Jan २५, २०१७ १३:३५ Asia/Kolkata

हमने इस्लाम की दृष्टि से स्वतंत्रता के बारे में बात करने के साथ ही पश्चिमी विचारकों के विचारों पर आधारित स्वतंत्रता और इस्लामी स्वतंत्रता के अंतर के बारे में भी चर्चा की थी। 

हमने इस ओर संकेत किया था कि इस्लामी दृष्टिकोण के अनुसार वर्चस्ववादी शक्तियों, तानाशाहों और अन्य लोगों द्वारा मानव की स्वतंत्रता को सीमित करने वाले बाहरी कारकों के अतिरिक्त कुछ आंतरिक कारक भी हैं जो मनुष्य की स्वतंत्रता को सीमित करते हैं जैसे भ्रष्ट आचरण, आंतरिक इच्छाएं, अहंकार।  यह वे आंतरिक विशेषताएं हैं जो मनुष्य को अपमान, कमज़ोरी और सहनशीलता के लिए बाध्य करती हैं।  इस्लाम का मानना है कि जो भी व्यक्ति कमज़ोरी, भय, लालच, या आंतरिक इच्छाओं के चलते कुछ बातों को मानने के लिए बाध्य होता है वह वास्तविक रूप में स्वतंत्र नहीं है।  वास्तविकता यह है कि इस्लाम की दृष्टि में मनुष्य को स्वतंत्र पैदा किया गया है।  इस्लाम इस बात की अनुमति नहीं देता कि मनुष्य भ्रष्ट कामों से ईश्वर की दी हुई इस स्वतंत्रता को क्षतिग्रस्त करे।  इस्लाम में जो स्वतंत्रता बताई गई है उसका मुख्य उद्देश्य, आंतरिक इच्छाओं से मुक्ति पाकर दूसरों की ग़ुलामी से बचना है।  इस आधार पर इस्लाम, मनुष्य को आज़ाद देखना चाहता है।

 

इस्लाम में आज़ादी, ईश्वरीय वरदान है जो मनुष्य को प्रदान किया गया है ताकि इसके माध्यम से वह कल्याण प्राप्त कर सके।  इस्लाम ने मनुष्य को इस बात के लिए स्वतंत्र छोड़ दिया है कि वह स्वेच्छा से कल्याण के मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करते हुए सफलता के मार्ग पर अग्रसर रहे।  इस आधार पर मनुष्य पूर्ण रूप से स्वतंत्र है।  इस्लाम के हिसाब से आज़ादी का दूसरा आयाम कर्तव्य है।  कर्तव्य के निर्वाह के लिए मनुष्य पूरी तरह से स्वतंत्र है।  इस आधार पर वह अपने किये गए कर्मों के प्रति उत्तरदायी भी है।  यही कारण है कि मुसलमान, यह कोशिश करता है कि वह ईश्वर की ओर से दी गई आज़ादी का सदुपयोग करते हुए तार्किक काम अंजाम दे।  दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि वह अपनी आज़ादी के साथ कल्याण के मार्ग को अपनाता है और दूसरों की आज़ादी के मार्ग में बाधा नहीं बनता।

 

इसके विपरीत पश्चिमी विचारधारा वाली आज़ादी में कर्तव्य को महत्व नहीं है क्योंकि वह मानव की आंतरिक इच्छाओं पर आधारित है।  पश्चिमी आज़ादी वाली विचारधारा का अर्थ है बिना किसी ज़िम्मेदारी वाली स्वतंत्रता।  पश्चिमी दर्शनशास्त्रियों के हिसाब से मनुष्य आंतरिक इच्छाओं का स्वामी है, जो अपनी इन्हीं इच्छाओं के अनुसार जीवन व्यतीत करना चाहता है।  जो चीज़ व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सीमित करती है वह दूसरों की इच्छाओं की आज़ादी है।  कोई भी एसा नियम नहीं है जो मनुष्यों की आज़ादी और उसकी इच्छाओं को सीमित कर सके।  किंतु यह जानना चाहिए कि इस अर्थ में स्वतंत्रता, वास्तव में एक प्रकार से जानवरों की आज़ादी जैसी है।  इस प्रकार मनुष्यों की स्वतंत्रता और जानवरों की आज़ादी में कोई अंतर नहीं है।

 

मनुष्य को दो आयामों पर पैदा किया गया है।  पवित्र क़ुरआन के हिसाब से मनुष्य के दो आयाम हैं भौतिक और आध्यात्मिक।  इस आधार पर यह संभव नहीं है कि वह दोनों हिसाब से असीमित आज़ादी का स्वामी बने।  मनुष्य के इन दोनों आयामों में से जब भी किसी आयाम को अधिक स्वतंत्रता मिलेगी तो वह दूसरे आयाम में पूरी तरह से आज़ादी प्राप्त नहीं कर सकता।

 

मनुष्य के भीतर कुछ एसी विशेषताएं निहित हैं जो उसकी मानवता का मानदंड हैं।  उदाहरण स्वरूप तार्किक सोच, सच्चाई को समझना, नैतिकता, सुन्दरता की ओर झुकाव और सच्ची बात को मानना आदि।  यही कारण है कि इस्लाम यह चाहता है कि मनुष्य की पाश्विक आवश्यकताओं को सीमित करते हुए उसकी मानवीय विशेषताओं को निखारा जाए।  मानव की आत्मा एसी स्थिति में स्वतंत्र हो सकती है कि जब वह पूरी स्वतंत्रता के साथ उच्च मानवीय विशेषताओं को प्राप्त करके मोक्ष या कल्याण प्राप्त करे।  इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि इस्लामी की दृष्टि में स्वतंत्रता, मानव का अधिकार है जो उसकी आंतरिक विशेषताओं के कारण है न कि आंतरिक इच्छाओं के आधार पर।

