आयतुल्लाह हाशेमी रफ़सन्जानी के इस्लाम क्रान्ति से पहले के संघर्षमय जीवन-2
आयतुल्लाह हाशेमी रफ़सन्जानी के इस्लाम क्रान्ति से पहले के संघर्षमय जीवन-2
ईरानी जनता और क्रांति से प्रेम करने वालों ने क्रांति के दौरान और ईरान की इस्लामी व्यवस्था को मजबूत करने वाली एक प्रभावी हस्ती को खो दिया। आयतुल्लाह हाशिमी रफसन्जानी के अचानक निधन से शोक की लहर दौड़ गयी है। आयतुल्लाह हाशिमी रफसन्जानी जिस तरह इस्लामी क्रांति के दौरान स्वर्गीय इमाम खुमैनी के नज़दीकी साथियों में से एक थे उसी तरह इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद भी स्वर्गीय इमाम खुमैनी के जीवन की अंतिम सांस तक अमीन और उनके निकट साथी बने रहे। वह इस्लामी क्रांति से पहले बड़े संघर्षकर्ता, बुद्धिमान,दूरगामी, होशियार और काम करने वाले प्रसिद्ध थे। यही विशेषताएं थीं जिन्होंने आयतुल्लाह हाशिमी रफ़सन्जानी को विशेष और बेजोड़ हस्ती बना दिया था। आयतुल्लाह हाशिमी रफसन्जानी के निधन पर ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली खामनेई ने अपने शोक संदेश में कहा था कि उन वर्षों में उनकी अधिक होशियारी, निष्ठा और प्रेम उन लोगों के लिए बेहतरीन भरोसा था जो उनके सहयोगी थे विशेषकर मेरे लिए।
आयतुल्लाह हाशिमी रफसन्जानी ने शाही सरकार के विरुद्ध संघर्ष से लेकर उसके पतन तक क्रांति की सफलता के बाद के दिनों के लिए कार्यक्रम बनाना आरंभ कर दिया था। संघर्षकर्ता धर्मगुरुओं के आधिकारिक दल का गठन, क्रांति परिषद का गठन, बंद व प्रदर्शनों का दिशा- निर्देशन, विभिन्न क्षेत्रों में इमाम खुमैनी द्वारा भेजे गये प्रतिनिधिमंडल के रूप में लोगों की ईंधन समस्या का समाधान और इमाम खुमैनी की वापसी पर उनका स्वागत और उनकी सुरक्षा करने वाले दल का गठन आयतुल्लाह हाशिमी रफसन्जानी और इमाम खुमैनी के कुछ निकटवर्ती दोस्तों व शिष्यों का कार्य था।
इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद आयतुल्लाह फाशिमी रफसन्जानी का एक कार्य जमहूरी इस्लामी पार्टी का गठन था। यह कार्य उन्होंने इमाम खुमैनी के आदेश से किया था और इसमें उनके साथ देश के सर्वोच्च न्यायधीश डाक्टर शहीद बहिश्ती और वरिष्ठ नेता भी थे। ईरान की इस्लामी क्रांति का केन्द्रीय बिन्दु एक महान धार्मिक हस्ती के नेतृत्व में धार्मिक और मानवीय मूल्यों को जीवित करना था। इसी कारण क्रांति की सफलता के आरंभ से ही उसके विरुद्ध पूर्वी और पश्चिमी ब्लाकों और ईरान के भीतर उनसे संबंधित तत्वों की दुश्मनी व विरोध आरंभ हो गया। उन लोगों ने इस्लामी क्रांति को विफल बनाने के लिए क्रांति के नेताओं की हत्या को लक्ष्य बनाया। शत्रुओं के पहले लक्ष्य क्रांति के विचारक व महान बुद्धिजीवी और इमाम खुमैनी के प्रतिभाशाली शिष्य उस्ताद मुर्तज़ा मुतह्हरी थे। इस्लामी क्रांति की सफलता के ढाई महीने बाद उस्ताद शहीद मुर्तज़ा मुतह्हरी को क्रांति के विरोधी फुरक़ान नामक गुट के एक एजेन्ट ने गोली मारकर शहीद कर दिया। इस गुट का दूसरा लक्ष्य आयतुल्लाह हाशिमी रफसन्जानी थे।
इस्लामी क्रांति को सफल हुए अभी चार महीने भी नहीं हुए थे कि आयतुल्लाह हाशिमी रफसन्जानी पर जानलेवा हमला हुआ। इस हमले में आयतुल्लाह फाशिमी रफसन्जानी घायल हो गये। इस हमले के विफल होने का सबसे महत्वपूर्ण कारण मौक़े पर ही उनकी धर्मपत्नी सैयद इफ्फत मरअशी का हस्तक्षेप था। स्वर्गीय इमाम खुमैनी ने आयतुल्लाह फाशिमी रफसन्जानी के सुरक्षित बच जाने पर एक संदेश जारी किया जो आयतुल्लाह फाशिमी रफसन्जानी के प्रति उनके गहरे लगाव का सूचक है।
