Jan २२, २०१७ १०:४२ Asia/Kolkata

8 जनवरी 2017 को तेहरान के शाम के साढ़े सात बजे एक दुखदायी समाचार के प्रसारण से दसियों लाख ईरानी और पूरी दुनिया में इस्लामी क्रान्ति के समर्थक दुखी व प्रभावित हुए।

ईरान की इस्लामी क्रान्ति हित संरक्षक परिषद के अध्यक्ष आयतुल्लाह हाशेमी रफ़सन्जानी अत्याचारी शाही शासन के ख़िलाफ़ संर्घर्ष करने वालों और इमाम ख़ुमैनी के निकटवर्ती साथियों में थे। उनका दिल का दौरा पड़ने से देहांत हुआ। जिस अस्पताल में उन्हें भर्ती किया गया था, वहॉं हज़ारों की संख्या में लोग इकट्ठा हुए। इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा ख़ामेनई ने आयतुल्लाह रफ़सन्जानी के देहांत पर अपने शोक संदेश में कहा, “ऐसे साथी का चला जाना बहुत सख़्त है जिसके साथ 59 साल की दोस्ती व सहयोग रहा है गया। कितनी मुश्किलें व कठनाइयां इन दसियों साल के दौरान हमें पेश आयीं और बहुत से कालखंड में कितनी मंत्रणा और सहमतियों ने हमें संयुक्त रूप से कोशिश करने, धैर्य से काम लेने और ख़तरों का सामना करने के लिए प्रेरित किया। उन वर्षों में उनकी समझदारी और अद्वितीय लगाव उन सभी लोगों के लिए जो उनके सहयोगी थे और ख़ास तौर पर हमारे लिए भरोसेमंद सहारा थे।”

वरिष्ठ नेता ने आयतुल्लाह हाशेमी रफ़सन्जानी की हस्ती की प्रशंसा में अपने संदेश में कहा, “वह शाह के अत्याचार के ख़िलाफ़ संघर्ष करने और इस ख़तरनाक व गौरान्वित करने वाली राह में यातना सहने करने वाली पहली पीढ़ी के असाधारण नमूना थे। वर्षों जेल में गुज़ारे और सावाक की यातनाएं झेलीं और इन सभी चीज़ों के सामने डटे रहे और फिर पवित्र प्रतिरक्षा के काल में भारी ज़िम्मेदारियां और ईरानी संसद, विशेषज्ञ परिषद इत्यादि की अध्यक्षता इस पुराने संघर्षकर्ता के उतार चढ़ाव से भरे जीवन के गौरान्वित पल हैं। हाशेमी की मौत के बाद हमें ऐसी कोई हस्ती नज़र नहीं आती जिनके साथ हमने इस ऐतिहासिक चरण के उतार चढ़ाव में इतने लंबे समय तक संयुक्त अनुभव किया हो।” इस्लामी क्रान्ति हित संरक्षक परिषद के अध्यक्ष का उस दिन देहान्त हुआ जिस दिन ईरान के इतिहास में 165 साल पहले इस देश के सुधारवादी चांसलर अमीर कबीर की हत्या हुयी थी। वह अयोग्य क़ाजारी शासक नासेरुद्दीन शाह के शासन काल में लगभग साढ़े तीन साल तक चांसलर थे।

अमीर कबीर ने इतने कम समय में ईरान में सुधार व विकास के लिए ऐसे क़दम उठाए कि देशी व विदेशी दुश्मन ख़ास तौर पर ब्रितानी साम्राज्य ने उनके ख़िलाफ़ साज़िश रची और अयोग्य क़ाजारी शासक ने उन्हें क़ैद करने और फिर क़त्ल करने का आदेश दिया। लेकिन अमीर कबीर ईरान के इतिहास में अमर हो गए। अमीर कबीर उन हस्तियों में थे जिनसे आयतुल्लाह हाशेमी रफ़सन्जानी बहुत प्रभावित थे और पहलवी शासक मोहम्मद रज़ा शाह के अत्याचारी शासन के खिलाफ़ संघर्ष के दौरान अमीर कबीर के बारे में एक किताब लिखी जिसमें उन्होंने उन्हें साम्राज्य के ख़िलाफ़ नायक के रूप में चित्रित किया।     

