यूरोप में इस्लामोफ़ोबिया और दक्षिणपंथी विचारधारा में वृद्धि - 4
हमने अतिवादी वामपंथ की दो प्रमुख विशेषताओं “पापुलिस्ट” और राष्ट्रवाद का उल्लेख किया था।
पापूलिस्ट समर्थक, लोकलुभावन नारों, समस्याओं को सुलझाने के वादे और इसी प्रकार की अन्य बातों से लोगों की भावनाओं को भड़काकर उनको अपना हम ख़याल बनाते हैं। इस प्रकार वे लोगों के विश्वास को जीतने के प्रयास करते हैं। बाद में वे किसी भी वर्ग या राष्ट्र के असंतोष को मुद्दा बनाकर अधिक से अधिक सत्ता प्राप्ति के प्रयास करते हैं। यह लोग अदृश्य शत्रुता को विषय बनाकर उसे ही समस्त समस्याओं का मुख्य कारण बताते हैं।
“पापुलिस्ट” वास्तव में समाजवादी विचारधारा पर आधारित 1860 का एक आन्दोलन है जिसके समर्थकों को 'नरोदनिक' या 'पापुलिस्ट' कहा जाता था। यह लोग आतंक के साधनों द्वारा तत्कालीन किसानों को भूमि का स्वामी बनाना चाहते थे।
दूसरे राष्ट्रों के प्रति द्वेष और एक-दूसरे से घृणा जैसी बातें, अतिवादी राष्ट्रवाद की देन हैं। यही अतिवादी सोच, यूरोप में जातिवाद के विचार को बढ़ा रही है। यूरोप में पलायनकर्ताओं का विरोध भी इसी अतिवादी राष्ट्रवाद के कारण बढ़ता जा रहा है। हालिया कुछ वर्षों के दौरान यूरोपीय देशों में वामपंथी दलों की संख्या में वृद्धि, किसी सीमा तक वहां पर आने वाले पलायनकर्ताओं के कारण है। कुछ यूरोपीय देशों में आम लोगों के बीच पलायनकर्ताओं के प्रति पाए जाने वाले असंतोष का दुरूपयोग करते हुए अतिवादी वामपंथी दल इस बात के प्रयास में हैं कि इस विषय को वे अपने हित में प्रयोग करें।
ज्ञात रहे कि यूरोप में शरणार्थियों के प्रति असंतोष कोई नई बात नहीं है। इस बात के दृष्टिगत कि यूरोप में जातिवादी सोच लंबे समय से पाई जाती है पलायनकर्ता ही अतिवादी गुटों के हमलों का पहला लक्ष्य रहे हैं। कहते हैं कि यूरोप में होने वाले कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तनों के कारण वहां पर पलायन के विरोध और अतिवादी वामपंथी दलों के प्रति झुकाव में वृद्धि हुई है। इन परिवर्तनों में आर्थिक संकट, अशांति तथा अफ़्रीकी एवं मध्यपूर्व के देशों में पश्चिमी सरकारों द्वारा संकट उत्पन्न करने के कारण यूरोप की ओर पलायन की बाढ़ जैसी बातों का उल्लेख किया जा सकता है। एसे में कुछ अरब देशों विशेषकर सीरिया के युद्धग्रस्त लोगों ने यूरोप की ओर पलायन किया। कुछ लोगों का कहना है कि पलायन की यह प्रक्रिया, अतिवादी एवं चरमपंथी वामपंथी दलों की ओर झुकाव का मुख्य कारण है। यहां पर इस बात का उल्लेख भी ज़रूरी है कि यूरोप में घटने वाली आतंकवादी घटनाएं और आतंकवादी धमकियों की भी पलायनकर्ताओं और मुसलमानों के विरुद्ध बढ़ती घृणा में महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यूरोप में मुसलमानों के विरुद्ध बढ़ती नफ़रत का कारण यह भी है कि जो लोग वहां पर पलायन करके आ रहे हैं उनमें से अधिकांश उत्तर अफ्रीका तथा मध्यपूर्व के देशों के हैं जो मुसलमान हैं। यही कारण है कि यूरोप में पलायनकर्तओं के प्रति बढ़ती घृणा के साथ ही मुसलमानों के विरुद्ध भी नफ़रत बढ़ रही है।
यूरोप में पलायनकर्ताओं या मुसलमानों के प्रति घृणा बढ़ाने में सबसे बड़ी भूमिका, यूरोप के अतिवादी वामपंथी दलों की है। अतिवादी वामपंथी विचारधारा का यह मानना है कि पलायनकर्ताओं से विरोध का कारण जातिवाद नहीं बल्कि सांस्कृतिक और आइडेंटिटी क्राइसेस या पहचान का संकट है। अतिवादी वामपंथी विचारधारा के अनुसार इसका अर्थ यह है कि जो लोग पलायन करके आते हैं वे सामान्यतः अपनी पहचान को सुरक्षित रखते हैं और जिस देश में वे पलायन करके आए हैं वहां की संस्कृति को नहीं अपनाते। इस प्रकार के लोग स्थानीय एवं राष्ट्रीय मूल्यों के लिए ख़तरा समझे जाते हैं अतः उन्हें अपने देशों को वापस चले जाना चाहिए। इसीलिए उनका विरोध किया जाता है।
