इस्लाम और मानवाधिकार- 26
इस्लाम के अनुसार आज़ादी न केवल अधिकार बल्कि इंसान का दायित्व है। क्योंकि आज़ादी से ही इंसान परिपूर्णता तक पहुंचता है।
इसी कारण किसी को भी इंसान की आज़ादी छीनने का अधिकार नहीं है। चूंकि इंसान को स्वयं को अंधविश्वासों या अपनी ग़लत इच्छाओं का ग़ुलाम नहीं बनना चाहिये इसलिए आजादी का आंतरिक आयाम भी है और चूंकि दूसरों का दायित्व है कि वे उसके रास्ते में रुकावट उत्पन्न न करें इसलिए आज़ादी का बाहरी आयाम भी है।
इंसान की आज़ादी का मापदंड यह है कि इंसान, इंसानियत के मार्ग में हो। इंसान को इंसानियत के मार्ग में स्वतंत्र छोड़ना चाहिये न यह कि इंसान ने अपने लिए जो कुछ चुना है उसमें उसको स्वतंत्र छोड़ देना चाहिये। स्वतंत्रता विभिन्न रुपों में प्रकट होती है और हम उनमें से हर एक की चर्चा करेंगे। सबसे पहले हम सोच- विचार में आज़ादी की चर्चा करेंगे।
सोच- विचार करना एक ऐसी विशेषता है जो इंसान को आध्यात्मिक जीवन प्रदान करती है और उसे दूसरे प्राणियों से भिन्न करती है। विभिन्न क्षेत्रों में चिंतन- मनन की आज़ादी इंसान का स्वाभाविक अधिकार है। यद्यपि इंसान अकेले और दूसरों के संपर्क के बिना चिंतन- मनन कर सकते हैं परंतु इंसान का सामाजिक होना दूसरों से प्रभावित होने का कारण बनता है।
आज़ादी रचनात्मक और विनाशकारी दोनों होती है इस बात के दृष्टिगत उसके प्रति लापरवाह नहीं रहा जा सकता। क्योंकि इंसान की सोच सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक स्थिति से प्रभावित होती है। वास्तविकता यह है कि वर्तमान दुनिया में नई2 तकनीकें आ गयी हैं और वे सरकारों या शक्तिशाली गुटों के नियंत्रण में हैं और समाज पर उनका प्रभाव इस प्रकार से है कि सरकारें और प्रभावशाली गुट समाचार पत्रों, रेडियो, टेलिवीज़न और दूसरे सामूहिक संचार माध्यमों द्वारा इंसानों की सोचों का दिशा निर्देशन विशेष मार्ग की ओर करते हैं।
आस्था में आज़ादी का अर्थ यह है कि हर इंसान किसी प्रकार के दबाव या भय के बिना अपनी आस्था को बयान कर सके। इंसान की सोच को सजाने, संवारने और उसे निखारने की आवश्यकता होती है अतः उसके विकास व निखार के मार्ग में किसी चीज़ को रुकावट नहीं बनना चाहिये। मानवाधिकार के अंतरराष्ट्रीय घोषणापत्र में कहा गया है कि एसी दुनिया का अस्तित्व में आना मनुष्य की सबसे बड़ी आकांक्षा है जिसमें किसी प्रकार के भय के बिना वह अपनी आस्था को बयान कर सके। यहां पर आस्था का अर्थ आम है उसमें सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक सब आस्था शामिल है।
घोषणापत्र के 19वें अनुच्छेद में आया है कि सबको आस्था और अभिव्यक्ति की आज़ादी है और इसमें वह अधिकार भी शामिल है कि इंसान को अपनी आस्था में किसी प्रकार का भय न हो। जानकारी प्राप्त करने और उसे समस्त संभव संसाधनों द्वारा और किसी सीमा के बिना प्रकाशित करने में स्वतंत्र हो।“
तो इंसान की सबसे बड़ी आकांक्षा यह है कि एसी दुनिया अस्तित्व में आये जिसमें हर इंसान अपनी आस्था को बयान करने में स्वतंत्र हो। उस दुनिया में भय व निर्धनता न हो, पूरी तरह सुरक्षा स्थापित हो और आर्थिक दृष्टि से भी पूर्ण सम्पन्ता हो।
