सय्यद रूहुल्लाह मीरक और कमालुद्दीन बहज़ाद
आपको बताया कि तैमूरी शासन काल ईरान में शासन करने वाले दूसरे शाही परिवार की तुलना में सबसे शानदार शासन काल था।
तैमूरी शासन काल में कला व संस्कृति पर इतना ध्यान दिया गया कि कि यह दौर ईरान में कला व सभ्यता के इतिहास का उज्जवल दौर समझा जाता है। सत्ता के गलियारों में विद्वानों की मौजूदगी इस दौर की मुख्य विशेषता है। अमीर नेज़ामुद्दीन अलीशीर नवाई शासक हुसैन बायक़रा के विद्वान व कलाप्रेमी वज़ीर थे। अलीशीर नवाई इस दौर की बहुत अहम हस्तियों में गिनी जाती हैं। हेरात के एक विद्वान परिवार में 17 रमज़ान 844 हिजरी क़मरी बराबर 9 फ़रवरी 1441 को अमीर अलीशीर नवाई पैदा हुए। वह शिक्षा के चरण तय करते हुए शासक हुसैन बायक़रा के शासन काल में मुख्य वज़ीर के पद पर पहुंचे और इस प्रकार वे जनता की मूल्यवान सेवा कर सके। उस दौर में हर शहर व स्थान से कला व संस्कृति में माहिर लोग शासक हुसैन बायक़रा के दरबार पहुंचते और उन्हें अमीर अलीशीर नवाई का संरक्षण मिलता और वे कला व साहित्य के ख़ज़ानों में मूल्यवान रत्न बढ़ाते जाते। अमीर अलीशीर नवाई ने दरबारियों के द्वेष के कारण अपने मंत्रीपद से इस्तीफ़ा दे दिया और शासक हुसैन बायक़रा के आदेश पर दो साल के लिए उसतराबाद के राज्यपाल बने और 906 हिजरी क़मरी में उनका वहीं पर देहान्त हो गया। इसी प्रकार हमने यह भी बताया कि अमीर अलीशीर नवाई उन मंत्रियों में थे जिन्होंने ख़ुद साहित्यकार व कलाप्रेमी होने के साथ साथ कलाकारों व साहित्यकारों पर बहुत ध्यान दिया। तैमूरी काल के कला के इतिहास में उनकी अहमियत इतनी ज़्यादा है कि यह कह सकते हैं कि पूरे तैमूरी काल में अगर उनके सिवा कोई कला पर ध्यान न देता तब भी काफ़ी था कि हम उनके ज़रिए ईरान के कला के इतिहास के सबसे उज्जवल दौर को जान लें।
अमीर अलीशीर नवाई हर क्षेत्र के कलाकारों से सीधे संपर्क में रहते, उनका समर्थन करते और उनकी क्षमता का उपयोग करते। अमीर अलीशीर नवाई कभी भी कलाकारों के साथ एक शक्तिशाली शासक की भांति व्यवहार न करते। अगर हम उस दौर के जामी, बहज़ाद और वाएज़ काशेफ़ी जैसी हस्तियों के जीवन की समीक्षा करें जो उस दौर में शायरी, कला व अध्यात्म के चरम पर थे, तो यह पाएंगे कि इन लोगों की क्षमताओं को निखारने में अमीर अलीशीर नवाई की ओर से समर्थन व मदद का बहुत बड़ा रोल था।
अमीर अलीशीर नवाई ने चित्रकारी के सबसे बड़े सरपरस्तों में थे। उनकी वजह से चित्रकारी के केन्द्रों में रौनक़ लौट आयी और उनके प्रयास से इस क्षेत्र में बहुत विकास हुआ। उनकी सरपरस्ती के नतीजे में कुछ कलाकार अपनी कलाकारी के चरम पर पहुंचे।
सय्यद रुहुल्लाह मीरक उन चित्रकारों में थे जिन पर अमीर अलीशीर ने सबसे पहले ध्यान दिया। वह शासक हुसैन बायक़रा की शाही लाइब्रेरी व स्टूडियो के प्रमुख थे। वह चित्रकारी और गिल्डिंग कला में अद्वितीय क्षमता के साथ साथ शिलालेख लिखने में भी माहिर थे। हेरात की ज़्यादातर इमारतों की शोभा बढ़ाने वाले शिलालेख उन्हीं ने लिखे थे।
किताब मकारेमुल अख़लाक़ में मीरक की शिलालेख लिखने की कला और इस संदर्भ में अमीर अलीशीर नवाई के साथ उनके संबंध के बारे में आया है, “वर्ष 904 हिजरी क़मरी में अमीर अलीशीर नवाई ने हेरात की जामा मस्जिद के पुनर्निर्माण का आदेश दिया तो मस्जिद के शिलालेख लिखने की ज़िम्मेदारी चित्रकार मीरक को सौंपी गयी। लेकिन मीरक काम को टाल रहे थे जिससे टाइल तराशने वालों का काम रुक रहा था। जब उनकी ओर से सुस्ती सीमा से ज़्यादा बढ़ गयी और नसीहत का कोई असर न हुआ तो अमीर अलीशीर नवाई ने एक हल सोचा और उन्हें 15 दिन के भीतर काम ख़त्म करने पर तय्यार किया।” इस तरह के वर्णन यह दर्शाते हैं कि अमीर अलीशीर नवाई कलाकृति के सही ढंग से और समय पर अंजाम पाने को कितनी अहमियत देते थे। यहां तक कि मीरक जैसे मशहूर कलाकार को भी इस उसूल के पालन के लिए तय्यार किया और काम में विलंब के कारण उन्हें तलब कर लेते थे।
