Jan २५, २०१७ १३:५९ Asia/Kolkata

हमने बताया था कि वैचारिक स्वतंत्रता और आस्था संबन्धी स्वतंत्रता ही मानव की मूल स्वतंत्रता है। 

इस्लाम ने भी इस विषय पर विशेष ध्यान दिया है।  हमने आपको यह भी बताया था कि आस्था संबन्धी स्वतंत्रता के बारे में इस्लाम का विशेष दृष्टिकोण है। 

मनुष्य की आस्था दो प्रकार से बनती है।  या तो वह स्वतंत्रता से सोच विचार करके अपना दृष्टिकोण तय करता है या फिर कोई दृष्टिकोण उसपर थोप दिया जाता है।  जो आस्था, विचारधारा या दृष्टिकोण मनुष्य पर लाद दिया जाता है उसमें सोच-विचार की कोई भूमिका नहीं होती।  इसका अर्थ यह है कि वह उन बातों और परंपराओं का अनुसरण करने लगता है जिनका अनुसरण उसके पूर्वज करते आए हैं।  आस्था वह चीज़ है जिससे मनुष्य का हार्दिक लगाव होता है।  यह हार्दिक लगाव दो प्रकार का हो सकता है।  पहले तो यह कि वह सोच-विचार पर आधारित हो दूसरे यह कि लगाव भावनात्मक हो या फिर अपने पूर्वजों के अनुसरण पर आधारित हो।  इस प्रकार की आस्था में बुद्धि या सोच-विचार का कोई महत्व नहीं होता इसलिए इसको स्वतंत्र आस्था नहीं कहा जा सकता।

इस प्रकार की आस्था किसी भी स्थिति में समस्या का समाधान नहीं करती बल्कि उसे जटिल कर देती है।  एसी स्थिति में मनुष्य की चिंतन शक्ति निष्क्रिय हो जाती है।  इसका परिणाम यह निकलता है कि वह ईश्वर की ओर से प्रदान की जाने वाली बुद्धि रूपी अनुकंपा से लाभान्वित नहीं हो पाता।  जिस आस्था में बुद्धि का प्रयोग न हो बल्कि जो दूसरों के अनुसरण पर आधारित हो वह विध्वंसक होती है।  इससे व्यक्ति या समाज दोनों को क्षति पहुंचती है।

महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि इस्लाम की दृष्टि में इस प्रकार की स्वतंत्रता पर आधारित आस्था नहीं है।  यहां पर आज़ादी, ग़ुलामी के अर्थ में है।  इस्लाम के अनुसार क्योंकि इस प्रकार की स्वतंत्रता मनुष्य को वास्तव में अंधे अनुसरण का दास बना देती है।  यहां पर दायित्व यह बनता है कि एसे व्यक्ति को इस ग़ुलामी की ज़ंजीरों से मुक्ति दिलाई जाए ताकि वह स्वयं स्वंतत्र ढंग से सोच-विचार करके तार्किक विचारधारा का चयन कर सके।  यह मानवता के लिए किया जाने वाला बहुत महान काम है।  ईश्वरीय दूतों के दायित्वों में से एक दायित्व यह था।  वे लोग अपने काल में व्याप्त अज्ञानता के केन्द्रों को ध्वस्त कर दिया करते थे ताकि लोग स्वतंत्रता के साथ तार्किक आधार पर अपने लिए उचित विचारधारा का चयन करें।

यही कारण है कि इस्लाम, स्वतंत्रता से सोच-विचार का पक्षधर है।  यही कारण है कि वह स्वतंत्र विचारों का समर्थन करता है।  यहां पर यह बात उल्लेखनीय है कि सोच-विचार पर आधारित हर आस्था सही नहीं होती।  यही वह बात है जो इस्लाम की दृष्टि में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अन्य विचारधाराओं के बीच अंतर को स्पष्ट करती है।

विभिन्न विचारधाराओं विशेषकर पश्चिमी विचारकों के विचार पर आधारित विचारधारा और इस्लामी विचारधारा में मूल अंतर इसी बात को लेकर है।  पश्चिमी विचारकों ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए तीन मानदंड निर्धारित किये हैं।  मानव का सम्मान, धर्म का निजी होना और दूसरों पर निजी राय को न थोपना।

मानव का सम्मान इस अर्थ में है कि मनुष्य सम्मानीय प्राणी है अतः उसके सम्मान का अर्थ है हर आस्था का सम्मान।  चाहे वह सच हो या झूठ।  हालांकि इस्लाम की दृष्टि में हर विचारधारा सम्मानीय नहीं है।  वह आस्था जो कुरीतियों या ग़लत परंपराओं पर आधारित होती है उसका स्वतंत्र विचारों से कोई संबन्ध नहीं है क्योंकि इस आस्था का कोई भी संबन्ध, विचारों से नहीं है।  उदाहरण स्वरूप यदि कोई पत्थर की पूजा करता है तो उसकी आस्था सम्मानीय नहीं हो सकती क्योंकि यदि वह ठीक से सोच-विचार करे तो अवश्य इस निष्कर्ष पर पहुंचेगा कि उसके इस कार्य ने उसे एक प्रकार का क़ैदी बना दिया है जो उसके स्वतंत्र चिंतन के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा है।

