इस्लामी जगत-4
हमने बताया था कि इस्लामी जगत में एक समय तक फूट और आठवीं शताब्दी हिजरी के आरंभिक बरसों में ख़िलाफ़त के विघटन के बाद उसमानी शासन के सशक्त सिपाहियों ने सत्ता अपने हाथ में ले ली और फिर धीरे-धीरे वे बैतुल मुक़द्दस पर स्वामित्व का दावा करने वाले सलीबी ईसाइयों के विरुद्ध मुसलमानों की सबसे बड़ी ताक़त में बदल गए।
मुसलमान, उसमानी ख़लीफ़ा सुल्तान मुहम्मद को इस्लाम के मोक्षदाता, सलीबी ईसाइयों के हमलों का मुक़ाबला करने वाले और मंगोलों के विध्वंसक हमलों से पैदा होने वाली स्थिति को बेहतर बनाने वाला शासक मानते थे और इसी कारण उसकी शक्ति और वैभव में वृद्धि होती चली गई। इस प्रकार से कि इस्तंबूल, ख़िलाफ़त और इस्लामी समाज के नेतृत्व का सशक्त केंद्र के रूप में पहचाना जाने लगा। सुल्तान मुहम्मद ने अनातोली और बालकान में उसमानी शासन को इस प्रकार स्थापित किया कि वह चार शताब्दियों तक बिना डगमगाए जारी रहा। इस ऐतिहासिक चर्चा को जारी रखते हुए हम आज के कार्यक्रम में दो विषयों पर बात करेंगे। प्रथम, मुसलमानों के बीच फूट और उनकी स्थिति कमज़ोर होने में उसमानी और सफ़वी शासन के बीच प्रतिस्पर्धा का प्रभाव और दूसरा, इस्लामी देशों में यूरोपीय साम्राज्यवादियों का आगमन तथा मुसलमानों के बीच अधिक फूट।
उसमानी शासन ने सलीबी युद्धों या क्रूसेड्स के बाद की अराजक स्थिति में इस्लामी जगत में एक केंद्रियता उत्पन्न करने में सफलता प्राप्त की लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि उसमानियों के सत्ता में आने से इस्लामी जगत एकजुट हो गया। इस काल में राष्ट्रवाद की भावनाओं में वृद्धि और एकेश्वरवादी मान्यताओं के कमज़ोर पड़ने के कारण इस्लामी देशों विशेष कर ईरान व उसमानी शासन के बीच प्रतिस्पर्ध शुरू हो गई। अलबत्ता इस्लामी देशों के बीच मतभेद और दुश्मनी पैदा करने में यूरोपीय सरकारों की भूमिका की अनदेखी नहीं की जा सकती। इतिहास साक्षी है कि दो बड़े इस्लामी देशों अर्थात ईरान व उसमानी के संबंध, आठवीं शताब्दी हिजरी से लेकिर उसमानी शासन की समाप्ति तक निरंतर शत्रुतापूर्ण और रक्तपात से भरे रहे और यूरोप वालों ने इन दोनों के बीच मतभेद पैदा करने और दुश्मनी को हवा देने में प्रभावी भूमिका निभाई। उदाहरण स्वरूप ईरान में गोरकानियों के शासन काल में तैमूर ने पूर्वी रोम के पतन की ओर अग्रसर शासन से उसमानी सुल्तान के विरुद्ध गठजोड़ कर लिया और वर्ष 1425 ईसवी में उसे पराजित कर दिया।
इस्लामी जगत में फूट और ईरान व उसमानी के बीच विवाद, सफ़वियों के सत्ता में आने के बाद बढ़ गया और वर्ष 920 हिजरी क़मरी में इन दो शासनों के बीच युद्ध की चिंगारी फूटी। इस साल ईरान और उसमानी के सिपाही पश्चिमी आज़रबाइजान के चालदरान क्षेत्र में एक दूसरे के सामने आ गए। इस युद्ध में सफ़वियों को उसमानियों से पराजय हुई जिनके पास बंदूक़ें और तोपें थीं। सुल्तान सलीम प्रथम ने तबरेज़ पर क़ब्ज़ा कर लिया लेकिन आठ ही दिन बाद उसके सैन्य अधिकारी, जो शीत ऋतु ईरान में बिताना नहीं चाहते थे, सफ़वी शासन की राजधानी से बाहर चले गए। चालदरान का युद्ध इस्लामी जगत में मतभेद और फूट का प्रतीक था और इससे इस्लामी जगत के दो बड़े देशों के बीच विवाद के अलावा ईरान में भी फूट पड़ गई क्योंकि शाह इस्माईल इस युद्ध के बाद एकांतवास में चला गया और सत्ता पर क़ब्ज़े के लिए क़ज़लबाश गुटों के बीच गृहयुद्ध आरंभ हो गया।
