Feb ०४, २०१७ १२:३३ Asia/Kolkata

हमने बताया था कि ईरान में तैमूरी शासनकाल को संस्कृति और कला के विकास के लिए एक सुनहरा काल माना जाता है।

इस काल में विशिष्ट सांस्कृतिक हस्तियों का उच्च पदों पर आसीन होना, इस काल की एक विशेषता है। सुल्तान हुसैन बायक़रा के बुद्धिमानी वज़ीर मीर निज़ामुद्दीन अलीशीर नवाई इस काल की एक विशिष्ट हस्ती थे। 17 रमज़ान 844 हिजरी क़मरी को एक विशिष्ट परिवार में उनका जन्म हुआ। शिक्षा ग्रहण करने के बाद और सुल्तान हुसैन बायक़रा के सत्ता संभालते ही वे उच्च न्यायालय के प्रमुख न्यायाधीश चुने गए और उन्होंने लोगों के लिए मूल्यवान सेवाएं अंजाम दीं। इस काल में विभिन्न शहरों और इलाक़ों से कलाकार जाकर सुल्तान हुसैन बायक़रा के दरबार में जमा हो गए थे। सुल्तान ने उनका समर्थन किया और उन्होंने ईरान की कला के इतिहास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। अमीर अलीशीर नवाई ने दरबारियों की ईर्ष्या के कारण, मंत्री के पद से इस्तीफ़ा दे दिया और सुल्तान के आदेश के अनुसार, उस्तराबाद राज्य के गवर्नर बन गए और 906 हिजरी क़मरी में वहीं उनका निधन हो गया।

अमीर अलीशीर नवाई उन मंत्रियों में से थे, जो स्वयं कलाकार होने के कारण कलाकारों का ख़ूब समर्थन करते थे। तैमूरी शासनकाल की कला के इतिहास में उनका महत्व इतना अधिक है कि कहा जा सकता है, तैमूरी काल में उनके अलावा अगर कोई और कला पर ध्यान नहीं देता तो उस काल को ईरान की कला में सुनहरा अवसर कहना काफ़ी था।

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तैमूरी दरबार, चित्रकारी, वास्तुकला, नक्क़ाशी और संगीत के विकास का केन्द्र बन गया था और इस काल के कलाकारों में सुलेख का भी काफ़ी महत्व था। यही कारण है कि उस काल की किताबें और शिलालेख इन सुलेखकों की कला का नमूना हैं। उस काल में सुलेख का प्रचलन इतना अधिक था कि तैमूरी शासक भी इस क्षेत्र में अपना हुनर आज़माते थे। शाहरुख़ तैमूरी के बेटे बायसन्क़र मिर्ज़ा और इब्राहीम सुल्तान सुलेखन में इतने प्रतिभाशाली थे कि उन्हें तैमूरी काल के विशिष्ट सुलेखकों में गिना जाता है। सुलेखकों के प्रोत्साहन और सुलेखन के विकास में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। बायसन्क़र मिर्ज़ा ने सुल्स लिपि में महारत हासिल की और उसमें किताबें लिखीं।

कहा जाता है कि उनके पुस्तकालय और वर्कशाप में चालीस विशिष्ट सुलेखक जाफ़र बायसनक़री के नेतृत्व में विभिन्न विषयों पर किताबें लिखने में व्यस्त थे, शाहनामे फ़िरदौसी का लिखना इस दल के महत्वपूर्ण कारनामों में से है। इब्राहीम सुल्तान को भी सुलेखन में दक्षता प्राप्त थी और वह सातवीं हिजरी शताब्दी के बग़दादी सुलेखक याक़ूत मुस्तासमी की शैली में लिखते थे, इस प्रकार से कि दोनों के लेख में अंतर करना मुश्किल होता था।

अमीर अलीशीर नवाई ने तैमूरी काल में सुलेखन के विकास में काफ़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्हें सोने की मुलम्माकारी, चित्रकारी और सुलेखन में दक्षता प्राप्त थी और उन्होंने अपने समय की कलात्मक एवं सांस्कृतिक विचारधाराओं को विभिन्न आयामों से प्रभावित किया है। उन्होंने हेरात को शायरी, साहित्य, संगीत, चित्रकारी, मुलम्माकारी और सुलेखन का केन्द्र बना दिया। हेरात में कला ने इतना विकास किया कि यहां के गुरुओं से कला सीखने के लिए कलाकारों के बीच प्रतिस्पर्धा रहती थी और यहां से कला का सीखना गौरव की बात होती थी। कला में रूची रखने वाले इस कलाकार वज़ीर द्वारा कला के समर्थन के कारण, सुलेखन समेत विभिन्न प्रकार की कलाओं का विकास हुआ और यहां से आसपास के शहरों और इलाक़ों तक कला स्थानांतरित हुई।