स्वर्गीय इमाम खुमैनी ने अपने संदेश में कहा “जनाब हुज्जतुल इस्लाम, प्रतिबद्ध संघर्षकर्ता प्रिय हाशिमी! दिवंगत मुदर्रिस ने, जिनकी हत्या रज़ाखान के आदेश से कर दी गयी, अस्पताल से सूचना दी थी कि रज़ा खान से कह दो कि मैं ज़िन्दा हूं। मुदर्रिस अब ज़िन्दा हैं इतिहासिक हस्तियां अंत तक जीवित हैं बुरा चाहने वालों को जान लेना चाहिये कि हाशिमी ज़िन्दा है क्योंकि आंदोलन ज़िन्दा है।“
आतुल्लाह मुदर्रिस वर्चस्ववादी व्यवस्था के खिलाफ बड़े संघर्षकर्ता थे जिन पर मोहम्मद रज़ा के बाप रज़ा शाह की ओर से कई बार हमला किया गया और अंत में उन्हें रज़ा शाह के आदेश से निष्कासित और शहीद कर दिया गया। दिवंगत प्रधानमंत्री बाज़रगान के प्रधानमंत्री के आदेश को पढ़ने के लिए इमाम खुमैनी की ओर से आयतुल्लाह हाशिमी रफसन्जानी का चयन और साथ ही उन पर जानलेवा हमले में बच जाने पर स्वर्गीय इमाम खुमैन की ओर से संदेश के जारी किये जाने से इमाम खुमैनी के निकट उनका विशेष स्थान स्पष्ट हो गया।
देश के भीतर और बाहर से इस्लामी क्रांति के विरुद्ध की जाने वाली शत्रुता के बावजूद क्रांति के नेताओं का पहला लक्ष्य ईरान की नई अस्तित्व में आई क्रांति को मज़बूत करना था।
आयतुल्लाह हाशिमी रफसन्जानी ने इस्लामी क्रांति की सफलता के आरंभ में कुछ समय तक गृहमंत्रालय का कार्यभार संभाला। इस दौरान उन्होंने एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी अदा की और वह 2500 वर्षीय शाही सरकार के अंत के बाद पहली बार ईरान में राष्ट्रपति पद के चुनाव का आयोजन था।
चूंकि उस चुनाव के बाद पहली बार ईरानी संसद मजलिसे शुराये इस्लामी के लिए चुनाव हो रहे थे और उस चुनाव में आयतुल्लाह हाशिमी रफसन्जानी भी उम्मीदवार थे इसलिए उन्होंने गृहमंत्रालय के पद से त्याग दे दिया। जब संसद का चुनाव हो गया और उस चुनाव में आयतुल्लाह हाशिमी रफसन्जानी भी जीत गये तो उन्हें संसद सभापित के लिए चुना गया। यद्यपि ईरानी संविधान में संसद सभापति के पद का कोई विशेष स्थान नहीं है परंतु आयतुल्लाह हाशिमी रफसन्जानी के संघर्ष, इमाम खुमैनी से उनकी निकटता और राजनीतिक अतीत ने इस पद को विशेष स्थान व सम्मान प्रदान कर दिया। सांसदों के मतों और विभिन्न प्रस्तावों में आयतुल्लाह हाशिमी रफसन्जानी के विरोध या सहमति की प्रभावी भूमिका होती थी। इस प्रकार से कि कुछ संचार माध्यमों ने स्वर्गीय इमाम खुमैनी के बाद उन्हें ईरान के दूसरे नंबर का व्यक्ति बताया।
संकटों से मुकाबला करने में आयतुल्लाह हाशिमी रफसन्जानी ने जो काम किया है उससे ईरान की नई इस्लामी व्यवस्था की मज़बूती की दिशा में उनकी भूमिका स्पष्ट होती है। इनमें से एक बड़ा संकट ईरान में पहले राष्ट्रपति बनी सद्र की भूमिका का रहस्योदघाटन था। वह भी सद्दाम द्वारा ईरान पर थोपे गये युद्ध की परिस्थिति में। वर्ष 1981 के आरंभ में देश की स्थिति बहुत ही संवेदनशील थी। उस स्थिति में आयतुल्लाह हाशिमी रफसन्जानी अपने अधिकार व स्थान का प्रयोग करके और मतभेद के दोनों पक्षों के मध्य संतुलन बनाकर देश के मामलों को विभिन्न मार्गों से आगे ले जाते थे। बनी सद्र ने राष्ट्रपति बन जाने के बाद नव गठित इस्लामी व्यवस्था के हितों पर ध्यान दिये बिना व्यवस्था के विभिन्न धड़ों के बीच मतभेद उत्पन्न कर दिया। अपनी स्थिति मज़बूत करने और इमाम खुमैनी के साथियों को हाशिये पर लगा देने के लिए वह मुजाहिदीने खल्क़ नामक गुट से निकट हो गया। लड़के और लड़कियां इस गुट के के सदस्य थे और यह गुट बनी सद्र के नियंत्रण में आ गया। इसके बाद बनी सद्र के लक्ष्यों और क्रांति के उद्देश्यों से उसके हट जाने में कोई संदेह नहीं रह गया। क्रांति विरोधी बनी सद्र के क्रिया- कलापों की पहली