 

मनुष्य को चाहिए कि वह ईश्वर की ओर से उसे प्रदान की गई वैचारिक, शारीरिक और आध्यात्मिक योग्यताओं को निखारे और दूसरे लोगों को उनके निखार में बाधा नहीं बनना चाहिए।  इस प्रकार आज़ादी का अर्थ है, छिपी हुई योग्यताओं के निखरने के मार्ग में आने वाली बाधाओं से बचना।  इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि मनुष्य के लिए आज़ादी, परिपूर्णता तक पहुंचने का माध्यम है।

 

हमने आज़ादी की जो व्याख्यात बताई उसे पवित्र क़ुरआन विशेष महत्व देता है।  इसका महत्व इतना अधिक है कि ईश्वर लोगों को आदेश देता है कि वे आज़ादी के प्रतीक काबे की ओर मुंह करके नमाज़ पढ़ें और दूसरे अन्य कार्य भी इसी पवित्र स्थल की ओर मुंह करके अंजाम दिया करें।  काबे का एक नाम “बैते अतीक़” है।  पैग़म्बरे इस्लाम (स) के पवित्र परिजनों के कथनों से ज्ञात होता है कि काबे को बैते अतीक़ इसलिए कहा जाता है कि वह कभी भी किसी की संपत्ति नहीं रहा और कोई भी अत्याचारी उसपर किसी भी समय वर्चस्व नहीं जमा सका।  दूसरे शब्दों में ईश्वर का यह घर सदैव आज़ाद रहा है।  इसलिए काबे को स्वंतत्रता का प्रतीक कहा जा सकता है।  सूरे बक़रा की आयत संख्या 144 में ईश्वर कहता है कि तुम कहीं भी हो, काबे की ओर मुंह करो।

पवित्र क़ुरआन के सूरे हज की 29वीं आयत में ईश्वर ने काबे के महत्व को दर्शाते हुए उसकी ओर मुंह करके नमाज़ पढ़ने का आदेश दिया है।  साथ ही लोगों से यह भी चाहा है कि वे काबे की परिक्रमा करते हुए उसका सम्मान करें।

 

न केवल उसकी परिक्रमा या तवाफ बल्कि मनुष्य के बहुत से कामों का संबन्ध इस ईश्वरीय आर्दश से है।  नमाज़ जैसे महान और पवित्र काम को काबे की ओर मुंह करके ही अंजाम दिया जाता है।  इसके अतिरिक्त पवित्र क़ुरआन पढ़ते समय बेहतर यह है कि मनुष्य का रुख़ बैते अतीक़ की ही ओर हो।  इस प्रकार से किसी मुसलमान का अपने जीवन के दौरान इस पवित्र एवं स्वतंत्र स्थल से संपर्क रहता है।  यहां तक कि इस्लामी शिक्षाओं में कहा गया है कि मरते समय मनुष्य का चेहरा, काबे की ओर होना चाहिए।

 

अपने दैनिक जीवन में काबे की ओर अधिक ध्यान इस अर्थ में है कि मुसलमान, अपनी ज़िंदगी में आज़ादी की अधिक से अधिक रक्षा करे और किसी भी स्थिति में ईश्वर की ओर से दी गई इस अनुकंपा को सांसारिक मायामोह से न बदले।  कभी-कभी एसा भी होता है कि मनुष्य के अशुद्ध विचार, मनुष्यों के एक गुट को प्रभावित करते हुए मानवीय योग्यताओं के निखार में बाधा बनें और सच्चे मार्गदर्शन से उसे वंचित रखें।

 

पवित्र क़ुरआन की दृष्टि में आज़ादी, जीवन की भूमिका है।  आज़ादी का प्रबंध इसलिए किया गया है कि मनुष्य, अपने लिए सफल और लाभदायक जीवन का चयन करे।  भौतिक और आध्यात्मिक जीवन को सफल बनाने के लिए यह आवश्यक है कि मनुष्य, आज़ाद हो और इस आज़ादी को पाने के लिए उसे आंतरिक इच्छाओं के बंधन से मुक्ति पानी होगी।  दुनिया के सारे ही लोग अपने ही कर्मों के कारण बंधक बने हुए हैं और केवल वे लोग ही इस बंधन से मुक्त हैं जो पवित्र क़ुरआन के अनुसार “असहाबे यमीन” हैं।  सूरे मुदस्सिर में ईश्वर कहता है कि असहाबे यमीन के अतिरिक्त हर एक अपने कर्मों का बंधक है।

 

अब देखना यह है कि अस्हाबे यमीन ने किस प्रकार से स्वयं को बंधनों से स्वतंत्र करा लिया?  इसका जवाब हमें पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र कथन में मिल जाएगा।  शाबान महीने के अंतिम जुमे के ख़ुत्बे में अपने कहा कि हे लोगो, तुम्हारे जीवन तुम्हारे ही कर्मों के बंधक हैं अतः ईश्वर से क्षमा मांगकर तुम अपने जीवन को स्वतंत्र करा लो।

 

इस प्रकार वास्तविक आज़ादी यह है कि मनुष्य, वह प्रायश्चित करके स्वयं को अपने बुरे कर्मों से मुक्त कराए और अच्छे कर्म करते हुए अस्हाबे यमीन की सूचि में सम्मिलित हो जाए।  यही वह आज़ादी है जो वास्तविक जीवन की भूमिका बन सकती है।