इस्लाम और मानवाधिकार- 28
इस्लाम ने एक व्यापक धर्म के रूप में अपनी शिक्षाओं में समस्त विश्व वासियों को संबोंधित किया है।
इस्लाम में जहां लोगों को सोच विचार के साथ उसके निमंत्रण को स्वीकार करने की दावत दी गई है, वहीं धार्मिक विश्वासों को ज़ोर ज़बरदस्ती से लोगों पर थोपने से मना किया गया है। इस्लाम विद्वानों और विचारकों के लिए वाद विवाद का रास्ता खुला रखता है और सोच समझकर चयन करने की आज़ादी पर किसी तरह की कोई पाबंदी नहीं लगाता है।
ईश्वरीय धर्म इस्लाम में लोगों को इसे स्वीकार करने के लिए आमंत्रित किया गया है। क़ुराने मजीद में सैकड़ों बार हे लोगों और ईमान वाले कहकर संबोधित किया गया है और उन्हें सोच विचार के साथ सही और सीधा मार्ग अपनाने का निमंत्रण दिया गया है।
क़ुराने मजीद की शिक्षाओं में अपनी बुद्धि से काम न लेने वालों को जानवरों की श्रेणी में रखा गया है और बुद्धि का इस्तेमाल करने वालों की प्रशंसा की गई है। क़ुराने मजीद की आयतें उन लोगों के लिए हैं, जो उन्हें समझने के लिए विचार करते हैं और अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करते हैं। ईश्वर सूरए अंकबूत की 43वीं आयत में कहता है, यह वह उदाहरण हैं, जो हम लोगों के लिए पेश करते हैं, बुद्धिमानी लोगों के अलावा उन्हें कोई नहीं समझ सकता। इस प्रकार, ज्ञान और ईमान के बीच तार्किक संबंध को देखा जा सकता है।
धर्म, व्यवहारिक शिक्षाओं का संग्रह होता है, जिसे ईश्वर की ओर से इंसानों के मार्गदर्शन के लिए भेजा गया है। धार्मिक शिक्षाओं पर विश्वास और उनके अनुसार व्यवहार, ईमान है। इस्लाम के मुताबिक़, इंसान को चाहिए कि वह वास्तविकता की खोज और सही धार्मिक विश्वास के लिए प्रयास करे। इंसान को आज़ादी के साथ सोच विचार करना चाहिए। हर व्यक्ति की ईश्वर की ओर से यह ज़िम्मेदारी है कि वह एकेश्वारवादी धर्म को स्वीकार करे और अनेकेश्वरवाद एवं नास्तिकता से बचे। लेकिन इस्लाम इस विश्वास को ज़ोर ज़बरदस्ती से लोगों पर थोपना नहीं चाहता है। इसलिए कि हार्दिक विश्वास और धार्मिक आस्थाएं बुद्धि और विवेक द्वारा स्वीकार करने से अस्तित्व में आते हैं, इसलिए ज़बरदस्ती किसी के विश्वासों को नहीं बदला जा सकता।
ईश्वर ने इंसान को सीधा रास्ता दिखा दिया है, इसी के साथ उसे स्वीकार करने या रद्द करने की आज़ादी दी है और लोगों पर आस्था को थोपने से रोक दिया है। जिस प्रकार ईश्वर सूरए कहफ़ की 29वीं आयत में पैग़म्बरे इस्लाम (स) को संबोधित करते हुए सदाचार के चरणों का उल्लेख करता हैः कह दो कि यह तुम्हारे पालनहार का हक़ है, जो व्यक्ति चाहे ईमान ले आए और जो चाहे काफ़िर बन जाए।
