Feb ०५, २०१७ १३:५० Asia/Kolkata

हमने नवीं शताब्दी हिजरी कमरी के ईरान के एक महान बुद्धिजीवी, शायर, लेखक विद्वान और राजनेता अली शीरनवाई के बारे में चर्चा की थी।

अली शीरनवाई विश्व विख्यात एक महान हस्ती हैं जिन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में मूल्यवान सेवाएं की हैं और उन्होंने मूल्यवान रचनाएं भी छोड़ी है।

हमने कहा कि तैमूरियों की सरकार का काल ईरान में शासन करने वाले परिवार का बेहतरीन काल था। इस परिवार ने संस्कृति और कला के क्षेत्र में जो सेवा की है उसके दृष्टिगत ईरान में संस्कृति व सभ्यता का सुनहरा दौर आरंभ हुआ। सत्ता में प्रतिभाशाली हस्तियों व व्यक्तियों की उपस्थिति इस दौर की एक विशेषता है। अमीर नेज़ामुद्दीन अली शीरनवाई, सुल्तान हुसैन बायकरा के दौर के  एक विद्वान व कला प्रेमी मंत्री थे और उन्हें उस दौर की एक महान हस्ती समझा जाता है। 17 रमज़ान 844 हिजरी कमरी अर्थात नौ फरवरी 1441 ईसवी को अली शीरनवाई का हेरात में एक शिक्षित परिवार में जन्म हुआ और शिक्षा प्राप्त करने तथा सुल्तान हुसैन बायकरा के सत्ता में पहुंचने के साथ अली शीरनवाई को मुख्य न्यायधीश नियुक्त कर दिया गया और उन्होंने लोगों के लिए मूल्यवान सेवाएं अंजाम दीं। उस काल में साहित्य और कलाप्रेमी हर शहर से सुल्तान हुसैन बायकरा के दरबार में आते और उन्हें अली शीरनवाई का समर्थन प्राप्त हो जाता था और इन लोगों ने किताबें लिखकर ईरान के साहित्य व कला के खजाने में वृद्धि की। अली शीरनवाई ने दरबारियों के द्वेष और ईर्ष्या के कारण अपने पद से त्याग पत्र दे दिया और सुल्तान हुसैन बायकरा के आदेश से वह दो वर्षों तक अस्तराबाद प्रांत के गवर्नर रहे और वर्ष 906 हिजरी कमरी में वहीं उनका निधन भी हो गया।

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इतिहासकारों ने इस साहित्य व कलाप्रेमी मंत्री की फार्सी और तुर्की में रचनाओं की संख्या 30 से अधिक बताई है जिनमें से कुछ अभी भी हैं जबकि कुछ दुर्लभ या उनकी कोई प्रति मौजूद नहीं है। ग़ज़लों के चार दीवान, खम्सा, मसनवी लेसानुत्तैर, तज़केरये मजालिसुन्नफाएस, मुन्शात पारसी व तुर्की और दीवाने फारसी अली शीरनवाई की बहुत सारी रचनाओं में से मात्र कुछ रचनाएं हैं।

अली शीरनवाई को तुर्की जुग़दाई शेरों का जनक कहा जाता है। फार्सी शेरों के अलावा तुर्की जुग़ताई में भी उनकी कुछ रचनाएं हैं जैसे ख़ज़ायेनुल मआनी नाम के चार दीवान, पंज मसनवी जिसे उन्होंने विस्तार से नेज़ामी की ख़मसा किताब का अनुसरण करके लिखा है। इसी प्रकार उन्होंने फरीदुद्दीन अत्तार की किताब मन्तिकुत्तैर का अनुसरण करके तुर्की जुगताई में एक मसनवी भी लिखी है।

तुर्की शेरों में अमीर अलीशीर का उपनाम नवाई है जबकि फार्सी शेरों में उनका उपनाम फानी था। मसनवी लेसानुत्तैर किताब अत्तार की मन्तिकुत्तैर किताब का तुर्की अनुवाद है। उसकी प्रस्तावना में अमीर अलीशीर अपने इन नामों के बारे में कहते हैं” तुर्की के शेरों में मैंने अपना उपनाम नवाई रख लिया और जब मैंने फार्सी में शेर कहना आरंभ किया और इस भाषा में मैंने हर प्रकार के शेर कहे तो मैंने अपना उपनाम फानी रख लिया।“  

अमीर अलीशीर ने मसनवी लेसानुत्तैर में भी अपना उपनाम फानी रखा है और उसकी प्रस्तावना में इसके कारण को उन्होंने इस प्रकार बयान किया है” जब मैंने लेसानुत्तैर का अनुवाद आरंभ किया और विभिन्न पक्षियों के साथ परवाज़ की। चूंकि इस किताब की रचना का मूल उद्देश्य आरंभ और अंत अर्थात ईश्वर और प्रलय को बयान करना था और दूसरी ओर मैंने फार्सी रचनाओं में फ़ानी उपनाम रख लिया है जबकि यह किताब तुर्की में थी फिर भी मैंने फानी उपनाम को उचित व बेहतर समझा। इसी प्रकार शेख फरीदुद्दीन अत्तार की इस किताब में मैंने पक्षियों की बातों को बयान किया है और पक्षियों की सैर को सात वादियों व चरणों में निर्धारित किया है और सातवां चरण फना व ख़त्म का है।