अली अकबर हाशेमी रफ़सन्जानी 1935 में किरमान प्रांत के रफ़सन्जान ज़िले के बहरमान गांव में एक ऐसे परिवार में पैदा हुए जो धार्मिक था और पेशे से किसान था। 14 साल की उम्र में वह इस्लामी ज्ञानों के केन्द्र क़ुम धार्मिक शिक्षा हासिल करने गए। बहुत जल्द ही उन्होंने राजनैतिक संघर्ष के मैदान में क़दम रखा। डॉक्टर मुसद्दिक़ की राष्ट्रीय सरकार के ख़िलाफ़ अमरीका-ब्रिटेन के सैन्य विद्रोह के बाद अकबर हाशेमी रफ़सन्जानी ने अपनी राजनैतिक व सांस्कृतिक गतिविधियां शुरु की। उन्हीं वर्षों में आयतुल्लहिल उज़्मा इमाम ख़ुमैनी से उनकी पहचान हुयी। इमाम ख़ुमैनी से उनकी पहचान उनके जीवन में नए अध्याय का आरंभ बनी। उन दिनों इमाम ख़ुमैनी की वरिष्ठ धर्मगुरु के रूप में पहचान नहीं बन पायी थी और लोगों के बीच भी बहुत मशहूर नहीं थे। हाशेमी रफ़सन्जानी धीरे-धीरे इमाम ख़ुमैनी के निकटवर्ती शिष्यों में शामिल हुए। हाशेमी रफ़सन्जानी ज्ञान की प्राप्ति व संघर्ष के साथ साथ इस्लामी शिक्षाओं के प्रसार में भी सक्रिय रहे और कुछ जवान छात्रों के सहयोग से शिया मत के बारे में पत्रिका प्रकाशित करते थे।                

मोहम्म रज़ा पहलवी ने 1953 के सैन्य विद्रोह के बाद अमरीका और ब्रिटेन के बहुआयामी सहयोग से अपनी सत्ता को मज़बूत करने की कोशिश शुरु की और चूंकि इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उसके पास जनाधार नहीं था इसलिए उसने अमरीका और ब्रिटेन के बूढ़े साम्राज्य पर ज़्यादा से ज़्यादा निर्भरता की कोशिश की। इसी परिप्रेक्ष्य में उसने सफ़ेद क्रान्ति के नाम पर भूमि सुधार और क़ानून में कुछ बदलाव किया। लेकिन वास्वत में इस सुधार का लक्ष्य ईरानी जनता को धार्मिक व सांस्कृतिक दृष्टि से पूरी तरह बदलना और ईरान को अमरीका व ब्रिटेन की अगुवाई में पश्चिमी सरकार के हवाले करना था। शियों के वरिष्ठ धर्मगुरु आयतुल्लाह बुरुजर्दी के देहांत के बाद इमाम ख़ुमैनी क़ुम के धार्मिक केन्द्र और ईरान में बड़े धर्मगुरु के रूप में पहचाने जाने लगे और पूरे ईरान से लोग इमाम ख़ुमैनी के संपर्क में आ गये। इमाम ख़ुमैनी ने अपने वीर छात्रों के साथ जिसमें आयतुल्लाह रफ़सन्जानी भी थे, शाह की सरकार की सफ़ेद क्रान्ति व भूमि सुधार की आड़ में ईरानी जनता को पूरी तरह बदलने और देश को साम्राज्य के हवाले करने के छिपे लक्ष्य के बारे में जनता को जागरुक करने का बीड़ा उठाया। इमाम ख़ुमैनी के पर्दाफ़ाश करने वाले भाषण से अत्याचारी मोहम्मद रज़ा पहलवी के शासन की चूलें हिल गयीं। शाही शासन ने इमाम ख़ुमैनी और उनके शिष्यों के पर्दाफ़ाश करन वाले भाषणों से चिंता व डर के कारण बिल्कुल घुटन का माहौल बनाना और धार्मिक व राजनैतिक कार्यकर्ताओं की गिरफ़्तारी और उन्हें यातना देने की नीति अपनायी। शाही शासन ने मार्च 1963 में क़ुम के सबसे बड़े मदरसों में से एक फ़ैज़िया मदरसे पर हमला किया और सैकड़ों लोगों को शहीद, घायल व गिरफ़्तार किया। गिरफ़्तार हुए छात्रों में से एक आयतुल्लाह हाशेमी रफ़सन्जानी भी थे। उस समय मदरसों के छात्रों के लिए सैन्य ट्रेनिंग हासिल करना माफ़ थी। शाही शासन ने क़ुम के धार्मिक केन्द्र से जवानों को दूर करने के लिए मदरसों के छात्रों के लिए सैन्य ट्रेनिंग को अनिवार्य कर दिया। उन्हीं छात्रों में हाशेमी रफ़सन्जानी भी थे जो सैन्य ट्रेनिंग के लिए गए थे।