प्रतिक्रिया में इमाम खुमैनी ने उसे सर्वोच्च सेना कमांडर के पद से हटा दिया और आयतुल्लाह हाशिमी रफसन्जानी की अध्यक्षता में ईरानी संसद ने भी पहले राष्ट्रपति को अयोग्य करार दे दिया। बनी सद्र के हटा दिये जाने के बाद मुजाहिदीने खल्क नामक गुट ने क्रांति के विरुद्ध सैनिक कार्यवाहियां आरंभ कर दी। देश में हत्या और विस्फोट की प्रक्रिया आरंभ हो गयी। उस समय तेहरान के इमामे जुमा वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज्मा सैयद अली खामनेई पर हमला किया गया। जमहूरी पार्टी के केन्द्रीय कार्यालय में विस्फोट, देश के 72 वरिष्ठ अधिकारियों के साथ ईरान के पहले सर्वोच्च न्यायधीश और न्यायपालिका के प्रमुख डाक्टर बहिश्ती का शहीद हो जाना, प्रधानमंत्री कार्यालय में विस्फोट और इस विस्फोट में राष्ट्रपति मोहम्मद अली रजाई और प्रधानमंत्री का शहीद हो जाना मुजाहिदीने खल्क के कृत्यों के कुछ नमूने हैं। उस कठिन परिस्थिति में आयतुल्लाह हाशिमी रफसन्जानी ने इमाम खुमैनी के दूसरे साथियों की सहायता से देश को संकटों से निकालने की जिम्मेदारी संभाली।
सद्दाम के अतिक्रमण से मुकाबला देश के कार्यों में सर्वोपरि था। युद्ध आरंभ होने की शुरआत से ही स्वर्गीय इमाम खुमैनी ने आयतुल्लाह हाशिमी रफसन्जानी को इस मामले में शामिल कर लिया और एक आदेश देकर उच्च रक्षा परिषद का सदस्य बना दिया और इस परिषद ने भी उन्हें प्रवक्ता के रूप में चुना। बनी सद्र के काल में सशस्त्र सेना के मध्य इस बारे में गम्भीर मतभेद थे कि सद्दाम के अतिक्रमण से किस प्रकार मुकाबला किया जाये। राष्ट्रपति पद से बनी सद्र के हटाये जाने के बाद यह मतभेद कम हो गया किन्तु युद्ध में कुछ कार्यवाहियों के बाद युद्ध की कार्यवाहियों की शैली को लेकर दोबारा मतभेद उत्पन्न हो गये। उस कठिन परिस्थिति में तत्कालीन राष्ट्रपति आयतुल्लाह खामनेई ने सर्वोच्च सेना कमांडर और इस्लामी व्यवस्था के संस्थापक स्वर्गीय इमाम खुमैनी के नाम पत्र लिखा कि सशस्त्र सेना से संबंधित समस्त मामलों को एक व्यक्ति के हवाले कर दिया जाये और इसी पत्र में यह बात भी लिखी कि वह व्यक्ति श्री हाशेमी रफसन्जानी हैं। इमाम खुमैनी ने भी पूरे अधिकार के साथ आयतुल्लाह हाशिमी रफसन्जानी को उप सेना प्रमुख बना दिया। इस बार आयतुल्लाह हाशिमी रफसन्जानी आधिकारिक तौर पर उप सेना प्रमुख बन गये और ईरान-इराक युद्ध की समाप्ति तक वह इस पद पर बने रहे। युद्ध के दिशा- निर्देशन के साथ- साथ देश के संचालन के लिए आयतुल्लाह हाशिमी रफसन्जानी के हवाले कई दूसरी जिम्मेदारियां भी सौंपी गयी। एक ओर उन्हें देश की कठिन आर्थिक और राजनीतिक स्थिति को ध्यान में रखकर संसद में ज़िम्मेदारी संभालनी पड़ती थी और दूसरी ओर सरकार की बहुत सीमित आमदनी को दृष्टि में रखकर उसे युद्ध में प्रयोग करना था। युद्ध के समर्थन के लिए आयोग गठित हो जाने के बाद देश के संचालन के मामलों विशेषकर देश की संभावनाओं को पहचानने में आयतुल्लाह हाशिमी रफसन्जानी की उपस्थिति और अधिक हो गयी। दुश्मनों के आर्थिक षडयंत्रों को निष्क्रिय बनाने के लिए आयतुल्लाह हाशिमी रफसन्जानी की समझदारी से दो मार्ग अपनाये गये। पहला यह कि तेल की आमदनी कम होने से जो क्षति पहुंच रही थी उसे कम करने के लिए सीमित समय के लिए तेल का निर्यात अधिक कर दिया गया और दूसरे सैन्य उद्योगों के आत्म निर्भर हो जाने के लिए अधिक से अधिक प्रयास किया जाने लगा।
उस समय जो आर्थिक तंगी थी उसके कारण अधिकारी गम्भीर रूप से निर्माण की सोच में पड़ गये परंतु कठिनाइयों के अधिक होने और युद्ध का खर्च बहुत अधिक होने के कारण देश संवेदनशील स्थिति में था।