अमीर अलीशीर फार्सी और तुर्की दोनों भाषाओं में शेर कहने में सक्षम थे इसी कारण उन्हें ज़ू लेसानैन अर्थात दोभाषी की उपाधि दी गयी। अरबी भाषा के शेरों को भी उनसे संबंधित बताया गया है जबकि अब तक इस भाषा में अमीर अलीशीर के शेरों की कोई प्रति नहीं मिली है। यद्यपि अमीर अलीशीर तुर्की भाषा के शेरों के जनक के रूप में प्रसिद्ध हैं परंतु फारसी साहित्य में भी उनका उल्लेखनीय योगदान है। उन्होंने फारसी भाषा की मिठास फिरदौसी, सादी, अत्तार, नेज़ामी जैसी हस्तियों से सीखी और उनसे लाभ उठाया है। साहित्य के इतिहासकारों ने लिखा है कि अमीर अलीशीर नवीं शताब्दी के प्रसिद्ध ईरानी शायर अब्दुर्रहमान जामी की विचारधारा के अनुसरणकर्ता थे। जो मसनवी उन्होंने यात्राओं में अपनी हालत बयान करने और सुल्तान हुसैन बायकरा से जुड़ जाने से पहले कही है उसके अध्ययन से इस बात को समझा जा सकता है कि उन्होंने शेर कहना किशोरावस्था से आरंभ कर दिया था और वह ऐसे व्यक्ति की खोज में थे जिसकी प्रशंसा में शेर कहें।

अमीर अलीशीर की कुछ रचनाएं फारसी में हैं जैसे उनका फारसी दीवान। इस दीवान में ग़ज़लें, चौपाइयां और पहेलियां आदि हैं। इन्हें अमीर अलीशीर ने कहा है और इनमें लगभग 6 हज़ार शेर हैं।

ज़हीरुद्दीन बाबर जैसे कुछ लोगों ने फारसी में अमीर अलीशीर के शेरों के अच्छे होने के बावजूद उन्हें अच्छा नहीं कहा है जबकि गूरसे जैसे कुछ लोगों का मानना है कि अमीर अलीशीर जिस प्रवाह से फार्सी में शेर कहते थे उसी प्रवाह से वह तुर्की में भी शेर कहते थे। अर्थों की गहराई और उच्च मानवीय विचार उनके शेरों की मुख्य विशेषता है।

अमीर अलीशीर के शेरों को दो भागों में बांटा जा सकता है। पहला उन गज़लों का है जिसे उन्होंने दूसरों के अनुसरण के बिना अपनी रूचि व बोध से कही हैं। दूसरे उन गज़लों का है जिसे उन्होंने हाफिज़, साअदी, नेज़ामी, अत्तार, जामी और अमीर खुस्रो देहलवी का अनुसरण करके कही हैं। उन्होंने अपनी अधिकांश गज़लें खाजा हाफिज़ शीराज़ी का अनुसरण करके कही हैं। वह हाफिज़ से बहुत श्रद्दा रखते थे और उन्होंने खाजा हाफ़िज़ शीराज़ी आत्मज्ञानी मत का अध्ययन किया है और उसी में वह आगे बढ़े हैं।

अमीर अलीशीर, नेज़ामी गंजवी और अमीर खुस्रो देहलवी के शेरों से बहुत प्रभावित थे इसके बावजूद वह स्वयं को इन शायरों से श्रेष्ठ समझते थे। वह अपनी रचनाओं में रूदकी और खय्याम का नाम नहीं लेते हैं। उनके शेर इस बात के सूचक हैं कि शायरी की कला में वह इन शायरों से प्रभावित थे। अमीर अलीशीर की एक रचना में स्पष्ट किया गया है कि लगभग कोई दीवान नहीं बचा है जिसके शेरों को उन्होंने न पढ़ा हो और उसकी समीक्षा न की हो। उन्होंने बड़े शायरों के अनुसरण को न केवल बुरा नहीं कहा है बल्कि उनके अनुसरण को भीख की संज्ञा दी है।

अमीर अलीशीर नवीं शताब्दी के प्रसिद्ध ईरानी शायर अब्दुर्रहमान जामी के मित्र और समर्थक थे और शेर कहने में वह उनकी शैली का अनुसरण करते थे और अपनी ग़जलों को सुधार के लिए उनके पास भेजते थे और उन्होंने अपनी बहुत सी रचनाओं को उन्हें भेंट कर दिया। जामी के कहने से अमीर अलीशीर नक्शबंदिया मत से जुड़ गये। अमीर अलीशीर ने फारसी में जो चौपाई कही है वह भी बहुत अच्छी हैं और थोड़ा- बहुत उसमें सूफीवाद और रहस्यवाद के अर्थ हैं। उन्होंने कभी अपने शेरों में बहुत ही अच्छी व मीठी भाषा का प्रयोग किया है जो बाद में फारसी कहावत के रूप में प्रसिद्ध हो गयीं।  

अमीर अलीशीर ने फारसी भाषा में भी गद्य रचनाएं छोड़ी हैं जो ध्यान योग्य हैं।

“तोहफुल मुलूक” और “सियरुल मुलूक” जैसे अमीर अलीशीर की कुछ रचनाओं के बारे में मौजूद जानकारियों से इस बात का पता नहीं चल पाता है कि वे किस भाषा में लिखी गयी हैं परंतु संभावना इस बात की है कि उन्हें फारसी में लिखा गया है। अमीर अलीशीर के लिखे हुए जो मूल्यवान पत्र हैं उन्हें मुन्शअत कहा जाता है और वे पुस्तकालयों में मौजूद हैं।