अमीर अलीशिर नवाई-2
हमने उल्लेख किया था कि तैमूरी शासनकाल ईरान में एक बेहतरीन काल था और तैमूरी परिवार द्वारा कला एवं संस्कृति के समर्थन से ईरान में संस्कृति एवं सभ्यता के एक सुनहरे दौर ने जन्म लिया। इस काल की एक विशेषता शासक परिवार में कला विशेषज्ञों का होना था।
सुल्तान हुसैन बायक़रा के विद्वान मंत्री और कला प्रेमी अमीर निज़ामुद्दीन अलीशिर नवाई इस काल की विशिष्ट हस्तियों में से एक थे। 17 रमज़ान 844 हिजरी को उनका हेरात के एक पढ़े लिखे परिवार में जन्म हुआ। शिक्षा ग्रहण और सुल्तान हुसैन बायक़रा के सत्ता संभालने के बाद, वे उच्चतम अदालत के मुख्य न्यायाधीश बने और जनता की सेवा की। यह वह काल था जब विभिन्न इलाक़ों से कला प्रेमी सुल्तान हुसैन बायक़रा के दरबार का रुख़ कर रहे थे और ईरान के कला के कोष में कला के अद्वितीय नमूनों की वृद्धि कर रहे थे। अमीर अलीशेर नवाई ने दरबारियों की ईर्ष्या के कारण अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया और सुल्तान हुसैन बायक़रा ने उन्हें दो साल के लिए उस्तराबाद का शासक बना दिया। 906 हिजरी में उनका वहीं निधन हो गया।
तैमूरी काल में ईरानी कला के विकास में कुछ राजकुमारों और दरबारियों ने अहम भूमिका निभाई थी। कला के क्षेत्र में तैमूरियों के लिए एक बड़ा आदर्श ख़ुद तैमूर था। तैमूर ने समरक़ंद को एक शानदार शहर बना दिया और जिन इलाक़ों को जीता वहां से वास्तुकारों, उद्योगपतियों और कलाकारें को समरक़ंद में एकत्रित किया, ताकि उनकी कला से लाभ उठाया जाए। उसके बाद उसके उत्तराधिकारियों ने भी इसी शैली को अपनाया। हालांकि तैमूरी राजकुमारों की शक्ति निरंतर कमज़ोर पड़ रही थी, लेकिन कला के क्षेत्र में उसी प्रकार से प्रगति हो रही थी और उनके दरबार कला के केन्द्र बने हुए थे। उनके दरबारों में दक्ष एवं प्रसिद्ध कलाकारों की उपस्थिति से कला के उनके प्रेम का डंका हर ओर बज रहा था।
तैमूरी शासकों के अलावा, अनेक दरबारियों और इस परिवार के सदस्यों को कला में अच्छी रूची थी। इसी कारण, तैमूर और शाहरूख़ की कुछ पत्नियों के समर्थन से कई इमारतों का निर्माण किया गया।
शाहरुख़ की संतान की भी कला में रूची थी। उनमें से हर एक ने न केवल कलाकारों का समर्थन किया, बल्कि ख़ुद भी कला की सेवा की और उनमें से कुछ दक्ष गुरु बने। शाहरुख़ के बड़े बेटे मिर्ज़ा उलुग़ बैग ने जब अपने पिता के आदेशानुसार समरक़ंद की सत्ता संभाली, तो उन्होंने इस शहर को सांस्कृतिक केन्द्र में परिवर्तित कर दिया। उलुग़ बैग खगोलशास्त्र के एक दक्ष विशेषज्ञ थे। ग़यासुद्दीन जमशेद काशानी जैसे विद्वानों के सहयोग से उन्होंने समरकंद में एक बड़ी एवं अद्वितीय वेधशाला की स्थापना की। उलुग़ बेग ने कवियों और विभिन्न क्षेत्र के कलाकारों पर विशेष ध्यान दिया और उनका भरपूर समर्थन किया।
हालांकि इस काल में कला के प्रति समर्पित राजकुमारों में से शाहरुख़ के बेटे मिर्ज़ा बाइसनक़ॉर का नाम लिया जा सकता है। अधिकांश इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के अनुसार, वे एक कवि, सुलेखक और संगीतकार होने के साथ साथ कला और किताबों के सबस बड़े समर्थक थे। उनकी वर्कशॉप में लेखकों और चित्रकारों ने अद्वितीय फ़ारसी साहित्य की रचनाएं कीं। वे ख़ुद एक दक्ष कवि और संगीतकार थे। शाहनामे बाइसनक़ॉरी की इसी राजा के आदेशानुसार रचना हुई और यह फ़िरदौसी के शाहनामे की महत्वपूर्ण प्रतिलिपि है।