कमालुद्दीन बहज़ाद भी उन चित्रकारों में है जिनकी क्षमताओं को निखारने में अलीशीर नवाई की सरपरस्ती का बहुत बड़ा योगदान रहा। कमालुद्दीन बहज़ाद नवीं हिजरी के सबसे बड़े चित्रकार और ईरान में चित्रकारी के इतिहास के कुछ सबसे अहम चित्रकारों में गिने जाते हैं। शासक हुसैन बायक़रा के दरबार में चत्रकारी की रौनक़ का श्रेय बड़ी हद तक बहज़ाद के प्रयास को जाता है और वह भी अपनी कला में निखार का श्रेय अमीर अलीशीर नवाई को देते हैं। अमीर अलीशीर नवाई की सरपरस्ती के नतीजे में बहज़ाद हेरात में मौजूद कला के माहौल से सबसे ज़्यादा लाभ उठाया। उन्होंने अमीर अलीशीर नवाई और शासक हुसैन बायक़रा के लाइब्रेरियों से बहुत लाभ उठाया और ईरान में चित्रकारी के क्षेत्र में एक नई शाखा की बुनियाद रखी। अमीर अलीशीर ने कमालुद्दीन बहज़ाद की नैतिक व भौतिक दोनों तरह से मदद की।
कमालुद्दीन बहज़ाद के बारे में एक अहम बिन्दु यह है कि बचपन में ही उनके मां बाप का देहान्त हो गया था और रूहुल्ला मीरक उनकी सरपरस्ती जो ख़ुद बहुत बड़े चित्रकार थे। कमालुद्दीन बहज़ाद 854 से 864 हिजरी क़मरी के बीच हेरात में पैदा हुए। उनकी पैदाइश के बारे में बहुत मतभेद है।
उन दिनों मीरक लाइब्रेरियन थे और उन पर शासक बायक़रा की लाइब्रेरी की देखभाल की ज़िम्मेदारी थी। बहज़ाद ने अपनी कला गतिविधि हेरात में शुरु कीं और बहुत से कलाचारों से परिचित हुए। उन्हें सबसे ज़्यादा प्रेरणा अमीर अलीशीर नवाई से मिली कि जिन्होंने बहज़ाद की क्षमता को पहचाना, उन्हें शासक के पास ले गए और सरपरस्ती की।
अमीर अलीशीर को ख़ुद भी चित्रकारी से बहुत लगाव था और ख़ुद भी चित्रकारी करते। ख़्वान्द मीर ने अपनी किताब में इस बिन्दु की ओर इशारा करते हुए कि अमीर अलीशीर नवाई गिलडिंग और चित्रकारी में बहुत माहिर थे और उनका अपना एक दृष्टिकोण था, लिखा है, “उस समय के ज़्यादातर चित्रकार व इंजीनियर उनकी ट्रेनिंग से इस कला से परिचित हुए।”
कमालुद्दीन बहज़ाद के उस्तादों में मीरक के अलावा सय्यद अहमद तबरीज़ी भी थे जिन्होंने बहज़ाद की चित्रकारी को निखारने में बड़ा योगदान दिया। बहज़ाद का शासक हुसैन बायक़रा के दरबार और अलीशीर नवाई के निकट विशेष सम्मान था।
अमीर अलीशीर आए दिन विद्वानों व कलाकारों की सभाओं का आयोजन करते जिसमें शासत्रार्थ होता, कलाकृतियां पेश होतीं और उनकी समीक्षा की जाती। एक बार इसी तरह की एक सभा में बहज़ाद एक फ़्रेम लेकर गए। उस पर फूल और पेड़ से भरे बग़ीचे, अच्छी आवाज़ वाले परिंदों, धाराओं के चित्र बने थे। उन्होंने इस फ़्रेम को अमीर अलीशीर नवाई को पेश किया। अमीर अलीशीर ने सभा में मौजूद लोगों से उस फ़्रेम के बारे में विचार पूछे। सभा में मौजूद सभी ने जो ख़ुद भी कलाकार थे, उस्ताद बहज़ाद की कलाकृति की तारीफ़ करते हुए कहा कि यह कलाकृति बहुत ही जीवंत नज़र आती है।
अमीर अलीशीर ने कला के हेरात मत के विकास में बहुत योगदान दिया। फ़ाइन आर्टस के कलाकार सहित कला की दूसरी शाखाओं के कलाकार अमीर अलीशीर से मिलने और उनका सरपरस्ती हासिल करने के लिए हेरात जाते ताकि उनके संरक्षण में अपनी कलाओं को निखारें।
शाह मुज़फ़्फ़र, क़ासिम अली चेहरागुशा, हाजी मोहम्मद नक़्क़ाश, मुल्ला यारी मुज़्ज़हिब और मुल्ला दरवीश उन चित्रकारों में हैं जिन्होंने अलीशीर नवाई की सरपरस्ती में कला की ट्रेनिंग पायी।