यूरोप में इस्लामोफ़ोबिया और दक्षिणपंथी विचारधारा में वृद्धि - 3
यूरोप में इस्लामोफ़ोबिया और दक्षिणपंथी विचारधारा में वृद्धि - 3
आपको याद होगा कि हमने यूरोप में चरमपंथी दक्षिणपंथी विचारधारा के इतिहास और इसकी विशेषताओं के बारे में आपको बताया। योरोप में चरमपंथी दक्षिणपंथी उन्नीसवीं शताब्दी के दूसरे और तीसरे दशक में फ़ासीवाद और नाज़ीवाद के सांचे में इटली और जर्मनी में सत्ता में पहुंचे। दूसरे विश्व युद्ध के बाद यूरोप में आर्थिक व राजनैतिक समस्याओं के कारण चरमपंथी दक्षिणपंथी विचारधारा ने एक बार फिर सिर उठाया है। अलबत्ता यह चरमपंथी दक्षिणपंथी विचारधारा नाज़ीवाद और फ़ासीवाद से समानता रखने के बावजूद उनसे भिन्न भी है। पिछले कार्यक्रम में चरमपंथी दक्षिणपंथी विचारधारा के बारे में हमने उल्लेख किया। चरमपंथी दक्षिणपंथी विचारधारा की मूल विशेषताएं ये हैं कि यह विचारधारा भूमंडलीकरण, इस्लाम और योरोपीय संघ के ख़िलाफ़ है और लोकाधिकारवादी प्रवृत्ति रखती है। यह विचारधारा ब्रिटेन, फ़्रांस, बेल्जियम, नेदरलैंड, ऑस्ट्रिया, आइसलैंड, डेनमार्क, फ़िनलैंड, नॉर्वे और स्वीडन में फैल रही है। चरमपंथी दक्षिणपंथी विचारधारा की एक विशेषता इसका लोकाधिकारवादी होना है। पाप्यलिज़्म लेटिन शब्द पाप्युलस से लिया गया है जिसका अर्थ है आम लोग। राजनैतिक शब्दावली के शब्दकोश में पाप्युलिज़्म का अर्थ जन-आस्था है जो विदित रूप से सार्थक अर्थ लगता है जैसे प्रजातंत्र। लेकिन पाप्यलिज़्म के नकारात्मक अर्थ भी हैं। पाप्युलिज़्म का अर्थ सामाजिक विज्ञान में उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में प्रचलित हुआ। पाप्यलिज़्म अर्थात लोकाधिकारवाद से मुराद ऐसा आंदोलन लिया गया जिसे न्यूयॉर्क में बड़े पूंजिपतियों ने शुरु किया था और उसके बाद इससे मुराद ऐसे राजनेता लिए जाने लगे जो आधुनिकतावाद के ख़िलाफ़, अतार्किक और रूढ़ीवादी हैं। लोकाधिकारवाद एक प्रकार की राजनीति है जिसमें समाज में व्याप्त अप्रसन्नता, भय, समस्याओं और अधिकार की प्राप्ति की उठने वाली मांगों के ज़रिए लोगों को व्यक्तिगत लक्ष्य के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इस प्रकार की राजनीति मौजूद समस्याओं के हल के लिए तार्किक मार्ग पेश करने के बजाए यह दावा करते हैं कि उसके पास सीधा व तेज़ उपाय है। यह विचारधारा ऐसे वादे करती है जिसे पूरा करने में सक्षम नहीं होती। लोकाधिकारवादी मुश्किलों का कारण जानने की कोशिश नहीं करते बल्कि मुश्किल के हल के लिए सादा मार्ग पेश करती है और ऐसी बात करते हैं जो व्यवहारिक नहीं हो सकती। इस विचारधारा की पूरी कोशिश समाज के निचले वर्ग में एक प्रकार की उम्मीद जगाना है, इसलिए वह विशेषज्ञ लोगों पर ध्यान नहीं देती।
