इस्लाम और मानवाधिकार-29
हमने इस बात का उल्लेख किया कि इस्लाम इंसान से चाहता है कि वह सत्य को समझने के लिए कोशिश करे इसलिए वह लोगों को इस्लाम के बारे में चिंतन मनन के लिए आमंत्रित करता है।
इस्लाम धर्म का यह उसूल है कि इंसान ख़ुद सोच-विचार के ज़रिए एकेश्वरवाद को पहचाने और अनेकेश्वरवाद व नास्तिकता से दूरी अपनाए। अलबत्ता इस्लाम इस आस्था को थोपना नहीं चाहता। चूंकि आस्था का संबंध सोच-विचार और अंतर्रात्मा से है इसलिए आस्था के संबंध में किसी के साथ ज़ोर ज़बरदस्ती नहीं की जा सकती। ईश्वर मानवता का सीधे रास्ते की ओर मार्गदर्शन करने के साथ ही इंसान को इस बात के लिए आमंत्रित करता है कि वह किसी ज़ोर ज़बरदस्ती के बिना सही मार्ग का चयन करे।
दूसरी ओर पवित्र क़ुरआन के आदेशानुसार, इस्लामी हुकूमत में मुसलमानों का यह कर्तव्य है कि उन ग़ैर मुसलमानों के साथ शांतिपूर्ण जीवन बिताएं जो उन्हें यातना नहीं देते। इसी प्रकार ग़ैर मुसलमानों के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार करें।
इस बात के मद्देनज़र कि इस्लाम ने आस्था के चयन के लिए छूट दी है, यह सवाल उठता है कि आस्था के चयन में इस स्वतंत्रता के बावजूद क्यों इस्लाम ने उन लोगों के लिए कड़ी सज़ा रखी है जो धर्म को छोड़ देते हैं?
इस्लाम में आस्था की आज़ादी का सिद्धांत मन से मानने पर निर्भर है। इसमें किसी प्रकार की ज़ोर ज़बरदस्ती नहीं है। इस उदारता के वावजूद इस्लाम ने अपने अनुयाइयों को अपना धर्म छोड़ने की इजाज़त नहीं दी है कि जिसके लिए इरतेदाद शब्द का इस्तेमाल होता है। पवित्र क़ुरआन में धर्म छोड़ने के संबंध में सख़्त फटकार लगायी गयी है। रोचक बिन्दु यह है कि इरतेदाद से संबंधित पवित्र क़ुरआन की किसी भी आयत में सांसारिक दंड निर्धारित नहीं है लेकिन पैग़म्बरे इस्लाम और पवित्र परिजनों के आचरण में इसके लिए कठोर दंड निर्धारित है। इसी कारण वरिष्ठ इस्लामी धर्मगुरुओं ने भी इरतेदाद के संबंध कठोर दंड बताए हैं। पवित्र क़ुरआन में धर्म छोड़ने वाले को शैतान पर मोहित, घाटा उठाने वाला, नास्तिक और इन जैसी उपमाओं से याद किया गया है। जैसा कि बक़रह सूरे की आयत नंबर 217 में ईश्वर कह रहा है, “तुममे जो भी धर्म से निकल जाए और उसी अवस्था में मर जाए तो वह नास्तिक मरा है। दुनिया में उसके सभी कर्म बेकार हुए और परलोक में उसे नरक में हमेशा रहना होगा।”
शिया धर्मगुरुओं ने धर्म से निकलने वालों को मिल्ली और फ़ितरी दो वर्ग में बांटा है। मुर्तद फ़ितरी उसे कहते हैं जो मुसलमान पैदा हुआ हो और नास्तिक हो जाए। मुर्तद मिल्ली उसे कहते हैं जो पहले नास्तिक रहा हो, बाद में मुसलमान हो और फिर से नास्तिक हो जाए। अंतर्राष्ट्रीय नागरिक व राजनैतिक अधिकारों के प्रतिज्ञापत्र के 18वें अनुच्छेद के अनुसार, “हर व्यक्ति को चिंतन-मनन, विवेक और धर्म की आज़ादी का अधिकार हासिल है। इस अधिकार में एक धर्म या आस्था को स्वीकार करने या न करने की आज़ादी, अपनी आस्था को व्यक्त करने चाहे व्यक्तिगत रूप में या सामूहिक रूप में, चाहे सार्वजनिक रूप में या छिप कर हो, उपासना में और रीति को लागू करने और धार्मिक शिक्षाओं व संस्कारों को लागू करने की आज़ादी शामिल है।” अब सवाल यह उठता है कि इस्लाम के आस्था की आज़ादी के संबंध में प्रगतिशील विचार के बावजूद धर्म को छोड़ने वाले मुर्तद व्यक्ति के बारे में आदेश की किस तरह व्याख्या की जाए? मुर्तद व्यक्ति को धर्म को छोड़ने के जुर्म में फांसी देने जैसे भारी आदेश के पीछे क्या बुद्धिमत्ता है?