इस आधार पर धार्मिक आज़ादी को ईश्वरीय शिक्षाओं में से माना जाना चाहिए, यहां तक ईश्वरीय दूत भी इसका उल्लंघन नहीं कर सकते। इसी कारण एकेश्वरवाद के विषय के संबंध में ईश्वर, पैग़म्बरे इस्लाम के पक्ष को केवल चेतावनी की हद तक स्वीकार करता है। इसलिए वे भी लोगों को ईमान लाने के लिए मजबूर नहीं कर सकते। ईश्वर सूरए यूनुस की 99वीं आयत में पैग़म्बरे इस्लाम को संबोधित करते हुए कहता है, और अगर तुम्हारा ईश्वर चाहता तो जितने लोग भी धरती पर हैं, सब ईमान ले आते, क्या तुम लोगों को मजबूर करना चाहते हो कि वे ईमान ले आएं।
इसीलिए जब इस्लामी शासन की स्थापना हुई, एकेश्वरवादी धर्मों के अनुयाईयों के लिए यद्यपि वे मुसलमान नहीं भी हुए थे, कुछ नियम बनाए गए, जिसके तहत वे आज़ादी के साथ अपने धार्मिक संस्कार अंजाम दे सकते थे। यहां तक कि कुछ सामाजिक मामलों में इस्लामी नियमों के विपरीत, अपने धार्मिक नियमों का अनुसरण कर सकते थे। वह काफ़िर जो इस्लाम से मुक़ाबले के लिए युद्ध नहीं छेड़ते थे, तो इस्लामी शासन को उनकी आस्था से कोई लेना देना नहीं था। इस्लामी शासन न ही उनकी आस्था की खोजबीन करता था और न ही केवल आस्था के कारण उन्हें सज़ा देता था।
आस्था में विविधता एक ऐसी वास्तविकता है कि इस्लाम भी उसे न केवल रद्द नहीं करता, बल्कि उसे स्वीकार भी करता है। हालांकि इस्लाम ने इस संदर्भ में स्वतंत्र वार्ता और वैचारिक बहस का रास्ता खुला रखा है। इस्लाम धर्म ने बुद्धिमत्ता के साथ ईश्वीरय मार्ग की ओर निमंत्रण देते हुए, अच्छी नसीहतों और बहसों द्वारा वार्ता के लिए रास्ता खोल दिया है, ताकि इस तरह से जिन लोगों को निमंत्रण दिया जा रहा है, अपनी इच्छा से सत्य को स्वीकार कर लें। सूरए नहल की 125वीं आयत में ईश्वर पैग़म्बरे इस्लाम को संबोधित करते हुए कहता है कि बुद्धिमत्ता और अच्छे उपदेशों से अपने ईश्वर के मार्ग की ओर लोगों को बुलाओ, और उनके साथ अच्छी शैली में तार्किक रूप से वाद विवाद करो, तुम्हारा ईश्वर सबसे बेहतर ज्ञान रखता है, कौन उसके रास्ते से भटक गया है, जिन लोगों को सही मार्ग मिल गया है वह उनके बारे में अधिक जानता है।
ईश्वरीय धर्मों के अनुयाईयों से बर्ताव के बारे में सूरए अनकबूत की 46वीं आयत में उल्लेख है, अहले किताब से सर्वश्रेष्ठ शैली के अलावा, तर्क वितर्क नहीं करना और उनसे कहो कि मेरा हर उस चीज़ पर जो ईश्वर की ओर से हमारे ऊपर और तुम्हारे ऊपर नाज़िल हुई है, ईमान है। हमारा और तुम्हारा पालनहार एक ही है और हम उसके सामने नतमस्तक हैं।
इस प्रकार संयुक्त बिंदुओं पर परस्पर सम्मान के साथ विनम्र, दोस्ताना और तार्किक बातचीत, विभिन्न मतों और धर्मों के बीच वार्ता की बेहतरीन शैली है। विविध दृष्टिकोणों को सुनने का इस्लाम स्वागत करता है, लोगों को शुभ सूचना दी गई है कि बातों को सुनों और बुद्धिमान व्यक्ति के रूप में बेहतरीन का चयन कर लो। सूरए ज़ुम्र की 17वीं और 18वीं आयतों में ईश्वर कहता है, मेरे बंदों को शुभ सूचना दे दो, कि बातों को सुनें और उनमें से जो बेहतरीन हों उनका अनुसरण करें, वे वह लोग हैं जिनका ईश्वर ने मार्गदर्शन किया है और वे बुद्धिमान हैं।