लोकाधिकारवादी राजनेता लोक लुभावन नारों, आम बात और लोक भावना को उभार कर उनका मत हासिल करने की कोशिश करता है और असंतोष की लहर पर सवार होकर सत्ता हथियाने का इरादा रखता है। वह घृणा जैसी, लोगों में मौजूद भावना को लक्ष्य बनाता है, समाज में सुरक्षा की ज़रूरत को मुद्दा बनाता है, हमेशा निर्धन लोगों की बात करता है और ख़ुद को धनवानों का विरोधी ज़ाहिर करता है। अवास्ताविक दुश्मन का नाम लेता है और उसे सभी मुश्किलों का कारण बताता है। वह सिर्फ़ नारा देता है। लोकाधिकारवादी नेता समाज के सिर्फ़ उस वर्ग व गुट की बात करता है जो ख़ुद को मौजूदा आर्थिक, सामाजिक व राजनैतिक व्यवस्था में सबसे ज़्यादा नुक़सान में पाते हैं। एक वाक्य में यह कह सकते हैं कि लोकाधिकारवादी समाज के उन लोगों की कुंठा को अपनी ढाल बनाता है जो पूरे अस्तित्व से ख़ुद को वंचित समझते हैं लेकिन चूंकि ये लोग कम पढ़े या अनपढ़ होते हैं इसलिए लोकाधिकारवादी नेता के धोखे में आते हैं और उसको मुक्तिदाता समझ लेते हैं। योरोपीय देशों का पिछले एक दशक के दौरान आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक व सुरक्षा क्षेत्र से जुड़े संकट का सामना रहा है। 2008 में शुरु हुआ आर्थिक संकट पूरे योरोप में फैल गया जिससे निपटने के लिए आर्थिक किफ़ायत की अपनायी गयी नीति क योरोपीय समाजों पर गहरा असर पड़ा। आर्थिक किफ़ायत की नीति का परिणाम यह निकला कि इन समाजों में आर्थिक खाई बढ़ गयी, मध्यम और निर्धन वर्ग की क्रय शक्ति कम हो गयी और बेरोज़गारी बढ़ गयी। आतंकवादी ख़तरों की बढ़ती लहर और यूरोपीय शरणार्थियों की यूरोप में उठी लहर से चरमपंथी दक्षिणपंथी दलों को यह मौक़ा मिल गया कि समाज में मौजूद असंतोष के माहौल से जनमत को अपनी ओर खींचने के लिए ज़्यादा से ज़्यादा फ़ायदा उठाएं। चरमपंथी दक्षिणपंथी दलों की लोकाधिकारवादी शैली यह दर्शाती है कि वे जनमत को अपनी ओर खींचने के लिए नाना प्रकार के हथकंडे अपना रहे हैं।
चरमपंथी दक्षिणपंथी दल लोकाधिकारवादी नारों के ज़रिए योरोप की उदारवादी सरकारों और योरोप को एकजुट बनाए रखकर जो उपलब्धियां हासिल हुयी हैं उनके सामने चुनौति खड़ी कर दी हैं। चरमपंथी दक्षिणपंथी विचारधारा को पहली सफलता 23 जून 2016 को ब्रिटेन में हुए जनमत संग्रह में मिली जिसमें इस विचारधारा के लोग योरोपीय संघ से ब्रिटेन को बाहर निकालने में इस देश की जनता के मत को हासिल करने में सफल हुए। योरोपीय संघ का विरोध करने के पीछे राष्ट्रवादी व राष्ट्रीय पहचान को बाक़ी रखने की भावना है। राष्ट्रवाद पर बल देना योरोप में चरमपंथी दक्षिणपंथी दल की एक विशेषता है। राष्ट्रीयता से प्रेम और राष्ट्रीय हितों की रक्षा बुरी बात नहीं है लेकिन अगर यह भावना अतिवाद का रूप अपना ले तो बहुत सी मुश्किलों का कारण बनती है। दूसरे राष्ट्रों से नफ़रत व द्वेष और योरोपीय संघ में विलय का विरोध चरमपंथी राष्ट्रवाद का परिणाम है। चरमपंथी दक्षिणपंथी दलों का मानना है कि राष्ट्रवाद से एकता