अमीर ने हेरात में मदरसए इख़लासिया, मदरसए शिफ़ाइया और मदसरए निज़ामिया और मर्व में मदरसए ख़ुसरविया जैसी इमारतों का निर्माण कराया, जिसके कारण शिक्षा और सुलेखन का विस्तार हुआ। इसी प्रकार उनका पुस्तकालय अपने समय का महत्वपूर्ण पुस्तकालय माना जाता था, जिसमें कलाकार कला के क्षेत्र में कार्य करते थे। उन्होंने अच्छी किताबों के संकलन में काफ़ी धन ख़र्च किया, जिन्हें दक्ष लेखकों ने लिखा था और दक्ष कलाकारों ने उन्हें सजाया था।

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अलीशीर की इस शैली के कारण, क़ुरान समेत विभिन्न विषयों में किताबों का प्रकाशन हुआ, जो आज भी बाक़ी हैं। उन्होंने सुलेखकों के प्रशिक्षण के लिए काफ़ी प्रयास किया और हमेशा उनका समर्थन किया। यही कारण है कि सुलेखकों को प्रशासनिक कार्यों में सेवा का भी अवसर प्रदान किया जाता था।

शाहरुख़ काल के गुरुओं जैसे कि मीर अली तबरेज़ी, जाफ़र बायसनक़री और अज़हर तबरेज़ी द्वारा प्रशिक्षित इस काल के प्रसिद्ध सुलेखकों ने अमीर अलीशीर के समर्थन से महत्वपूर्ण कार्य अंजाम दिए। अमीर अलीशीर के पुस्तकालय में मौलाना सुल्तान अली मशहदी, ख़्वाजा मोहम्मद हाफ़िज़ और मौलाना सुल्तान अली क़ायनी जैसे प्रसिद्ध सुलेखक सुलेखन के क्षेत्र में सक्रिय थे। वे नस्तालीक़ लिपि में दक्ष होने के साथ अन्य लिपियों में भी महारत रखते थे। उन्होंने काफ़ी महत्वपूर्ण रचनाएं छोड़ी हैं, जो आज भी ईरान और विश्व के कई देशों के संग्राहलयों की ज़ीनत हैं।

सुल्तान अली मशहदी एक ऐसे कलाकार थे, जो जवानी में ही सुल्तान अबू सईद मिर्ज़ा के निमंत्रण पर हेरात चले गए और सुल्तान हुसैन बायक़रा एवं अमीर अलीशीर का ध्यान अपनी ओर खींचा। वे शाही पुस्तकालय में काम करने लगे, हस्तलिखित किताबों में वे अपना नाम कातिब सुल्तान लिखते थे। अमीर अलीशीर ने अपनी किताब मजालिसुन्नफ़ायस में उनकी काफ़ी प्रशंसा की है। अमीर अलीशीर की किताब मजालिसुन्नफ़ायस को इस दक्ष कलाकार ने अमीर के घर की हौज़ के संग मर मर पर लिखा था। तैमूरी शासनकाल के अधिकांश अंतिम शासकों और दरबारियों के मक़बरे के शिलालेख सुल्तान अली मशहदी ने ही लिखे थे।

कहा जाता है कि एक दिन सुल्तान हुसैन ने उनसे कहा कि उनके लिए एक क़ब्र का पत्थर लेकर आएं, लेकिन सुल्तान अली ने ऐसा करने से क्षमा मांगी। हालांकि सुल्तान के जवाब ने उन्हें आश्वस्त कर दिया, जिसके बाद उन्होंने सुल्तान की क़ब्र के लिए एक अद्वितीय शिलालेख तैयार किया, जिसकी चकाचौंध हर किसी को हैरान कर देती थी।

सुल्तान अली इतने अधिक मश्हूर हो गए थे कि उनके हाथ की लिखी रचनाओं को कला में रूची रखने वाले और कलाकार संग्रहीत करते थे। सुल्तान याक़ूब आक़, जो ख़ुद भी एक सुलेखक थे, सुल्तान अली की रचनाओं को संग्रहीत करते थे। सुल्तान हसन बायक़रा और अमीर अलीशीर की किताबों की किताबत के अलावा भी सुल्तान अली अन्य लेखकों की रचनाओं को लिखते थे। उदाहरण स्वरूप, गुलख़नी उस्तराबादी संग्रह और हम्माम ख़लील नीज़े ची शिलालेख की ओर संकेत किया जा सकता है। सुल्तान हुसैन और अमीर अलीशीर की कृपा से सुल्तान अली की जो रचनाएं बाक़ी हैं, उन्हें तीन भागों, शिलालेख, किताब और बोर्ड में बांटा जा सकता है। ख़्वाजा अब्दुल्लाह अंसारी और मोहम्मद बिन बायक़रा के मज़ारों के शिलालेख, वह शिलालेख हैं, जो हेरात शहर से बाहर स्थित हैं।

गूयी व चूगान, रुबाइयाते ख़य्याम, अल-अहरार जामी, अल-असरारे निज़मी, दीवाने हाफ़िज़, मुनाजात नामे ख़्वाजा अब्दुल्लाह अंसारी और बूस्ताने साअदी उन दसियों किताबों में से कुछ किताबें हैं, जिन्हें अमीर अलीशीर के समर्थन से सुल्तान अली ने लिखा था। लगभग 470 बोर्ड, जिनमें से कई ईरान और विश्व के कई अन्य देशों के संग्राहलयों में रखे हुए हैं, सुल्तान अली ने तैयार किए थे।