अतिवादी वामपंथियों का मानना है कि पलायनकर्ता, अपनी इस सोच के साथ जिस देश में रहते हैं वहां पर बहु-सांस्कृतिक समाज बन जाते हैं जो बाद में मेज़बान देश की संस्कृति और राष्ट्रीय पहचान के लिए ख़तरा बनते हैं। यदि ग़ौर से देखा जाए तो पलायनकर्ताओं से विरोध, एक हिसाब से मानवजाति से विरोध के अर्थ में है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि अतिवादी वामपंथी विचारधारा की दृष्टि में पलायनकर्ता, तीन आयामों से हमारे लिए चुनौती हैं। इस विचारधारा के हिसाब से इन चुनौतियों में से एक सांस्कृतिक मामला है। यह विचारधारा आम जनमत में इस बात को स्वीकार कराने पर बल दे रही है कि पलायनकर्ता, अपने मेज़बान देश की मुख्य राष्ट्रीय धारा में आ ही नहीं सकते अतः उन्हें स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। दूसरे नंबर पर वे कहते हैं कि पलायनकर्ताओं के आने से सुरक्षा संबन्धी ख़तरे उत्पन्न होते हैं। वे कहते हैं कि पलायनकर्ता, अधिकतर अपराधिक गतिविधियों में लिप्त होते हैं। तीसरी बात यह है कि अतिवादी वामपंथी विचारधारा के अनुसार पलायनकर्ता, यूरोपीय देशों की अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ बने हुए हैं। इन्होंने स्थानीय लोगों के रोज़गार पर डाका डाला है। वामपंथियों का यह भी कहना है कि पलायनकर्ता, देश में बेरोज़गारी बढ़ाते हैं और लोगों की नौकरियां छीन लेते हैं।
एक बात ध्यान योग्य यह है कि यूरोप जाने वाले अधिकांश पलायनकर्ता मुसलमान हैं इसीलिए यूरोप में शरणार्थियों के विरुद्ध घृणा के साथ ही इस्लामोफोबिया में भी वृद्धि हुई है। यही विषय वर्तमान समय में यूरोपीय देशों में सक्रिय वामपंथी दलों के सबसे महत्वपूर्ण हथकण्डे में बदल गया है। इस संबन्ध में जर्मनी के “पेगिदा” आन्दोलन का उल्लेख किया जा सकता है। वर्तमान समय में यूरोप में वे दल ही सफल माने जाते हैं जो मुसलमानों को गंभीर समस्या के रूप में पेश करें और इस्लाम का खुलकर विरोध करते रहें। ब्रिटेन में किये गए एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि इस देश में अतिवादी वामपंथी दलों के समर्थकों की संख्या में दो बराबर की वृद्धि हुई है। यूरोपीय संघ के मूलभूत अधिकारों के संघ की रिपोर्ट के अनुसार यूरोप में रहने वाले हर 3 मुसलमानों में से एक, इस्लाम विरोधियों की हिंसा का अवश्य शिकार हुआ है।
अमरीका में होने वाली ग्यारह सितंबर की घटना के बाद से अमरीका और यूरोपीय देशों में अल्पसंख्यकों विशेषकर मुसलमानों के विरुद्ध हिंसक कार्यवाहियों में बहुत तेज़ी से वृद्धि हुई है। वहां के इस्लाम विरोधी, मुसलमानों को अपने समाज के लिए गंभीर ख़तरा दर्शाते हैं। आस्ट्रिया के आज़ादी दल के संस्थापक का कहना है कि अतिवादी वामपंथी दल, इस्लामी मूल्यों के विरुद्ध हैं। एक अन्य अतिवादी यूरोपीय नेता वेल्डर्ज़ का कहना है कि मुसलमान, समस्याओं की जड़ हैं।
यहां पर इस बिंदु की ओर संकेत करना ज़रूरी है कि सारे यूरोपीय देशों में इस्लामोफोबिया और पलायनकर्तओं के प्रति दुर्भावना, एक समान नहीं है। पूर्वी यूरोप और केन्द्रीय यूरोप में यह समस्या कुछ कम है। पूर्वी यूरोप में जातिवाद और यहूदी विरोधी लहर अधिक दिखाई पड़ती है। यहां पर अल्पसंख्यकों के विरुद्ध नफ़रत दूसरे रूप में दिखाई देती है।