अमीर अली शीरनवाई -3
आपको बताया कि ईरान में शासक परिवारों में तैमूरी शासन काल सबसे भव्य काल था।
इस शासन काल ने कला व संस्कृति को विशेष रूप से ध्यान दिया। तैमूरी शासन काल ईरानी सभ्यता व संस्कृति के इतिहास का सबसे उज्जलव दौर रहा है। इस काल के शासक साहित्यकारों को बहुत अहमियत देते थे जो इस काल की मुख्य विशेषता है। शासक सुल्तान हुसैन बायक़रा के वज़ीर निज़ामुद्दीन अलीशीर नवाई इस दौर की महत्वपूर्ण हस्तियों में हैं। अलीशीर नवाई को कला से बहुत प्रेम था। वह 17 रमज़ान 844 हिजरी क़मरी बराबर 9 फ़रवरी 1441 में हेरात में एक पढ़े-लिखे परिवार में पैदा हुए। अलीशीर नवाई शिक्षा हासिल करके सुल्तान हुसैन बायक़रा के वज़ीर बने और इस तरह उन्होंने लोगों की मूल्यवान सेवा की। इस दौर में जिस जगह से भी कोई कलाप्रेमी सुल्तान हुसैन बायक़रा के दरबार में पहुंचता अलीशीर नवाई उसकी मदद करते और इस तरह साहित्यकारों का कला और साहित्य के क्षेत्र में अमर योगदान बढ़ता गया। अलीशीर नवाई ने दरबारियों के द्वेष के कारण मंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया और सुल्मान हुसैन बायक़रा के आदेश से 2 साल के लिए उस्तुराबाद के गवर्नर बने और 906 हिजरी क़मरी में वहीं उनका देहांत हुआ।
इसी प्रकार हमने आपको यह भी बताया कि अलीशीर नवाई तैमूरी काल में कला को बढ़ावा देने वालों में थे और इस क्षेत्र में मूल्यवान सेवाएं दीं। उन्होंने कला व संस्कृति के प्रसार के लिए बहुत कोशिश की और ईरानी कलाकारों का भरपूर समर्थन किया। कला के इतिहास में उनकी अहमियत इतनी ज़्यादा है कि यह कहा जा सकता है कि पूरे तैमूरी काल में कोई भी अलीशीर नवाई जितना कला पर ध्यान नहीं देता था। कला को बढ़ावा देने में अमीर अलीशीर नवाई की अनथक कोशिश ही उन्हें तैमूरी दौर में इस दृष्टि से अद्वितीय बनाती है।
ईरान के विद्वान वज़ीर अलीशीर नवाई ने संस्कृति के प्रसार के लिए कलाकारों का बहुत समर्थन किया कि इस दृष्टि से यह उनका बहुत अहम क़दम था। अलीशीर नवाई साहित्य व कला में हेरात के मत को चरम पर पहुंचा और यह शहर उनकी कोशिशों से शायरी, साहित्य, संगीत, चित्र कला, सुलेखन और सोने का पानी चढ़ाने की कला का केन्द्र बन गया। उनकी ओर से मिलने वाले समर्थन व मदद ने बहुत से साहित्यकारों, शिल्पकारों, संगीतकारों, चित्रकारों और सुलेखकों की क्षमता को निखार कर चरम पर पहुंचाया।
अमीर अलीशीर नवाई चूंकि ख़ुद भी शायर व साहित्यकार थे इसलिए वह साहित्यकारों और शायरों को सबसे ज़्यादा अहमियत देते थे। वह फ़ारसी और तुर्की दोनों ही ज़बान में शायरी करते थे। उनके शेरों का संकलन भी मौजूद है जिसके बारे में बाद में उल्लेख करेंगे।
अमीर अलीशीर नवाई शायरी में दक्षता के अलावा वक्ताओं, धर्मगुरुओं और कलाकारों की भौतिक व नैतिक दोनों तरह से मदद करते थे। उन्होंने कलाकारों को सुख-सुविधा के ज़रिए दरबार को बहुत बड़ा कलाकेन्द्र बना दिया था जिसके संरक्षण में रोज़गार की चिंता से दूर रह कर कलाकार कला की सेवा कर सकता था।
अमीर अलीशीर नवाई का कलाकारों व साहित्यकारों के साथ व्यवहार किसी शासक की तरह न था बल्कि वे ख़ुद को उनका सेवक समझते थे। अगर अलीशीर नवाई के उस काल की जामी, बहज़ाद और वाएज़ काशेफ़ी जैसी कला, शायरी व आत्मज्ञानी हस्तियों के साथ व्यवहार की समीक्षा करें तो इस बात को अच्छी तरह समझ सकते हैं कि इन लोगों की कला को निखारने में अलीशीर नवाई का बहुत बड़ा योगदान था।