इरतेदाद के संबंध में एक महत्वपूर्ण बिन्दु इस्लामी क़ानून और धर्मशास्त्र में इस अपराध को साबित करने वाले तर्क को लेकर है। इमाम ख़ुमैनी का दृष्टिकोण यह है कि इरतेदाद ख़ुद मुर्तद व्यक्ति की दो बार स्वीकारोक्ति या दो आदिल व्यक्ति की गवाही से साबित हो जाता है। इस्लाम में आदिल उस व्यक्ति को कहते हैं जो इस्लाम के आदेशों का पालन करता हो। इसी प्रकार यह ज़रूरी है कि मुर्तद व्यक्ति व्यस्क, बुद्धिमान और आज़ाद हो और उसने जानबूझकर ऐसा किया हो। दूसरी ओर इस्लामी समाज में मुर्तद व्यक्ति के विदित व्यवहार पर नज़र रखने वाले दो आदिल व्यक्ति की गवाही का सामाजिक असर पड़ेगा। इसलिए किसी व्यक्ति के मन ही मन में मुर्तद होने और किसी व्यक्ति के खुल्लम खुल्ला मुर्तद होने के बारे में अलग अलग व्यवहार अपनाया जाएगा।
जो व्यक्ति मन से मुर्तद हो जाए अर्थात धर्मभ्रष्ट हो जाए, अपनी इरतेदाद या धर्म छोड़ने के बारे में कुछ न कहे तो ऐसे व्यक्ति के संबंध में किसी प्रकार की ज़ोर ज़बर्दस्ती नहीं की जा सकती। ऐसा व्यक्ति आज़ादी से कल्याण या बर्बादी में से किसी एक रास्ते का चयन करता है। स्पष्ट है कि गुमराही का रास्ता चुनने वाले ने महापाप किया है और परलोक में उसे बुरा नतीजा भुगतना होगा। ऐसे व्यक्ति के संबंध में इस्लामी सरकार को उसकी आस्था की जांच-पड़ताल करने का अधिकार नहीं है। तो अगर कोई व्यक्ति मन में मुर्तद हो जाए और अपने इस बदलाव को प्रकट न करे तो इस्लामी सरकार उसे दंडित नहीं करेगी लेकिन अगर कोई व्यक्ति व्यवहारिक रूप से मुर्दत हो जाए। अपने कर्म के ज़रिए इरतेदाद को ज़ाहिर करे और उसका कर्म समाज में गुमराही और इस्लामी सरकार के लिए हानिकारक हो तो ऐसा व्यक्ति अपराधी समझा जाएगा और शासक की ओर से उसे क़ानूनी दंड दिया जाएगा।
इस प्रकार इस दो तरह की स्थिति के मद्देनज़र, एक ओर आस्था को चुनने की आज़ादी और दूसरी ओर धर्म को छोड़ने की अनुमति न होने के बीच एक तार्किक संपर्क को स्थापित किया जा सकता है और यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि मुर्तद व्यक्ति को मौत की सज़ा देने से संबंधित रिवायत जिनके बारे में सभी इस्लामी मतों के धर्मगुरु एकमत हैं, उस मुर्तद व्यक्ति के बारे में है जिसने अपने कर्म से समाज की सुरक्षा व व्यवस्था को नुक़सान पहुंचाया हो। इस व्याख्या से यह कहा जा सकता है कि इरतेदाद का आदेश उस समय जारी होगा जब व्यक्ति अपने इरतेदाद का खुल्लम खुल्ला एलान किया हो, इक़रार किया हो और अगर ऐसा नहीं है सिर्फ़ मन में एक व्यक्ति मुर्तद हो जाए तो उसके ख़िलाफ़ आदेश जारी नहीं हो सकता। इससे पता चलता है कि इरतेदाद के संबंध में इस्लाम इसके राजनैतिक व सामाजिक आयाम पर बल देता है। इस्लाम ने इरतेदाद के संबंध में सामाजिक व सार्वजनिक आयाम को मद्देनज़र रखा है कि इस उद्देश्य से धर्म को छोड़ने के सामाजिक नुक़सान को रोकना और इस्लाम के दुश्मन के षड्यंत्र को नाकाम करना है।