कला प्रेमी शासक सुल्तान हुसैन बाइक़रा के साथ बुद्धिमानी मंत्री अमीर अली शेर नवाई जैसे कलाकार मौजूद थे। नवाई एक योग्य कवि थे और कला में भी उनकी रूची थी, उन्होंने ईरानी कला के विस्तार के लिए भरसक प्रयास किया और कलाकारों का व्यापक समर्थन किया। तैमूरी काल में कला के इतिहास में उनका महत्व इतना अधिक है कि अगर यह कहा जाए कि तैमूरी काल में उनके अलावा और कोई कला पर ध्यान नहीं देता तो अकेले उनका वजूद ही काफ़ी था। इस काल को ईरानी कला के इतिहास का सुनहरा काल कहा जा सकता है। अमीर अली शेर ने कला और कलाकारों पर विशेष ध्यान दिया, जिससे उनका व्यक्तित्व अनोखा हो गया है।
नवाई के समर्थन से कई इमारतों का निर्माण किया गया। क़ुल मौहम्मद औदी, बहज़ाद और सुल्तान अली शाह जैसे अनेक कलाकार अमीर अली शेर नवाई का समर्थन प्राप्त कलाकार थे। विभिन्न क्षेत्रों के कलाकारों से अली शेर का सीधा संबंध था। उनके समर्थन से कलाकारों, साहित्यकारों, वास्तुकारों, संगीतकारों और सुलेखकों को प्रगति का अवसर प्राप्त हुआ। उन्होंने ख़ुद फ़ारसी और तुर्की भाषाओं में अनेक किताबें लिखीं और कई किताबें उनके नाम से और उनके समर्थन से लिखी गईं।
इस बुद्धिजीवी मंत्री की महत्वपूर्ण गतिविधियों में से कलाकारों का समर्थन करना था। अली शेर ने हेरात के कला केन्द्र को विकास के चरम पर पहुंचाया और इस शहर को शायरी, साहित्य, संगीत, चित्रकारी और सुलेख का केन्द्र बना दिया। फ़ख़री हेरवी ने मजालिस्सुनफ़ायस किताब में अली शेर की जीवनी लिखते हुए उल्लेख किया है कि इतने अद्वितीय सुलेखकों, गायकों, संगीतकारों, चित्रकारों और कवियों ने अली शेर के प्रशिक्षण में विकास किया कि किसी और काल में इसका उदाहरण देखने को नहीं मिलता है।
उन्होंने सुल्तान हुसैन बाइक़रा के साथ मिलकर किताबों को सुन्दर बनाने पर काफ़ी धन ख़र्च किया, जिसका उदाहरण उस काल से पहले नहीं मिलता। प्रसिद्ध सुलेखक सुल्तान अली मशहदी ऐसे कलाकार थे, जो युवा अवस्था में सुल्तान अबू सईद के निमंत्रण पर हेरात गए, जिसके बाद सुल्तान और अली शेर ने उनका समर्थन किया। इस कलाकार ने अमीर अली शेर की किताब मजालिसुन्नफ़ाइस को अमीर के महल के पानी के हौज़ के संगे मरमर पर बहुत ही सुन्दर लिपि में लिखा था। ज़हीरुद्दीन बाबर ने अपनी यादों का उल्लेख करते हुए लिखा है कि मौलाना सुल्तान अली मशहदी प्रतिदिन 30 शेर सुल्तान हुसैन बाइक़रा और 20 शेर अमीर अली शेर के लिए लिखते थे। अमीर अली शेर के अन्य निकट सुलेखकों में सुल्तान अली क़ाइनी, मौलाना सुल्तान अली सब्ज़ मशहदी और मौलाना सुल्तान मोहम्मद ख़ंदान का नाम लिया जा सकता है, जिन्होंने फ़ार्सी किताबों को बहुत ही सुन्दर लिपी में लिखा है।
इस प्रसिद्ध ईरानी मंत्री की अन्य महत्वपूर्ण गतिविधियों में से बुद्धिजीवियों का समर्थन करना और उन्हें उच्च स्थान प्रदान करना था। उस काल में अमीर अली शेर का समर्थन प्राप्त बुद्धिजीवियों ने कई किताबें उनके नाम से लिखी हैं।
अमीर अली शेर नवाई ने इस क्षेत्र के उद्योगपतियों और कलाकारों पर भी विशेष ध्यान दिया, क्योंकि इमारतों और पुलों के निर्माण में उनकी बहुत रूची थी और वे इन इमारतों के सुन्दरीकरण में विभिन्न कलाओं का प्रयोग करते थे। उदाहरण स्वरूप, पत्थर के बहुत ही सुन्दर मिंबर की ओर संकेत किया जा सकता है, जो हेरात की जामा मस्जिद के लिए अली शेर के आदेश के अनुसार बनाया गया था। हालांकि अब यह मिंबर बाक़ी नहीं है। ख़्वान्मीर ने उसके बारे में विस्तार से जो लिखा है, उससे उसमें प्रयोग की गई कला का पता चलता है। ख़्वान्दमीर ने इस बारे में कहा है, अख़रोट की लकड़ी से बनाया गया पुराना मिंबर, क्योंकि टूट चुका था, अमीर ने आदेश दिया कि मरमर के पत्थर से एक मिंबर बनाया जाए। अमीर के कर्मचारियों ने पत्थर की खोज शुरू की और ख़्वाफ़ राज्य में उन्हें मरमर पत्थर मिला, उन्होंने मंहगी क़ीमत देकर उसे ख़रीदा और शीघ्र उसे इस पवित्र स्थान पर पहुंचाया। उस्ताद शम्सुद्दीन संगतराश ने उससे मिंबर बनाया। जिसकी कोई मिसाल नहीं थी।