इस्लामी जगत-5
सैयद जमालुद्दीन असदाबादी हालिया शताब्दी के सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक सुधारकों व इस्लामी जगत में एकता के पक्षधरों में से थे।
वह ऐसे सुधारक धर्मगुरू थे जिन्होंने 19वीं शताब्दी के अंत और 20 शताब्दी के आरंभ में धार्मिक आस्थाओं व शिक्षाओं को अंधविश्वासों से अलग करने और इस्लाम की मूल शिक्षाओं पर ध्यान दिलाने का प्रयास किया ताकि इस्लाम की शुद्ध शिक्षाएं वर्तमान समय के इंसान की समस्याओं का समाधान कर सकें। इस्लामी जगत में एकता व सुधार के लिए जो आंदोलन चलाये गये उनमें पश्चिम से संघर्ष पर विशेष ध्यान दिया गया क्योंकि पश्चिम को पूर्वी राष्ट्रों के पिछड़ेपन के महत्वपूर्ण कारण के रूप में देखा जाता था और इस्लामी जगत में एकता व एकजुटता को इस्लामी जगत की समस्याओं के समाधान का एकमात्र विकल्प समझा जाता था। इस्लामी जगत में एकता व एकजुटता की दिशा में जो आंदोलन चलाया गया, उसमें सैयद जमालुद्दीन असदाबादी ने एक विचारक की भूमिका निभाई और जब ज़रुरत पड़ती थी तो वह एक प्रतिक्रियावादी का दायित्व निभाते थे और इस्लामी देशों के नेताओं के नाम पत्र , पत्रिका प्रकाशन और लोगों के मध्य भाषण के ज़रिए इस्लामी एकता की बात करते थे।
वह ऐसे समय में पूर्वी राष्ट्रों और मुसलमानों की जागरुकता के लिए उठ खड़े हुए थे जब ईरान, उसमानी साम्राज्य और भारत को रूस, फ्रांस और ब्रिटेन जैसे यूरोपीय देशों की ओर से अतिग्रहण का खतरा था और दूसरे इस्लामी देश व क्षेत्र प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पश्चिम की वर्चस्ववादी सरकारों के नियंत्रण में जा चुके थे।
सैयद जमालुद्दीन असदाबादी ने सबसे पहले अपनी राजनीतिक गतिविधियां अफगानिस्तान, भारत, मिस्र, ईरान और उसमानी साम्राज्य में आरंभ की और उनका ध्यान इन देशों की आंतरिक समस्याओं पर था। उन्होंने अपना महत्वपूर्ण प्रयास वैचारिक, राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्रों में मौजूद समस्याओं के समाधान पर किया परंतु धीरे- धीरे उनकी समझ में आ गया कि इन देशों की आंतरिक समस्याएं विदेशी साम्राज्य से जुड़ी हुई हैं और जब तक उन्हें विदेशी साम्राज्यवादियों से मुक्ति नहीं दिलाई जायेगी तब तक उनकी समस्याओं का समाधान संभव नहीं है और केवल मुसलमान राष्ट्रों के मध्य मतभेदों को समाप्त करके और मुसलमान सरकारों को एकजुट करके पश्चिमी साम्राज्यवादियों के मुकाबले में प्रतिरोध किया जा सकता है। सैयद जमालुद्दीन असदाबादी ने पश्चिमी साम्राज्य के मुकाबले में एकता का जो इस्लामी आंदोलन आरंभ किया था उसका संबंध कोलकाता और हैदराबाद में उनके चार वर्षीय प्रवास के समय से संबंधित है। उस समय वह हैदराबाद में गुप्त रूप से “उर्वतुलवुस्का” नाम का एक संगठन गठित करने में सफल हो गये और धीरे- धीरे उसकी शाखायें मिस्र, टयूनीशिया, सहित उत्तरी अफ्रीक़ा में भी बन गयीं। इस संगठन का बुनियादी उद्देश्य विश्व स्तर पर मुसलमानों की एकता के लिए प्रयास और पश्चिमी साम्राज्य से संघर्ष करना था।
भारत पर ब्रिटेन के आधिपत्य और इस देश में दूसरे मुसलमानों के साथ संपर्क स्थापित करने हेतु सैयद जमालुद्दीन असदाबादी के लिए मौजूद सीमाओं के दृष्टिगत वह भारत से निकल कर यूरोप चले गये। उन्होंने यूरोप में “अलउर्वतुल वुस्का” नाम की पत्रिका प्रकाशित की और उस पत्रिका में इस्लामी एकता के उद्देश्य को आगे बढ़ाया और इस पत्रिका के 18 संस्करणों में पश्चिमी साम्राज्य के मुकाबले में मुसलमानों के मध्य एकता की आवश्यकता के संबंध में विभिन्न लेख लिखे और इस प्रकार विश्व वासियों विशेषकर मुसलमानों के ध्यान को अपने विचारों की ओर आकृष्ट किया। वह अपने लेखों में विश्व के विभिन्न क्षेत्रों के मुसलमानों की समस्याओं को बयान करते थे। वह इस्लामी शासकों की तानाशाही और पश्चिमी साम्रज्य को इन समस्याओं का दो मूल कारण मानते थे। उनके अनुसार इन समस्याओं से मुकाबले का एकमात्र मार्ग समस्त मुसलमानों के मध्य एकता है।