15 ख़ुर्दाद की घटना के बाद शाही शासन के ख़िलाफ़ इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह का संघर्ष शुरु हुआ। हाशेमी रफ़सन्जानी 15 ख़ुर्दाद की घटना के बाद सैन्य ट्रेनिंग के लिए नहीं गए और कुछ महीने अपने वतन में ख़ामोशी की ज़िन्दगी गुज़ारी। उन्होंने इस दौरान फ़िलिस्तीन के इतिहास या साम्राज्य के काले करतूत के बयान पर आधारित अकरम ज़ुएतर की किताब का अनुवाद किया और एक प्रस्ताव ना बढ़ाकर प्रकाशित की। यह प्रस्तावना वास्तव में मुसलमानों और ख़ास तौर पर फ़िलिस्तीन के पीड़ितों की स्थिति का बखान और आंतिरक वर्चस्व व विदेशी साम्राज्य के ख़िलाफ़ एक घोषणापत्र के समान था। इस किताब का उस समय के संघर्षकर्ताओं व बुद्धिजीवियों पर गहरा असर पड़ा। नवंबर 1964 में इमाम ख़ुमैनी को तुर्की और फिर इराक़ की ओर देशनिकाला दिए जाने के बाद, आयतुल्लाह रफ़सन्जानी सहित इमाम ख़ुमैनी के दूसरे शिष्यों के संघर्षों ने नया मोड़ अख़्तियार किया। शाही शासन आयतुल्लाह हाशेमी रफ़सन्जानी सहित इमाम ख़ुमैनी के दूसरे शिष्यों और राजनैतिक व धार्मिक कार्यकर्ताओं की तलाश में लगा हुआ था। उन्हें शाही शासन की जासूसी व सुरक्षा एजेंसी सावाक ने बारंबार गिरफ़्तार करके बहुत कड़ी यातनाएं दी। उन दिनों सावाक को दुनिया की सबसे ख़तरनाक सुरक्षा व जासूसी एजेंसियों में समझा जाता था। लेकिन इन गिरफ़्तारियों व यातनाओं से आयतुल्लाह रज़सन्जानी सहित इमाम ख़ुमैनी के दूसरे शिष्यों के संकल्प पर कोई असर न पड़ा। अली अकबर हाशेमी रफ़सन्जानी जेल में हाथ पर हाथ धरे बैठे नहीं रहते बल्कि हर अवसर को किताब लिखने या लेख द्वारा क़ैदियों के बीच इस्लामी शिक्षाओं के प्रसार की कोशिश में इस्तेमाल करते। इसी तरह जेल से बाहर आयतुल्लाह रफ़सन्जानी शाही शासन के ख़िलाफ़ अपनी राजनैतिक व धार्मिक गतिविधियों के साथ साथ जेल में बंद लोगों के परिजनों की पैसों से मदद भी करते थे।                 

आयतुल्लाह हाशेमी रफ़सन्जानी शाही शासन के ख़िलाफ़ संघर्ष को सुव्यवस्थित करने वाली मुख्य हस्तियों में थे। वह जिन दिनों इमाम ख़ुमैनी इराक़ में और फिर पेरिस में थे, उनसे निकट संपर्क में थे। जब इमाम ख़ुमैनी पेरिस में थे उन दिनों ईरान में शाही शासन के ख़िलाफ़ प्रदर्शन अपने चरम पर था। इमाम ख़ुमैनी ने क्रान्तिकारी परिषद के सदस्यों को तय करने के लिए जिस सूचि की पुष्टि की थी उसमें आयतुल्लाह हाशेमी रफ़सन्जानी का नाम उन नामों के साथ था जो सबसे ऊपर थे। आयतुल्लाह रफ़सन्जानी जिस तरह शाही शासन के ख़िलाफ़ संघर्ष करने वालों में आगे रहे और इमाम ख़ुमैनी के निकटवर्तियों में शामिल रहे उसी तरह क्रान्ति की सफलता के बाद उन्होंने इस्लामी क्रान्ति को मज़बूत करने, ईरान के विकास और क्रान्ति के बाद विभिन्न राजनैतिक प्रक्रियाओं को संतुलित करने में मुख्य योगदान देने वालों में शामिल रहे।