और इसी चीज़ से उसकी शक्ति व प्रतिष्ठा ज़्यादा हुयी और इस प्रकार इस्तांबोल इस्लाम समाज के नेतृत्व का शक्तिशाली गढ़ समझा जाने लगा। उस्मानी शासन सलीबी जंगों से उत्पन्न उथल-पुथल स्थिति में इस्लामी जगत के लिए एक केन्द्र बनाने में सफल हुआ हालांकि यह दावा नहीं किया जा सकता कि इस्लामी जगत उस्मानी शासन के सत्ता में पहुंचने से मज़बूत हुआ।