अलउर्वतुल वुस्का नामक पत्रिका प्रकाशित करके सैयद जमालुद्दीन असदाबादी ने विश्व के मुसलमानों के ध्यान को आकर्षित करने और इस्लामी एकता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया। इस प्रकार से कि ईरान सहित बहुत से इस्लामी देशों में प्रकाशित होने वाली पत्रिकाओं में इस्लामी एकता की विचारधारा को प्रचलित किया गया और उर्वतुल वुस्का पत्रिका का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद करके मुसलमानों के मध्य एकता के लिए प्रयास किया गया। सैयद जमालुद्दीन असदाबादी ने अपनी पत्रिका के पहले संस्करण में एक रोचक प्रस्ताव दिया और अगर इस प्रस्ताव पर ध्यान दिया जाता और इस्लामी शासक इसे गम्भीरता से लागू करते तो इस्लामी एकता की विचारधारा व्यवहारिक दृष्टि से निकट हो जाती।
सैयद जमालुद्दीन असदाबादी ने अपनी पत्रिका में सऊदी अरब के पवित्र नगर मक्का में इस्लामी कांफ्रेन्स का सुझाव दिया। इस्लामी जगत की एकता के संबंध में सैयद जमालुद्दीन असदाबादी के जो दृष्टिकोण हैं उसमें वह तीन चीज़ों पर बल देते हैं। खतरे के प्रति संयुक्त आभास, रक्षा के उपकरणों व संसाधनों की पहचान और अमल करने के समय आम सहमति को धार्मिक व राजनीतिक एकता के लिए आवश्यक समझते थे और इस एकता तक पहुंचने के लिए कुछ सिद्धांतों व शैलियों पर भी बल देते थे। उनका मानना था कि जब तक इस्लामी देशों की व्यवस्था अच्छी व स्वतंत्र नहीं होगी, शासक अच्छे, साहसी और स्वाभिमानी नहीं होंगे तब तक साम्राज्य के मुकाबले में प्रतिरोध संभव नहीं है और व्यवहारिक रूप से कठपुतली सरकारों, भ्रष्ठ, डरपोक और गैर स्वाभिमानी नेताओं की उपस्थिति के साथ साम्राज्य से मुकाबला कठिन है। इसी प्रकार सैयद जमालुद्दीन असदाबादी का मानना था कि विश्व के मुसलमान प्रतिरोध के केन्द्र के रूप में एक शक्तिशाली व बड़े देश को स्वीकार कर लें ताकि समस्त मुसलमान उसी को आधार मान कर साम्राज्य के विरुद्ध एकजुट हो जायें। सऊदी अरब के पवित्र नगर मक्का में इस्लामी कांफ्रेस के लिए उनके प्रयास को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है।
सैयद जमालुद्दीन असदाबादी विदेशियों के मुकाबले में मुसलमानों के पक्षपात की प्रशंसा करते थे परंतु वह सांप्रदायिकता और जातिवाद के मुखर विरोधी थे और उसे कमजोरी और मुसलमानों की विफलता का कारण समझते थे। उनका मानना था कि अगर मुसलमान एकजुट हो जायें और सांप्रदायिकता को समाप्त कर दें और अपने क्रोध का प्रयोग विदेशियों के विरुद्ध करें तो बड़ी से बड़ी शक्ति भी उनका मुकाबला नहीं कर सकती।
सैयद जमालुद्दीन असदाबादी विश्व के मुसलमानों से सांप्रदायिकता समाप्त किये जाने की दिशा में अपनी पहचान बताने से कतराते थे । वह स्वयं को कभी शीया तो कभी
सुन्नी हनफी बताते थे। विशेष सम्प्रदाय का अनुयाइ होने के कारण वह कभी भी किसी मुसलमान की आलोचना नहीं करते थे। वह उम्मते मोहम्मदी और विलायते इस्लामी जैसे शब्दों का प्रयोग करते थे। वह कुरआन और इस्लाम के आधार पर एकता पर बल देते थे और एसा धार्मिक व राष्ट्रीय दृष्टिकोण नहीं अपनाते थे जिससे मुसलमानों की एकता प्रक्रिया को आघात पहुंचे।
