आयतुल्लाह हाशेमी रफ़सन्जानी के इस्लाम क्रान्ति से पहले के संघर्षमय जीवन-3
आयतुल्लाह हाशेमी रफ़सन्जानी के इस्लाम क्रान्ति से पहले के संघर्षमय जीवन-3
हमने आपको आयतुल्लाह हाशेमी रफ़संजानी की इस्लामी क्रांति की सफलता और उसके बाद के चरणों में उनकी भूमिका के बारे में बताया था। हमने बताया था कि वह इराक़ में मौजूद इमाम ख़ुमैनी के संदेशों को क्रांतिकारियों और धार्मिक हस्तियों तक पहुंचाने की ज़िम्मेदारी निभाते थे और लोगों के मध्य समन्वय स्थापित करते थे। इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद भी ईरान की नव स्कापित व्यवस्था के मुख्य तत्व समझे जाते थे। इस्लामी क्रांति के महान धर्मगुरू और नेता इमाम ख़ुमैनी के नेतृत्व में हाशेमी रफ़संजानी ने क्रांति के बाद संकटों के समाधान में निर्णायक भूमिका निभाई। दुनिया में बहुत कम ही क्रांतियां होंगी जिन्हें ईरान की इस्लामी क्रांति जैसे संकटों, समस्याओं और शत्रुताओं का सामना करना पड़ा है। इस्लामी क्रांति के विरोधी गुटों की गतिविधियां, सीमावर्ती क्षेत्रों में शक्तियों के दो ध्रुव पूरब और पश्चिम समर्थित अलगाववादी गुटों की सक्रियता, व्यवस्था के उच्चाधिकारियों की टारगेट किलिंग, आर्थिक प्रतिबंध और अंततः इराक़ के बासी शासन की ओर से थोपे गये युद्ध से विशेष परिस्थितियां उत्पन्न हो गयीं। इनमें से हर एक संकट एक गठित व्यवस्था को धराशायी करने के लिए काफ़ी था। इमाम ख़ुमैनी के नेतृत्व में और हाशेमी रफ़संजानी जैसी क्रांतिकारी, बुद्धिजीवी और युक्तिकर्ता हस्तियों की उपस्थिति में ईरानी जनता के प्रतिरोध ने समस्त संकटों को एक ओर लगा दिया।
पिछले कार्यक्रम में हमने बताया था कि इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद आयतुल्लाह हाशेमी रफ़ंसजानी की ज़िम्मेदारियों में से एक सशस्त्र सेना का उत्राधिकारी होना और युद्ध की कमान्ड संभालना था। इस्लामी गणतंत्र ईरान ने अपने युवाओं की शक्ति और साहस पर भरोसा करते हुए रणक्षेत्र में बासी शत्रुओं के मुक़ाबले में ज़बरदस्त सफलताएं अर्जित कीं। बासी शासन पूर्वी और पश्चिमी दोनों ब्लाकों की ओर से आधुनिक हथियारों से लैस था। सद्दाम की पराजय, उसके समर्थकों की बड़ी पराजय और ईरान के लिए बहुत बड़ी जीत थी। यही कारण है कि ईरान-इराक़ युद्ध समाप्त होने के एक वर्ष से भी कम समय में वर्ष 1987 से 1988 तक अमरीका आधिकारिक रूप से फ़ार्स की खाड़ी में ईरान से युद्ध के मैदान में कूद पड़ा। दूसरी ओर फ़ार्स की खाड़ी के अरब रजवाड़ों और उनके मुखिया सऊदी अरब ने सद्दाम शासन की सहायता करके और तेल के उत्पादन में वृद्धि करके तेल के मूल्यों को कम करने का प्रयास किया ताकि ईरान की सफलता के मुख्य रास्ते अर्थात विदेशी मुद्रा के स्रोत को रोक सके ।