इस्लामी जगत में फूट की अंतिम कड़ी, इस्लामी देशों में यूरोपीय साम्राज्य के आगमन के साथ आरंभ हुई। जिन वैचारिक परिवर्तनों ने यूरोप में मध्य युगीन शताब्दियों का अंत किया था और नए दार्शनिक जीवन को अस्तित्व प्रदान किया था उसने साम्राज्यवाद के जन्म में प्रभावी भूमिका निभाई। यह आंदोलन, जिसे यूमनिज़्म या मानववाद का नाम दिया गया, पहले चरण में साहित्यिक व दार्शनिक रंग लिए हुए था और मनुष्य को हर चीज़ का मानदंड समझता थ और चाहता था कि प्रकृति को पूरी तरह से मनुष्य के क़ब्ज़े में दे दे। लेकिन यह विचार, संसार पर क़ब्ज़े का कारण बना और इसी के चलते संसार के विभिन्न देशों विशेष कर मुस्लिम देशों पर यूरोपीय साम्राज्यवादियों ने क़ब्ज़ा करना शुरू किया। अलबत्ता इससे पहले भी यूरोपीय देश, इस्लामी देशों के बीच मतभेद पैदा करने में अहम भूमिका निभा रहे थे। मध्य युगीन शताब्दियों में इस्लामी जगत शक्ति व महानता का चिन्ह था जबकि यूरोपीय देश कमज़ोरी और पिछड़ेपन का शिकार थे लेकिन पुनर्जागरण के नाम से यूरोप में जो परिवर्तन आया और जिसने पश्चिम के आर्थिक, राजनैतिक, सामरिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों को परिवर्तित कर दिया, उसके चलते इस्लामी देशों पर यूरोपीय देशों के साम्राज्यवादी वर्चस्व की भूमि प्रशस्त हुई।
18वीं और 19वीं शताब्दी में पश्चिम की साम्राज्यवादी सरकारों और उसमानी, ईरान व मिस्र के बीच होने वाले अनेक युद्धों के परिणाम स्वरूप इन देशों का एक बड़ा भाग उनके हाथ से निकल गया, उनकी राजनैतिक सत्ता तबाह हो गए और वे साम्राज्यवादी शक्तियों की लूट-मार का शिकार हो गए। इस प्रकार से कि केवल रूसियों ने छः युद्धों में उसमानी को पराजित किया जिसके परिणाम स्वरूप कुचूक-कारनियाजा समझौते पर हस्ताक्षर हुए और उसमानी में हस्तक्षेप के लिए रूस के ज़ार शासन के हाथ व्यवहारिक रूप से खुल गए। इसी के बाद काला सागर के उत्तर और यूक्रेन के दक्षिण में स्थित क्राइमिया प्रायद्वीप उसमानी से निकल कर रूस में शामिल हो गया। रूसियों ने इसी तरह बाकू और दरबंद को ईरान से छीन लिया और वर्ष 1723 में अंतिम सफ़वी शासक शाह सुल्तान हुसैन के पुत्र तहमास्ब द्वितीय से उन्होंने एक समझौता किया जिसके अंतर्गत कैस्पियन सागर में ईरान के सभी क्षेत्र रूस के हवाले कर दिए गए। इसकी शर्त यह थी कि रूस मुहम्मद और अशरफ़ अग़ान के नेतृत्व वाली अफ़ग़ान सेना को ईरान से बाहर निकालने में सफ़वियों की मदद करेगा जिन्होंने इस्फ़हान समेत ईरान के एक बड़े भाग पर क़ब्ज़ा कर लिया था।