“अलउर्वतुल वुस्का” पत्रिका के बंद होने के बाद वर्ष 1885 के आरंभ से 1897 तक इस्लामी एकता की दिशा में सैयद जमालुद्दीन असदाबादी जो अभियान चला रहे थे वह व्यवहारिक और राजनीतिक रूप धारण कर गया था। उसमानी साम्राज्य बहुत सारी कमियों के बावजूद पश्चिम के साम्राजयवादी अतिक्रमण की दिशा में सबसे बड़ी रुकावट था और मुसलमानों के मध्य उसका बहुत प्रभाव था इसी बात के दृष्टिगत सैयद जमालुद्दीन असदाबादी उसमानी शासक सुल्तान अब्दुल हमीद द्वितीय का समर्थन करने लगे ताकि उसमानी खिलाफत को आधार बनाकर पश्चिमी साम्रराज्य के प्रवेश से इस्लामी देशों की सुरक्षा करें। इसी संबंध में उन्होंने सुल्तान अब्दुल हमीद से इस्लामी एकता के संबंध में पत्राचार किया और एक विस्तृत पत्र में इस्लामी एकता को व्यवहारिक बनाने के अपने सुझाव को पेश किया। सैयद जमालुद्दीन असदाबादी उसमानी साम्राज्य और ब्रिटेन के मध्य गठजोड़ और इस्लामी एकता के विचार के मुकाबले में ब्रिटेन के संभावित विरोध से अवगत थे इसलिए उन्होंने अब्दुल हमीद को सुझाव दिया कि भारत, अफगानिस्तान, बलोचिस्तान, तुर्कमनिस्तान और बुखारा को उसमानी साम्राज्य के अधीन कर ले ताकि उसमानी सरकार को मज़बूत करके रूस के विरुद्ध नये मोर्चे को अस्तित्व में लाया जा सके।
सुल्तान अब्दुल हमीद द्वितीय को राष्ट्रवाद की भारी लहर का सामना था इसलिए उसने इस सुझाव का स्वागत किया ताकि पैन इस्लामी नीति ,,,,के अंतर्गत उसमानी साम्राज्य के भीतर और इस्लामी जगत में एकता की रक्षा कर सके। इसी परिप्रेक्ष्य में उसने सैयद जमालुद्दीन असदाबादी से बात करने के लिए एक प्रतिनिधि भेजा और उनके दृष्टिकोणों से अवगत हुआ। उसने सैयद जमालुद्दीन असदाबादी और इस्लामी एकता के दूसरे समर्थकों के दृष्टिकोणों का लाभ उठाकर मुसलमानों विशेषकर एशिया के मुसलमानों को एकजुट करने की दिशा में व्यवहारिक रुप से कदम उठाया और इसी उद्देश्य से उसने इस्लामी संगठन आदि का गठन किया।
उसने हाजियों के समर्थन से आनातोली, बगदाद और सऊदी अरब के मध्य रेल मार्ग बनाकर इस्लामी एकता की दिशा में सैयद जमालुद्दीन असदाबादी के विचारों को व्यवहारिक रूप देने का प्रयास किया परंतु चूंकि इस्लामी जगत में एकता के व्यवहारिक होने से ब्रिटेन भयभीत था इसलिए ब्रिटेन का दृष्टिकोण और कुछ दूसरे कारक सैयद जमालुद्दीन असदाबादी के इस्लामी एकता के दृष्टिकोण के व्यवहारिक होने की दिशा में रुकावट बन गये।
सैयद जमालुद्दीन असदाबादी ने इस्लामी एकता के दृष्टिकोण को व्यवहारिक बनाने के उद्देश्य से कई बार ईरान की यात्रा की और ईरान के तत्कालीन शासक नासिरुद्दीन शाह और प्रधानमंत्री एतमादुस्सल्तनत से भेंट की परंतु नासिरुद्दीन शाह के दरबारियों और उससे महत्वपूर्ण ब्रिटेन के षडयंत्र के कारण ईरान इस्लामी एकता के अभियान में शामिल न हो सका। सैयद जमालुद्दीन असदाबादी को ईरान में अपने प्रवास के दौरान पहले से अधिक इस्लामी एकता की दिशा में रुकावट के रूप में आंतरिक तानाशाही का सामना हुआ और उन्होंने उसके विरुद्ध पूरी शक्ति से गतिविधि आरंभ कर दी इस प्रकार से कि तंबाकू अभियान में तंबाकू के खिलाफ फतवा देने वाले ईरान के वरिष्ठ शीया धर्मगुरू मिर्जा शीराज़ी के नाम पत्र लिखकर नासिरुद्दीन शाह की तानाशाही के विरुद्ध महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उस समय सैयद जमालुद्दीन असदाबादी को ईरान से इराक के बसरा और बगदाद निकाल दिया गया था और उनके निष्कासन के कुछ ही दिन बाद आयतुल्लाह मिर्ज़ा शीराज़ी ने तंबाकू के हराम होने का फतवा दिया था।