यहां तक हमने इस बात की ओर संकेत किया कि चिंतन- मनन में स्वतंत्र होना आज़ादी का एक बुनियादी आयाम है। पवित्र कुरआन चिंतन- मनन के लिए इंसान का आह्वान करता है और उसे ईमान का आधार मानता है। पवित्र कुरआन का अध्ययन करने के बाद इस बात को समझा जा सकता है कि उसने किन विषयों के बारे में चिंतन- मनन की सिफारिश की है। पवित्र कुरआन ने विभिन्न रूपों व आयतों में चिंतन- मनन करने वालों के उच्च स्थान के बारे में बताया है। पवित्र कुरआन ने इंसान का आह्वान अपनी और सृष्टि की रचना के बारे में किया है। पवित्र कुरआन बहुत सी आयतों में सृष्टि की निशानियों को बयान करने के बाद” क्या चिंतन- मनन नहीं करते हो” जैसे शब्दों का प्रयोग करता है।
इंसान की सोच को हर प्रकार की सामाजिक परम्परा व बंधन से मुक्त होना चाहिये। पवित्र कुरआन उन लोगों की निंदा व भर्त्सना करता है जो अपने पूर्वजों का अंधा अनुसरण करते हैं और सोच- विचार नहीं करते हैं। पवित्र कुरआन की इस निंदा का उद्देश्य यह है कि इंसान निश्चेतना की नींद से जागे और आंख बंद करके अपने पूर्वजों के अनुसरण को छोड़ दे। इसी प्रकार पवित्र क़ुरआन इंसान को बताता है कि सही और गलत की पहचान का मापदंड बुद्धि है।
इस्लाम धर्म में भी स्वतंत्र रूप से चिंतन- मनन पर बहुत बल दिया गया है। इस्लाम धर्म में कुछ शारीरिक उपासनायें हैं जैसे नमाज़ और रोजा, कुछ माली उपासनायें हैं जैसे खुम्स व ज़कात है इसी तरह इस्लाम में वैचारिक उपासना भी है यानी सही सोच को उपासना करार दिया गया है। अगर इंसान अपनी सोच का प्रयोग जागरूकता के मार्ग में करे तो वर्षों की शारीरिक उपासना से भी बेहतर है। पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों के बहुत से कथन मौजूद हैं जो इस बात के सूचक हैं कि सोच -विचार के बहुत पुण्य हैं। जैसे एक घंटे की सोच एक साल की उपासना से बेहतर है। इसी प्रकार दूसरे कथन में कहा गया है कि एक घंटे की सोच साठ साल की उपासना से बेहतर है जबकि कुछ कथनों में एक घंटे की सोच को 70 साल की उपासना से बेहतर बताया गया है। बहुत से धर्मगुरूओं का मानना है कि एक घंटे की सोच के पुण्य में जो अंतर है वह विषय और सोच के प्रकार से संबंधित है। एक सोच है जो इंसान को एक साल की उपासना से आगे ले जाती है जबकि एक सोच है जो इंसान को 70 साल की उपासना से आगे ले जाती है।
इस्लाम से पहले धर्म को बुद्धि से अलग एक वास्तविकता के रूप में स्वीकार किया जाता था। विशेषकर परिवर्तित हो गयी ईसाई धर्म की शिक्षाओं में। यह ग़लत धारण ईसाई धर्म में मौजूद थी और मौजूद है। ईसाइयों का मानना था और है कि धर्म का संबंध आस्था से है और उसमें सोच विचार की गुंजाइश नहीं है जबकि इस्लाम धर्म सोच- विचार का न केवल विरोधी नहीं है बल्कि वह लगभग हर कार्य को बुद्धि की तराज़ू पर तौलने और उससे सहायता लेने के लिए कहता है। इस्लाम धर्म का वास्तविक मूल्य इस चीज़ से स्पष्ट होता है कि उसकी शिक्षाएं इंसान की प्रकृति के अनुरूप हैं जबकि दूसरे धर्म इंसान को छोटे - छोटे मामलों व विषयों के बारे में भी सोचने से मना करते हैं। इस्लाम धर्म सोच- विचार और चिंतन- मनन को इतना अधिक महत्व देता है कि उसने आस्था की मूल शिक्षाओं को प्राप्त करने को सब पर अनिवार्य करार दिया है और उसमें बुद्धि से काम लिये जाने को आवश्यक बताया है। इस्लाम धर्म आस्था के मामले में केवल अनुसरण को काफी नहीं मानता और उसे रद्द करता है। इस्लाम धर्म के अनुसार समस्त मुसलमानों पर अनिवार्य है कि वे आस्था व मौलिक सिद्धांतों के बारे में बुद्धि से काम लें।