मनुष्य जब किसी भी भ्रष्ट विचारधारा का अनुसरण करता है तो उसका सबसे पहला दुष्परिणाम यह है कि उसके सोच-विचार के सारे मार्ग बंद हो जाते हैं।  अब वह केवल अपनी आस्था से ही प्रेम करता है।  यह अंधा प्रेम उसके भीतर द्वेष, संकीर्णता, और रूढ़ीवादी विचारों को जन्म देता है।  अब उसके सुनने की शक्ति समाप्त हो जाती है और वह केवल वहीं सुनना पसंद करता है जो उसकी आस्था के अनुरूप हों।

क्या यह संभव है कि कोई व्यक्ति या लोगों का एक समूह सही ढंग से सोच-विचार करने और बुद्धि का प्रयोग करके इस निष्कर्श तक पहुंचेगा कि पत्थर या पशुओं की पूजा की जाए? वास्तविकता तो यह है कि मनुष्य की बुद्धि और उसका सही चिंतन उसे कभी भी इस प्रकार के कार्य के लिए प्रेरित नहीं कर सकता।  इस प्रकार की आस्था वास्तव में बुद्धि पर नहीं बल्कि परंपराओं और रूढ़ीवाद पर आधारित है।  एसा लगता है कि आदिकाल में कुछ लोगों ने दूसरों का शोषण करने के उद्देश्य से इस प्रकार की बातों को जन्म दिया जो शताब्दियों तक चलती रहीं।

यहां इस बात का उल्लेख आवश्यक है कि एक ओर तो कहा जाता है कि मनुष्य को सोच को स्वतंत्र होना चाहिए।  दूसरी ओर यह कहा जाता है कि हरएक की आस्था स्वतंत्र होनी चाहिए और किसी को उसमें हस्तक्षेप की अनुमति नहीं है।  जिस व्यक्ति ने आस्था के लिए जिसे भी चुना है उसको उसीके हाल पर छोड़ देना चाहिए क्योंकि वह उसकी आस्था है और आस्था का सम्मान किया जाना चाहिए।  हालांकि यह सही नहीं है क्योंकि अंधविश्वास पर आधारित आस्था, स्वतंत्रता विरोधी होती है।  इस प्रकार की आस्था मनुष्य के हाथ-पैर बांध देती है।

पश्चिमी विचारक कहते हैं कि मनुष्य होने के नाते मानव सम्मानीय है।  इसलिए वह अपने लिए जो भी दृष्टिकोण अपनाता है वह भी सम्मानीय है।  यहां यह बात तो समझ में आती है कि मनुष्य सम्मानीय है और इस्लाम भी इस बात को मानता है।  इस्लाम, मनुष्य के लिए विशेष सम्मान का पक्षधर है।  किंतु यह बात सही नहीं है कि मनुष्य अपने लिए जो भी विचारधारा चुने या जिसका भी चयन करे उसका भी सम्मान किया जाए।  इस बारे में इस्लाम का अपना विशेष दृष्टिकोण है।  एसा हो सकता है कि मनुष्य अपने लिए ज़ंजीरों का चयन करे और स्वयं को उनमें बांध ले अर्थात रूढ़ीवादी विचारधारा या प्रचलित परंपराओं को अपनाकर सोच-विचार के सारे रास्ते बंद कर दे और रूढ़ीवाद रूपी ज़जीर से स्वयं को जकड़ ले।  इस्लाम की दृष्टि में मानव के सम्मान का अर्थ यह है कि हम उसके लिए मोक्ष और कल्याण का रास्ता चुनें और उसका उसी ओर मार्गदर्शन करें।  यदि रूढ़ीवादी और कट्टरपंथी विचारधाराओं का सम्मान किया जाएगा तो फिर यह तो वास्तव में एक प्रकार से मनुष्य की योग्यताओं को निखरने से रोकने के अर्थ में है।  उचित तो यह है मनुष्य स्वतंत्र ढंग से चिंतन करके अपने लिए सही मार्ग का चयन करे।

पश्चिमी विचारकों का कहना है कि किसी भी व्यक्ति पर दूसरी विचारधारा या आस्था को थोपना उचित नहीं है बल्कि यह ग़लत है।  इस्लाम पश्चिमी विचारकों के इस विचार से भी सहमत नहीं है कि बहुमत की बात मानी जाए और अल्पमत पर उसे लागू किया जाए।  इस्लाम का मानना है कि आस्था के बारे में बहुमत या अल्पमत को मानदंड नहीं बनाया जा सकता।  यह किसी भी स्थिति में उचित नहीं है कि मनुष्य बिना सोचे-समझे, वह काम करने लगे जिसे अधिकांश लोग कर रहे हैं।  वह उसी जीवनशैली या आस्था को अपनाए जिसे अधिक्तर लोगों ने अपना रखा है।  इस्लाम के अनुसार इस प्रकार की सोच, अंधे अनुसरण के समान है।  इसके लिए तर्क यह पेश किया जाता है कि अधिकांश लोग केवल कल्पना और अपनी सीमित जानकारी के आधार पर दृष्टिकोण निर्धारित करते हैं जो बुद्धि, ज्ञान और विश्वास पर आधारित नहीं होता।

दूसरी बात यह है कि मनुष्य के बारे में लोगों के फैसले को मानदंड नहीं बनाया जा सकता।  उदाहरण स्वरूप किसी व्यक्ति ने अपने कपड़ों के लिए जिस रंग का चयन किया है वह उसके निकट बहुत अच्छा हो किंतु एसा भी हो सकता है कि उसी के मित्र या परिजन उसे अच्छा न मानते हों बल्कि उसके विरोधी हों।  यही कारण है कि मनुष्य को दूसरों के फैसलों को कभी भी आस्था का मानदंड नहीं बनाना चाहिए।