व राष्ट्रीय पहचान मज़बूत होती है और कभी कभी यह भावना नस्लभेद का कारण बनती है। योरोप के कुछ चरमपंथी दक्षिणपंथी दल नस्ल के स्थान पर राष्ट्रीय संस्कृति व मूल्यों पर बल दे रहे हैं ताकि ख़ुद को नस्लभेदी होने के आरोप से बचा सकें। कुछ प्रकार की संस्कृतियों का विरोध भी इसी विशेषता का नतीजा है। यह कहा जा सकता है कि देशी संस्कृति पर बल देना एक प्रकार से विदेशियों से नस्लभेद के आधार पर डराना है। इसका लक्ष्य राष्ट्र को नस्ल के आधार पर एक जैसा बनाना, पारंपरिक मूल्यों की ओर पलटना और समाज से उन गुटों को ख़त्म करना है जो उसकी पारंपरिक पहचान के लिए ख़तरा हों। इसका अर्थ सभी इंसानों के बराबर होने के सिद्धांत का विरोध करना और नस्लभेद के आधार पर मेल-मिलाप पर बल देना है। चूंकि जैविक आधार पर नस्लभेद को यूरोपीय जनता स्वीकार नहीं करती, इसलिए अल्पसंख्यकों व पलायनकर्ताओं को नस्लभेदी ख़तरा दर्शाने के बजाए सांस्कृतिक ख़तरा दर्शाने की कोशिश हो रही है कि इस विषय को पश्चिमी मूल्यों की परिधि में बेहतर ढंग व आसानी से पेश किया जा सकता है। मिसाल के तौर पर जर्मनी में नस्लभेदी हमले की बढ़ती घटनाएं, चरमपंथी दक्षिणपंथी दलों की विचारधारा के प्रभाव के कारण हैं और जर्मनी 1990 के दशक से नस्लभेदी राष्ट्रवाद की ओर दुबारा पलटने लगा। आरईपी और जर्मन राष्ट्रीय डेमोक्रेट एनपीडी जैसी चरमपंथी दक्षिणपंथी पार्टियों का रुजहान दूसरी पार्टियों की तुलना में अधिक राष्ट्रवादी है वे प्लूरलिज़्म के मुक़ाबले में इंडविजुअलिज़्म अर्थात व्यक्तिवाद का समर्थन करती हैं।
वर्ष 2008 में जर्मनी के हेस राज्य के चुनाव में एनपीडी पार्टी ने एक पोस्टर छपवाया। इस पोस्टर पर लिखा था, हम हेस को पाक करेंगे। इस पार्टी ने इस तरह का संदेश लोगों को पहुंचाया, “जर्मनी सिर्फ़ जर्मन जनता का है और ग़ैर जर्मन लोग इस देश को छोड़ दें।” इस तरह की एक और मिसाल पगीडा आंदोलन है। पगीडा असल में “पश्चिम के इस्लामीकरण के ख़िलाफ़ वतनपरस्त योरोपीय नागरिक आंदोलन” का संक्षिप्त रूप है। यह आंदोलन अक्तूबर 2014 में जर्मनी के ड्रेस्डन शहर से शुरु हुआ। यह आंदोलन दो साल बाद जर्मनी के बाहर भी फैल गया है। योरोप के चरमपंथी दक्षिणपंथी दल इस समय योरोपीय देशों में चुनाव व राजनैतिक मंच पर बहुत प्रभावी हो गए हैं। जब 2002 में जान मैरी लोपेन फ़्रांस में राष्ट्रपति पद के चुनाव के दूसरे चरण में पहुंचे तो फ़्रांसीसियों ने योरोप के बाक़ी भाग की तुलना में सबसे ज़्यादा फ़ासीवाद के ख़तरे को महसूस किया। लेकिन आज पूरे योरोप में फ़ासीवाद की दस्तक सुनायी दे रही है। अब नियो फ़ासीवाद संभावित ख़तरा नहीं रह गया है बल्कि योरोपीय समाज की वास्तविकता बन गयी है।
योरोप के मध्यमार्गी दक्षिणपंथी दल भी अपने जनाधार को बचाने के लिए चरमपंथी दक्षिणपंथ की तरह शरणार्थी व इस्लाम विरोधी नारे लगा रहे हैं।