इस्लाम धर्म आस्था की बुनियादी चीज़ों को बुद्धि के अलावा किसी और चीज़ से स्वीकार नहीं करता है। इसका अर्थ यह है कि इंसान द्वारा एकेश्वरवाद की आस्था को उसी समय स्वीकार किया जायेगा जब इंसान अपनी बुद्धि से स्वीकार करे कि ईश्वर एक है क्योंकि एकेश्वरवाद का मामला एक वैचारिक मामला है। जिस प्रकार एक शिक्षक अपने शिष्य से कहे कि गणित के मामले को तुम्हीं हल करो। अगर शिक्षक सवाल का उत्तर लिख दे और उसका शिष्य किसी सोच- विचार के बिना जवाब पा जाये तो भविष्य में और कठिन मामलों को हल नहीं कर सकता है और उसे कठिनाइयों का सामना होगा।
दूसरी ओर अगर वास्तव में कोई आस्था के बारे में सोचता है और उसके मन में कोई संदेह उत्पन्न होता है तो उसे इस बात का अधिकार है कि वह अपने सवाल को उससे संबंधित विद्वानों व लोंगो से पूछे ताकि उसके सवाल का जवाब मिले सके। धर्म की मौलिक शिक्षाओं के संबंध में सवाल करना अनिवार्य है। इसी कारण बहुत से लोग पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों से सवाल करते और वे उनका उत्तर देते थे।
इंसान की सोच में आज़ादी का स्रोत वही इंसान की इंसानी योग्यता है जिससे इंसान विभिन्न विषयों के बारे में सोच सकता है। इंसान बुद्धि रखने वाला प्राणी है वह सोचने वाला प्राणी है वह विभिन्न विषयों के बारे में सोचने की शक्ति रखता है। उसके पास सोचने की जो शक्ति है उसी के माध्यम से, जितना उससे संभव होता है, वास्तविकता तक पहुंच जाता है। इस इंसानी क्षमता व योग्यता को निश्चित रूप से आज़ाद होना चाहिये। इंसान की परिपूर्णता इसी क्षमता के आज़ाद होने में नीहित है।
महान ईश्वर ने इंसान को बुद्धि दी है ताकि उसके ज़रिये वह सोचे और जो चीज़ें नहीं जानता है उन्हें सीखे। पवित्र कुरआन सूरे नहल की 78वीं आयत में कहता है” ईश्वर ने तुम्हें तुम्हारी माताओं के पेट से उस स्थिति में पैदा किया जब तुम कुछ भी नहीं जानते थे। इस आयत के अनुसार इंसान जब पैदा होता है तो कुछ भी नहीं जानता है और उसका दायित्व है कि वह शिक्षा ग्रहण करे। किस प्रकार पढ़े और विद्वान बने? चिंतन- मनन और दर्स पढ़कर शिक्षित बने। यानी इंसान के पास जितनी क्षमता है उसका प्रयोग करके समस्या के समाधान का प्रयास करे। इंसान की सोच में निखार के लिए चिंतन- मनन आवश्यक है।
यहां तक यह बयान किया गया कि सोच में आज़ादी इंसान के मौलिक अधिकारों में से है और इसका उल्लेख मानवाधिकार घोषणापत्र में भी किया गया है। इसी प्रकार इस बात की ओर संकेत किया गया कि आसमानी धर्मों में एक इस्लाम है जिसने सोच- विचार के स्वतंत्र होने पर विशेष ध्यान दिया है और इस्लाम, सोच- विचार को उपासना मानता है और उसका मानना है कि धर्म की मौलिक आस्था पर विश्वास बुद्धि से काम लेकर किया जाना चाहिये। यहां यह बात उल्लेखनीय है कि इस्लाम आस्था में विचार की आज़ादी की बहस को सूक्ष्म दृष्टि से देखता है। इस संबंध में इस्लाम का जो दृष्टिकोण है वह विद्वानों एवं बुद्धिजीवियों के दृष्टिकोणों से विशेष भिन्नता रखता है और उस भिन्नता का कारण यह है कि इस्लाम में विचार के स्वतंत्र होने का आधार वहि अर्थात ईश्वरीय संदेश है और यह वह चीज़ है जो इस्लाम में मानवाधिकारों के आदेशों को अद्वितीय बनाती है।