इस प्रकार, सत्य की स्वाभविक खोज के साथ बुद्धिमत्ता और चिंतन सर्वश्रेष्ठ के चयन के लिए मार्ग प्रशस्त करते हैं। धार्मिक आज़ादी शुरू से ही इस्लाम के निकट मूल्यवान रही है। जैसा कि क़ुरान में मुसलमानों से ग़ैर मुसलमानों के साथ शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत करने का आहवान किया गया है। क़ुरान अपनी शिक्षाओं में मुसलमानों को मध्य समुदाय और आदर्श समुदाय बताता है और इस्लाम को सर्वश्रेष्ठ बताते हुए कहता है, अगर कोई इस्लाम के अलावा दूसरा धर्म चुनता है, तो उसे स्वीकार नहीं किया जाएगा।
लेकिन सामाजिक क्षेत्र में, धर्म और अभिव्यक्ति की आज़ादी के कारण, इस्लामी समाज में संभव है कुछ लोग स्वाधीन रूप से दूसरे आस्थाओं के साथ ज़िंदगी गुज़ारें, इस प्रकार उनके साथ शांतिपूर्ण ढंग से रहने का अलावा कोई और रास्ता नहीं है। इस संदर्भ में इस्लाम ने ईश्वरीय धर्मों के अनुयाईयों और अन्य ग़ैर मुस्लिमों के प्रति अलग अलग पक्ष लिया है।
उदाहरण स्वरूप, ईश्वर, प्रलय के दिन और भले कार्यों पर ईमान के कारण यहूदी और ईसाई भी मुसलमानों की भांति ईश्वर के निकट मूल्यवान हैं और उन्हें भयभीत होने की ज़रूरत नहीं है। प्रलय के दिन उनका हिसाब किताब अनेकेश्वरवादियों से अलग होगा। इस वास्तविकता को देखते हुए उन लोगों के और मुसलमानों के बीच शांतिपूर्ण जीवन के लिए भूमि प्रशस्त है। आपसी शांतिपूर्ण जीवन के लिए वह संधि मद्देनज़र है कि जो इस्लामी शासन और अन्य ईश्वरीय धर्मों के अनुयाईयों के बीच होती है। इस संधि के आधार पर इन लोगों को सुरक्षा, स्वाधीनता और मुसलमानों के साथ दोस्ती का हक़ हासिल होता है।
हालांकि ईश्वर ने मुसलमानों को अन्य ग़ैर मुस्लिमों के साथ दोस्ती से रोका है, लेकिन संभव है कि अच्छे इस्लामी वातावरण में वे एक दूसरे के निकट आजाएं और उनके बीच दोस्ती हो जाए। ईश्वर सूरए मुमतहेना की 8वीं आयत में फ़रमाता है, ईश्वर ने तुम्हें उन लोगों के साथ भलाई करने और न्याय करने से नहीं रोका है, जिन्हों ने तुमसे युद्ध नहीं किया है और तुम्हें तुम्हारे घरों और इलाक़ों से बाहर नहीं किया है, इसलिए कि ईश्वर न्याय प्रेमियों को पंसद करता है।
इसी कारण, अगर वे अनेकेश्वरवादी होने के बावजूद, मुसलमानों से युद्ध की स्थिति में नहीं होंगे, तो उनके साथ शांतिपूर्ण जीवन एवं न्यायपूर्ण व्यवहार में कोई रुकावट नहीं है। बल्कि ऐसे काफ़िरों के साथ भलाई, वास्तव में न्याय है और ईश्वर न्याय करने वालों से प्रेम करता है। इस्लाम की यह शिक्षा एक मूल नियम है, जिससे इस्लामी समाज के ग़ैर मुस्लिमों के साथ व्यवहार की शैली स्पष्ट हो जाती है और मुसलमान ऐसे काफ़िरों के साथ अच्छे संबंध रख सकते हैं।