तैमूरी काल की एक महत्वपूर्ण हस्ती का नाम जामी है। उनकी मूल्यवान किताबें उनके ज्ञान का पता देती हैं। अपने दौर के शासकों के साथ जामी का संबंध ख़ास तौर पर शासक सुल्तान हुसैन बायक़रा और इससे ज़्यादा अहम अलीशीर नवाई से उनका संबंध, राजनैतिक ढांचे में जामी के स्थान और उनकी लोकप्रितया को दर्शाता है। इसी प्रकार उनके संबंध की समीक्षा से पता चलता है कि तैमूरी शासन का अपने दौर के कलाकारों व साहित्यकारों के साथ उस्ताद और शिष्य का संबंध था।
अलीशीर नवाई के काल में साहित्यकार स्वयं अलीशीर नवाई की छत्रछाया में ज़िन्दगी गुज़ारते थे और साहित्यकारों के उनसे निरंतर संपर्क में रहने से उस दौर की संस्कृति बहुत निखरी। यह वह बिन्दु है जिसका जामी की जीवनी में उल्लेख मिलता है। जामी का अमीर अलीशीर नवाई के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध था। जामी की अलीशीर नवाई से दोस्ती इस हद तक थी कि उन्होंने अपनी ज़्यादातर रचनाओं में अलीशीर नवाई की प्रशंसा की है। राज दरबारों की ओर शायरों व कलाकारों के रुझान के कारण की समीक्षा करने वालों का मानना है कि अगर साहित्यकार व कलाकार दरबारों का रुख़ न करते तो उनकी क्षमता नहीं निखरती। जामी के काल की राजनैतिक व आर्थिक स्थिति और रोज़गार की ज़रूरत के कारण कलाकार और विचारक दरबार से हटकर अपने सांस्कृतिक जीवन के बारे में सोच भी नहीं सकते थे। जामी के काल के एक दक्ष शायर मसऊद क़ुम्मी जब हेरात आए तो बहुत कोशिश की कि दरबार के प्रभाव दूर रह कर साहित्यिक जीवन बिताएं लेकिन ऐसा न कर सके यहां तक कि तीग़ो क़लम नामक मस्नवी कह डाली।
जामी के अलीशीर नवाई के साथ अच्छे संबंध के गवाह कई ख़त हैं जो दोनों हस्तियों ने एक दूसरे को लिखे हैं। इन ख़तों की विषयवस्तु इसलिए अहम है कि इससे जामी से अलीशीर नवाई की निकटता और जामी के विचार व चिंताओं का पता चलता है। इन ख़तों में ऐतिहासिक घटनाओं, राजनैतिक-सांस्कृतिक स्थिति, ज्ञान, साहित्य और कला के हालात और जामी व अलीशीर नवाई के बीच व्यक्तिगत संबंध का पता चलता है। रोचक बिन्दु यह है कि इन ख़तों में जामी ने किसी व्यक्तिगत बात का कोई उल्लेख नहीं किया है। जामी के व्यक्तित्व का सामाजिक आयाम बहुत ऊंचा है। उनकी सारी बातों व प्रयास का लक्ष्य आम लोगों की मदद और उनके सिर से अत्याचारियों के ज़ुल्म को रोकना था। जामी सत्ताधारियों के निकट अपने प्रभाव को लोगों के हित में उपयोग करते थे। वह भलिभांति जानते थे कि शासक सुल्तान हुसैन बायक़रा उनकी बात सुनते हैं और अमल करते हैं। इसलिए हमेशा शासक सुल्तान हुसैन बायक़रा को नसीहत करते थे।
जामी अलीशीर नवाई को सत्ता में बाक़ी रखने के लिए बहुत कोशिश करते थे ताकि इस तरह लोगों के कल्याण के लिए कोशिश कर सके। अलीशीर और जामी के बीच साहित्यिक संबंध भी था। इनमें से कोई भी किसी किताब को सार्वजनिक करने से पहले उसकी एक प्रति समीक्षा के लिए एक दूसरे को देता था।
जामी ने बहुत सी किताबें अलीशीर के अनुरोध पर लिखी या उन्हें भेंट की है। उन्होंने अपनी किताब लैला-मजनू में अमीर अलीशीर नवाई को पीड़ितों का समर्थक और अपना बेहतरीन दोस्त कहा है। अलीशीर नवाई ने अपनी ज़्यादातर किताबों में जामी का अपने उस्ताद के रूप में वर्णन किया है और बहुत सी किताबें जामी की सलाह से लिखी हैं।
अमीर अलीशीर नवाई और जामी के बीच पत्राकार के अध्ययन से यह समझा जा सकता है कि अलीशीर नवायी की पूरी कोशिश यह रहती थी कि साहित्याकारों व कलाकारों के साथ जीवन बिताएं और उनका साथ देकर उस दौर में कला को ज़्यादा से ज़्यादा बढ़ावा दें।
जामी की मौत के बाद अलीशीर ने उनकी याद में दर्दनाक शेर कह कर अपनी असीम श्रद्धा प्रकट की। इसी प्रकार उन्होंने जामी के लिए हेरात में शोकसभा आयोजित की जिसमें शहर की जनता सहित हस्तियों ने भाग लिया। इसी प्रकार अलीशीर नवाई ने जामी के लिए मक़बरा भी बनवाया।