इस प्रकार ईरान, जो 19वीं सदी में इस्लामी जगत की शक्ति का एक आधार था, रूस व ब्रिटेन जैसी दो यूरोपीय शक्तियों की लूटमार का शिकार बन गया और इन दोनों देशों ने विभिन्न कारणों से ईरान के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप किया। हालांकि ईरान की समृद्ध संस्कृति व सभ्यता के कारण ये देश कभी भी अन्य इस्लामी देशों की तरह ईरान को अपनी कॉलोनी या उपनिवेश नहीं बन सके लेकिन इस काल में रूस व ब्रिटेन जैसे दो साम्राज्यवादी देशों ने इस्लामी जगत में फूट और अराजकता से फ़ायदा उठा कर सभी इस्लामी देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप शुरू किया और उनमें से कई को अपना उपनिवेश बना लिया। वस्तुतः अधिकांश इस्लामी देशों के शासकों की आत्मुग्धता, भ्रष्टाचार और स्वार्थ और साथ ही मुसलमानों के बीच पैदा हो चुका व्यापक मतभद इस बात का कारण बना कि 18वीं और 19वीं शताब्दियों में पश्चिमी साम्राज्यवादी इस्लामी जगत में अपना हस्तक्षेप बढ़ा दें।
इस काल में कुछ शासकों की तानाशाही और मुसलामनों के बीच मतभेद इतना बढ़ गया था कि पश्चिमी साम्राज्य के मुक़ाबले में इस्लामी जगत की एकता की कोई आशा नहीं रह गई थी। शायद कहा जा सकता है कि इस्लामी जगत में राष्ट्रीय और जातीय मान्यताएं इतनी जड़ पकड़ चुकी थीं कि कुछ इस्लामी देशों के शासकों की एकता की पुकार अन्य देशों में सुनाई ही नहीं दे रही थीं।
इस्लामी देशों के बीच आपसी मतभेद और दुश्मनी के कारण उनके बीच आपसी विश्वास बचा ही नहीं था कि जिसके सहारे इस्लामी जगत में एकता को पुनर्जीवित किया जाता। उदाहरण स्वरूप जब नादिर शाह ने इस्लामी एकता का नारा लगाया तो उसे उसमानी शासन की ओर से उचित जवाब नहीं मिला क्योंकि उसमानी ख़लीफ़ा उस समय भी इस्लामी देशों में सबसे सशक्त सरकार का मालिक था और वह अपने आपको इस्लामी जगत के नैतिक, राजनैतिक और धार्मिक नेतृत्व के लिए बेहतर स्थिति में देख रहा था। इसी तरह जब उसमानी शासन के अंतिम बरसों में सुल्तान अब्दुल हमीद द्वितीय ने सैयद जमालुद्दीन असदाबादी जैसे सुधारकों की समरसता से सभी मुसलमानों की ओर से ख़लीफ़ा के (अर्थात स्वयं उसके) समर्थन के आधार पर इस्लामी एकता की नीति अपनाई और हर जगह इसका प्रचार किया तो उसे इस्लामी देशों विशेष कर ईरान की ओर से उचित उत्तर नहीं मिला क्योंकि इस्लामी देशों के विचार में उसमें इस्लामी जगत के नेतृत्व की योग्यता नहीं थी और उसमानी शासकों ने मुस्लिम सरकारों के संबंध में विरोधाभासी नीतियां अपना रखी थीं।
यद्यपि उसमानी शासन श्रृंखला के 34वें ख़लीफ़ा अब्दुल हमीद द्वितीय के काल में जो सन 1876 से 1909 पर आधारित था किसी हद तक संसार के मुसलमानों के बीच एक प्रकार की जागरूकता उत्पन्न हो गई थी और कुछ मुस्लिम सुधारक और विद्वान, इस्लाम के पुनर्जवित करने और मुसलमानों के बीच एकता उत्पन्न करने की कोशिश कर रहे थे लेकिन सुल्तान अब्दुल हमीद द्वितीय की नीतियों का मुसलमानों ने व्यापक स्तर पर स्वागत नहीं किया। अब्दुल हमीद द्वितीय ने अनेक सुधारवादी काम भी किए जिनका इस्लामी जगत में स्वागत भी किया गया लेकिन इससे पश्चिमी साम्राज्य के विरुद्ध एक व्यापक एकता उत्पन्न ही हो सकी क्योंकि अनेक मुस्लिम देशों विशेष कर ईरान को उसमानी ख़लीफ़ा पर विश्वास नहीं था और वे उसके कार्यों को राजनैतिक, निजी या राष्ट्रीय हितों की पूर्ति की राह में उठाए गए क़दम समझते थे।