वर्ष 1987 में युद्ध के हालात बहुत जटिल हो गये थे । ईरानी संसद के सभापति और युद्ध के कमान्डर आयतुल्लाह हाशेमी रफ़संजानी अपने एक साक्षात्कार में युद्ध की जटिलताओं को इस प्रकार बयान करते हुए कहते हैं कि दुनिया के लिए जो चीज़ महत्वपूर्ण थी वह यह थी कि इराक़ की पराजय इस्लामी गणतंत्र ईरान की एक सैन्य सफलता न समझी जाए। वर्ष 1987 में सुरक्षा परिषद का प्रस्ताव क्रमांक 598 पास हुआ जिसे ईरान ने सशर्त स्वीकार किया। प्रस्ताव के पारित होने के बाद विदेशमंत्रालय की गतिविधियां प्रस्ताव के क्रियान्वयन के लिए ईरान की स्थिति को दृष्टिगत रखने के उद्देश्य से तेज़ हो गयीं । देश की विषम आर्थिक स्थिति, सद्दाम के हित में युद्ध में अमरीका का सीधा हस्तक्षेप, पूरब और पश्चिम की ओर से उपहार में मिलने वाले आधुनिक संसाधनों को प्रयोग करने और युद्ध अपराध करने में अंतर्राष्ट्रीय क़ानूनों का उल्लंघन करने के लिए जिसका स्पष्ट नमूना हलब्चे पर रासायनिक बमबारी थी, सद्दाम के बासी शासन के लिए हरी झंडी थी और उसने , देश के अधिकारियों और इमाम ख़ुमैनी को इस परिणाम पर पहुंचा दिया कि युद्ध का जारी रहना हित में नहीं है। आयतुल्लाह हाशेमी रफ़संजानी ने सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव क्रमांक 598 को स्वीकार करने और आठ वर्षीय युद्ध समाप्त करने में विशेष भूमिका निभाई। सद्दाम के बासी शासन के अतिक्रमण से मुक़ाबले में ईरानी जनता का आठ वर्षीय साहसिक प्रतिरोध ऐसी स्थिति में समाप्त हुआ कि विश्व समुदाय सद्दा को एक अतिक्रमणकारी के रूप में पहचानने पर विवश हुआ। इस्लामी गणतंत्र ईरान ने विजयी होकर आठ वर्षीय युद्ध को समाप्त किया जबकि सद्दाम और उसके समर्थक, आठ वर्षीय युद्ध के दौरान ईरान की नव आधार व्यवस्था को समापत करने के अपने प्रयास को सफल न बना सके।
युद्ध की समाप्ति के बाद देशों की प्राथमिकता पुनर्निमाण की होती है। आयतुल्लाह हाशेमी रफ़संजानी ने भी इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई किन्तु वर्ष 1989 में इस्लामी गणतंत्र ईरान के संस्थापक इमाम ख़ुमैनी के स्वर्गवास से देश में बड़ा शून्य पैदा हो गया। आयतुल्लाह हाशेमी रफ़संजानी ने नेतृत्व के शून्य को भरने के लिए भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस्लामी क्रांति के शत्रुओं ने इमाम ख़ुमैनी की चमत्कारिक विशेषता के दृष्टिगत यह सोचा कि इमाम ख़ुमैनी के स्वर्गवास से इस्लामी क्रांति का दीपक बुझ जाएगा। इसके विपरीत ईरान की एक्सपीडीएंसी काउंसिल ने इमाम ख़ुमैनी के स्वर्गवास के 24 घंटे के भीतर ही पूर्व राष्ट्रपति आयतुल्लाहिल उज़्मा ख़ामेनेई को वरिष्ठ नेता चुनकर दुनिया को हतप्रभ कर दिया। वरिष्ठ नेता के चयन में आयतुल्लाह हाशेमी रफ़संजानी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इमाम ख़मेनेई के वरिष्ठ नेता चुने जाने के बाद ईरानी जनता ने वर्ष 1989 से 1997 तक चार वर्ष के दो चरणों के लिए अली अकबर हाशेमी रफ़संजानी को राष्ट्रपति चुना। इस आठ वर्षीय काल को निर्माण काल का नाम दिया गया। इस काल में देश का सकल घरेलू उत्पाद 4.6 प्रतिशत तक पहुंच गया था जिसके कारण पूंजीनिवेश में