इरतेदाद अर्थात धर्म छोड़ने के अपराध होने के बारे में इस बात पर ध्यान देना ज़रूरी है कि मन में धर्म को छोड़ना एक व्यक्ति का व्यक्तिगत मामला है और इसका संबंध अमुक व्यक्ति के विवेक से है लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि व्यक्ति के सामाजिक होने के कारण व्यक्तिगत विचार का दूसरों पर थोड़ा या ज़्यादा असर ज़रूर पड़ता है। यही बात आस्था के संबंध में भी लागू होती है। इरतेदाद के संबंध में मान्यता इस बात पर है कि मुर्तद या धर्मभ्रष्ट व्यक्ति शोध व अध्ययन के ज़रिए अपने विचार में धर्म में कमज़ोर पहलू को समझ गया और उसे कोई दूसरा धर्म बेहतर लगता है, उसकी आस्था में इस बदलाव का आम लोगों के मन पर ख़ास तौर पर उन लोगों के मन पर बुरा असर पड़ेगा जिन्होंने धर्म को सोच-विचार कर नहीं अपनाया है। इस तरह इस बदलाव से सामाजिक स्तर पर उथल पुथल पैदा होगी।
इस्लाम के आरंभ में यहूदी ताज़ा मुसलमान होने वालों के मनोबल को तोड़ने के लिए कुछ लोगों को मुसलमानों के भेस में भेजते थे। वे लोग विदित रूप से ख़ुद को मुसलमान कहते थे। ये पैठ बनाने वाले लोग कुछ समय बाद इस्लाम को छोड़ देते और यह कहते फिरते थे कि इस्लाम अनुसरण करने के योग्य धर्म नहीं है। इस तरह कुछ मुसलमानों के मन में भी शंका पैदा होने लगती। इसलिए इस तरह की चाल को नाकाम बनाने के लिए इस्लाम में यह उपाय अपनाया गया है। यह चीज़ मौजूदा स्थिति पर भी लागू होती है और संभव है दुश्मन भी यही हथकंडा अपनाए। यह संवेदनशीलता उस वक़्त बढ़ जाती है जब किसी समाज में इस्लामी व्यवस्था लागू हो। क्योंकि मुमकिन है सरकार के साथ लोगों के संबंध में किसी प्रकार का विघ्न पैदा हो जाए कि इस स्थिति में इरतेदाद का सामाजिक असर क़ानून - व्यवस्था पर पड़ेगा।
धर्मभ्रष्टता और उसे प्रकट करना, एक प्रकार का इस्लाम और मुस्लिम समाज के ख़िलाफ़ व्यवहारिक षड्यंत्र, क़ानून-व्यवस्था और समाज के आध्यात्मिक सुकून में विघ्न पैदा करने, नास्तिकता को बढ़ावा देने के लिए वातावरण बनाने और इस्लामी समाज को कमज़ोर करने की पृष्ठभूमि तय्यार करने जैसा है। इस्लाम में पश्चिम के दृष्टिगत मानवाधिकार के सिद्धांत के विपरीत इरतेदाद के लिए गंभीर दंड मद्देनज़र रखा गया है, शायद इसका कारण यह है कि इरतेदाद उपासना और ईश्वर के सामिप्य जैसे सृष्टि के सबसे बड़े उद्देश्य के ख़िलाफ़ सबसे ख़तरनाक हथियार है। इरतेदाद से समाज में धार्मिक शांति को नुक़सान पहुंचता है इसलिए इस्लाम में उस मुर्तद के लिए मौत की सज़ा नहीं है जिसने अपने इरतेदाद का सार्वजनिक रूप से एलान नहीं किया है। इसी तरह अगर कोई व्यक्ति यह जान जाए कि अमुक व्यक्ति मुर्तद अर्थात धर्मभ्रष्ट हो गया है तो वह उस व्यक्ति को मृत्युदंड की सज़ा नहीं दे सकता। इस आधार पर इस्लाम में मुर्तद या धर्मभ्रष्ट को सज़ा देने का उद्देश्य इस्लामी देशों के भीतरी मोर्चे को सुरक्षित रखना और उसमें बाहरी तत्वों और पाखंडियों के प्रभाव को रोकना है। ख़ास तौर पर इसलिए कि यह आदेश किसी ऐसे व्यक्ति के ख़िलाफ़ नहीं जो मन में आस्था नहीं रखता और उसे प्रकट भी नहीं करता बल्कि यह आदेश उस व्यक्ति के लिए है जो अपनी धर्मभ्रष्टता का प्रचार कर वास्तव में समाज में मौजूद व्यवस्था के ख़िलाफ़ विद्रोह करता है।