औसतन 11 प्रतिशत की वृद्धि हुई और श्रमबल का स्तर बढ़ा। देश में चल रहा 50 प्रतिशत का बजट घाटा समाप्त होकर संतुलित हो गया और सरकार ने इसको देश के पुनर्निमाण में लगा दिया। विदेशी क़र्ज़ों में कमी हुई और विदेशी व्यापारियों की नकारात्मक सोच बदल गयी। देश में आर्थिक विकास के कारण सामाजिक कल्याण में ज़बरदस्त उछाल आया और नगरों, गांव और शहरों में चिकित्सा और कल्याण की सुविधाएं उपलब्ध कराई गयीं।
साठ से अधिक डैम बनाए गये और पूरे देश में जलापूर्ति का नेटवर्क बिछा दिया जिसके कारण गेहूं की पैदावार और अन्य उत्पादों में वार्षिक 6 प्रतिशत का विकास हुआ। देश के बिजलीघरों की क्षमता 13 हज़ार मेगावाट से भी कम थीं जिसे बढ़ाकर 23 हज़ार मेगावाट तक पहुंचाया गया। विभिन्न ऊर्जाओं का उत्पादन, इस्पात, सीमेंट और पेट्रोकेमिलक उद्योग में क्रमशः 18.3, 5.3 और 21 प्रतिशत वृद्धि हुई। अली अकबर हाशेमी रफ़संजानी के कार्यकाल में सामाजिक और आर्थिक विकास के क्षेत्र में देश ने ऊंची छलांग लगाई। राष्ट्रपति कार्यकाल समाप्त होने के बाद हाशेमी रफ़संसानी ने वरिष्ठ नेता के आदेश पर इस्लामी क्रांति हित संरक्षक परिषद के प्रमुख चुने गये। इस्लामी क्रांति हित संरक्षक परिषद की ज़िम्मेदारी तीनों पालिकाओं में पाये जाने वाले मतभेदों को दूर करना और समस्त क्षेत्रों में देश की नीति निर्धारण करने की है। आयतुल्लाह हाशेमी रफ़संजानी अपने देहान्त तक इस्लामी क्रांति हित संरक्षक परिषद के प्रमुख के पद पर रहे। हाशेमी रफ़संजानी ने इस्लामी क्रांति हित संरक्षक परिषद के प्रमुख के पद पर रहते हुए जो महत्वपूर्ण काम अंजाम दिए उनमें से एक जिसने दुनिया भर के विशेषज्ञों के ध्यान को अपनी ओर आकर्षित कर लिया वह बीस वर्षीय विकास योजना है। अली अकबर हाशेमी रफ़संजानी का नाम दुनिया के इतिहास में हमेशा के लिए अमर हो गया। हाशेमी रफ़संजानी ने हालिया पचास वर्षों के दौरान घटने वाली घटनाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई इसीलिए दुनिया भर के व्यक्ति और हर राजनेता उनको श्रद्धांजलि पेश करें हा है। जिस प्रकार ईरान के इतिहास में प्रसिद्ध सुधारक अमीर कबीर का नाम हमेशा के लिए अमर हो गया इसी प्रकार ईरान के इतिहास में हाशेमी रफ़संजानी हमेशा के लिए अमर हो गये।
हाशेमी रफ़संजानी ने समस्त कालों में, इस्लामी क्रांति की सफलता से पहले और क्रांति की सफलता के बाद जनता और देश की सेवा में स्वयं को न्योछावर कर दिया। उनका जीवन हमेशा से साधारण था और उन्होंने कभी भी ठाट बाट भरा जीवन व्यतीत नहीं किया। उनकी इसी विशेषता के कारण उनकी शवयात्रा में जनता के समस्त वर्गों ने बढ़ चढ़कर भाग लिया और अपने नेता को नम आंखों से भावभीनी श्रद्धांजलि पेश की। समाचारों से पता चलता है कि उनकी शवयात्रा में 25 लाख लोग उपस्थित हुए। उनकी शव यात्रा इस्लामी क्रांति के संस्थापक स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी की शवयात्रा के बाद अभूतपूर्व थी।